बोलना तो है लेकिन कैसे- पुस्तक समीक्षा

बोलना तो है। यह एक किताब का नाम है। बोलने के तौर-तरीकों को लेकर हिंदी में एक अच्छी किताब आई है। अपने मित्र दुर्गानाथ स्वर्णकार के हवाले से यह पुस्तक हाथ लग गई। न्यूज़ चैनलों के विस्तार ने बोले जाने को महत्वपूर्ण बनाया है। विविधता कायम की है लेकिन अभी बोले जाने को लेकर गंभीरता कम दिखती है। कैसे बोला जाए और कहां पर बलाघात का प्रयोग हो, इसकी विधिवत जानकारी कम लोगों को है। नतीजा खुशी और ग़म की ख़बरों का उतार-चढ़ाव एक सा लगता है। बहुत सारी विसंगतियां हैं। जिन्हें हम बोले जाने की विविधता के नाम पर स्वीकार या नज़रअंदाज़ करते रहते हैं। यह समस्या तब और बड़ी हो जाती है जब समझना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा शब्द बोला गया और किस मतलब से बोला गया। पत्रकारिता की पढ़ाई में वॉयस ओवर की ट्रेनिंग निश्चित रूप से घटिया होती होगी तभी वहां से निकलने वाले छात्रों को इसका कुछ अता-पता नहीं होता। और जो पेशे में हैं उन्होंने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि इसमें सुधार हो सकता है। हिंदी पत्रकारिता में पेशेवर प्रतिबद्धता का अभाव और पर्सनल जुगाड़ ही इस तरह की छूट देता है कि आप कैसे भी अपना काम चला लें। हमने कम लोगों को देखा है,जो वॉयस ओवर को लेकर चिंतित हों और उसे दूर करने का प्रयास किया हो।


बोलना तो है। पुस्तक का अच्छा नाम है। बोलना तो है लेकिन कैसे। यह किताब दावा करती है कि यह झूठ है कि बोलने का गुण नैसर्गिक है। अभ्यास और प्रशिक्षण के ज़रिये बोलने की क्षमता का विकास होता है। किसी में कम होता है तो किसी में ज़्यादा होता है लेकिन होता है। पचास हज़ार लोगों को बोलने की ट्रेनिंग देने वाले इंदौर के प्रोफेसर शीतला मिश्रा ने यह किताब लिखी है। जिसका संपादन किया है इंदौर के ही रवींद्र शाह ने। इंदौर में बोलने को लेकर वाग्मिता नाम की एक संस्था कई सालों से लोगों के बीच काम कर रही है। गृहणी से लेकर छात्रों तक को बोलने की कला का अभ्यास कराया जाता है।

शीतला मिश्रा लिखते हैं कि प्रभावशाली तरीके से बोलना चाहिए। बोलना एक महत्वपूर्ण क्रिया है। इसका असर लिखे हुए शब्दों से ज़्यादा होता है। किताब तकनीकी तौर पर लिखी गई है इसलिए बहुत धीरज चाहिए पढ़ने और समझने के लिए कि एक एक बात का मतलब है और वो कहां पर लागू होगा। कई तरह के फार्मूले इस शक्ल में लिखे गए हैं।

बचें वचन से
जो औसत बात करते हैं
जो ख़ूब-ख़ूब बोले जाते हैं
सोचना रोक देने वाले
जो किसी को न छूते हैं,न छेड़ते हैं
कितनी ही बार बोले जाएं
अनाकर्षक
चल-चल कर घिस-पिट गए,
मुड़े-तुड़े, चिपचिपे, मटमैले
करंसी नोटों जैसे।

