ख़बर तुम साबुन हो
चीनी हो माचिस हो
बाज़ार में बिकती हो
सरकार में बनती हो
ख़बर तुम दुकान हो
दलिया हो बादाम हो
साहूकार की गिरवी हो
सरकार की जिगरी हो
ख़बर तुम धंधेबाज़ हो
दलालों की हलाल हो
हलालों का मलाल हो
ख़बर तुम मालामाल हो
कस्बा qasba
कहने का मन करता है...
चांद तुम एक कर्मचारी हो.....
दफ्तर है आसमान, चांद तुम एक कर्मचारी हो।
पंद्रह दिनों तक कंटते छटते घटते रह जाते हो।
बाद पंद्रह दिनों के कृष्ण पक्ष में खो जाते हो ।
नौकरी के पहले दिन जैसे पूनम हो जाते हो।
वेतन के दिन जैसे चांदनी बिखराते निकलते हो।
चांद तुम एक कर्मचारी हो.....
पंद्रह दिनों तक कंटते छटते घटते रह जाते हो।
बाद पंद्रह दिनों के कृष्ण पक्ष में खो जाते हो ।
नौकरी के पहले दिन जैसे पूनम हो जाते हो।
वेतन के दिन जैसे चांदनी बिखराते निकलते हो।
चांद तुम एक कर्मचारी हो.....
रामधन एंड मूलधन इन यूपी इलेक्शन-पार्ट ३
मूलधन,खेत के मेड़ पर बैठा शून्यगामी प्रतीत हो रहा था। रामधन भैय्या खोजते धौगते चले आ रहे थे। अरे मूलधनवा उठ न रे। ग्रैभिटी फोर्स ज़ीरो हो गइल का रे। कौन कहीस है रामधन भैय्या। अरे गांव भर के लइकन सब कहत हैं कि मूलधनवा के ग्रैभिटी ज़ीरो हो गवा है। धरती छोड़ता है कि हवा में उड़ने लगता है। इ कौन बीमारी है रे यंगर ब्रदर। रामधन भय्या। अब मूलधन भोकार पार के रोने लगता है। हम मेड़ पर के घास छोड़त हईं त हवा में उड़त लागत हईं। बे हुआ का है,बतावेगा। भैय्या हम टीवी देख लीहलीं। ओकरा में बोकरात रभीसवा बोल रहिस था कि धर्म आ जाति से ऊपर उठकर कब वोट करेगा। बस हम कहली ए भौकालेंकर महोदय(एंकर का नया नाम) देख हम उठत जात हईं धर्म आ जाति से। बस भैय्या, हल्का हो गललीं। जैसे धर्म आ जात छोड़ दिहलीं, बुझाइल कि भूचाल आई गवा है। जे जे धर्म आ जाति के धइले रहल, उस सभन ज़मीन में आ हमहीं अकेले असमाने में उड़े लगनी। कुछऊ शरीरियां में बाकिये नइखे। अब बुझाता, धर्म आ जाति केतना ज़रूरी है। धरती पर रहने के लिए। ओकरा बिना ग्रेभिटी वाला थ्योरी है न न्यूटनिया के, बेकार है।
अरे काहे रे। पोलटिक्स में फिजिक्स पढ़ता है। दिमाग की बीमारी हो गएल ह तोहकें। बुझले मूलधनवा। तू भोटर है रे। बिना जात अ धर्म के भोटर होता है कहीं। देखा है दुनिया में। दुनिया में...अरे रामधन भैय्या हम त जिनगी भर सीतापुर से बाहरे न गइलीं। इ सीतापुर में तो कउनू भोटर नाहीं है, जाति धर्म के बिना। नहीं है न त तू काहे दुन्नों के बिना हो गया। बड़का भाई के विस्वास में काहे नहीं लिया रे। देख, धर्म आ जाति न रखबे, तो कौनो पव्वो न देवेगा इलेक्सन टाइम में। बेगार करबे का रे नेतवन के। कुछऊ हमरो त मिलेके चाहीं। एहीसे कहत हईं,ऊपर उठिये त एक्के बार। देखल जाइ तब कि जहन्नुम मिलल की जन्नत। का पता ऊपरों जाय के बेरा चुनाव हो जाए आ पार्टी वालन हमके तोहकें जन्नत भेज दे।
मेनिफेस्टों का कोई भरोसा है। कुछऊ लिख देवत हैं सन। ओकरा में देखत तू कि एक्को लाइन लिखलै हैं कोई,कि धर्म या जात के बिना वाले भोटरों के लिए इ करेंगे उ करेंगे। बाप रे बाप । मूलधनवा अनरथ कईले रहले तू त। मत छोड़। धइले रह जात आ धर्म के। भौकालेंकर लोग तो बकत रहलन रात भर। बके दे ओनकरा के। देख मूलधन। बिकास के मतलब बूझ। फ्री कपड़ा लत्ता,जूता,साइकिल। इहे कूली मिलतौ। खैरात में सरकार हज़ार पांच सौ रूपये देगी हमन सभी को। लेकिन कौनो सामान बिना जात धर्म वाले के लिए नहीं है। न गांव है न रोड है न स्कूल है। जात धर्म त भोटर के श्रृंगार है। सजनी बिन घूंघट के शोभत नाहीं रे। मेलवन के लौंडिया मत बन। उघार हो जइबे,जात धरम छोड़ले त। माफी दे द भैय्या। हम सोचली कि बिकास होई जाइ।
अरे काहे रे। पोलटिक्स में फिजिक्स पढ़ता है। दिमाग की बीमारी हो गएल ह तोहकें। बुझले मूलधनवा। तू भोटर है रे। बिना जात अ धर्म के भोटर होता है कहीं। देखा है दुनिया में। दुनिया में...अरे रामधन भैय्या हम त जिनगी भर सीतापुर से बाहरे न गइलीं। इ सीतापुर में तो कउनू भोटर नाहीं है, जाति धर्म के बिना। नहीं है न त तू काहे दुन्नों के बिना हो गया। बड़का भाई के विस्वास में काहे नहीं लिया रे। देख, धर्म आ जाति न रखबे, तो कौनो पव्वो न देवेगा इलेक्सन टाइम में। बेगार करबे का रे नेतवन के। कुछऊ हमरो त मिलेके चाहीं। एहीसे कहत हईं,ऊपर उठिये त एक्के बार। देखल जाइ तब कि जहन्नुम मिलल की जन्नत। का पता ऊपरों जाय के बेरा चुनाव हो जाए आ पार्टी वालन हमके तोहकें जन्नत भेज दे।
मेनिफेस्टों का कोई भरोसा है। कुछऊ लिख देवत हैं सन। ओकरा में देखत तू कि एक्को लाइन लिखलै हैं कोई,कि धर्म या जात के बिना वाले भोटरों के लिए इ करेंगे उ करेंगे। बाप रे बाप । मूलधनवा अनरथ कईले रहले तू त। मत छोड़। धइले रह जात आ धर्म के। भौकालेंकर लोग तो बकत रहलन रात भर। बके दे ओनकरा के। देख मूलधन। बिकास के मतलब बूझ। फ्री कपड़ा लत्ता,जूता,साइकिल। इहे कूली मिलतौ। खैरात में सरकार हज़ार पांच सौ रूपये देगी हमन सभी को। लेकिन कौनो सामान बिना जात धर्म वाले के लिए नहीं है। न गांव है न रोड है न स्कूल है। जात धर्म त भोटर के श्रृंगार है। सजनी बिन घूंघट के शोभत नाहीं रे। मेलवन के लौंडिया मत बन। उघार हो जइबे,जात धरम छोड़ले त। माफी दे द भैय्या। हम सोचली कि बिकास होई जाइ।
गांधी परिवार का मीडिया परिवार
जब से प्रियंका गांधी वाड्रा उतरीं हैं मैदान में,तब से लग रहा है कि यूपी में बाकी नेता प्रचार ही नहीं कर रहे हैं। वैसे प्रियंका ने सिर्फ रायबरेली और अमेठी का जिम्मा संभाला है फिर भी ऐसे बताया जा रहा है जैसे वो पूरे उत्तर प्रदेश में प्रचार कर रही हैं। दिन भर कैमरे पीछा करते है,लाइव दिखाते हैं,फोकस में प्रियंका ही रहती हैं। एक भी कैमरा पैन होकर,लेफ्ट-राइट होकर अमेठी या रायबरेली नहीं दिखाता। उनकी हर बात बल्कि वही बात बार बार दिखाई जा रही है। अब प्रियंका गांधी ने तो नहीं कहा होगा कि आइये हमारे पीछे-पीछे चलिये। मीडिया खुद ही दरी बिछाकर लेटने के लिए तैयार है तो क्या किया जा सकता है। प्रियंका की राजनीतिक अहमियत तो समझ आती है मगर रॉबर्ट वाड्रा को भी कवरेज की कमी महसूस नहीं हुई होगी। राबर्ट वाड्रा पर मीडिया टूट और टूटा पड़ा रहा।
राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों के बीच प्रियंका गांधी एक ख़बर ज़रूर हैं। लेकिन जब यह ज़रूरत निष्ठा में घुलने मिलने लगती है तब समस्या होती है। समस्या उन चिरकुट पत्रकारों को ही होती है जो सत्ता के साथ चुपचाप तालमेल बिठाकर नहीं रहना जानते। अगर आप टीवी पर कवरेज का प्रतिशत निकालें तो प्रियंका के आने के बाद से यह संतुलन गांधी परिवार के पक्ष में ही बैठता है। जितना राहुल को दिखाया जाता है उतना अखिलेश या मायावती को नहीं। मुलायम तो शायद ही कभी-कभी। अजित सिंह भी नज़र नहीं आते। अब इसके लिए गांधी परिवार को क्यों दोष दें? उन्होंने कोई सर्कुलर तो जारी नहीं किया होगा कि अरे भाई आओ,हमीं को दिखाओ। मीडिया सचमुच इस परिवार की सत्ता को सह्रदय स्वीकार करता है। इसलिए नहीं कि बाइट या इंटरव्यू मिलेगा। वो भी किसी को नहीं मिला है। एक्सक्लूसिव तो किसी को नहीं मिला। प्रियंका ने तो झुंड के बीच एकाध बाइट दे भी दिये हैं मगर राहुल गांधी तो हमेशा लांग शाट में ही नज़र आते हैं। इन दोनों में राबर्ट वाड्रा ही मीडिया चतुर निकले। कैमरे और माइक के बीच सहज नज़र आए। आराम से बात करते रहे। उन्हें राजनीति का यह रूट शायद पसंद हो। मगर राहुल गांधी तो बिल्कुल कैमरे वाला रूट पसंद नहीं करते। उन्हें मालूम है कि ये पीछे पीछे आयेंगे ही तो क्यों बुलायें। राहुल बुलाते भी हैं तो एक कमरे में मीडिया को बिठाकर बात करते हैं। खुलकर बात करते हैं। मगर यह भी कह देते हैं कि आपके लिए है,रिपोर्ट करने के लिए नहीं। वहां कैमरे और रिकार्डर नहीं होते हैं। यह अपने आप में मीडिया पर गंभीर टिप्पणी है। राहुल को भरोसा नहीं कि इस तरह की बातचीत को भाई लोग ज़रूरत से अधिक निष्ठा में कुछ का कुछ न बना कर परोस दें। बहुत अजीब लगता है कि जब किसी तिराहे पर ओबी वैन लगे हों और मीडिया प्रियंका के आने का इंतज़ार कर रही हो। वो वहां पांच सौ हज़ार लोगों से मिलकर चली जाती हैं। कैमरा दूसरे लोकेशन पर पहुंचने के लिए सामान समेटने लगता है।
मीडिया के लिए राहुल या प्रियंका को फॉलो करना ग़लत नहीं है। राजनीति के विद्यार्थी और पत्रकार के नाते मैं भी यही करता। लेकिन क्या सारा कैमरा इन पर ही रहेगा? जबकि खुद प्रियंका कह रही हैं कि रायबरेली और अमेठी का चुने हुए विधायकों ने विकास नहीं किया। तब भी कैमरे और रिपोर्टर इसे स्टोरी नहीं समझते। वो एक सस्ता काम करते हैं। दावे के साथ कह सकता हूं एक राजनेता के तौर पर राहुल गांधी जितनी मेहनत करते हैं वो खुद समझ जाते होंगे ऐसी मीडिया को देखकर। सवाल राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा गांधी के कवरेज में संतुलन का है। बाकी नेताओं के साथ ग़ैर गांधी परिवार या ग़ैर करिश्माई व्यवहार नहीं होना चाहिए। ऐसा करने वाले पत्रकार राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले कम चाटुकारिता की तलाश वाले ज्यादा लगते हैं।
एक दिन यही राहुल गांधी कह देंगे कि मीडिया अपना काम ठीक से नहीं करता। उसे नेता की नहीं जनता की रिपोर्टिंग करनी चाहिए। देश की हालत दिखानी चाहिए। मीडिया नहीं दिखाता इसलिए उन्हें लोगों के घरों में जाना पड़ता है। क्यों नहीं मीडिया को अखिलेश,मायावती,अजित सिंह में करिश्मा नज़र आता है? क्या ये तीनों बिना करिश्मा के ही राजनीति में डटे हुए हैं? पत्रकारों से समझदार तो राहुल गांधी निकले जो मायावती और कांशीराम की तारीफ कर दी। शायद राहुल गांधी ने कांशीराम से ही सीखा हो कि गंभीर राजनीति करनी है तो ऐसी हल्की और बेपेंदी की मीडिया के भरोसे मत रहो। ज़मीन पर जाओ। धक्के खाओ। इंटरव्यू के चक्कर में मत पड़ो। चार संपादकों के चक्कर में पड़े रहने से अच्छा राहुल को लगता होगा कि बनारस के किसी रेस्त्रां या चाय की दुकान में चाय पी ली जाए। कम से कम उसके आस पास के लोग बात तो करेंगे कि यहां नेता जी आए थे। रही बात मीडिया की तो उन्हें मोबाइल में रिकार्ड कर फुटेज दे दो। एक्सक्लूसिव बनाकर दिखा देंगे। इतना वक्त और संसाधन लगाने के बाद भी एक भी जगह पर राहुल या प्रियंका गांधी वाड्रा की राजनीति की बारीकियों को समझाने वाली रिपोर्ट नहीं दिखी। वो भी शाम को टीवी खोल कर बंद कर देते होंगे कि इतना घूमा मगर ये भाई लोग सिर्फ हमारे आकर्षण में ही खोए रहे।
इसीलिए टीवी के ज़रिये आपको चुनावों की समझ कभी नहीं मिलेगी। आपको कई चैनल और अखबार ढूंढने होंगे तब जाकर पांच से दस प्रतिशत की ही जानकारी मिलेगी। बाकी जो हो रहा है वो कैमरों के बाहर हो रहा है। प्रधानमंत्री कब बनेंगे और राजनीति में कब आयेंगे, पूछने के लिए यही दो सवाल हैं इनके पास। हद है। क्या प्रियंका गांधी वाड्रा राजनीति में नहीं है? नहीं होतीं तो वो पिछले कई बार से चुनाव प्रचार का काम क्यों संभाल रही होतीं? क्या राहुल गांधी बता देंगे कि जी मैं परसों प्रधानमंत्री बनूंगा? वो लालू यादव नहीं हैं कि यह कह दें कि मैं बनना चाहता हूं। अफसोस यही है कि ये सारे चाटुकारिता करके भी राहुल गांधी के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। हर नेता चाहता है कि पत्रकार उसकी राजनीति को गंभीरता से ले। मीडिया के लिए राहुल गांधी बाइट प्रवक्ता बन कर रह गए हैं। रिपोर्टिंग की लाश पड़ी है। हम सब कुचल कर चले जा रहे हैं।
राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों के बीच प्रियंका गांधी एक ख़बर ज़रूर हैं। लेकिन जब यह ज़रूरत निष्ठा में घुलने मिलने लगती है तब समस्या होती है। समस्या उन चिरकुट पत्रकारों को ही होती है जो सत्ता के साथ चुपचाप तालमेल बिठाकर नहीं रहना जानते। अगर आप टीवी पर कवरेज का प्रतिशत निकालें तो प्रियंका के आने के बाद से यह संतुलन गांधी परिवार के पक्ष में ही बैठता है। जितना राहुल को दिखाया जाता है उतना अखिलेश या मायावती को नहीं। मुलायम तो शायद ही कभी-कभी। अजित सिंह भी नज़र नहीं आते। अब इसके लिए गांधी परिवार को क्यों दोष दें? उन्होंने कोई सर्कुलर तो जारी नहीं किया होगा कि अरे भाई आओ,हमीं को दिखाओ। मीडिया सचमुच इस परिवार की सत्ता को सह्रदय स्वीकार करता है। इसलिए नहीं कि बाइट या इंटरव्यू मिलेगा। वो भी किसी को नहीं मिला है। एक्सक्लूसिव तो किसी को नहीं मिला। प्रियंका ने तो झुंड के