वन-रूम सेट का रोमांस- दिल्ली मेरी (5)

गिरने जा रहे हैं। आज वो हमारे यहां गिरा हुआ है। चार दिन से यहीं गिरा हुआ है। बहुत दिनों तक माथापच्ची करता रहा कि किस कद्दावर सिंह से पूछूं कि भाई गिरना क्या होता है। जब कोई किसी के यहां जाता है तो वो गिरना कैसे हो जाता है। कल मेरे यहां गिरा था सब। कुछ भटकती आत्माओं की टोली दोस्तों के वन-रूम सेटों की खोज में बेचैन रहती थी। उन्हें अपने कमरे में कम मन लगता था। वो हमेशा किसी न किसी के यहां प़ड़े रहते थे। शायद ज़मीन पर बिस्तर होने के कारण गिरना का चलन शुरू हुआ होगा। किसी आदिम प्रवासी ने पहली बार कहा होगा कि तुम्हारे बिस्तर पर आकर सीधे गिर गए। तभी से गिरना चलन में आया होगा।

गिरने-पड़ने के बाद हर उस नुक्कड़ की पहचान कर ली गई थी,जहां से कोई लड़की गुज़रती थी। कई लड़के लाइब्रेरी में भी इस टेकनीक का इस्तमाल करते थे। सीट इस तरह से ली जाती थी कि सामने या बगल में किसी लड़की के बैठने या बैठे होने की संभावना अधिक हो। बहुत सारे फोटोकॉपी के दम पर ही रोमियो बने रहे। किसी सीनियर का नोट्स फोटोकापी लिया और अपने वन-रूम सेट के किसी गुप्त स्थान में दफन कर दिया। छन-छन कर जानकारियां लीक की जाती थीं ताकि लड़कियों में नोट्स पाने की बेचैनी बने रहे। हालात को देख लड़कियों ने भी नोट्स लेने की टेकनीक निकाल ली थी। कई लड़के सीनियर के नोट्स को अपनी लिखावट में ढाल कर फोटोकॉपी बौद्धिकता के सहारे इम्प्रेसित करने की कोशिश करते थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के नोट्स की कई पंक्तियां समान होती थी। वो ज़माने से चली आ रही थीं।

चैम्पियन गाइड सबको रास्ता बता रहा था। घटिया होने के बाद भी चैम्पियन साक्षर विद्यार्थियों की संख्या ज़्यादा थी। दिल्ली विश्वविद्यालय के हर कॉलेज के कोने में फोटोस्टेट वाला मौजूद होता था। आज भी है। अब तो ईमेल से नोट्स चलने लगे हैं। तब छपाई होती थी। नोट्स देने को लेकर कई तरह की साज़िशों का जन्म हुआ। एक लड़का रोज़ कहीं से नोट्स लेकर आता था। लड़कियां टूट पड़ती थीं। मेरा ही जूनियर था। एम ए के क्लास में। उसने मुझे जीवन का ज्ञान दिया। बोला पानी में मछलियां तैर रही हैं। नोट्स दाना है। डाल दीजिए,फंस जाएंगी। कई लड़के इस तरह के दाने लेकर घूमते रहते थे। नोट्स कल्चर। मिलते ही झट से फोटोकॉपी। नोट्स को लेकर वन-रूम सेट कमरों में कई रिश्ते पुनर्परिभाषित हुए। कुछ टूट गए तो कुछ बने।

नोट्स को लेकर छात्रों का व्यवहार बदल जाता था। किसी के कमरे में अचानक पहुंचा और देखा कि मित्र किसी का फोटोकापी पढ़ रहा है तो पहली प्रतिक्रिया में वो नोट्स को मोड़ देता था। मेरी नज़रों से बचाने के लिए। बिस्तर पर पड़े नोट्स को बातों बातों में पहले पलटता था फिर गोल गोल कर हाथ में ले लेता था। ताकि बिस्तर पर बिखरा जान मैं उठा न लूं। प्रतियोगी होने के लिए अविश्वासी होना अनिवार्य शर्त है। कमरे में नोट्स का होना और अचानक आने की आंशका हमेशा वन-रुम सेट को कमज़ोर बनाती थी। लगता था कि किसी चोर ने बिना ताला तोड़े दरवाजा खोल दिया हो। कई दोस्तों को बक्से में नोट्स दबा कर रखते देखा। मौलिक लिखने की कोशिश में कलम की दाब से बने उंगलियों पर निशान आज भी मौजूद हैं। हिंदी में लिखता रहा। फिर भी दूसरे लोगों के नोट्स भी पढ़े हैं। मुझे आसानी से दे देते थे। क्योंकि अंग्रेजी में लिखने वाले यह मानकर चलते थे कि हिंदीवाला प्रतिस्पर्धी नहीं है। जब अंग्रेज़ी पढ़ना और समझना सीख गया तो ऐसे लोगों से नोट्स लेने में झिझक होने लगी जो मुझे प्रतिस्पर्धी नहीं समझते थे। नोट्स ने लिखने का अभ्यास डाल दिया। आज तक जारी है। फोटोकापी मशीन की दुकान तक पहुंचने के रास्ते में लड़के-लड़कियां किसी प्रतिस्पर्धी के द्वारा देख लिये जाने की आशंका से घिरे रहते थे। लिखावट से लेखक पहचान लिये जाने की आदत भी विकसित होने लगी। यह ज़रूरी था। अचानक छुपा लिये जाने की कोशिशों में लिखावट की एक झलक मौलिक नोट्स लेखक का अहसास करा देती थी। कहां तो उबलनी चाहिए थी इन जवानियों को, लेकिन वो ठंडी हो रही थीं,शाहरूख की मचलती अदाओं की राख पर। प्रवासी छात्रों ने रोमांस का व्यापक अनुभव तो किया लेकिन वो अपने मां बाप और समाज के आज्ञाकारी हो गए। उनकी बेवफाई को झेलती कई लड़कियों की आहें आज भी दिल्ली विश्वविद्यालय की दीवारों से टकराती हैं।

आईएएस बनने की कल्पना में इन वन-रूम सेटों में किसी रात दहेज के सामानों की सूची भी बनती थी। कितना मिलेगा और क्या क्या मिलेगा। फलाने सीनीयर जी को पचास लाख मिला है। शादी में इतने लोग आए थे। दहेज में सिनेमा हाल मिल गया है। प्रवासी छात्र आजादी की हवा तो ले रहे थे लेकिन उनके हर सपने परिवर्तनगामी विरोधी थे। पास से गुज़रती किसी लड़की की देह को नज़र भर देख थोड़ी देर जलते रहने की ऊर्जा उनकी जातिगत मानसिकता में प्रवेश करते ही कमज़ोर पड़ जाती थी। कई वन रूम सेट की बालकनियों और बाथरूम की खिड़कियों से उन झरोखों का रास्ता ढूंढ लिया गया था जिनसे वो किसी नहाती औरत और बेडरूम में कपड़े बदलती किसी स्त्री की देहकल्पना का साक्षात दर्शन कर सके। प्रवासी छात्र अपने इस आंतरिक अतीत को कहीं दफन कर गए हैं। मां-बाप की मर्ज़ी से शादी कर खुद को अच्छा सा लड़का कहलाने के लिए उसी भीड़ में चले गए हैं जिससे निकलने के लिए दिल्ली आए थे। पर दिल्ली की लड़कियों ने इन भूखी आंखों को जो खुराक दी,उसके लिए प्रवासी छात्रों को शुक्रिया अदा करना चाहिए। वन-रूम सेट ऐसे किस्सों से भरे होते थे।

लेकिन वन-रूम सेट ने उन्हें जो आजादी दी,उसकी कोई मिसाल नहीं। सेल से खरीदे गए जीन्स के जैकेट को पहनना और बार-बार आईने में देखना। कमरे से निकलने से पहले ये सुनिश्चित कर लेना ताकि किसी के देखे जाने पर कोई अफसोस न रहे। सुंदर होने और दिखने की पहली पुष्टि आईने के सामने होती थी। एक दूसरे की कमीज़ और स्वेटर पहनना आम बात थी। अच्छा दिखने का जुनून सवार हो रहा था। कई लड़कों ने कमला नगर और सरोजिनी नगर का रुख़ करना शुरू कर दिया था। डेढ़ सौ रुपये की कमीज़ और इतने की ही जीन्स। एक जीन्स कंपनी आई थी। लड़कों ने सेल की जानकारी रखनी शुरू कर दी। इन दुकानों में भटकने के बाद सब अपने अपने वन-रूम सेट में लौट आते थे। दराज़ में पड़ी प्लास्टिक के जार में रखे नमकीन और ठेकुआ खाने के लिए।

वन-रूम सेट का रोमांस- दिल्ली मेरी जान (4)