आपको याद ही होगा टीवी पत्रकारों और एंकरों का सवाल- कैसा महसूस हो रहा है और पीटूसी के आखिर में कही जाने वाली सनातन पंक्त- अब देखना है कि आने वाले समय में सरकार....। एक ऐसे समय में जब विभत्स रस में वॉसर-ओवर किये जाने लगे हैं लोगों का ध्यान खींचने के लिए,यह किताब उपयोगी हो सकती है। जानने-समझने के लिए कि ध्यान खींचने के और भी बेहतर और रोचक तरीके हो सकते हैं। सायं-सायं और भायं-भायं ही अंतिम तरीका नहीं है। कई लोगों की अच्छी स्टोरी बोले जाने की कमी के कारण प्रभाव नहीं छोड़ पाती। कई एंकर सवाल( इसमें मैं भी शामिल हो सकता हूं) पूछते हैं तो जवाब लगता है। सवाल नहीं। कई एंकरों ने आज तक ज़िंदगी को जिदगी बोलने की ज़िद पाल रखी है। वो अपनी प्रतिष्ठा को पेशेवर विकास से ज़्यादा महत्व देते हैं। हिंदी फिल्मों से ज़्यादा बड़ा जनसंचार नहीं है। वहां भी किशोर कुमार ज़िंदगी गा कर गए हैं। जिंदगी कभी नहीं गाया। नुक्तों की लड़ाई में उच्चारण की बलि दे दी गई। बोलना प्रभावहीन हो गया। बिना इस समस्या का समाधान किये,एक रास्ता निकाल लिया गया। बुला लाओ,हुंकारे भरने वाली आवाज़ों को। चीख-चीख के बुलायेंगी दर्शकों को।

बोलने की गति पर भी विस्तार से लिखा गया है। मकसद यही है कि सुनने वाला बोलने वाले से ध्यान न हटा सके। अकेले भाषण से लेकर कई लोगों के बीच बोलने की प्रक्रिया के बारे में काफी जानकारी दी गई है। कई बार लगेगा कि इसमें खास क्या है। यह तो हम जानते हैं लेकिन पूरी किताब पढ़ने पर लगेगा कि हम टुकड़ों में तो कई बातें जानते थे लेकिन इनका इस्तमाल तब पता चलेगा जब समग्र का पता चलेगा। यह किताब पढ़ी जानी चाहिए। टीवी के पत्रकारों को खासकर से। राधाकृष्ण ने छापी है और कीमत १७५ रुपये है। बोलने की शैली पर और भी किताबें आनी चाहिए। टीवी की पढ़ाई में यह एक पेशेवर कोर्स की तरह होना चाहिए। अच्छे-अच्छे पत्रकारों को इस कमी के कारण नुकसान उठाना पड़ता है। कोई बताने वाला नहीं है कि इस कमी को अभ्यास से दूर किया जा सकता है। यह किताब वाणी को महत्वपूर्ण मानती है। संयोग से मैंने भी अपने ब्लॉग पर लिखा है कि मैं बोलने को लिखने से ज़्यादा महत्वपूर्ण मानता हूं। कुछ साल पहले बातूनी इंडिया नाम की एक स्पेशल रिपोर्ट बनाई थी। देखने के लिए कि हमारा बोलना कैसे बदल गया। एक सेल कंपनी का विज्ञापन भी आता है...हिंदुस्तान बोल रहा है। लेकिन तरीके से बोले से असर ज़्यादा होगा। यही मकसद है इस पुस्तक है। मैं अब प्रोफेसर शीतला मिश्र के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानना चाहता हूं जो इतने बड़े काम में लगे हैं और पुस्तक में अपने बारे में कम से कम शब्दों में बताया। शायद उनका काम बोलता होगा। बहुत अच्छा प्रयास है। उम्मीद है बोलने पर और पुस्तकें आएंगी।

पुस्तक के आखिर तक नहीं पहुंच पाया हूं। आधा से ज़्यादा पार कर चुका हूं। उम्मीद करता हूं कि इस या अगली पुस्तक में बोलने की व्यक्तिगत कमज़ोरियों पर भी सामग्री होगी। मसलन कई लोग साफ शब्दों का उच्चारण नहीं कर पाते, वो किस तरह का अभ्यास करें,कई श स की बीमारी से ग्रस्त हैं,उसे कैसे दूर करे और कई वाक्यों के समूह को कैसे पढ़ा जाए जिससे वायस ओवर बेहतर हो सके। नाक से निकलने वाली आवाज़ को कैसे भारी करें और सामंती किस्म की भारी आवाज़ को कैसे कर्णप्रिय किया जाए,अगर ये ध्यान में रखकर लिखा जाए तो पुस्तक टीवी पत्रकारों के सिरहाने हो सकती है।