बीच एकाध बाइट दे भी दिये हैं मगर राहुल गांधी तो हमेशा लांग शाट में ही नज़र आते हैं। इन दोनों में राबर्ट वाड्रा ही मीडिया चतुर निकले। कैमरे और माइक के बीच सहज नज़र आए। आराम से बात करते रहे। उन्हें राजनीति का यह रूट शायद पसंद हो। मगर राहुल गांधी तो बिल्कुल कैमरे वाला रूट पसंद नहीं करते। उन्हें मालूम है कि ये पीछे पीछे आयेंगे ही तो क्यों बुलायें। राहुल बुलाते भी हैं तो एक कमरे में मीडिया को बिठाकर बात करते हैं। खुलकर बात करते हैं। मगर यह भी कह देते हैं कि आपके लिए है,रिपोर्ट करने के लिए नहीं। वहां कैमरे और रिकार्डर नहीं होते हैं। यह अपने आप में मीडिया पर गंभीर टिप्पणी है। राहुल को भरोसा नहीं कि इस तरह की बातचीत को भाई लोग ज़रूरत से अधिक निष्ठा में कुछ का कुछ न बना कर परोस दें। बहुत अजीब लगता है कि जब किसी तिराहे पर ओबी वैन लगे हों और मीडिया प्रियंका के आने का इंतज़ार कर रही हो। वो वहां पांच सौ हज़ार लोगों से मिलकर चली जाती हैं। कैमरा दूसरे लोकेशन पर पहुंचने के लिए सामान समेटने लगता है।
मीडिया के लिए राहुल या प्रियंका को फॉलो करना ग़लत नहीं है। राजनीति के विद्यार्थी और पत्रकार के नाते मैं भी यही करता। लेकिन क्या सारा कैमरा इन पर ही रहेगा? जबकि खुद प्रियंका कह रही हैं कि रायबरेली और अमेठी का चुने हुए विधायकों ने विकास नहीं किया। तब भी कैमरे और रिपोर्टर इसे स्टोरी नहीं समझते। वो एक सस्ता काम करते हैं। दावे के साथ कह सकता हूं एक राजनेता के तौर पर राहुल गांधी जितनी मेहनत करते हैं वो खुद समझ जाते होंगे ऐसी मीडिया को देखकर। सवाल राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा गांधी के कवरेज में संतुलन का है। बाकी नेताओं के साथ ग़ैर गांधी परिवार या ग़ैर करिश्माई व्यवहार नहीं होना चाहिए। ऐसा करने वाले पत्रकार राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले कम चाटुकारिता की तलाश वाले ज्यादा लगते हैं।
एक दिन यही राहुल गांधी कह देंगे कि मीडिया अपना काम ठीक से नहीं करता। उसे नेता की नहीं जनता की रिपोर्टिंग करनी चाहिए। देश की हालत दिखानी चाहिए। मीडिया नहीं दिखाता इसलिए उन्हें लोगों के घरों में जाना पड़ता है। क्यों नहीं मीडिया को अखिलेश,मायावती,अजित सिंह में करिश्मा नज़र आता है? क्या ये तीनों बिना करिश्मा के ही राजनीति में डटे हुए हैं? पत्रकारों से समझदार तो राहुल गांधी निकले जो मायावती और कांशीराम की तारीफ कर दी। शायद राहुल गांधी ने कांशीराम से ही सीखा हो कि गंभीर राजनीति करनी है तो ऐसी हल्की और बेपेंदी की मीडिया के भरोसे मत रहो। ज़मीन पर जाओ। धक्के खाओ। इंटरव्यू के चक्कर में मत पड़ो। चार संपादकों के चक्कर में पड़े रहने से अच्छा राहुल को लगता होगा कि बनारस के किसी रेस्त्रां या चाय की दुकान में चाय पी ली जाए। कम से कम उसके आस पास के लोग बात तो करेंगे कि यहां नेता जी आए थे। रही बात मीडिया की तो उन्हें मोबाइल में रिकार्ड कर फुटेज दे दो। एक्सक्लूसिव बनाकर दिखा देंगे। इतना वक्त और संसाधन लगाने के बाद भी एक भी जगह पर राहुल या प्रियंका गांधी वाड्रा की राजनीति की बारीकियों को समझाने वाली रिपोर्ट नहीं दिखी। वो भी शाम को टीवी खोल कर बंद कर देते होंगे कि इतना घूमा मगर ये भाई लोग सिर्फ हमारे आकर्षण में ही खोए रहे।
इसीलिए टीवी के ज़रिये आपको चुनावों की समझ कभी नहीं मिलेगी। आपको कई चैनल और अखबार ढूंढने होंगे तब जाकर पांच से दस प्रतिशत की ही जानकारी मिलेगी। बाकी जो हो रहा है वो कैमरों के बाहर हो रहा है। प्रधानमंत्री कब बनेंगे और राजनीति में कब आयेंगे, पूछने के लिए यही दो सवाल हैं इनके पास। हद है। क्या प्रियंका गांधी वाड्रा राजनीति में नहीं है? नहीं होतीं तो वो पिछले कई बार से चुनाव प्रचार का काम क्यों संभाल रही होतीं? क्या राहुल गांधी बता देंगे कि जी मैं परसों प्रधानमंत्री बनूंगा? वो लालू यादव नहीं हैं कि यह कह दें कि मैं बनना चाहता हूं। अफसोस यही है कि ये सारे चाटुकारिता करके भी राहुल गांधी के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। हर नेता चाहता है कि पत्रकार उसकी राजनीति को गंभीरता से ले। मीडिया के लिए राहुल गांधी बाइट प्रवक्ता बन कर रह गए हैं। रिपोर्टिंग की लाश पड़ी है। हम सब कुचल कर चले जा रहे हैं।
अंकिल टैम के आउटपुटियों का युवराज
अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि न्यूज़ चैनलों पर युवराज सिंह की श्रद्दांजलि लिखी जा रही है या जीवनी। ध्यान से देखने पर इन दोनों का मिश्रण दिखाई पड़ रहा है। वीर रस के भाव में सब कुछ कहा जाने लगा है। इसमें देशभक्ति के रस भी नज़र आते हैं। काल को हराकर नियतिवाद से होड़ भी है। युवराज सिंह की बीमारी ने क्रिकेट प्रेमियों को सन्न किया है। मगर न्यूज़ चैनल वाले ऐसे बर्ताव कर रहे हैं जैसे कैंसर युवराज को नहीं,उन्हें हो गया है। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का वो दाद खाज खुजली जैसा चित्रण कर रहे हैं। सारे अस्पतालों के कैंसर और कीमो विशेषज्ञ बुला लिये गए हैं। जैसा कि गंभीर बीमारियों के समय सामान्य मरीज़ बर्ताव करता है उसी तरह से चैनलवाले भी कर रहे हैं। वैद्य,ओझा और बाबा रामदेव भी बाइट दे रहे हैं। एक आम मरीज़ भी यही करता है। अपोलो से दिखा कर सीधा वैध और होम्योपैथी के पास जाएगा। फिर किसी के कहने पर टोटका भी करेगा। युवराज सिंह पर जो रिपोर्टिंग हो रही है, इस तरह की पहले भी कई बार हो चुकी है। सोनिया गांधी के समय भी ग्राफिक्स और एनिमेशन के ज़रिये और स्थानीय डाक्टरों के अंदाज़ी टक्कर प्रवचनों के सहारे टीआरपी बटोर ली गई थी। अब युवराज के बहाने यही काम हो रहा है। कोई अपवाद नहीं है। सब एक ही तरह से रिपोर्ट कर रहे हैं। बैकग्राउंड स्कोर ऐसा है जैसे सिनेमा में नासिर हुसैन को हार्ट अटैक होने पर सुनाई पड़ता था। पता नहीं कोई मेडिकल का छात्र इस तरह की रिपोर्टिंग को कैसे देखता होगा। भावुक परन्तु चीखू मार्का वायस ओवर से हरारत तो उठने ही लगती होगी। कंठ दबोच के बोलने वाले फिर से लौट आए हैं। काल से होड़ कर रहा है फाइटर। जल्दी लौटेगा कैंसर को हराकर युवराज। बाप रे बाप।