घर बदलना शुरू हो गया था। आठ सौ रुपये और पंद्रह सौ रुपये के वन रूम सेट के बीच अपनी आर्थिक औकात का साप्ताहिक मूल्यांकन होता रहता था। फोल्डिंग कॉट के आगमन से हम ज़मीन से उठकर थोड़ा ऊपर हुए। नीचे सोना बंद हो गया। गरम पानी से नहाने की आदत पड़ चुकी थी। इससे पहले सर्दी में भी ठंडे पानी से नहाता था। दिल्ली की सर्दी और इसके ख़ौफ़ ने इमरसन रॉड की आदत डाल दी। इमरसन रॉड बाथरूम के एक कोने में लटकता रहता था। ठंडे ठंडे पानी से नहाना चाहिए। ये गाने में ही अच्छा लगता था।


किचन के सामान जुड़ने लगे। खिचड़ी बनने लगी। दिल्ली में दही खिचड़ी खूब खाई। खाना बनाने नहीं आया तो बर्तन धोने वालों में शुमार हो गया। अपने लिए रामू का किरदार चुन लिया। बर्तन धोकर दोस्तों के बीच अपराध बोध कम हो जाता था और भोजन पर दावेदारी बन जाती थी। दोस्तों ने बर्थ-डे मनाना शुरू कर दिया था। पटना में इस तरह से उनमुक्त बर्थ-डे मनते नहीं देखा था। मां-पिता से दूर होने और स्थानीय सामाजिक बंधनों से आज़ाद होने के कारण बर्थ-डे एक स्पेस बन रहा था। जिसके सहारे प्रवासी छात्र दिल्ली से अपनी सामाजिकता कायम कर रहे थे। इन्हीं मौकों के बहाने वन-रूम सेट में लड़कियां आने लगीं। मैंने बहुत पहले दिल्ली की लड़कियां सीरीज़ में ज़िक्र भी किया है।


बर्थ-डे साल का वो एक दिन। इस दिन के लिए लड़की आगमन विरोधी मकान मालिक को समझौता करना पड़ता था। इन्हीं सब तात्कालिक आयोजनों के बहाने दिल्ली के मकान मालिक उदार होने लगे। मकान-मालिक और किरायेदार का रिश्ता सास-बहू का होता है। हर समय शक। हर समय नया विश्वास। लेकिन इस नियम का ऐसा दबाव था कि जब कोई साथ आने की कोशिश करती थी तो तमाम बंदिशों के कांटे चुभते थे। ठीक वैसे ही जैसे कोई लड़की गली पार करती हुई हर दिन इस तरह की आशंकाओं से गुज़रती होगी। अच्छी बात ये रही कि लड़कों को भी देख लिये जाने के भय का अंदाज़ा हुआ।


ख़ैर,ज़्यादा मुश्किल लड़कियों को हुआ होगा। उन्हें हर दिन मकान मालिक को विश्वास का इम्तहान देना होता होगा। न जाने उनके कितने दोस्त इस दिल्ली में भाई बनकर उनकी बरसाती में गए होंगे। मिलने की हर जगह शक से देखी जाती है। ये हमारी सामाजिक नैतिकता की देन है। वन-रूम सेट ने प्रवासी लड़कियों को भी नई ज़िंदगी दी। कपड़े से लेकर खाने तक की आदत बदली। शराब और सिगरेट उनकी ज़िंदगी में भी आए। स्थानीय पहरेदारी से दूर होने के बाद भी मकान-मालिक और उनका परिवार सामाजिक बंदिशों के विकल्प के रूम में काम कर रहा था। फिर भी लड़कियों का जीवन बदला। उन्होंने लेट नाइट सिनेमा देखने का आनंद लेने शुरू कर दिया। उत्तरी दिल्ली का बत्रा सिनेमा बिहार यूपी से आई लड़कियों के रात्रि जीवन का पहला पड़ाव था। ग्रुप में लड़कियों का आना एक नया अनुभव था। बिहार की खराब कानून व्यवस्था ने इन मामूली सार्वजनिक अनुभवों को बंद कर रखा था।


डीटीसी की बसों ने वन-रुम सेट से निकल कर आने वाली लड़़कियों को सार्वजिनक स्पेस में घुसने का साहस और अनुभव दिया। सार्वजनिक स्पेस में की जाने वाली दादागीरी में भी लड़कियों ने हिस्सेदारी की। मुझे पहली बार एक लड़की ने ही कहा था तुम टिकट क्यों लेते हो। स्टाफ क्यों नहीं बोलते। दिल्ली की बसों में छात्र टिकट नहीं लेते हैं। प्राइवेट बसों में स्टाफ चलाते हैं। उस लड़की ने मेरी तरफ से कहा था कि ये स्टाफ है। इस नकारात्मक बदलाव पर मैं सकारात्मक हो गया। उत्तरांचल की एक संभ्रात सी लड़की से स्टाफ बोलना सीख गया। लेकिन अकेले बोलने में मुश्किल होती थी इसलिए धीरे धीरे कम कर दिया और बाद में बंद कर दिया। इन्हीं यात्राओं के ज़रिये जाना कि बसों में लड़कियों के साथ क्या क्या होता है। पहले तो लड़कियां बात नहीं करती थी लेकिन अब इस बारे में खुलकर बातें करती हैं। लड़कों की बातचीत से जाना कि कैसे एक लड़का चढ़ता तो साथ था लेकिन अचानक आगे चला जाता था। डीटीसी की बसों में लड़कियों,महिलाओं का समूह अक्सर आगे की तरफ जमा होता था। आगे नहीं लिखना चाहता था।


वैसे लड़कियों के लिए वन-रूम सेट आज़ादी बन कर आए। उनकी दीवारों पर जार्ज माइकल से लेकर शाहरूख ख़ान बेधड़क टांग दिये गए। इन लड़कों के दीवारों पर चौबीसों घंटे टंगे रहने पर किसी मकान मालिक को आपत्ति नहीं थी। सिर्फ कोई साक्षात न आ जाए। कल्पनाओं और चाहतों के ज़रिये कोई भी कमरे में आ जा सकता था। लेकिन ये खुशनसीबी दुनिया के चंद मशहूर शख्सियतों को ही हासिल थी। उन लड़कों को हासिल नहीं थी जो किसी लड़की के आने की अभिलाषा में अपने कमरे को सजाते रहते थे। आर्ची कार्ड के ज़रिये न जाने कितने रिश्ते बनाने की कोशिश हुई। लेकिन प्रवासी छात्रों ने इसे अपने संवाद का ज़रिया बना लिया। बर्थ-डे कार्ड को ध्यान से इसलिए पढ़ा जाता था ताकि कुछ इशारा तो मिले कि देने वाला या देने वाली के मन में क्या है। आर्ची गैलरी से खरीदा गया “इश्क का इत्यादि सामान”( एक्सेसरीज) मुझे बड़ा आकर्षित करता था। अपना जन्मदिन तो नहीं मना लेकिन जिन दोस्तों का मनता था उनको मिलने वाले तोहफे में मेरी नज़र इन इत्यादि सामानों को ढूंढती रहती थी। कप। फ्रेम। फ्रेम पर लिखा दोस्ती का खूबसूरत अफसाना। कुछ दिल नुमा टाइप की आकृति। कुछ कमरों में आर्ची से लाए गए पोस्टर। पोस्टरों पर लिखीं सूक्तियां। इन सूक्तियों वाले पोस्टरों के ज़रिये भी लड़के-लड़़कियां ख़ुद को डिफाइन यानी परिभाषित करने की कोशिश कर रहे थे। और हां...मौका निकाल कर किसी बहाने से किसी को छू लेने के बाद की तड़प और बाद में उस पर रात भर चर्चा। इस पर लिख दूंगा तो मार दिया जाऊंगा।


ये तो बताना भूल ही गया कि रात तक जागना,देर सुबह तक सोना और रजाई में घुस कर पढ़ना। दीवारों पर यूपीएससी की तैयारी का रूटीन चस्पां हो चुका था। दीवारों पर यूपीएसपी की तैयारी के रूटीन चस्पां होने लगे। रजाई में घुस कर देर तक पढ़ना और सिगरेट की डिब्बी में राख का जमा होना। हर कमरे की यही कहानी थी। नहीं पीने वाले मेरी तरह घोर नैतिकतावादी। लगता था जो सिगरेट पीता है वो अपने मां-बार से छल करता है। अब हंसी आती है। जो नहीं पीता वो भी छल करता है। ये बात बाद में समझ में आई। वन-रूम सेट का एकांत इन्हीं सब बातों से भरता था। मंडल, बाबरी मस्जिद को लेकर बहस और सचिन के कमाल की बातों से रातें कट जाया करती थीं। इन बहसों से प्रवासी छात्र-छात्रायें अपनी राजनीतिक सोच गढ़ रहे थे। उस वक्त रात के वक्त टीवी पर बहस नहीं होती थी। हम सब आपस में बहस करते थे। अब शायद हमारे टाइप के लोग टीवी के बहसकारों की बातों पर एसएमएस भेजते होंगे। जारी है...

