पोपुलर प्रेस का आगमन

यूरोप की १८४८ की क्रांति पर एक किताब पढ़ रहा था। Jonathan Sperber की। इस किताब के एक हिस्से में पत्रकारिता पर भी चर्चा है। कैसे १८४८ की क्रांति के दौरान यूरोप के कई शहरों में अख़बारों की संख्या बढ़ती जाती है। उनका प्रसार बढ़ता है। प्रशिया के राइन प्रांत के तीन ज़िलों से निकलने वाले अख़बारों की संख्या सत्तर हो गई थी। इनमें से ३४ की स्थापना १८४८ की क्रांति के दौरान हुई। आस्ट्रिया साम्राज्य से उन्यासी अख़बार निकल रहे थे। सिर्फ उन्नीस को इजाज़त थी कि वे राजनीतिक मामलों की चर्चा कर सकते थे। सेंसर के तहत। ये सारे अख़बार जर्मन में थे।


अख़बारों की संख्या और प्रसार में वृद्धि के साथ पोपुलर प्रेस को लेकर बहस शुरू हो गई। क्या लिखा जाए जो आम आदमी को समझ आए इस सवाल को लेकर जूझ रहे थे। स्पर्बर कहते हैं कि इस दौरान पत्रकारिता के भीतर कई तरह की स्टाइल का जन्म और विकास हुआ। पहली बार पोपुलर प्रेस की दिशा में प्रयास हुए। १८४८ के पहले के अख़बारों की ख़बरें और लेख ज्ञानपूर्ण हुआ करती थीं। अकादमिक शैली में। कम ही लोग समझ पाते थे और अनुसरण कर पाते थे। क्योंकि कम ही लोग बारहवीं तक पास थे। शिक्षा का प्रसार नहीं हुआ था। लेकिन अल्प साक्षर जनता राजनीति में काफी सक्रिय थी। क्रांति की घटनाओं ने आबादी के बड़े हिस्से को राजनीतिक रूप से सक्रिय कर दिया था। पत्रकारिता के सामने एक समस्या आई। संवाद की समस्या। साहित्यिक शैली के लेखों के पाठकों और ख़बरों के प्रति बेचैन आम जनता के बीच संवाद की भाषा क्या हो। ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक कैसे पहुंचे।


क्रांति के दौरान कई अख़बार पढ़े लिखे तबके के लिए छप रहे थे लेकिन कुछ अख़बारों ने लोकरूप धारण करने का रास्ता चुन लिया। एक अख़बार का नाम था- New Cologne News for Townfolk, Country People and Soldier। इसका संपादन एक महिला कर रही थी। यह अख़बार मार्क्स के संपादित अख़बार Neue Rheinische Zeitung से अलग था। दोनों के टोन अलग थे। मार्क्स की लिखावट क्लिष्ट थी। जिसे आम आदमी के लिए समझना मुश्किल हो रहा था। वहीं कुछ अख़बार ऐसे निकलने लगे जो सिर्फ किसानों को अपना पाठक मान कर चल रहे थे। हंगरी,फ्रांस और जर्मनी से निकलने वाले कई अखबारों के नाम The Village Sheet,The Village News थे। गांवों से शहर मज़दूरी करने आने वाले लोगों के बीच ये अख़बार बांटे जा रहे थे।


इस तरह से आम लोगों के बीच राजनीति की ख़बरें पहुंचने लगीं। इससे पहले उन तक संतों की कथाएं,पंचांग और कैलेंडर ही पहुंच रहे थे। एक पन्ने का अख़बार होता था। शब्द कम होते थे और चित्र ज़्यादा। ताकि लोग समझ सकें। राजनीतिक नारे,ख़बरें आदि छप रही थीं। तंज करने वाले कार्टून का भी आगमन हो चुका था। इससे पहले जो खबरें होती थीं वो अपराध और विचित्र किंतु सत्य कैटगरी की हुआ करती थीं।


स्पर्बर कहते हैं कि उस दौरान अख़बार व्यक्तिगत पठन के लिए नहीं थे। सामूहिक पाठ होता था। कॉफीशॉप चर्च और सियासी क्लबों में। ऊंची आवाज़ में पढ़े जाते थे। अपनी कॉपी होने का बोध और चलन शुरू नहीं हुआ था। एक आदमी पढ़ता था और कई लोग झुंड बनाकर सुनते थे। साथ-साथ प्रश्नोत्तरी भी चलते रहती थी। लोग बीच में टोक कर किसी हिस्से को समझाने के लिए कहते थे। पढ़ने वाला समझाता था कि मतलब क्या है।

13 comments:

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी said...

आप इस किताब के बहाने पोपुलर प्रेस का आख्यान जारी रखें इससे नाध्यम साक्षरता में मदद मिलेगी। आपको देखकर अन्य भी इसी रास्ते से गुजरेंगे। बेहतर बन पड़ा है।

Aadarsh Rathore said...