अंग्रेज़ी और हिन्दी दोनों एक ही भाव से रिपोर्ट कर रहे हैं। बात ये है कि हम अंग्रेज़ी में हर चीज़ अच्छी मान लेते हैं। मगर वहां भी खिलाड़ी से लेकर डॉक्टर तक कैंसर पर बता रहे हैं। कैंसर अब पहले जैसे असाध्य नहीं रहा। मगर चर्चा होनी थी तो इस बात पर भी होती कि हमारे डाक्टरों का क्या हाल है। जब युवराज जैसी हस्ती की बीमारी का पता चलने में इतनी देर हो सकती है तो आम आदमी का कितना नुकसान होता होगा। चर्चा इस पर भी हो सकती थी कि कैंसर क्यों फैल रहा है? ऐसे मौके पर बहुत सारे नशेड़ी गंजेड़ी कहने लगते हैं कि देखिये युवराज तो नियम से रहता होगा,फिर भी कैंसर हो गया तो हम तंबाकु बीड़ी क्यों छोड़ दे। बहुत सारे लोग मिलते हैं जो कैंसर को लेकर काम करते हैं। अपना कार्ड देते हैं,कहते हैं कि भाई साहब कुछ कीजिए। जागरूकता के लिए। ऐसे कार्ड और मुद्दों की कोई पूछ नहीं रह गई है। अब तो वहीं मना कर देता हूं। बता देता हूं कि आप ही समझा दीजिए मुझे कि स्पीड न्यूज़ और डिबेट से कैसे जागरूकता फैलती है।
यह लेख दर्शकों से संवाद के लिए हैं। युवराज पर तमाम तरह के रसों में लिखने और स्पेशल बनाने वाले आउटपुटियों को हतोत्साहित करने के लिए नहीं हैं। जब भारत अंकल सैम के आगे नतमस्तक हो जाता है, तो मामूली तनख्वाह पर काम करने वाले आउटपुटिये अंकल टैम( टैम मीटर) के आगे सलाम क्यों न बजाए। बल्कि उन्हें यह काम शान से करना चाहिए। जब हम सबकी प्रतिबद्धता रेटिंग ही है तो उसे लेकर शर्मिंदा कब तक रह सकते हैं? रेटिंग पर अब प्रबंधन बोले, बेऔकात पत्रकार क्यों स्टैंड लेता चले। अब काम से कोई मतलब नहीं है। काम वही है जो रेटिंग ला दे। जिनके घर अंकल टैम का मीटर नहीं है ऐसे दर्शकों को जल्दी भगाना शुरू कीजिए। कह दीजिए कि भाई जब आपके लिए हम काम ही नहीं करते हैं तो क्यों बकवास सुने। अगर कोई अंकल टैम का मीटर वाला भतीजा बोलेगा तो उसकी सुनेंगे। छक कर ऐसे प्रोग्राम बनाइये। जिसको हिन्दी चैनल ख़राब लगते हैं वो तमिल देख लें। अंग्रेज़ी के देख लें । कम से कम हिन्दी वाले ख़राबे में भी सृजनशील तो हैं ही। ग़ैरत मारकर रोते हुए आपके लिए ऐसे कार्यक्रम तो बना ही देते हैं जिन्हें देखकर आप हंस तो सकते ही हैं। मैं भी युवराज का फैन हूं। क्रिकेट नहीं देखता मगर यह कहीं नहीं लिखा है कि युवराज का फैन होने के लिए क्रिकेट देखना ही पड़ेगा। मैं भी चाहता हूं कि युवराज स्वस्थ्य हो जाएं। कैंसर जैसे काल से होड़ कर एक बार फिर से मैदान में आ जाए ये फाइटर। भारत मां का लाल, तुझे कुछ नहीं होगा। पूरा देश दुआएं भेज रहा है। तू लड़ेगा, तू जीतेगा, तू खेलेगा, तू दौड़ेगा, तू बनेगा सरताज,क्योंकि तू है युवराज। जय हिन्द।
अंग्रेज़ी और हिन्दी दोनों एक ही भाव से रिपोर्ट कर रहे हैं। बात ये है कि हम अंग्रेज़ी में हर चीज़ अच्छी मान लेते हैं। मगर वहां भी खिलाड़ी से लेकर डॉक्टर तक कैंसर पर बता रहे हैं। कैंसर अब पहले जैसे असाध्य नहीं रहा। मगर चर्चा होनी थी तो इस बात पर भी होती कि हमारे डाक्टरों का क्या हाल है। जब युवराज जैसी हस्ती की बीमारी का पता चलने में इतनी देर हो सकती है तो आम आदमी का कितना नुकसान होता होगा। चर्चा इस पर भी हो सकती थी कि कैंसर क्यों फैल रहा है? ऐसे मौके पर बहुत सारे नशेड़ी गंजेड़ी कहने लगते हैं कि देखिये युवराज तो नियम से रहता होगा,फिर भी कैंसर हो गया तो हम तंबाकु बीड़ी क्यों छोड़ दे। बहुत सारे लोग मिलते हैं जो कैंसर को लेकर काम करते हैं। अपना कार्ड देते हैं,कहते हैं कि भाई साहब कुछ कीजिए। जागरूकता के लिए। ऐसे कार्ड और मुद्दों की कोई पूछ नहीं रह गई है। अब तो वहीं मना कर देता हूं। बता देता हूं कि आप ही समझा दीजिए मुझे कि स्पीड न्यूज़ और डिबेट से कैसे जागरूकता फैलती है।
यह लेख दर्शकों से संवाद के लिए हैं। युवराज पर तमाम तरह के रसों में लिखने और स्पेशल बनाने वाले आउटपुटियों को हतोत्साहित करने के लिए नहीं हैं। जब भारत अंकल सैम के आगे नतमस्तक हो जाता है, तो मामूली तनख्वाह पर काम करने वाले आउटपुटिये अंकल टैम( टैम मीटर) के आगे सलाम क्यों न बजाए। बल्कि उन्हें यह काम शान से करना चाहिए। जब हम सबकी प्रतिबद्धता रेटिंग ही है तो उसे लेकर शर्मिंदा कब तक रह सकते हैं? रेटिंग पर अब प्रबंधन बोले, बेऔकात पत्रकार क्यों स्टैंड लेता चले। अब काम से कोई मतलब नहीं है। काम वही है जो रेटिंग ला दे। जिनके घर अंकल टैम का मीटर नहीं है ऐसे दर्शकों को जल्दी भगाना शुरू कीजिए। कह दीजिए कि भाई जब आपके लिए हम काम ही नहीं करते हैं तो क्यों बकवास सुने। अगर कोई अंकल टैम का मीटर वाला भतीजा बोलेगा तो उसकी सुनेंगे। छक कर ऐसे प्रोग्राम बनाइये। जिसको हिन्दी चैनल ख़राब लगते हैं वो तमिल देख लें। अंग्रेज़ी के देख लें । कम से कम हिन्दी वाले ख़राबे में भी सृजनशील तो हैं ही। ग़ैरत मारकर रोते हुए आपके लिए ऐसे कार्यक्रम तो बना ही देते हैं जिन्हें देखकर आप हंस तो सकते ही हैं। मैं भी युवराज का फैन हूं। क्रिकेट नहीं देखता मगर यह कहीं नहीं लिखा है कि युवराज का फैन होने के लिए क्रिकेट देखना ही पड़ेगा। मैं भी चाहता हूं कि युवराज स्वस्थ्य हो जाएं। कैंसर जैसे काल से होड़ कर एक बार फिर से मैदान में आ जाए ये फाइटर। भारत मां का लाल, तुझे कुछ नहीं होगा। पूरा देश दुआएं भेज रहा है। तू लड़ेगा, तू जीतेगा, तू खेलेगा, तू दौड़ेगा, तू बनेगा सरताज,क्योंकि तू है युवराज। जय हिन्द।
खोड़ा ने बेइंतहा मोहब्बत का इनाम दिया है