वन रूम सेट का रोमांस-दिल्ली मेरी (3)

वन रूम सेट में रहने वालों की एक मानसिकता होती है। वो कभी अपने कमरे से संतुष्ट नहीं रहते। हमेशा एक बेहतर वन-रूम सेट की तलाश में रहते हैं। गोविंदपुरी,बेरसराय और मुनिरका की गलियों में आप देखेंगे, लोग ठेले पर सामान लादे एक गली से दूसरी गली में जा रहे होते हैं। इनमें से कोई न कोई तो ऐसा होगा ही जो अच्छे कमरे की तलाश में बदली कर रहा होगा। सीमित सामान के साथ जीने की कला वन-रूम सेट में ही रहते हुए आती है। प्लास्टिक की बाल्टी। पानी का सबसे बड़ा जलाशय और किताबें रखने के लिए बेंत की रैक। ये प्रवासी छात्रों का ज़रूरी सामान बनता जा रहा था। बीसवीं सदी का आखिरी दशक। उन्नीस सौ नब्बे। डियोड्रेंट अभी छात्रों की ज़िंदगी में नहीं आया था। पटना के मौर्यालोक से खरीद कर लाई गई सेंट की शीशी से बात आगे नहीं बढ़ी थी। एनसीआरटी की किताबें दोस्तों की रैक पर किसी सपने की तरह सोती नज़र आती थी। किताबों को अंडरलाइन करके पढ़ना। इन सबके बीच तकीये के नीचे छुपा कर रखी गई मेरी रैपिडेक्स इंग्लिश स्पिकिंग कोर्स की किताब। आज तक कोर्स पूरा नहीं हुआ। कमबख्त बैरी इंग्लिश आई ही नहीं अपनी लाइफ में। हर तरह से लुभाया, बुलाया मगर जालिम आज तक तड़पाती है। दोस्तों की इंग्लिश उधार लेकर अपना काम चला लेता हूं। वो मेरे लिए लिख देती हैं। खैर। रैपिडेक्स पर अपने ब्लॉग पर पहले भी लिख चुका हूं।


वन रूम सेट एक स्पेस बन रहा था। जिसके भीतर हम खुद को ढूंढ रहे थे। बंद कमरे में अपने आप को देखने के अलावा कुछ था ही नहीं। कल्पनाएं ऐसे हमला करती थीं कि छोटे से कमरे में दम घुटने लगता था। ज़मीन पर पड़ा गद्दा और उस पर चेकदार चादर। सिंगल बेडशीट भी वन रूम सेट की तरह जीवन का हिस्सा बन गया। वाटर फिल्टर जीवन में आ गया। ख़राब पानी ने जब पीलीया का मरीज़ बनाकर पटक दिया तो वॉटर फिल्टर लाना पड़ा। नदी के किनारे बड़ा हुआ था। गंडक और गंगा के किनारे। पानी छान कर नहीं पीया। बीच धार से गंगा का पानी कटोरे में भर कर पीया है। गोविंदपुरी में स्टील का वॉटर फिल्टर। पानी छनता था। हम मुफ्त पानी से साफ और महंगे पानी पीने की आदत के शिकार हो रहे थे। सुबह जब कमरे को साफ कर देता था तो लगता था कि जीवन में कुछ अपना होना ज़रूरी है और वो अपना अपने हिसाब का होना ज़रूरी है। फिर भी अपने साथी को रूम मेट बुलाना अजीब लगता था। कौन है तुम्हारा रूम मेट? एक लड़की ने जब यह सवाल पूछा तो हैरान हो गया। उसका नाम तो अनुराग है। अरे..वही...तुम्हारे साथ रहता है तो रूम मेट ही हुआ न। जब वी मेट तो बहुत बाद में आई। हम तो अपनी लाइफ में रूम मेट पहले बन गए थे। कमरे के दोनों छोर पर दीवार से सटा कर लगाए गए बिस्तर। बीच का रास्ता किसी राजपथ सा लगता था। कृपया जूते बाहर उतारें का नोटिस बोर्ड। यह भी नया था।


और हां,हिंदी अखबार पढ़ने की आदत छूट गई। आर्यावर्त,प्रदीप,इंडियन नेशन,हिंदुस्तान,पाटलिपुत्र टाइम्स,नवभारत टाइम्स और जनसत्ता पढ़ने के संस्कारों से दूर चला गया। ये कैसे हुआ पता नहीं लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया हर दिन दरवाजे के बाहर पड़ा मिलता था। हॉकर पेपर का रोल बनाकर काली रबड़ चढ़ा कर फेंक देता था। सुबह सुबह इस तरह पेपर की बेकदरी बर्दाश्त नहीं होती थी। आदत नहीं थी अखबार को पढ़ने से पहले कूड़े की शक्ल में देखना। जब अपना घर हुआ तो सबसे पहले हॉकर को यही कहा अखबार दरवाज़े पर चाहिए। मोड़़-माड़ के नहीं देना। अब अख़बार अख़बार की तरह मिलता है।


गोविंदपुरी के मकान में शर्मा जी ने कहा कि आप एच के दुआ का आर्टिकल पढ़ते हैं। नहीं। क्या पढ़ते हैं,शर्मा जी के इस सवाल पर ईमानदारी से कह दिया कि अंग्रेजी नहीं आती। शर्माजी का एक और सवाल। फिर क्या आती है। हिंदी आती है मुझे। शर्मा जी झुंझला गए। हिंदी आती है। हिंदी इज़ अ डेड लैंग्वेज। सुन कर ऐसे लगा किसी ने बेंत की छड़ी कस दी हो। शर्मा जी ने एच के दुआ के लेखों की कतरनों की फाइल दे मारी। कहां पढ़ो। अंग्रेज़ी सीखो। कुछ नहीं कर पाओगे। मेरे तकिये के किनारे एच के दुआ और गिरीलाल जैन के लेखों की कतरनें सोने लगीं। वो सोती ही रह गईं। मैं अपने ख्यालों की भाषा में ही खोया रहा। जहां शब्द चित्र बनकर चलते दिखाई देते थे।


हाफ पैंट। पतले दुबले शरीर की डंडी सी लंबी टांगों पर जब चढ़ी तो लगा कि लंगोट के ऊपर लंगोट क्यों पहनी गई है। शर्मा जी ने ठीक ही कहा होगा कि पूरे कपड़े पहनो जी और बाहर रात में सोना बंद कर दो। दिल्ली साली। पहले बदलती है और फिर बदल कर पूछती है कि इतना क्यों बदल गए। बहुत गुस्सा आया। मैंने कहा शर्मा जी, गर्मी के दिन हैं। अंदर लगता है कि जल जायेंगे। आपकी तकलीफ? कहा मेरे घर में बहू है। आप हाफ पैंट यानी शॉट्स न पहने और अंदर सोने की कोशिश कीजिए। मकान मालिक का फरमान था। जिस शहर में शाहजहां जैसे बादशाह आकर दुनिया से गए हों,उसी शहर में एक बादशाह तुगलक भी हुआ और उसी शहर में मोहम्मद शाह रंगीला भी। उसी शहर में शर्मा जी खुद को बादशाह क्यों न समझें। मकान बनाना किसी मुल्क को बनाने से कम नहीं। जवाहरलाल नेहरू और दिल्ली के किसी मकान मालिक के बीच बहस करा दीजिए। आप तय ही नहीं कर पायेंगे कि मुल्क बनाना मुश्किल काम था या मकान।


दिल्ली के वन-रूम सेट नए कानूनों की संसद में बदल गए। दस बजे से पहले घर आना है,पानी के लिए मोटर बार बार नहीं चलाना है, गेस्ट कम आयेंगे। लड़कियां तो सिर्फ बहू बन कर ही आ सकती थीं। एक मकान मालिक के सवालों से तंग आ गया था। बोल दिया कि मेरी शादी हो गई है। बीबी बिहार में रहती है। गांव में। वो नहीं आएगी। यहां की लड़की कैसे ला सकते हैं। शादीशुदा होना एक सोशल परमिट है। ड्राइविंग लाइसेंस। बनवा लीजिए और ट्रैफिक के नियम तोड़ते रहिए। खैर उस घर में बात पटी नहीं। जिस घर में बात पटी उस घर के मालिक से मेरा सवाल काम कर गया। इस बार मैंनें पूछ दिया। आप जब मेरी उमर के थे तब क्या करते थे। वो चुप हो गए। मेरा जवाब ये था- हम भी वही करते हैं जो आप करते थे। भरोसा करना है तो कीजिए। वर्ना मकान बनाकर अपनी नैतिकता हमारे ऊपर मत थोपिये। बस घर मिल गया। साला फिल्म का डायलॉग लगता है। लेकिन सच्ची मुच्ची का डायलॉग।