धन्यवाद

Kulwant Happy said...

तभी तो असर होता था, आज व्यक्तिगत कॉपी की तरह विचार भी व्यक्तिगत होकर ही दम तोड़ देते हैं। व्यक्तिगत और सामूहिक पठन में बहुत अंतर है। किसी ने कहा है कि ज्यादा विचार करने से फैसले ठंडे पड़ जाते हैं, और व्यक्ति खुद में इतना कुढ़ता है कि वो बात को वहीं छोड़कर आगे बढ़ने की सोचता है। आज के न्यूज चैनल भी कहां किसी को सोचने का मौका देते हैं...टीआरपी की आग में झूलसती हुई पत्रकारिता देखता हूं हररोज।
महिलाओं की ही क्यों सुनी जाती है तब....

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

एक बेहद जरूरी पोस्ट..ये चर्चा जारी रहे..सुंदर.!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

महत्वपूर्ण आलेख। परिवर्तन की प्रक्रिया को समझने के लिए।

JC said...

१८४८ (कुल जमा संख्या २३) का यूरोप और ९९ वर्ष बाद, १९४७ (वो भी कुल जमा संख्या २३, गुरु = २ +३ = ५, पंचतत्व) का आज़ाद भारत, लगभग एक से लगते हैं इस संदर्भित विषय में...

मुझे याद है कि कैसे इसी भांति रेडियो कुछ एक के पास ही होता था. हमारे घर का रेडियो लम्बी तार लगा बाहर खुले में एक मेज पर रखा गया जिससे हमारी कालोनी के ३६ घरों के सभी जवाहर लाल नेहरु का पार्लियामेंट में आजादी के उपलक्ष्य में दी गयी प्रसिद्द ऐतिहासिक स्पीच सुन सकें...

JC said...

रवीश जी, क्षमा प्रार्थी हूँ, पता नहीं किस लहर में कुल जमा २३ लिख गया, जबकि २१ होना चाहिए था, जिनका योग ३ होता है, त्रेयम्बकेश्वर, ॐ, समान...

JC said...

हांलाकि आप कन्नी काट जाते हो, अब आप सोचेंगे कि मैंने ९९ के बारे में तो कुछ कहा नहीं! वो मैंने नेहरु का नाम ले कर इशारे-इशारे में ही जताया था, जो भारत को ९९ के फेर में धकेलने वाले ऐतिहासिक किरदार, यानि मनुष्य जीवन के ड्रामे, या काल-चक्र, के अनेकों मुख्य पात्रों में से एक पात्र, कहे जा सकते हैं...

और, चाहे वो पश्चिम का हो या पूर्व का कोई देश, कोपनहागन में, क्रिसमस के पहले भी, सभी अत्यधिक गर्मी महसूस कर रहे हैं...वर्तमान में भारत के प्रधान मंत्री भी वहां के लिए रवाना होने से पहले बाधित हुवे, यानि ३ घंटे देर से उनकी सुध विघ्नहर्ता (गणेश) ने ली :) "रूकावट के लिए खेद है" अब अधिक दिखाई नहीं देता टीवी पर आजकल...

SACHIN KUMAR said...

SACHIN KUMAR
एक बेहतरीन लेख। तब किस तरह से प्रसार संख्या बढ़ाने के लिए तत्कालीन पत्रकारों ने क्या किया। अगर आज की बात करे तो क्या करना चाहिए। आज लोग क्या चाहते है। फिर ये भी सवाल आता है कि जो लोग चाहते है क्या हम वो दिखाए या फिर जो हम दिखाना चाहते है वो लोग देखे। हम उन्हे देखने पर मजबूर कर दे या फिर वो हमे दिखाने पर मजबूर कर दे। फिल्म 'पा'में जो है वो अलग बात है। मजा आ जाता अगर इस पर बहस होती कि आज जादा से जादा लोगों के करीब कैसे पहुंचा जाए। उनकी ख़बर दिखा कर...कुछ हटके दिखा कर..कुछ अलग करना होगा..इतना तो तय है..ये भी तय है कि कोई निश्चित फॉर्मूला इसका नहीं है। और वो हमारी घटिया टीआरपी प्रणाली किए कराए पर खास देने जैसा है। एक बार फिर पाठकों से अनुरोध है अगर इस पर चर्चा हो तो मजा आ जाए...खाली मीडिया को गरियाने से काम नहीं चलेगा...कुछ करना ही होगा।

JC said...

सचिन और रविश जी अदि आदि, जैसा पहले भी प्राचीन हिन्दुओं ने समझा है, प्रश्न निरंतर द्वन्द का है जो मानव जाति को अधिक देखने को मिलता है इस 'मिथ्या संसार' में - झगडा 'इतिहास' और 'परंपरा' के बीच है...