दूसरा, किताब के कवर पर हिटलर का उदाहरण देखकर चौंक गया। बोलने की प्रभुता में हिटलर का यकीन था। उसी यकीन पर चलकर हमारे यहां कुछ लोग अयोध्या पहुंच गए। बेहद प्रभावशाली तरीके से बोलने की कला में पारंगत किन्तु सांप्रदायिक सत्य गढ़ने के खतरनाक खेल में शामिल। ऐसे उदाहरणों से बचना चाहिए। हमें यह भी सावधान करना चाहिए कि बोलने की उस कला में यकीन नहीं करना है जो बार बार बोलकर किसी झूठ को सत्य बना दे। इसे समझे होते तो आज बाबरी मस्जिद गिराने वाले नेता सत्रह साल बाद अपना बचाव करते हुए झूठे और कमज़ोर न लगते। उनका तेज चला गया है। क्योंकि वो अपने बोलने की प्रतिभा का इस्तमाल गलत मकसद के लिए कर रहे थे। शीतला मिश्र का मकसद ये तो नहीं होगा लेकिन हिटलर के मिसाल को ठिकाने लगा सकते थे। इस शख्स से कुछ भी सीखने लायक नहीं है।

15 comments:

मधुकर राजपूत said...

इस पुस्तक को ज़रूर पढ़ा जाएगा रवीश जी। जानकारी देने के लिए धन्यवाद।

Charul said...

सही विषय पकडा है, मुझे माफ कीजियेगा, परंतु कभी कभी मन करता है, कि ऍकर के एक लगा दिया जाये, या टेप चिपका दिया जाये, और इस गलत बोलने की गंगा मैं सब चैनल बिना अपवाद हाथ धो रहे हैं. कोइ हिन्दी गलत बोले तो चुभता है, उच्चारण की कला जैसे भुला दी गयी है.

चारुल शुक्ल
http:// dilli6in.blogspot.com

sanjay vyas said...

शायद ये किताब रेडियो पर कार्यक्रम देने वालों के लिए भी काम की होगी.पारंपरिक हिंदी रेडियो प्रसारण में बेस बनाकर कृत्रिम लहजे में बोलने का अंदाज़ बहुत उबाऊ हो गया है.

सुबोध said...

ज़रुर बोलने पर अभी बहुत काम करने की ज़रुरत है..

SACHIN KUMAR said...

SACHIN KUMAR,
NAMASAR...
आपको याद ही होगा टीवी पत्रकारों और एंकरों का सवाल- कैसा महसूस हो रहा है और पीटूसी के आखिर में कही जाने वाली सनातन पंक्त- अब देखना है कि आने वाले समय में सरकार....।
YOU ALWAYS SAY IT IS BETTER TO SAY THAN TO WRITE I DO BELEIVE YOU DO BOTH GREAT. YOU TOLD IN THIS ARTICLE MANY MORE BOOKS SHOULD COME ON THIS WHY NOT YOU ARE WRITING A BOOK. PLEASE THERE ARE MANY MORE WHO ARE WAITING FOR THIS. PLEASE........THNX

anil yadav said...

आपके बोलने में सुधार की सबसे ज्यादा जरूरत है....बोलते बोलते क्या बोल जाते हैं इसका ध्यान नहीं रखते हैं....अयोध्या में बाबरी मस्जिद कभी नहीं थी....और जो बदसूरत ढांचा गिराया गया वो नवनिर्माण की लिए जमीन की सफाई थी....

SACHIN KUMAR said...

SACHIN KUMAR
ANIL YADAV HAS JUST COMMENTED SOMETHING THIS, THAT IS MORE THAN FOOLISH.DONOT FORGET IT WAS A BLACK DAY THE 6TH DEC BEYOND A FRACTION DOUBT YADAV JI. DO NOT SUPPORT THAT AT ANY COST. THIS WAS A WRONG THING WHO IS RESPONSIBLE FOR THAT SHAMEFUL ACCIDENT IS ANOTHER MATTER BUT WHAT I WANT TO WRITE HERE IS THIS.
I REMEMBER THAT CLASS IN JOURNALISM WHEN ONE BOY NAMED MUKESH WAS FIGTING WITH THE TEACHER. TEACHER SAID TO DO PUSTAK SAMIKSHA ON A BOOK WHICH NO ONE HAS READ. EVERYONE IS WRITING SOMETHING EXCEPT THAT BOY AND ME.TEACHER OR SAY PROFSSOR WAS ANGRY ON THAT BOY NAMED MUKESH HE IS NOW IN MEDIA EARLIER A SUCI SUPPORTER AND DOES NOT WANT TO JOB UNDER ANY COMPANY I MADE HIM READY FOR THAT. HE TOLD I HAVE NOT READ THE BOOK AND I CANNOT DO THAT. PROFESSOR WAS ANGRY..SO IS OUR PROFESSOR THEY SAY DO THE PUSTAK SAMIKSHA BEFORE READING THE WHOLE BOOK....ALAS....I CANNOT DO THAT..THAT WAS JUST AN ACCIDENT I REMEMBERED AFTER READING GREAT RAVISH SIR BLOG...THNX ALL...HOPE ANIL JI WILL NOT MIND IT....