ऐसी बात नहीं है कि लड़कियां नहीं आती थीं। उन्हें भी जानना था कि साथ पढ़ने वाले ये लड़के आए कहां से हैं। रहते कहां हैं। जब भी कोई लड़की कमरे में आती तो उसकी गर्दन कमरे में पूरे ब्रम्हांड की तलाश करती। उसके पांव दहलीज़ पर ऐसे ठिठकते थे जैसे कोई हमारी नीयत का इम्तहान ले रहा हो। उनके जाते ही मकान मालिक आता था। कौन थी। जी..... लड़की। लड़की कैसे आ गई। अब कोई आना चाहे तो कैसे मना कर दें। मकान मालिक के जाने के बाद हम सब आशंकाओं की दहलीज़ पर खड़े मिलते थे। गहरे अविश्वास से शुरू होने वाले रिश्ते वक्त की आंधियों के साथ उड़ते चले गए। वन-रूम सेट की दहलीज़ को जो पार नहीं कर सका वो जान ही नहीं सका इन अंधेरे कमरों में आने वाले कल के लिए कैसे कैसे ख्वाब सजाते हैं। वो देख ही नहीं पाए बिस्तर के नीचे दबीं रूम मेटों की चिट्ठियां। जिनमें उनके मां बाप लिखते थे। सिर्फ पढ़ना है। आईएएस बनना है। मुश्किल से पढ़ा रहे हैं। दो सौ रूपये अलग से भेज रहा हूं। जूस के लिए। इस तरह के खत आते थे। मेरे बाबूजी ने तो कभी खत ही नहीं लिखा। डाकिया, कमबख्त कभी मेरे लिए भी आता। कुछ करने के भयंकर दबाव से कभी-कभी वन-रूम सेट हिटलर का गैस चेंबर लगता था। खै़र जिन्होंने हमारे वन रूम सेट की दहलीज़ पार की, उनकी दुनिया बड़ी हो गई। दिल्ली टकरा रही थी। टिन के डिब्बे की तरह हिल रही थी। आंटा समाने लगा। हम सब एक दूसरे को अपने अनुभवों से भरने लगे। लड़कियों के लिए लड़के बदलने लगे। ये आप दिल्ली की लड़कियां सीरीज़ में पढ़ सकते हैं। पहली बार एक शब्द ज़िंदगी में आया। इम्प्रेस करना।


इस पर अभी नहीं। लेकिन गलियों में सुबह सुबह ठेले पर लदे ब्रेड और अंडे। दरवाज़े पर दूध का पाकेट। किस शहर में मैं भी आ गया था। जहां कोई किसी को फूफा,मामा, चाचा नहीं बोलता था। धोबी से लेकर दूधवाला, पेपर वाला और मकान मालिक। सबके सब अंकल जी। रिश्तेदारियों के इस मुल्क में सबको अंकल जी पुकारना अजीब लगता था। सारी महिलायें आंटी जी। दिल्ली विश्वविद्यालय की तरफ मेरी बस पहुंच रही थी। मैं उतरने वाला था। उम्र और सूरत देखे बिना उस महिला को आंटी जी कह दिया। आंटी जी थोड़ी सी जगह दीजिएगा। गुस्सा गई। क्यों बे...मैं तेरी आंटी लगती हूं। अब ये तो नहीं कह सकता कि दिलरुबा भी नहीं लगती हैं। खैर। चुप हो गया। जब आंटी गाली ही लगती है तो साली दिल्ली सबको अंकल-आंटी बुलाती क्यों हैं। वैसे मुझे भी अच्छा नहीं लगता। अंकल जी बुलाया जाना। बुलाते तो हैं। दिल्ली के अंकल-आंटी पर फिर भी कभी। वन रूम सेट का रोमांस और दिल्ली मेरी जान जारी है।

वन-रूम सेट का रोमांस- दिल्ली मेरी जान(2)

गोविंदपुरी के शर्मा जी का वन-रूम सेट। तीसरी मंज़िल पर। टेबल फैन की औकात नहीं थी कि वो दिल्ली की गर्मी से राहत दिला दे। चटाई लेकर छत पर सो जाता था। बगल की छत पर सो रहे मज़दूरों के रेडियो से छन कर आते हिंदी गाने। किसी रात जाग रहा था। आसमान में ताकने के लिए कुछ नहीं था। इक शहशांह ने बनवा के हसीं ताजमहल, सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है। पहली बार तभी सुना था यह गाना। सोचता रहा कि कितनी मुश्किल हुई होगी रफी चचा को गाने में। जैसे किसी गद्य को उठाकर गा दिया हो। गाना खतम हुआ और मैं गोविंदपुरी के ताजमहलों को देखने लगा।


गज भर ज़मीन पर बने मकान। ऊंचे उठते चले आए थे। कुछ बन रहे थे और कुछ बन चुके थे। बाहर से आ रहे प्रवासी छात्रों और मजदूरों के लिए। मज़दूरों की डिल्ली और छात्रों की दिल्ली के लिए। गोविन्दपुरी प्रवासियों के लिए किसी सेज़ की तरह एकीकृत शहर के रूप में उभर रहा था। तब किसी गली का नाम नहीं होता था। नंबर होता था। इतनी गलियां थीं कि नाम रखने के लिए महान लोगों की सूची कम पड़ जाती। लाखों मकानों का अपना कोई चरित्र नहीं था। किसी भीड़ की तरह बने लगते थे मकान। हर मकान का नंबर होता था। मकान का नंबर बटा गली नंबर। इसी से बनता था पता। लाल किले से खरीदा गया बीस रुपये का रेडियो। वॉक मैन का भतीजा लगता था। कान में तार घुसा कर हिला हिला कर सुनना पड़ता था। हल्की सी आवाज़ भी गोविंदपुरी के भदेस मकानों को ताजमहल के रंग में रंग देती थी। किशोर के गीत हों या फिर कुमार शानू का गाना। तू मेरी ज़िंदगी है...तू ही मेरी पहली चाहत...तू ही आखिरी है। कोई रोको न दीवाने को...मन मचल रहा...कुछ गाने को।


जब बीस रुपये वाले रेडियो(ट्रांजिस्टर) से काम न चला तो पहली बार बाबूजी से अपने लिए कुछ मांगने की हिम्मत जुटा ली। बाबूजी से आंखें मिला कर कुछ मांगने की ये मेरी ज़िंदगी की पहली घटना थी। रेडियो चाहिए। उन्होंने पूछा कि किस लिए। तुम यहां गाना सुनने आए हो। पढ़ो। मुझे भी हिम्मत नहीं हुई कि कह दें कि गाना सुनना है। कह दिया कि बीबीसी सुनना है। आज पलट कर देखता हूं तो लगता है कि मीडिया की साख कितनी प्रभावशाली होती है। तभी ऑटो तेजी से लेडी श्रीराम कालेज के बगल से गुज़रा। बाबूजी के साथ रेडियो खरीदने को लेकर बहस चल रही थी। बीच में बात से बचने के लिए उनको दिखाया कि ये एलएसआर है। लड़कियों का सबसे अच्छा कालेज। बाबूजी ने कहा....तो। मैं चुप हो गया। सत्रह साल बाद वो उसी एलएसआर के सामने खड़े थे। अपनी बहू को छोड़ने गए थे। मेरी पत्नी वहीं पढ़ाती हैं। वो बताती हैं कि तब एलएसआर की तरफ देखकर रोने लगे थे। हमारे मां बाप ऐसे ही हैं। भावुक ज़्यादा। रोया नहीं तो संवाद ही पूरा नहीं हुआ। खैर सत्रह साल पहले की उस दुपहरी आटो भागा जा रहा था। बीच बीच में बाबूजी ड्राइवर से घर का पता पूछ रहे थे। कहां के हो। कौन ज़िला है, नाम क्या है। फलाने का मकान देखा है रे। तुम्हारे गांव में गए हैं। शादी में गए थे। प्रवासियों की बातचीत। खुश हो जाते थे कि बेटे का परिचय किसी अपने इलाके वाले से करा दिया है। लेकिन रेडियो की बात पर कोई वादा नहीं किया। काश समझ पाते कि जवान बेटा इस शहर में आकर अकेला हो गया होगा। क्या पता रेडियो से उसका मन बहल जाए। अगले दिन बाबूजी चुपचाप पहाड़गंज गए और रेडियो ले आए। इतने सख्त और बेरहम पिता से मुझे उम्मीद नहीं थी। वो ऐसे ही थे। बाहर से सख्त और अंदर से मुलायम। खेतिहर समाज के पिता ऐसे ही हुआ करते हैं। बाहर से एकदम पत्थर। उनसे घुलने मिलने की जगह बनानी पड़ती थी। लेकिन जब भी वो कोना खुलता था तो लगता था कि अभी उनसे लिपट जाएं। हमने अपने बाबूजी को ऐसे ही चाहा। दूर से।