खोड़ा से फोन आया था। वहां की रिपोर्टिंग के बाद से नहीं गया हूं। रवीश की रिपोर्ट भी बंद हो गई। मगर वहां से फोन आते रहते हैं। एक दिन किसी चाट की दुकान पर पापड़ी चाट खा रहा था। खाने के बाद जब पैसे दिये तो दुकानदार ने इंकार कर दिया। मैं गिड़गिड़ाने लगा कि लोग क्या सोचेंगे कि पत्रकार तीस रुपये की चीज़ भी फ्री में खाने लगे हैं। मंत्रियों की जूतियां उठाने के अलावा। मगर वो नहीं माना। कहने लगा कि मैं खोड़ा में रहता हूं। ये मेरी तरफ से इनाम है। साथ में घर के लिए भी पैक कर दिया हैं,लेते जाइयेगा। बार बार कहने पर भी कि तारीफ कर दी बहुत है। अब धंधे से समझौता मत करो। उसका यही जवाब था कि हमारी बात करने वाले कम हैं। यह हमारा तरीका है खुद को खुश करने का। इसी तरह ऑटो से स्टेशन जा रहा था। ऑटो वाला पहचान गया। नई दिल्ली पहुंच कर किराया लेने से इंकार कर दिया। बहुत मुश्किल हुई। समझाते रहा कि पैसे ले लो। बोला नहीं लेंगे। बल्कि आप कहिये तो आज पूरी दिल्ली फ्री में घुमायेंगे। आपने हमारी बात उठाई है। हम खोड़ा में नरक की ज़िंदगी जी रहे थे। मैंने कहा कि बात ही उठाई है,सरकार ने जो पैसे दिये हैं उससे भी कुछ नहीं होगा। ऑटो वाला नहीं माना। कहा जितना कर सकते थे आपने किया। हम आपसे किराया नहीं लेंगे। बस मोबाइल में एक फोटो हो जाए। दूसरे आटो वाले को बुलाया और उसने दोनों की तस्वीर क्लिक कर दी। आज फिर खोड़ा से फोन आया। पता दीजिए। मैंने पूछा क्यों? जवाब मिला कि हमने आपके लिए पांच फुट का पोस्टर बनवाया है। साईं का अलग से और कृष्ण का अलग से। हंसने लगा कि भाई धार्मिक प्राणी नहीं हैं। कहने लगा कि अरे ड्राइंग रूप में सजा दीजिए। मना करने पर वो मायूस हो गए। फिर फोन आया कि भाई साहब गांव ले जाकर पोस्टर लगा दीजिएगा। मुझसे इतना प्यार संभलता नहीं है।
हम सब रिपोर्टर को लगता है कि क्यों काम कर रहे हैं? दफ्तर में तो एंकर ही प्रमोट होता है। रागदरबार,शिखर और बाबा घोटूं ,घटिया और अनुप्रासिक हिन्दी लिखने वाला आउटपुट वाला ही मालिक बन जाता है। कभी कभी इस बेइंतहा मोहब्बत को देखकर कहने का मन करता है कि रिपोर्टर ठीक से काम करे तो उसे जो प्यार मिलेगा पब्लिक से,उसके लिए आउटपुट वाला और टिव और इंग पदनामानों वाला एडिटर तरस जाएगा। एक रिपोर्टर को यही ढाढस बंधाने की ज़रूरत है। बशर्ते उसे दफ्तर मौका दे। संपादक मौका दे। बिना मौका रिपोर्टर क्या कर सकता है? लेकिन वो अपनी तरफ से इतनी तैयारी तो रखे कि जब भी मौका मिले एक अच्छी कहानी की गुज़ाइश बना दे। खोड़ा के बाद एक मॉल में शर्ट खरीद रहा था। दुकानदार ने कहा कि बीस मिनट ठहर जाइये। देखा कि उसकी बेटी और बीबी भागे भागे आ रहे हैं। दोनों ने मेरे साथ तस्वीर खिंचाई। आप ही हैं जी जिसने खोड़ा पर रिपोर्ट बनाई थी। सही चीज़ थी सर। आपको डर नहीं लगता। मां बेटी इसी तरह की बातें करने लगीं। जब शर्ट लेकर काउंटर पर गया और डेबिट कार्ट दिया तो पर्ची पर पांच सौ रुपये लिखे थे। मैंने कहा कि ये तो कम है। दुकानदार ने कहा कि हमें मालूम है कि आप मुफ्तखोर पत्रकार नहीं हो इसीलिए पांच सौ रुपये लिये हैं। पर शर्ट तो मैंने दो हज़ार की खरीदी है। दो कमीज़ पांच सौ में पटरी पर भी नहीं मिलेगी। उसने पैसे नहीं लिये। कहा कि ये हमारा प्यार है। अगली बार से पूरे पैसे दीजिएगा मगर इस बार ये इनाम हमारी तरफ से। दिल्ली के अतिकुलीन खान मार्केट में ही ऐसा वाकया हुआ। पांच हज़ार की चीज़ ढाई हज़ार में दे दी। कहता रहा कि आप रिपोर्टर की आदत खराब करते हैं। उसने कहा कि मेरी दुकान पर आपकी कंपनी के बड़े बड़े लोग भी आते हैं। दो रुपये कम नहीं करता। आपने खोड़ा के लिए जो किया है उसके लिए इनाम समझिये इसे। उस करोड़पति दुकानदार ने मुझे अपने हाथ से काफी पिलाई। पानी मंगाकर दिया। अगर अब भी ऐसे प्यार को नहीं पाना चाहते हैं तो नुकसान हमारा है। नुकसान हमारे धंधे का है।
खोड़ा के बाद ऐसे कई वाकये हुए। टाटा कंपनी में काम करने वाले एक साधारण से कर्मचारी ने मेरे पड़ोसी के हाथों पांच किलो सत्तू और दो किलो चना भिजवा दिया। यह कहकर कि ओरिजनल आदमी है तो ओरिजनल चीज़ खाए। उसका बॉस जब सत्तू और चना लेकर दरवाज़े पर खड़ा था तो काफी शर्मसार था। पत्नी भी घबरा गई। बोली नहीं ले जाइये। वो भड़क जाएगा। फिर फोन किया कि क्या करना है। मैंने कहा रख लो। सत्तू और चना भिजवाने वाला मुझे क्या खरीदेगा। अपने हिस्से में से ही निकाल कर दे रहा है। खोड़ा की रिपोर्टिंग के बाद लोगों ने तरह तरह से शुक्रिया अदा किया। कोई बीच रास्ते से कार मोड़ कर आ गया तो किसी ने बीच रास्ते में ही कार रोक दी। एक मॉल में एक महिला ने अपने खड़ूस पति का हाथ छुड़ा लिया और दौड़ कर चली आई। बुलाती रही कि तुम आ जाओ, आया ही नहीं. लेकिन वो आई और शुक्रिया अदा कर गई। स्टेशन पर एक वृद्ध सज्जन मुझे देखकर भावुक हो गए। कहा कि ज़िंदा आदमी लगते हो। पत्रकारिता का यही मतलब होता है।
रवीश की रिपोर्ट को बंद हुए अब साल होने को आ रहा है। मगर आज भी लोग ट्वीट पर आते ही पहला सवाल यही करते हैं कि कब शुरू करेंगे। मैंने कुछ सोच कर तो शुरू नहीं किया था और न ही मैंने बंद किया। उस रिपोर्ट को जनता और रेटिंग दोनों ने काफी पसंद किया था। ज्यादातर रिपोर्ट रेटिंग चार्ट में हिट ही रही। दफ्तर की ज़रूरतें व्यक्ति की भूमिका और ज़रूरतों को परिभाषित करती रहती हैं। लेकिन उसकी वजह से लोगों का जो प्यार मिला,मेरा दिल अब भी कहता है कि ज़मीन से लाई गई बेहतरीन रिपोर्ट के लिए अब भी जनता भूखी है। वो अपना सबकुछ लुटाने के लिए तैयार है। वो अब एंकर और रिपोर्टर के बीच के फर्क को भी समझती है। हम बदलाव में छोटा सा योगदान तो कर ही सकते हैं। लेकिन अब तो जिससे मिलिये इस धंधे में या तो सरकार का दुलरूवा न पाने का अफसोस करता है या फिर कहीं सेटिंग में लगा हुआ है। रिपोर्टर और एंकर भयंकर अहंकार से भरे पड़े हैं। इतने अहंकारी पुरुषों और स्त्रियों से मैं भी टकराते टकराते बदलने लगा हूं। पता है कि सही नहीं है। मैं बदलूंगा भी नहीं लेकिन उस वक्त जब ऐसी नकारात्मक ऊर्जा निकलती हुई पास आती है तो मेरे कपार से भी भन्ना कर निकल जाती है। भायं भायं करने वाले ये भौकालेंकर( एंकर का नया नाम) ज़रा अहंकारों की दुनिया से निकले। अपने दफ्तरों में थोड़ी सी जगह मांगे मिट्टी की रिपोर्ट लाने की। जो जहां है और जितना भी मौका मिल सकता है, उसका सदुपयोग करे तो यह फील्ड वाकई मज़ेदार है। ठीक है कि कोई मंत्री नहीं बुलाता चाय पर मगर फ्री में कोई चाट खिलाने वाला तो है न। बस हम सब एक अच्छा रिपोर्टर बने रहे। मुझे पूरा यकीन है इस तरह के संस्मरण तमाम रिपोर्टरों के होंगे जिन्होंने कभी न कभी अच्छी रिपोर्टिंग की होगी या कर रहे होंगे। वर्ना प्रमोट तो कुत्ता भी अपनी गली में हो जाता है। प्रमोशन जीवन नहीं है। सेटिंग कर रोस्टर प्रभारी बन जाना पत्रकारिता नहीं है। ऐसे लोगों से पेशेवर संबंध इन्हीं कामों के लिए ही रखना चाहिए। लोगों के बीच घूमिये, देखिये और दिखाइये।