JC said...

रवीश जी को मैंने बरखा दत्त के एक अंग्रेजी प्रोग्राम में देखा और सुना था हिंदी में बोलते. उन्होंने अच्छा बोला था ब्लॉग के बारे में...किन्तु दुर्भाग्यवश मेरा केबल ओपरेटर NDTV हिंदी चैनल नहीं दिखाता, जिस कारण मैंने उनकी स्पेशल रिपोर्ट आदि नहीं देखी हैं...

जहां तक "बोलना तो है लेकिन कैसे- पुस्तक समीक्षा" विषय का सवाल (प्रश्न) है, तो उस पर मैं प्रसिद्द गायक पंडित ओंकार नाथ ठाकुर का कथन दोहराना चाहूँगा कि जो कुछ भी हम बोलते हैं वो भी संगीत ही है. उन्होंने उदाहरण के तौर पर बताया कैसे हम एक बीमार के पास जाते हैं तो उसको बोलते हैं, "क्यूं भाई कैसे हो?" और यही हम दस साल बाद और किसी दोस्त को बाज़ार में अचानक मिलने पर बोलते हैं. किन्तु क्या हम अपने स्वरों और चेहरे के भाव एक सा रख सकते हैं? कदापि नहीं! (इसका विवरण शब्दों में केवल बोल कर ही दिया जा सकता है, लिख कर नहीं)...संगीत में भी वो ही सात सुर लगते हैं (मंद्र, मध्यम, और तार सप्तक) किन्तु हर एक राग को सुनने वाले पर भिन्न प्रभाव पड़ता है. और हमारे देश में योगियों ने ही विभिन्न रागों क़ी रचना समय आदि को ध्यान में रख कर क़ी. तानसेन प्रसिद्द हुआ दीपक राग से, जिससे दीपक जल उठते थे (फतहपुर सीकरी में वो स्थान आज भी देखा जा सकता है)...स्वामी हरिदास के दोनों चेले तानसेन और बैजू बावरा के किस्से प्रसिद्द हुए - कि कैसे तानसेन अकबर के दरबार में नौ में से एक रत्न क़ी प्रसिद्धि प्राप्त कर, घमंड के कारण, बैजू से हार गया क्यूंकि वो बैजू सामान पत्थर को गायन से पिघलाने में असमर्थ रहा!

creativekona said...

रवीश जी,
बहुत अच्छी जानकारी दी आपने ---ऐसी किताबें तो आनी चाहिये लोगों के सामने।
हेमन्त कुमार

अमृत कुमार तिवारी said...

पुस्तक के बारे में जानकारी देने के लिए धन्यवाद। ये किताब ज़रूर ही बढ़ी जाएगी।

इरशाद अली said...

Accha

Dipti said...

समीक्षा पढ़कर लग रहा है कि किताब पढ़नी चाहिए। लेकिन, ऐसी कोई भी कोशिश उनके लिए नाकाफी है जो महज ज़िद के चलते बहुवचन को भी एकवचन में और स्त्रीलिंग के शब्दों को भी पुलिंग में बोलते हैं।

शरद कोकास said...

जो बोलता है उसे पढ़ना अनिवार्य है।

devsinghji said...

जाहिर है अब मीडिया का अधूरा पन दूर हो सकेगा... अगर इस तरह की किताबें और बाज़ार में आए... कासकर हिन्दी में..। शीतला मिश्र और रवींद्र शाह को धन्यवाद।

jay said...

Bahut achha likha hai aapne aamtaur par iski jankari sabko nahi hoti.aapke nd tv mein manoranjan bharati bhi is uchharan ki bimari se grast hai lekin unki reporting achhi hoti hai isliye koi dhyan nahi deta, jabki vinodd dua, aap aur lucknow se kamal khan aap teenon ke bolane ki shaili pure electronic media mein sabse alag hai mujhe aap ki aur kamal khan ke bolane style bahut achhi lagti mai lagbhag aapki har report dekhta hoon.