ये और बात है कि उस रेडियो ने कभी बीसीसी नहीं पकड़ा। हिंदी गानों ने मुझे भरना शुरू कर दिया। जब कोई बात बिगड़ जाए,जब कोई मुश्किल पड़ जाए। ये गाना मुझे बेहद रोमाचिंत कर देता था। समझ में नहीं आता था कि कौन देगा मेरा साथ मुश्किल वक्त में। लेकिन किसी के होने का कोमल अहसास पनपता रहा। दिल्ली की बसों में सवार होने से पहले तय करने लगा कि गाना बजता है या नहीं। बिना स्टीरियो वाली बस में कभी नहीं चढ़ा। गाना अच्छा बजाया तो दो चार स्टॉप आगे तक चला गया। कभी ऐसा नहीं हुआ कि अपनी पसंद का गाना खतम होने से पहले बस से उतर गया। मुझे नींद न आए...मुझे चैन न आए...कोई जाए ज़रा ढूंढ के लाए..न जाने कहां दिल खो गया। दिल का गाना बज रहा था। कालकाजी मोड़ से बस निकलकर नेहरू प्लेस चौराहे पर आ गई थी। रफ्तार के साथ हवा तेज़ होने लगी। खिड़की वाली सीट पर बैठे दिल्ली को गुज़रते देखने का रोमांस चालू था। मैं धीरे धीरे इस शहर का अपना होने लगा था। उदित नारायण की आवाज़। माधुरी का डांस। हालत क्या है कैसे तुझे बताऊं मैं..करवट बदल बदल कर रात बिताऊं मैं...। पूछो ज़रा पूछो ज़रा क्या हाल है...हाल मेरा बेहाल है....। कोई समझ न पाए..क्या रोग सताए...कोई जाए ज़रा ढूंढ के लाए। फिरोज़शाह रोड की तरफ जाने वाली बस। एम-१३। खचाखच भरी हुई। मंडी हाउस के पास उतार देती थी। पैदल आईसीएचआर की लाइब्रेरी पहुंच जाते थे। ऐ सनम हम तो तुझ से प्यार करते हैं....तेरी उम्मीद..तेरा इंतज़ार करते हैं। लौटते वक्त इस टाइप का गाना सुनकर इक्कीसवीं सदी के आने से पहले की जवानियां सपनों में खो जाया करती थीं।


हिंदी फिल्मों के गानों से ही इस शहर से एक रिश्ता बना। मेरे वन रूम सेट का पूरी दिल्ली से एक संबंध कायम हुआ। कमरे में बजने वाला गाना जब बाहर बजता सुनाई देता था तो भरोसा हो जाता था कि कुछ तो है मेरी दुनिया में,जो सब तरफ है। बगल से कोई ऑटो गुज़र जाता था लेकिन उसका गाना ठहर जाता था। ऑटो के ओझल होने के बाद तक वो गाना भीतर ही भीतर बजता रहता था। पूरा होता रहता था। बस ड्राइवरों से दोस्ती होने लगी। मुझे देखकर वॉल्यूम बढ़ा देते थे। मूलचंद से डिफेंस कालोनी तक की खुली हवा और उसमें घुलती अलका याज्ञनिक की आवाज़। पैसे सीमित थे इसलिए फिल्में छूट रही थीं। बहुत ही कम हो गई। लिहाज़ा गानों पर निर्भरता बढ़ती गई। रेडियो से सुबह प्रसारित होने वाले कुछ अंग्रेज़ी गाने भी ज़िंदगी में उतरने लगे।

इन गानों के अलावा और क्या था। पटना से चलते वक्त सारे रिश्ते टूट गए थे। उनका खींचाव तो था लेकिन धीरे-धीरे अहसास गहराने लगा कि अब मुझे उन सब पुराने रिश्तों के बिना जीना पड़ेगा, जिनके सहारे यहां तक बड़ा हुआ। इसीलिए बहुत गौर से देखता था गोविंदपुरी को। उसकी गलियों को। आज भी जब यहां से गुज़रता हूं तो गोविंदपुरी अंदर तक रूला देता है। बुला लेता है। कहने के लिए कि जब कुछ नहीं होगा तुम्हारे पास तो फिर से आ जाना मेरी गलियों में। याद दिला देता है कि जब सब छूट गए थे तो तुम यहीं तो आए थे। मेरे अकेलेपन का पनाहगार-गोविंदपुरी। इन उजाड़ मकानों में मेरे जैसे हज़ारों अपनी ज़मीन से बिछुड़ कर रह रहे थे। टीवी नहीं था। दुकानों के कोने में रखे टीवी पर सचिन को खेलते देखता था। भीड़ बढ़ती थी तो दुकानदार तंग आकर बंद कर देता था। हम अगली दुकान की तलाश में बढ़ जाते थे। जीत के किसी निर्णायक मोड़ पर तमाम मकानों से आती आवाज़ मुझे गलियों में भगाने लगती थी। अगली दुकान की तरफ। सचिन के शॉट को देखने के लिए। टीम इंडिया के प्रदर्शन से भीतर धौंकनी बढ़ती थी और जीत से गुदगुदी होती थी। घर को भूलने का ज़रिया बनता जा रहा था क्रिकेट। मैं चलता था गोविंदपुरी में और दिखता था पटना।

अपने अकेलेपन को गोविंदपुरी के मकानों की भीड़ से बांटने लगा। खूब चलता था इसकी गलियों में। एक गलि से निकल कर दूसरी गलि में। देखता रहता था दिल्ली को। ढाबे से आने वाली टमाटर प्यूरी की गंध। हर सब्ज़ी को एक ही तरी में बनते देखना अजीब लगता था। पैन में आलू फ्राई की और फिर तरी में डाल कर रसदार बना दिया। चिकन और मटन के साथ भी यही होता था। हर चीज़ में अजनबीयत। जो भी बिहार और पूर्वी यूपी का मिलता था लगता था कि ये अपनी रिश्तेदारी में है। भोजपुरी बोलने वाला मिलता था तो लगता था कि भाई ही होगा। इसी चक्कर में एक ढाबे वाले से दोस्ती हो गई थी। प्रवासी था। गोरखपुर का। दाल में एक पीस मटन डाल देता था। वो जानता था कि मुझे मटन पसंद है लेकिन हर दिन खरीद कर खाना बस की बात नहीं। धीरे-धीरे लघु वित्त मंत्री बनने लगा था। मेरी पसंद के ठिकाने बनने लगे। कहां चाय पीनी है और कहां खाना खाना है। घर से निकल कर पैदल चल कर ढाबे तक पहुंचना अब भोजन करने का नया रूटीन था। रसोई के बाहर पालथी मार कर खाने की आदत समाप्त हो गई।


फिर भी ये सारे मकान मेरे अकेलेपन को नहीं बाट सकें। दोस्तों की मटरगस्तियां उनकी थीं। उनमें शामिल होकर भी बाहरी हो जाता था। दोस्त बनने लगे। इनके सहारे अगले दस साल का सफर कटने वाला था। एक दूसरे की आदतों से एडजस्ट करना। कई ऐसे थे जिनसे मुलाकात गोविंदपुरी में ही हुई। पहली बार फ्लैट में रहने का सपना इन्हीं मुलाकातों में जवान हुआ। चार लोगों ने अपना बजट मिला दिया। फ्लैट लिया गया। लेकिन भीतर पहुंचते ही हम वैसे ही रहने लगे जैसे वन-रूम सेट में रहते थे। एक कमरे में दो लोग। किचन साझा और बाथरूम अपना। इस बार बड़ा लेकिन वन-रूम सेट ऐसे सेट हो गया कि हम आज तक इसी पैटर्न पर रहते आए हैं। मज़ाक करता हूं अपने दोस्तों से। लाइफ वन रूम सेटहा हो गई है।

वन-रूम सेट में बसती दिल्ली

दिल्ली आते ही घर और कमरे का मतलब बदल गया। गृहस्वामी को मकान-मालिक कहते सुना तो अजीब लगा। पटना में घरों को हम शर्मा अंकल,तिवारी जी का मकान,यादव जी का घर,रामबालक बाबू का मकान,केशव बाबू,उदय बाबू का मकान,पांडे जी का मकान। पूरा मोहल्ला मकानों को इन्हीं जातिसूचक और व्यक्तिगत सूचक नामों से जानता था। इन नामो से आप यह भी महसूस कर सकते हैं कि मैं जिन जगहों पर रहा और जिन मकानों में गया,उनमें दलित नाम वाले मकान नहीं थे। पता चलता है कि हमारी ज़िंदगी के सामाजिक अनुभवों में इस चीज़ की कितनी कमी रही है। मैंने बाद में इस कमी को पूरी कर ली लेकिन मध्यमवर्गीय विकास के मोहल्लों में दलितों के मकान आज भी नहीं मिलेंगे। खैर मकसद लिखने का कुछ और है।

दिल्ली आ गया था। गोविंदपुरी। प्रोप्रटी डीलर घरों को कमरों में बांट कर पेश कर रहा था। एक वन रुम है, कहिये तो टू-रूम सेट या बरसाती चलेगा? भकुआ जाता था। घर का हर कोना किराये के लिए काट दिया गया था। मैं किसी महल से निकल कर दिल्ली नहीं आया था। जहां रहता था वहां कमरा होता भी था और नहीं भी होता था। लेकिन एक कमरा अपने आप में पूरा घर हो जाएगा,ये कभी नहीं सोचा था। अपनी औकात भांपते ही प्रोपर्टी डीलर समझ गया और बोला कि जितने पैसे आप दे सकते हो,उसमें वन रूम सेट या बहुत से बहुत बरसाती मिलेगी। बरसाती रहने की उस व्यवस्था को कहते हैं जिसके तहत मकान बनने के बाद बचे खुचे सीमेंट गारे से छत पर एक कमरा बन जाता है। जिसकी छत एस्बेस्टस शीट की होती थी और होती है। वन-रूम सेट के अलग-अलग पैमाने थे। किसी में आलमारी तो किसी में नहीं। किसी में टेबल फ्री तो किसी में नहीं। अगले दस साल तक न जाने कितने वन-रुम सेट बदले। मज़ाक में कहता था कि अपनी ज़िंदगी वन-रूम सेटहा हो गई है। सात सौ लेकर पंद्रह सौ रुपये तक के वन-रूम सेट। उन्नीस सौ नब्बे की बात बता रहा हूं।