हम सब रिपोर्टर को लगता है कि क्यों काम कर रहे हैं? दफ्तर में तो एंकर ही प्रमोट होता है। रागदरबार,शिखर और बाबा घोटूं ,घटिया और अनुप्रासिक हिन्दी लिखने वाला आउटपुट वाला ही मालिक बन जाता है। कभी कभी इस बेइंतहा मोहब्बत को देखकर कहने का मन करता है कि रिपोर्टर ठीक से काम करे तो उसे जो प्यार मिलेगा पब्लिक से,उसके लिए आउटपुट वाला और टिव और इंग पदनामानों वाला एडिटर तरस जाएगा। एक रिपोर्टर को यही ढाढस बंधाने की ज़रूरत है। बशर्ते उसे दफ्तर मौका दे। संपादक मौका दे। बिना मौका रिपोर्टर क्या कर सकता है? लेकिन वो अपनी तरफ से इतनी तैयारी तो रखे कि जब भी मौका मिले एक अच्छी कहानी की गुज़ाइश बना दे। खोड़ा के बाद एक मॉल में शर्ट खरीद रहा था। दुकानदार ने कहा कि बीस मिनट ठहर जाइये। देखा कि उसकी बेटी और बीबी भागे भागे आ रहे हैं। दोनों ने मेरे साथ तस्वीर खिंचाई। आप ही हैं जी जिसने खोड़ा पर रिपोर्ट बनाई थी। सही चीज़ थी सर। आपको डर नहीं लगता। मां बेटी इसी तरह की बातें करने लगीं। जब शर्ट लेकर काउंटर पर गया और डेबिट कार्ट दिया तो पर्ची पर पांच सौ रुपये लिखे थे। मैंने कहा कि ये तो कम है। दुकानदार ने कहा कि हमें मालूम है कि आप मुफ्तखोर पत्रकार नहीं हो इसीलिए पांच सौ रुपये लिये हैं। पर शर्ट तो मैंने दो हज़ार की खरीदी है। दो कमीज़ पांच सौ में पटरी पर भी नहीं मिलेगी। उसने पैसे नहीं लिये। कहा कि ये हमारा प्यार है। अगली बार से पूरे पैसे दीजिएगा मगर इस बार ये इनाम हमारी तरफ से। दिल्ली के अतिकुलीन खान मार्केट में ही ऐसा वाकया हुआ। पांच हज़ार की चीज़ ढाई हज़ार में दे दी। कहता रहा कि आप रिपोर्टर की आदत खराब करते हैं। उसने कहा कि मेरी दुकान पर आपकी कंपनी के बड़े बड़े लोग भी आते हैं। दो रुपये कम नहीं करता। आपने खोड़ा के लिए जो किया है उसके लिए इनाम समझिये इसे। उस करोड़पति दुकानदार ने मुझे अपने हाथ से काफी पिलाई। पानी मंगाकर दिया। अगर अब भी ऐसे प्यार को नहीं पाना चाहते हैं तो नुकसान हमारा है। नुकसान हमारे धंधे का है।
खोड़ा के बाद ऐसे कई वाकये हुए। टाटा कंपनी में काम करने वाले एक साधारण से कर्मचारी ने मेरे पड़ोसी के हाथों पांच किलो सत्तू और दो किलो चना भिजवा दिया। यह कहकर कि ओरिजनल आदमी है तो ओरिजनल चीज़ खाए। उसका बॉस जब सत्तू और चना लेकर दरवाज़े पर खड़ा था तो काफी शर्मसार था। पत्नी भी घबरा गई। बोली नहीं ले जाइये। वो भड़क जाएगा। फिर फोन किया कि क्या करना है। मैंने कहा रख लो। सत्तू और चना भिजवाने वाला मुझे क्या खरीदेगा। अपने हिस्से में से ही निकाल कर दे रहा है। खोड़ा की रिपोर्टिंग के बाद लोगों ने तरह तरह से शुक्रिया अदा किया। कोई बीच रास्ते से कार मोड़ कर आ गया तो किसी ने बीच रास्ते में ही कार रोक दी। एक मॉल में एक महिला ने अपने खड़ूस पति का हाथ छुड़ा लिया और दौड़ कर चली आई। बुलाती रही कि तुम आ जाओ, आया ही नहीं. लेकिन वो आई और शुक्रिया अदा कर गई। स्टेशन पर एक वृद्ध सज्जन मुझे देखकर भावुक हो गए। कहा कि ज़िंदा आदमी लगते हो। पत्रकारिता का यही मतलब होता है।
रवीश की रिपोर्ट को बंद हुए अब साल होने को आ रहा है। मगर आज भी लोग ट्वीट पर आते ही पहला सवाल यही करते हैं कि कब शुरू करेंगे। मैंने कुछ सोच कर तो शुरू नहीं किया था और न ही मैंने बंद किया। उस रिपोर्ट को जनता और रेटिंग दोनों ने काफी पसंद किया था। ज्यादातर रिपोर्ट रेटिंग चार्ट में हिट ही रही। दफ्तर की ज़रूरतें व्यक्ति की भूमिका और ज़रूरतों को परिभाषित करती रहती हैं। लेकिन उसकी वजह से लोगों का जो प्यार मिला,मेरा दिल अब भी कहता है कि ज़मीन से लाई गई बेहतरीन रिपोर्ट के लिए अब भी जनता भूखी है। वो अपना सबकुछ लुटाने के लिए तैयार है। वो अब एंकर और रिपोर्टर के बीच के फर्क को भी समझती है। हम बदलाव में छोटा सा योगदान तो कर ही सकते हैं। लेकिन अब तो जिससे मिलिये इस धंधे में या तो सरकार का दुलरूवा न पाने का अफसोस करता है या फिर कहीं सेटिंग में लगा हुआ है। रिपोर्टर और एंकर भयंकर अहंकार से भरे पड़े हैं। इतने अहंकारी पुरुषों और स्त्रियों से मैं भी टकराते टकराते बदलने लगा हूं। पता है कि सही नहीं है। मैं बदलूंगा भी नहीं लेकिन उस वक्त जब ऐसी नकारात्मक ऊर्जा निकलती हुई पास आती है तो मेरे कपार से भी भन्ना कर निकल जाती है। भायं भायं करने वाले ये भौकालेंकर( एंकर का नया नाम) ज़रा अहंकारों की दुनिया से निकले। अपने दफ्तरों में थोड़ी सी जगह मांगे मिट्टी की रिपोर्ट लाने की। जो जहां है और जितना भी मौका मिल सकता है, उसका सदुपयोग करे तो यह फील्ड वाकई मज़ेदार है। ठीक है कि कोई मंत्री नहीं बुलाता चाय पर मगर फ्री में कोई चाट खिलाने वाला तो है न। बस हम सब एक अच्छा रिपोर्टर बने रहे। मुझे पूरा यकीन है इस तरह के संस्मरण तमाम रिपोर्टरों के होंगे जिन्होंने कभी न कभी अच्छी रिपोर्टिंग की होगी या कर रहे होंगे। वर्ना प्रमोट तो कुत्ता भी अपनी गली में हो जाता है। प्रमोशन जीवन नहीं है। सेटिंग कर रोस्टर प्रभारी बन जाना पत्रकारिता नहीं है। ऐसे लोगों से पेशेवर संबंध इन्हीं कामों के लिए ही रखना चाहिए। लोगों के बीच घूमिये, देखिये और दिखाइये।
कहां गए अन्ना के लोग
रामलीला मैदान में जमा भीड़ को लेकर फासीवाद से लेकर सांप्रदायिकता के जितने भी ख़तरे बताये गए थे वो सब ग़ायब हो गए। इस भीड़ को लेकर जितनी भी उम्मीदें बताई गई थी वो भी हवा हो चुकी है। मोबाइल फोन में बहुत सारी तस्वीरें दुबकी हुई थीं। अन्ना के विभिन्न देवों अवतार से लेकर जूस के ठेले से लेकर झुर्रीदार गालों के ऊपर तिरंगे के कारोबार तक की तस्वीरें हैं। यह सब सिक्वेंस में सजा दी गईं हैं ताकि आप एक पुरानी शो रील की तरह देख सकें। समय एक भंडारा है। उसके भंडारे में जाने कितने अनाज समा कर खप गए पता नहीं। उम्मीद है आपको ये सिक्वेंसिंग पसंद आएगी।





















मयूर विहार में पत्रिका विहार
यमुनापार की सबसे बड़ी मैगज़ीन की दुकान है। जितने भी क्लियरिंग एंड फारवार्डिंग एजेंट हैं वो सब यहां अपनी पत्रिका दे जाते हैं। प्रदीप संकोच में बता रहा था। मैं अपने आई फोन से तस्वीरें उतारने और उसकी बातों को सुनने में लगा था। वो कुछ शक कर रहा था कि कहीं भाई साहब एमसीडी वाले तो नहीं हैं। टैक्सुआ अफसर तो नहीं हैं। घबराहट में वो कम बता रहा था। लिहाज़ा मैं देखने लगा और जो दिखा उसके बारे में पूछने लगा।
