गांधी पूजा और लक्ष्मी







दिल्ली के साउथ एक्सटेंशन मार्केट की एक गली में चला गया। सेल्स मैन अपनी बाइक लगा कर चाय पी रहे थे। चाय की दुकान पर ये तस्वीर नज़र आई। गांधी जी लक्ष्मी पूजा के पार्ट बन चुके हैं। आम आदमी लोकप्रिय चीज़ों को लेकर जितना प्रयोग करता है कि उतना फिल्म निर्देशक भी नहीं कर पाते।

8 comments:

Meenakshi Kandwal said...

मानना पड़ेगा आपकी पारखी नज़र..।
एक अनुभव बांटना चाहूंगी... घर पर नवरात्र में नवदुर्गा की आरती की एक किताब लाई गई। किताब के लेखक ने देवियों को जो वर्णन किया वो तो ख़ैर एक अलग विषय है, लेकिन हर आरती के आख़िर की पक्तिं में महोदय अपने 'नाम' का ज़िक्र करना नहीं भूले। मां की पूजा के साथ मंदिर में बज रही घंटी और आरती गायन में उनका नाम सुनना बहुत भारी पड़ रहा था।

ravishndtv said...

हा हा। महोदय लेखक की भी आरती हो गई। बीमार कलाकार।

मधुकर राजपूत said...

लक्ष्मी की पर्याय बने गांधी।

शरद कोकास said...

गाँधी जी भी कहाँ कहाँ दिख जाते हैं ..।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

भाई लक्ष्मी से अच्छे अच्छे हारे
अभी दार्जीलिंग के होटेल का एक दृष्य याद आया जहां लक्ष्मी गणेश की मूर्ति के आगे विद्युत चालित बौद्ध मंत्राभिसिक्त चंवर ( नाम पता नहीं वह जो बौद्ध भिक्षु गोल गोल हिलाते रहते हैं) डोल रहा था।

JC said...

रवीश जी, बहुत पहले किसी सचित्र पत्रिका में पढ़ा था कि कैसे एक स्त्री के घर में फिल्म तारिका मीना कुमारी की पूजा करी जाती थी...पूरी दीवार मीना कुमारी की विभन्न तस्वीरों से भरी पड़ी थी :)

और, 'रामायण' के कारण प्रसिद्ध तुलसी दास - जिनकी पत्नी (नाम नहीं मालूम!) को श्रेय जाता है 'उनकी दिमाग की बत्ती खोलने' का (सही बटन दबा कर जैसे) - भी कह गए "जाकी रही भावना जैसी / प्रभु मूरत तिन देखी तैसी" ...
"राम जी की लीला है न्यारी"? या जय माता की? क्यूंकि 'हर सफल व्यक्ति की सफलता के पीछे किसी स्त्री (देवी) का (अनदेखा या देखा) हाथ होता है" अंग्रेजी में कहते हैं :)

Suresh Chiplunkar said...

नोटों पर छपे गाँधी तो वाकई पूजनीय हैं ही… सरकारी दफ़्तरों में सुबह-शाम इनकी पूजा होती है, पहले टेबल के नीचे से होती थी, अब तो खुलेआम होने लगी है…

डॉ टी एस दराल said...

भाई, ये भी मार्केटिंग का एक तरीका है।