हम प्रवासी छात्रों के लाए सामानों से जो वन रूम भरता था उसका भी खाका खींचना ज़रूरी है। कमरे के एक हिस्से में किरासन तेल वाला स्टोव,ऑमलेट बनाने के लिए पैन,पिन,चाय के लिए बर्तन,दो कप और दो थालियां। एक कोने में चटाई,रजाई और बिस्तर। तीन चार किताबें। रैपिडेक्स इंग्लिश तो होती ही थी। इन्हीं तीन-चार किताबों से प्रवासी छात्रों और प्रवासी मज़दूरों के वन रूम सेट कमरों के बीच फर्क बनता था। कमरे के एक छोर से दूसरे छोर को छूती एक रस्सी। जिस पर लटके रहते थे हमारे कपड़े। और हां..एक बीस रुपये का रेडियो भी था। सबसे पहले खाने का तरीका बदल गया। घर पर मां थाली में परोस देती थी। अब पोलिथिन में दाल और ठोंगे में तंदूरी लिये चले आ रहे थे। दाल-फ्राई खाना नया अनुभव था। मालूम नहीं था कि काली दाल और पीली दाल इस टाइप के नामों से दाल पुकारी जाएगी। पुकार के कम दुत्कार के नाम ज़्यादा लगते थे। दिल्ली आने से पहले राजमा से तो भेंट ही नहीं हुई थी। गोविंदपुरी के ढाबों में राजमा चावल खाना शुरू कर दिया। दालभात सब्जी और चटनी खाने की आदत समाप्त। दाल फ्राई और रोटी नया कंबिनेशन बन गया। तवे और तंदूर की रोटी का फर्क बना। नाश्ते से दही-चूड़ा गायब। ब्रेड-ऑमलेट घुस गया। कभी-कभी तो ब्रेड-ऑमलेट भी मुख्य भोजन बन जाता था। और हां...पानी रखने के लिए बोतल। बाद में पेप्सी और कोक के पांच लिटर वाले बोतल छात्रों और मज़दूरों के घरों में पानी जमा करने के सबसे लोकप्रिय साधन हो गए। और हां...प्रवासी छात्रों के कमरे में छुपा कर या सामने रखा गया टिकाऊ नाश्ता। नमकीन और ठेकुआ। फ्रिज आधारित दुनिया के बनने से पहले के टिकाऊ नाश्तों का उत्तम प्रबंध दिल्ली के वन-रूम सेट कमरों में हुआ करता था।


पहनावा भी बदला। पायजामा समाप्त। उसकी जगह जनपथ से पच्चीस-पच्चीस में खरीदे गए हाफ पैंट,जिसे क्लासी लैंग्वेज में शाट्स कहा जाता है,पहनने लगा। कुर्ते की जगह पच्चीस रुपये वाली होजियरी की टी-शर्ट। कैट बिहारी बनने की ये मामूली शर्तें बनती जा रही थीं। कैट इसलिए कहलाए गए कि हम बदल रहे थे। अजीब अजीब किस्म के कपड़े पहनने लगे। जीन्स का हमला हुआ। धोने से छुटकारा और फटेगा नहीं के नाम पर बदन के नीचले हिस्से से चिपक गया। मोहनसिंह जी पैलेस एक नया पता ज़िंदगी में शामिल हो गया। दिल्ली की ठंड के आंतक ने सर्दी के कपडे भी बदलवा दिये। तिब्बती मार्केट से जैकेट खरीदा गया। शायद गामा जैकट कहलाता था। हर जैकेट इस दावे से खरीदा जाता था कि ये दिल्ली की सर्दी का अचूक काट है। अब जैकेट फैशन के लिहाज़ से खरीदता हूं। गामा जैकेट पर अलग से लिखा जाना चाहिए। कैसे पर्यावरण के बदलने के साथ गामा जैकेट गायब हो गया। सिपाही से लेकर स्टुडेंट और ऑटोवाले सब गामा जैकेट पहनते थे। मोटा और भारी-भरकम जैकेट। लबादा लाद लिये हों,ऐसा लगता था। गामा जैकेट पांच सौ रुपये का। रईस या दुलारे प्रवासी छात्रों अपने मां-बाप की कृपा से गामा जैकेट पहनते थे। पटना से फोन आता था कि अंटार्कटिका की सर्दी की कल्पना के सहारे सवाल निकलते थे। अब लोग दिल्ली की ठंड के बारे में इस तरह के सवाल नहीं करते। अब कहते हैं कि दिल्ली में ठंड है या नहीं।
जिस ठंढ के बारे में दावा किया जाता था,उसके बारे में सवाल किया जा रहा है। कोपनहेगन जाने की कोई ज़रूरत नहीं है।


लेकिन बात मैंने घरों के कमरों में वितरित कर दिये जाने से शुरू की थी। वन रुम सेट भी भांति भांति प्रकार के। कमरा टेढ़ा तो बाथरूम कहीं और। किचन दोनों के बीच की एक संकरी सी गली में। रोशनी के लिए बल्ब का सहारा। कहीं आप वन-रूम सेट वाले मकान मालिक के बारे में तो नहीं जानना चाहते। इन मालिकों का वर्णन कभी और। वैसे हर मकान-मालिक यही पूछता था कि कॉलेज में पढ़ते हो,लड़की तो नहीं आएगी। शादी हो गई है? नौटंकी करता था। तब तक हम भी किसी लड़की को नहीं जानते थे। इसलिए ये सवाल ही समझ में नहीं आता था कि कहां से और कैसे लड़की आ जाएगी। बस जवाब का टोन ऐसा होता था जैसे महाभारत के भीष्म जी बोल रहे हों। प्रतिज्ञा टाइप शैली में। कोई लड़की नहीं आएगी। वन-रूम सेट के मालिक लड़कियों के विरोधी होते थे। लेकिन जब लड़कियों को कमरा देते थे तो ज़रूर पूछते थे कि लड़के तो नहीं आएंगे न। दिल्ली के ये मकान मालिक अपने कमरे को ऐसी एकांत जगह में नहीं ढलने देना चाहते थे जहां लड़का-लड़की मिल सकें। बहुत बाद में समझ में आया कि दिल्ली के ऑटो में लड़का-लड़की इस तरह से क्यों चिपके रहते हैं, जैसे ऑटो वाले ने फालतू में सीट चौड़ी कर दी हो। बाइक पर सवार पीछे बैठी लड़की को जब लड़के को जकड़े देखता था तो समझ नहीं आता था। पटना शहर में लड़कियों को स्कूटर या बाइक पर बैठे देखा था। इतनी दूरी तो होती ही थी जैसे लगता था कि अंकल जी बस की ड्राइवर की सीट पर बैठे हों और लड़की कंडक्टर की सीट के बगल में। तब पटना में बाइक स्कूट पर गर्लफ्रैंड नहीं बैठती थी। बाप-बेटी,भाई-बहन का कांबिनेशन होता था। इसीलिए दूरी का आभास होता था। दिल्ली में दूरी मिट चुकी थी। बाइट और ऑटो पर सवार लड़के-लड़कियों ने इसे वन रूम सेट में बदल दिया था। दुपट्टों से मुंह को ढंकने की कला। ज़रूर काले धुएं से खूबसूरती को बचाने का प्रयत्न होगा और कपड़ों के अंधेरे में अपने किसी के साथ होने के अहसास का एकांत।


मुझे पूरी दिल्ली वन-रूम सेट के ढांचे में ढली हुई लगती थी। एडजस्ट करती हुई दिल्ली। गोविंदपुरी,पुष्पविहार,कठवाड़िया सराय,मुनिरका,बेर सराय आदि आदि। ये सारी जगहें वन-रूम सेट से बसे शहर की तरह लगती हैं। मुनिरका में जिस कमरे में मैं रहता था वो एक ड्राइंग रूम था। उसमें दीवार नहीं थी। चारों तरफ से खुलने वाले लकड़ी के दरवाज़े थे। जब वन-रूम सेट की मांग बढ़ी होगी तो हंसराज जी ने इसे हम जैसे किरायदारों के लिए समर्पित कर दिया। दरवाजा खुलते ही पूरे सामान के साथ मेरा एक कमरे का मकान सड़क पर आ जाता था। सीढ़ी से उतर कर बाथरूम का रास्ता। टॉयलेटशीट के ऊपर लकड़ी रख कर नहाने का इंतज़ाम। वन-रूम सेट का सामाजिक अध्ययन होना चाहिए। ये एक किस्म की मानसिकता भी है। रहने वाले के प्रति सोच भी है। बेर सराय के एक कमरे को देख कर बाबूजी ने मज़ाक में कह दिया था। भूगोल की परिभाषा के अनुसार यह कमरा नहीं है। गुफा है। जिसमें जाने का एक ही रास्ता है। निकले का भी वही है। खिड़की नहीं थी। वन-रूम सेट में खिड़कियां कभी-कभार मिलती हैं। नब्बे के दशक में दिल्ली में भयंकर मात्रा में वन-रूम सेट का निर्माण हुआ है। आज भी जारी है। साठ फीसदी मकान वन-रुम सेट के हिसाब से बने होंगे।