मयूर विहार के समाचार अपार्टमेंट के पास के मार्केट की पटरी पर पत्रिकाओं का अंबार आपको दिखेगा। ऐसी पटरियों में या तो चाय की दुकानें खुलते खुलते एक कड़ी में बन जाती हैं या फिर सिगरेट, ब्रेड,अंडा और चिप्स की दुकानें। मगर उसी पैटर्न पर मैगज़ीन की तीन तीन दुकानें आबाद हो जाए तो इलाकावार दुकानों के फलने-फुलने का ट्रेंड समझा जा सकता है। अठारह साल पहले प्रदीप बिहार से आया था। तब पत्रिकाओं की छोटी सी दुकान थी। पत्रिकाएं भी कम थीं। अब तीन दुकानें हैं। बीच में पान बीड़ी सिगरेट का स्टाल इस तरह से है जैसे पेमेंट काउंटर लगता है। मगर वो भी अपने आप में एक दुकान ही है।
इन पत्रिकाओं ने पटरी को काफी खूबसूरत बना दिया है। खंभे और पेड़ के तने पत्रिकाओं के पोस्टर में लिपटे नज़र आते हैं। प्रदीप ने कहा कि एक स्टाल पर तीन सौ से अधिक पत्रिकाएं हैं। हम योजना भी रखते हैं और इंपैक्ट भी। प्ले ब्वाय भी। मगर सबसे अधिक इंडिया टुडे बिकती है। हर हफ्ते पचास कापी तो निकल ही जाती है। समाचार अपार्टमेंट से ज़्यादातर पत्रकार रहते हैं। उसके आस पास भी पत्रकार भी रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट से नज़दीकी के कारण मयूर विहार में बड़ी संख्या में वकील भी रहते हैं। मगर वकीलों की कोई भी पत्रिका नज़र नहीं आई। पूरे स्टाल को देखना कई तरह के कवर डिजाइनों से गुज़रना था। ऐसा लग रहा था कि कई स्टार मयूर विहार की इस पटरी पर अपनी नुमाइश कर रहे हैं। प्रदीप कह रहे थे कि सारी पत्रिकाएं बिकती हैं। धार्मिक भी और साहित्यिक भी। इसलिए हंस, समयांतर और नया ज्ञानोदय आदि आदि। आप पाठकों में से अगर कोई मयूर विहार वासी है तो अधिक जानकारी जुटाकर ज़रूर कमेंट छोड़ दे। आप यहां पत्रिकाओं की दुनिया में विहार कर सकते हैं। इस तरह की दुकान आपको दिल्ली के कुलीन खान मार्केट में ही दिखेगी। मगर यमुना पार के सबसे बड़े मैगज़ीन स्टाल होने की शेखी शायद कुछ और ही होगी। है न।
कभी पुतला हुआ महान है ?
भीड़ आई है दरवाज़े के बाहर
बता रही है गंभीर मुझे
सरोकार से सने सनकी की तलाश में
दहलीज़ पर हिंदी जगत के
मेरे कहे पर बेताब है चलने को
पूछती हुई पता अपने घर का
कुर्ता फाड़ रही है मिट्टी के महान का
हा हा हा ये हंसी मेरी है बेख़ौफ़
लौट जाओ लौट जाओ
नहीं अभिलाषी प्रशंसा पात्र का
जगत जो हिन्दी नहीं है और
जगत जो हिन्दी भी है
जगत जो जगत ही है
मैं नहीं साहूकार किसी दुकान का
कुर्ता क्यों फाड़ते हो चीख चीख के
मिट्टी के महान का
माधो माधो ओ माधो
ढेला मार भगा सब साधो
एकांत की मुक्ति की मेरी साधना में
ये किसने कर लिया जुटान है
कभी पुतला हुआ महान है ?
बता रही है गंभीर मुझे
सरोकार से सने सनकी की तलाश में
दहलीज़ पर हिंदी जगत के
मेरे कहे पर बेताब है चलने को
पूछती हुई पता अपने घर का
कुर्ता फाड़ रही है मिट्टी के महान का
हा हा हा ये हंसी मेरी है बेख़ौफ़
लौट जाओ लौट जाओ
नहीं अभिलाषी प्रशंसा पात्र का
जगत जो हिन्दी नहीं है और
जगत जो हिन्दी भी है
जगत जो जगत ही है
मैं नहीं साहूकार किसी दुकान का
कुर्ता क्यों फाड़ते हो चीख चीख के
मिट्टी के महान का
माधो माधो ओ माधो
ढेला मार भगा सब साधो
एकांत की मुक्ति की मेरी साधना में
ये किसने कर लिया जुटान है
कभी पुतला हुआ महान है ?
पटना के अशोक राजपथ से अग्निपथ तक का सफर
भोर होने में कुछ घंटे बाक़ी रहे होंगे। दरवाज़े के सांकल को चुपचाप लगाकर निकल गया था। गांधी मैदान की तरफ पैदल ही। फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने का जुनून टीवी और मल्टीप्लेक्स के आने के पहले सिनेमा संस्कृति का हिस्सा रहा है। टिकट खिड़की पर कतार में खड़ी भीड़ के कंधे के ऊपर से चलते हुए काउंटर तक पहुंच जाने वाले भले ही लफंगे कहे जाएं मगर उनका यह करतब मुझे सचिन तेंदुलकर के छक्के जैसे अचंभित कर देता था। पर्दे तक पहुंचने के पहले ऐसे हीरो से मुलाकात न हो तो सिनेमा देखने का मज़ा नहीं मिलता। तय हुआ कि पहले दिन और पहले ही शो में देखेंगे वर्ना अग्निपथ नहीं देखेंगे। पैसा दोस्तों का था और पसीना मेरा बहने वाला था। जल्दी पहुंचने से काउंटर के करीब तो आ गया मगर काउंटर के उस्तादों के आते ही मुझे धकेल कर कोई अस्सी नब्बे लोगों के बाद पहुंचा दिया गया। लाइन लहरों की तरह डोल रही थी। टूट रही थी। बन रही थी। लाइन बहुत दूर आ गई थी। लोग धक्का देते और कुछ लोग निकल जाते। नए लोग जुड़ जाते। यह क्रम चल रहा था। तभी पुलिस की पार्टी आई और लाठी भांजने लगी। तीन चार लाठी तबीयत से जब पैरों और चूतड़ पर तर हुई तो दिमाग गनगना गया। तब तो गोलियां खाते हुए अग्निपथ अग्निपथ बोलते हुए प्रोमो भी नसीब नहीं था वर्ना वही याद कर बच्चन मुद्रा में खुद के इस त्याग को महिमामंडित करते हुए लाइन में बने रहते।
खैर चप्पल पांव का साथ छोड़ गए। हम नीचे से नंगे हो चुके थे। टिकट लेने के बाद होश ठीक से उड़ा कि इस हालत में घर गया तो वहां भी लाठी तय थी। किसी ने चप्पल का इंतज़ाम किया और पहले शो की तैयारी से हम फिर सिनेमा हाल के करीब पहुंच गए। मोना या रिजेन्ट में लगी थी अग्निपथ। यह वही साल था जब मुझे दिल्ली शहर के बारे में भारत की राजधानी से ज्यादा कुछ पता नहीं था। अग्निपथ देख चुके थे और अब बंद हो चुकी इलेवन अप से, जिसे दिल्ली एक्सप्रेस कहा जाता था, दिल्ली के लिए रवाना हो चुके थे। इन दोनों के बीच कुछ हफ्तों या महीनों का अंतराल ज़रूर रहा होगा। स्मृतियां लिखते वक्त ऐसा घालमेल हो जाता है। मगर विजय दीनानाथ चौहान। बाप का नाम मास्टर दीना नाथ चौहान। ऐसे संवाद दून स्कूल से पास होकर स्टीफंस पहुंचने वाले नौजवानों को लुभाते होंगे मगर वो इसे जी नहीं पाते होंगे। इस बात का सुकून तो था ही कि अग्निपथ देख चुके थे। उस टेलर की तलाश आज तक करता हूं जिसने कांचा के इतने अच्छे कपड़े सिले थे। अपने बाप के हत्यारे कांचा को मारने का जुनून लिए विजय दीनानाथ चौहान भी तो हत्यारे के दर्ज़ी को ढूंढ रहा था। ख़ैर ।