मेरे एक मित्र, मलयालम भाषा के ज्ञानपीठ पुरुस्कार विजेता, ने मुझसे एक दिन कहा कि अंग्रेजों के कारण इतिहास के द्वारा विभिन्न घटनाओं का काल-क्रम के अनुसार वर्णन संभव हो पाया है.

मैंने उनको 'हिन्दू' मान्यता को दर्शाते बताया कि हिन्दू, यद्यपि निराकार ब्रह्म को 'परम सत्य' मानता था, वो इस ड्रामा में 'सत्य' उसी को मानता था जो समय के प्रभाव से परे था - जैसे सूर्य का पूर्व से उदय होना, इत्यादि...

इस कारण उनकी, अद्वैतवादी, की दृष्टि में मानव जीवन का अनंत ड्रामा माया के कारण सत्य और असत्य का खेल दिखाई पड़ता है...और इस लिए हर व्यक्ति को 'सच' को 'झूट' से अलग करना है, जैसे खर-पतवार और कोई इच्छित फसल, या हंस के समान दूध को पानी से - जिसमें एक अनपढ़ गदाई नामक 'निरक्षर' बंगाली व्यक्ति सिद्धि प्राप्त कर रामकृष्ण 'परमहंस' के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त किया, और उनके 'साक्षर' चेले विवेकानंद नाम से जाने गए प्रसिद्द व्यक्ति के कारण परंपरागत तौर पर उनका नाम उजागर किया हुआ है, पूर्व में ही नहीं अपितु पश्चिम में भी...यही भारत की विशेषता है जिसकी झलक 'गीता' में भी मिलती है किन्तु कालवश आधुनिक हिन्दू या भारतीय उसे पढने में अपनी बेइज्जत्ति समझता है और पश्चिम दिशा के कारण 'यूरोप के इतिहास' को प्राथमिकता देता है, जो ऐसा ही है जैसे अँधेरे स्थान में खोई वस्तु को वहाँ ढूंढना जहां उजाला है :)

विनीत कुमार said...

हिन्दी पत्रकारिता के विकासक्रम को लेकर भी इस तरह के कोई संदर्भ रहे हैं क्या? जानना दिलचस्प रहेगा। क्योंकि कई ऐसे संदर्भ रहे हैं जिसे कि हमने अपने छुटपन में देखा है। अखबारों का सामूहिक पाठ,अपनी प्रति न होने का बोध और एक ही बात को एक बार से अधिक बोलकर पढ़वाने वाली बात। क्या पत्रकारिता के भीतर रीडर रिस्पांस थ्योरी को लेकर कुछ शोध गुंजाइश बनती है। ऐसा इसलिए कि मुझे लगता है कि जितना कुछ भी लिखा गया है वो इसके लिखने और छपने के विकासक्रम के स्तर पर,पाठकों ने उसे किस रुप में लिया..इसके विकासक्रम के बारे में न के बराबर लिखा गया है।

JC said...

जैसा भारत के भूतकाल के विषय में प्रश्न है, संकेत मिलते हैं अनादी काल से यहाँ समाज के चार मुख्य श्रेणी, या वर्ण, में विभाजित किये जाने के. जिसमें ज्ञानोपार्जन का कार्य केवल ब्राह्मणों को, पर हित में ही करने के लिए, सोंपा गया...वो गुरु, यानि सर्व श्रेष्ट, भी कहलाये गए...

हर १२ वर्ष में परंपरागत रूप में मनाये जाने वाले कुम्भ मेले से आभास लगाया जा सकता है कि कैसे प्राचीन काल में सिद्धि प्राप्ति पर जोर था और समकालीन सिद्ध पुरुष गंगा तट पर, मुख्यतया काशी में, और अन्य विभिन्न स्थानों पर भी, एकत्रित हो मौखिक शास्त्रार्थ करते थे. सहमती हो जाने पर फिर अपने अपने स्थान पर लौट आम आदमी के हित में, विभिन्न भाषा में मनोरंजक कहानियों के माध्यम से शिक्षा प्रदान करते थे...शिव (विष का उल्टा) को यानी अनंत को ही उन्होंने सत्य माना जैसा 'सत्यम शिवम् सुंदरम' द्वारा आज भी बोला जाता है, किन्तु कभी कभी ऐसा प्रतीत होता है कि वो केवल तोते सामान ही दुहराया जाता है :)

आज भी भारत के किसी भी कोने में चले जाओ तो लगेगा कि उन्होंने बहुत अच्छा मौखिक प्रचार किया था क्यूंकि हर कोई ' प्रभु की माया ' अथवा "राम/ कृष्ण की लीला" बताता मिलेगा मानव जीवन को...

Anupam Dan said...

A very interesting to read topic........keep on writing Ravish !