एक खतरनाक किस्म की दम घोंटू प्राइवेसी। दरवाजे को खूबसूरत बनाने के लिए रविना टंडन या माधुरी दीक्षित टाइप की हीरोईनों की तस्वीरें। अमिताभ से लेकर सचिन भी होते थे। दरवाजों पर टंगे पतलून। बेल्ट और कमीज़ और भीतर की हैंडिल पर लटकता ताला। और हां..ताला बंद कर जाने की आदत। दरवाज़े पर छो़ड़े जाने लगे नोट्स। कहां गए हैं और कब आयेंगे। ताकि आकस्मिक आगंतुक को सूचना मिल जाए। मोबाइल ने इस आदत को समाप्त कर दिया। खैर दिल्ली के कमरों पर लिखना जारी रहेगा। ताला अभी बंद नहीं हुआ है।पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त।

आम आदमी देख रहा है




वैशाली से इंदिरापुरम जाने के रास्ते पर पंचर की इस दुकान पर डिश टीवी देखकर लगा कि डिजिटल टेक्नॉलजी दाल भात हो रही है। डिश टीवी एक महंगा उपकरण है मगर यह उनकी ज़िंदगी का भी हिस्सा बन रहा है जिनके स्थायी घर न हीं हैं। खानाबदोशों के सामान में टेलीविजन भी शामिल हो गया है। सबको विकल्प चाहिए। गांवों में लोग डिश टीवी लगा रहे हैं। कितना इंतज़ार करते। कितनी पीढ़िया बिना रियालिटी शो देखे खतम हो गईं। पता ही नहीं चला कि कोई राखी कोई राजू धमाल कर रहे हैं। न्यूज़ चैनल क्या दिखा रहा है गांवों के बारे में। यह गांव के लोगों को पता ही नहीं चला। डिश टीवी से पता चलेगा। बैटरी ट्रैक्टर में चार्ज कर रईस लोग अब शाम को एक घंटा टीवी देख लेते हैं।

गार्डिनिया या गरदनिया से बायें जाकर हैमिल्टन से मुड़ें?

सब्ज़ीबाग़,जक्कनपुर,मीठापुर,लोदीपुर,लोहानीपुर,चिरैयाटांड,गोरियामठ,मंदिरी। इन्हीं नामों से जाना हमने मोहल्लों को,अपने शहर पटना में। भिखनापहाड़ी से लेकर दूजरा और बांसघाट। अपने जीवन के आस पास की चीज़ों और भाव से निकले ये नाम। किसी शहर को अपना समझने के लिए एक रास्ता बताते थे। मोहल्ले खतम हो रहे हैं। अपार्टमेंट ही नया मोहल्ला है। लेकिन इनके नाम फिलहाल डरावने लगते हैं लेकिन पचास साल बाद कोई इन नामों को लेकर इसी देश में सेंटी हुआ करेगा।

लेकिन आज जब किसी को बताता हूं कि सनब्रीज़ अपार्टमेंट में रहता हूं तो हवा वाली ब्रीज़ और पुल वाले ब्रिज में फर्क नहीं कर पाता। इतना महीन और अनजाना फर्क सुनने वाले के कान में दर्ज नहीं होता है। आएं..आएं करता रहता है। मगर अब इस तरह के अंग्रेज़ी दां और यूरोपीय नामों के साथ जीना पड़ेगा। हमारी पिताजी सनब्रीज़ बोल ही नहीं पाए। नाम की वजह से ही यह हुआ। मैं आसानी से अब बोल लेता हूं। बस दांत और जीभ के बीच कोई कंकड़ फंसा सा लगता है। पड़ोस में एक अपार्टमेंट का नाम गार्डेनिया है। सुनने में यह गरदनिया भी लग सकता है। गनीमत है कि एकाध अपार्टमेंट का नाम हिंदी टाइप भी हैं। आम्रपाली और आशियाना। एल्डेको क्या नाम हुआ। ज़रा बताइये।

इन नामों से भयंकर दिशा भ्रम हो रहा है। लोग उसी अपार्टमेंट के नीचे पहुंच कर कहीं और मुड़ जाते हैं। बोले और सुने जाने की असमर्थता के कारण इन अपार्टमेंट में मेहमान देरी से और चक्कर लगा कर पहुंचते हैं। जो जैसा सुनता है उसी के हिसाब से अंदाज़ लगा कर पता बता देता है।

शनिवार को अखबारों में हसीन सपनों को लेकर मकानों के विज्ञापन छपते हैं। विज्ञापन में ऐसी हरियाली दिखती है कि लगता है कि कोपनहेगन में बेकार ही भाई लोग पर्यावरण को लेकर विचार हगने जा रहे हैं। हैमिल्टन हाइट्स। ये एक नाम है किसी अपार्टमेंट का। सोचा कि हैमिल्टन कोई समाजसेवी होंगे। डिक्शनरी में सर्च मार दिया। अनाप शनाप जानकारी आई। न्यूज़ीलैंड और ग्लासगो में इस नाम के शहर और मोहल्ले हुए हैं। बकिये इस नाम के कुछ लोग हुए हैं जो तमाम तरह के काम करते हुए तमाम हुए हैं। अब बताइये कि हैमिल्टन साहब का न अता न पता लेकिन उनके नाम पर फरीदाबाद के सेक्टर-३७ में हैमिल्टन हाइट्स बन रहे हैं। क्या लोदीपुर हाइट्स कैट नाम नहीं लगता है। कैट के चक्कर में हम सब रैट हो गए हैं। चूहा।

एक तो हर अपार्टमेंट का लक्ज़री होना क्यों ज़रूरी है,समझ नहीं आया। फिर तो होटल का ही कमरा ईएमआई पर ले लीजिए। रहिये उसी में जाकर। अपनी रईसी ठेलते रहिए। नोएडा में लक्ज़री फार्मलैंड बन रहा है। टू बीएचके वाला। सोनिपत में ट्यूलिप गार्डन बना है। किसने देखा है श्रीनगर जाकर ट्यूलिप। गेंदा फूल है का। गेंदा गार्डन ही रख देते। मतलब तो निकलता कि भाई जो गेंदा नेता के गर्दन से लेकर ड्राइवर की स्टियरिंग पर चढ़ाया जाता है उसी के नाम पर यह मोहल्ला आबाद होने जा रहा है। एक विज्ञापन के अनुसार नेशनल हाइवे-२४ पर क्रासिंग रिपब्लिक बनने जा रहा है। भारत एक गणतंत्र हैं लेकिन अपार्टमेंट भी गणतंत्र हो जाएगा तब तो अंबेडकर नाम के महान लोग प्रोपर्टी डीलींग करने लगेंगे। नेहरू क्या करेंगे। डॉ राजेंद्र प्रसाद किसी हाउसिंग सोसायटी के पहले प्रेसिडेंट बनके अमर हो जायेंगे। उस में क्रासिंग रिपब्लिक नाम से मन नहीं भरा है। भाई लोगों ने एक टैग लाइन जोड़ दिया है कि यह इंडिया का पहला ग्लोबल सिटी होगा। भाई साहब इतना शौक है ग्लोबल सिटी में रहना का तो इंग्लैंड जाइये न। और ग्लोबल सिटी होता क्या है। प्रोपर्टी डीलर बना देगा ग्लोबल सिटी। एक रोड तो हम ठीक से बना नहीं पाते।

लक्जरी विलास( विलासिता वाला नहीं,विला वाला)बन रहे हैं। एक का नाम है ओमैक्स गार्डन वुड्स। केएलजे ग्रीन्स। एंजेल मरक्यूरी, हाइटेक रेसिडेंसी, रिज रेसीडेंसी। भिवाड़ी में एक अपार्टमेंट का नाम है हिल व्यू गार्डन। बताइये वहां कौन सा हिल है और कौन सा गार्डन है जिसका व्यू है। हम लोग पढ़ लिखकर चिरकुट ही हुए। स्टेटस के चक्कर में अब अपार्टमेंट में रहने वाला प्रेसिडेंट जल्दी ही अपना यूनिफार्म और प्रोटोकोल बनवा लेगा।

अंग्रेजी से चिढ़ नहीं हैं। इन बेमतलब के नामों से चिढ़ है। यूरोपीय नामों को चेपने के चक्कर में भाई लोगों ने अपने नामों के संस्कार को खतम कर दिया है। गार्डन और गार्डिनिया रखने के बाद भी इनके यहां वही बिजली और पानी की मारामारी रहती है। ठगी के शिकार लोग भी मिलते हैं। अब बताइये याद करना कितना मुश्किल हो रहा है। सही उच्चारण न कर पाने की हताशा कितनों का आत्मविश्वास तोड़ देती होगी। कितने अपने आत्मविश्वास को जताने के लिए पूरे उच्चारण का तेल कर देते होंगे। अब यही बाकी है कि इंडिया और भारत को भी बदल दो। पुराने नाम रखकर करना क्या है। इंडियात या भारिंडिया रख दो। हां,लक्ज़री ज़रूर लगा दें। लग्ज़री इंडिया। हम तो अपार्टमेंट की ही तरह अपने मुल्क का विज्ञापन करने लगे हैं।

आलीशा

प्यार पॉसिबल है। दूर से चाहने वाले आशिकों की कहानी लगती है। एक खूबसूरत सी लड़की आलीशा। हिमरतन तेल बालों में चपेत कर और ढीली पतलून पहिन कर वो कुछ टेढ़ा मेढ़ा चश्मू। इस गाने को देखता हूं तो लगता है कि कोई आशिक है जो किसी को दूर से चाहता है। दूर से चाहने वाले आशिकों को कभी सराहा-समझा नहीं गया। जबकि ये वो आशिक हैं जो ट्रैफिक जाम क्रिएट नहीं करते। किसी साये की तरह अपने महबूब के पीछे चलते हैं और अपने भीतर सपनों का ढेर लगा कर उसी के नीचे दबे रहते हैं। यकीन दिलाते रहते हैं कि एक दिन जब सब कुछ उनके पास होगा तो आलीशा भी होगी। वो न जाने कितनी चिट्ठियां लिख चुके होते हैं। टेम्पू के पीछे लिखे शेर को उतार कर डायरी में लिख चुके होते हैं। खुद को हर फिल्मिया हीरों के आभासी खांचे में ढाल चुके होते हैं। बस कह नहीं पाते। रह जाते हैं।


वी चैनल पर आलीशा का गाना देख कर यही लगा। चांद को क्या मालूम चाहता है उसे कोई चकोर। वो बेचारा दूर से देखे, करे न कोई शोर। बेखबर चांद न जाने किसके आसमान में निकल आता है, लेकिन चकोर को ताकने से कौन रोक सका। यही वो बेकरारी है जो किसी आशिक को लफंगा बनाने से रोकती होगी। प्यार पॉसिबल है। बालीवुड के शायरों, संगीतकारों और कहानीकारों ने जो बड़ा काम किया है, वो यही किया है। प्रेम को सार्वजनिक मान्यता दिलाई है। इसके बाद भी पंचायतें बैठ जाती हैं। प्रेमियों का कत्ल कर दिया जाता है। प्रेमी की बहन की शादी नहीं होती और प्रेमिका के घर का बहिष्कार हो जाता है। हिंदुस्तान में प्रेम इम्पॉसिबिल है। लेकिन कोशिश करें तो पॉसिबल है। जब भी यह धीरज टूटता है तभी कोई हिंदी फिल्म आकर आशिका का मन बढ़ा जाती है। वर्ना डरपोक आशिक आज भी अपनी किताबों के पन्नों के बीच गुलाब की पखुंड़ियां रखते होंगे, लड़की का गिरा रूमाल उठाकर रोज़ धोते होंगे। प्रेमी अपने नितांत एकांत क्षणों में ही सबसे अधिक सृजनशील होता है। वो अपनी क्लपनाओं में इश्क को ऐसे सजाता है, जैसे किसी राष्ट्रपति के आने से पहले मंच को फूलों से लाद दिया गया हो। जैसे बारात के आने से पहले दरवाज़े के बाहर धूल पर पानी डाल दिया गया हो। इश्क में सबसे अधिक फायदा ज़बान को होता है। आशिकों के बोलने के अंदाज़ बदल जाते हैं। रंग बदलने से पहले उनकी भाषा काल्पनिक होने लगती है। संवाद की शक्ल में बातें किसी चाही जानी वाली लड़की को प्रभावित करने के लिए की जाती हैं। लड़का बेहद सभ्य हो जाता है।

लेकिन जो दूर से चाहते हैं, उनका क्या। जो दूर से चाही जाती है वो तो बेखबर है ही। हमारे देश के दूर से चाहने वाले आशिकों का सामाजिक मानसिक अध्ययन नहीं हुआ है। मन-संसार के भीतर कल्पनाओं में कौन सी नूर उतर आती होगी, ये न तो धड़कनें बताती हैं न लब। वो चुपचाप अपने आप,चाहता है किसी को। पीछा करता है। एक बार देख कर ही आहें भर लेता है। फिर काम पर लौट आता है। इक्का दुक्का ऐसे भी हैं जो नहीं लौट पाते। पीछा करने लगते हैं। हर जगह। अपनी कल्पनाओं को रक्तरंजित कर देते हैं। न कह पाने की कमज़ोरी और स्वीकार न किये जाने का भय। प्रेम पूर्व ऐसी स्थितियां हैं,जो प्यार को इम्पॉसिबल बनाती हैं। कह दीजिए। दिल को साज़िशों और हताशाओं का अड्डा मत बनाइये। मन ही मन क्या घुटना,मन ही क्या जलना। अस्वीकार किये जाने को स्वीकार करना सीखें। कोई ना कह दें और आप ड्राम भर कर रोने लगे,नहीं चलेगा। इश्क एक बार नहीं होता है। ये उसके बाद भी होता है जब किसी से हो जाता है। सौ में एक बार तो होगा। लगे रहो मुन्ना भाई।

एक सुबह की आत्मकथा

जितना कहता हूं,उतना ही अधूरा रह जाता है। जितना मिलता हूं,उतना ही अकेला हो जाता हूं। ऐसा क्यों होता है कि दिल्ली में रहना अक्सर याद दिलाता है कि अब चलना है वापस। जहां से आया था। दिल्ली एक्सप्रेस से। पर वो ट्रेन तो अब बंद हो चुकी है। क्या मेरी वापसी के लिए पुराने रास्ते इंतज़ार कर रहे होंगे? उन रास्तों को किसी और ने चौड़ा कर दिया होगा। जिनके लिए लौटने का मन करता है,वो अब दुनिया में नहीं हैं। जिनके साथ खेला,वो न जाने कहां हैं। सबके सब भटक गए हैं। तो क्या किसी से मिलने की बेकरारी है या फिर इस शहर में मन के उजड़ जाने के बाद अपना ही खरीदा घर किराये का मकान लगता है। ऐसा क्यों होता है कि किसी सुबह मन खराब हो जाता हैं। सामान बांधने का दिल करता है। बीबी बच्ची के कालेज और स्कूल जाने के बाद लगता है कि किसी वीराने में घिर गया हूं। क्या कोई लौट सकेगा कभी अपनी मां के गर्भ में और वहां से शून्य आकाश में। उन्नीस साल हो गए दिल्ली में। जो मिला वही छूटता चला गया। दरअसल सहेजने आया ही नहीं था,जो सहेज सकूं। हर दिन गंवाने का अहसास गहराता है। लौट कर आता हूं तो ख्याल आता है। क्यों और कब तक इस शहर में बेदिल हो घूमता रहूंगा। इस शहर में जबड़ों को मुसकुराने की कसरत क्यों करनी पड़ती है? सारी बातें पीठ के पीछे ही क्यों होती है? सोचता हूं किसके लिए मेरी बूढ़ी मां गांव में घर की चारदीवारी बना रही है। अपने बेटों के लिए घर को महफूज़ कर रही है। मैं कल की शाम एक फाइव स्टार होटल में था। बस फिर से दिल टूट गया। इतनी चमकदार रौशनी,महफिल और मेरी मां अकेली। वो कहती है कि गांव से अच्छा कुछ नहीं। तुम्हारी दिल्ली में दिल नहीं लगता। किसी को भोजपुरी आती नहीं है। यहां तुम्हारी ज़मीन है। बाप दादाओं की है। क्या मां ही पुरखों की सारी कसमें पूरी करती रहेगी? और हम? क्या हम उन पुरखों के नहीं हैं। नौकरी का चक्र ऐसा क्यों हैं कि सारे रिश्ते उसमें फंस कर टूटते ही जाते हैं। पेशेवर होना अब एक अपराधी होना लगता है। छु्ट्टी लेकर गांव जाने का मतलब नहीं। यहां वहां के बीच आना-जाना हल नहीं है। दिल्ली कब तक मुझे बसा कर उजाड़ती रहेगी। यहां बादशाह टिका न आवाम। सब टिके रहने के भ्रम में जी रहे हैं। मेरी तरह कहीं से आए प्रवासी मज़दूर मकान खरीद कर सोचते हैं कि वो दिल्ली में बस रहे हैं।

गांधी पूजा और लक्ष्मी







दिल्ली के साउथ एक्सटेंशन मार्केट की एक गली में चला गया। सेल्स मैन अपनी बाइक लगा कर चाय पी रहे थे। चाय की दुकान पर ये तस्वीर नज़र आई। गांधी जी लक्ष्मी पूजा के पार्ट बन चुके हैं। आम आदमी लोकप्रिय चीज़ों को लेकर जितना प्रयोग करता है कि उतना फिल्म निर्देशक भी नहीं कर पाते।