इसीलिए कहता हूं कि अग्निपथ एक ऐसी फिल्म है जिसमें मैं भी हूं। मुकुल एस आनंद की अग्निपथ में भी मैं था और करण जौहर द्वारा निर्मित और करण मल्होत्रा द्वारा निर्देशित अग्निपथ में भी मेरा रोल बचा रहा। दो फिल्मों के बीच का यह दर्शक दो दशकों की ज़िंदगी जी चुका है। गाज़ियाबाद के स्टार एक्स सिनेमा हाल में पहुंचने से पहले बदनाम हिन्दी चैनलों की बारात का वो बाराती बन चुका था जिसे कुछ लोग शरीफ समझते हैं। नाचना भले न आए मगर नगीनिया डांस की तड़प हमेशा रही है। अमर उजाला के एक पत्रकार से बाहर मुलाकात हुई। मैंने उनको यह कह कर रवाना कर दिया कि मैं अकेले रहना पसंद करता हूं। वो निराश हो कर चले गए कि सर कहने पर झड़प देने वाला यह मशहूर पत्रकार बदतमीज़ भी है। उन्हें नहीं मालूम था कि यह पत्रकार खुद अपनी प्रेरणाओं को नहीं समझ पाया इसलिए दूसरे जब इसे प्रेरणा बनाते हैं तो चिढ़ जाता है। तो बीस रुपये का पान बनवाया। तीन सौ रुपये के दस ग्राम वाले किमाम का एक छोटा सा हिस्सा पान के पत्ते पर घिसवा कर दबाया और स्टार एक्स सिनेमा के भीतर। कुछ लोग पहचान रहे थे । कुछ हैरान कि भर मुंह पान दबाए ये फटीचर है या एंकर है। हॉल में पहुंचा तो दो बजे के शो के लिए लेकिन हाथ में टिकट था एक बजे के शो का। सिनेमा हाल का मैनेजर दिलफेंक सिनेमची समझता है इसलिए उसने एक मेहरबानी की। सलाम किया और उसी नंबर के टिकट पर दो बजे के हाल में सीट दिला गया। अब शुरू होने वाला था अग्निपथ। इस बार प्रोमो तो बने थे पर टीवी नहीं देखने के कारण एक भी नहीं देख पाया। लाठी नहीं चली और दोस्त नहीं थे। तब दर्जन भर थे अब अकेला। लेकिन फेसबुक और ट्वीटर के अपने मानस मित्रों की फौज को बताने की बेताबी ज़रूर थी। ढैन ढैन ढैन....अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
एक सुपुरुष घोती कुर्ताधारी मास्टरनुमा हंसमुख कवि। देखते ही पिता की याद आ गई। धोती कुर्ता में वो भी काफी जंचते थे। आंखें थोड़ी देर के लिए नम तो हुईं मगर मास्टर दीनानाथ चौहान के चेहरे पर अभिनय की कशिश उतरते देखी तो लगा कि मामला जंचेगा। कैमरा कमाल तरीके से काम कर रहा था। मांडवा । बच्चन की ज़ुबान पर जब मांडवा उच्चरित होता था तो लगता था कि भारत छोड़ो मांडवा में ही बसो। अपने गांव के बाद मांडवा का ही नाम लेने में मज़ा आता था, लगता था काश मांडवा में पैदा हुए होते। करण मल्होत्रा ने मांडवा को तो रखा मगर उसे पहचान की पटरी से उतार दिया। वो सिर्फ मुंबई के नक्शे के बाहर का गांव है जहां पुलिस मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के डर से नहीं पहुच पाती। खुद भी नहीं जाती और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी जाने के लिए नहीं कहती कि जाकर देखो मांडवा में क्या हो रहा है। खैर। हिन्दी सिनेमा को सिनेमा की तरह नहीं देखना चाहते तो दुनिया में बहुत अच्छे विश्वविद्यालय हैं जहां आप जाकर गंभीर पढ़ाई कर सकते हैं।
जल्दी समझ में आने लगा कि संजय दत्त ने फिल्म को लूट लिया है। फिर लगा कि कुछ माल ऋषि कपूर भी लूट रहे हैं। खलनायक में जोकर लगने वाले संजय दत्त इस अग्निपथ में वाकई खलनायक लगे हैं। बीस सालों में हमारे पर्दे का खलनायक हीरो की तरह कमनीय हो चला था। अमरीश पुरी के भयावह खलनायकी के बाद संजय दत्त ने उस क्रूरता को उभारा है। वांडेट का खलनायक नहीं भूलियेगा। खैर। मास्टर के मारने का दृश्य कमाल का है। समंदर के किनारे की हत्यारी शामें शायद ऐसी ही होती होंगी। बारिश और नीली काली लाइटिंग के बीच मशाल की पीली रौशनी उस क्रूरता को खूबसूरती से रचती है जिसे लेकर फिल्म आगे चलने वाली थी। मांडवा से मुंबई आते ही रऊफ लाला का किरदार। मक्कारी से लबरेज़ ऋषि कपूर ने मकबूल के पंकज कपूर के अभियन के करीब खुद को ला खड़ा कर दिया। आज के ज़माने में जब कसाई भी सूट पैंट वाले हो गए हैं और विधायकी का चुनाव लड़कर पसमांदा मुस्लिम के हकों की लड़ाई में शामिल हैं, गनीमत है कि मुस्लिम पात्र का यह चित्रण सांप्रदायिक दौर की मुंबई की पैदाइश नहीं लगता। कहानी कमज़ोर होती हुई अपने किरदारों से मज़बूत होने लगती है। विजय दीनानाथ चौहान बड़ा हो जाता है। पंद्रह साल गुज़रने का एलान होता है। माधवी बनी नर्स की जगह प्रियंका चोपड़ा ब्यूटी पार्लर वाली काली के रूप में जगह ले चुकी होती है।
पहली अग्निपथ में अमिताभ बच्चन का नायकत्व छाया रहता है। वो अपने परिचय वाले संवाद को दोहराते दोहराते थकाते भी रहे और पकाते भी रहे। करण मल्होत्रा की अग्निपथ में विजय दीनानाथ आधी से ज़्यादा फिल्म में बीजू बन कर ही रहता है। वो मौत के साथ अपीटमेंट जैसी कामचलाऊ इंग्लिश की कोशिश नहीं करता। औरतों से भरे मोहल्ले में रहता है। औरतें उसकी ढाल हैं। मुकुल आनंद की फिल्म में कृष्णन अय्यर बाडीगार्ड था। करण मल्होत्रा की फिल्म में सीढ़ियों, बालकनियों और बरामदे में नज़र आने वाली असंख्य औरते बीजू की बाडीगार्ड हैं। रोहिणी हट्टंगड़ी और विजय के बीच गहरा रिश्ता बना रहता है। यहां ज़रीना वहाब पूरी फिल्म में टेंपोरेरी यानी अस्थाई मां लगती है। इन्हीं सब बिंदुओं पर फिल्म टूटती है। मगर शानदार बने रहने का रास्ता नहीं छो़ड़ती।
नई अग्निपथ में ह्रतिक रौशन मांडवा पहुंचने से पहले तक मोहल्ले का बागी से ज़्यादा नहीं लगता। उसके गुस्से की थरथराहट कंपकंपाहट पैदा करती है। लेकिन जब वो कमिश्नर के घर पहुंच कर जान बचाने की बात करता है तो डान की जगह मुखबिर नज़र आने लगता है। मुकुल आनंद की फिल्म में कमीश्नर और विजय दीनानाथ के बीच का रिश्ता ग़ज़ब का था। इस फिल्म में पड़ोसी का लगता है। इसीलिए ह्रतिक नायकत्व की उस ऊंचाई को नहीं छू पाते जिसे बच्चन ने छुआ। पहली अग्निपथ में बच्चन नायक थे मगर इस अग्निपथ में फिल्म नायक है। उस फिल्म में वृतांत बच्चन तय करते हैं, इस फिल्म में वृतांत यानी नैरेटिव निर्देशक अपने पात्रों के ज़रिये तय करता है। पहली फिल्म में विजय दीनानाथ बनने से पहले अमिताभ एंग्री यंग मैन की छवि को कई दशक जी चुके होते हैं। इस फिल्म में विजय बनने से पहले तक ह्रतिक चौकलेटी हीरो की छवि की तलाश में मुख्य से लेकर सहयोगी किरदार में भटकते रहे हैं। मगर आखिरी सीन में मांडवा पहुंचने के बाद ह्रतिक का अभिनय उन्हें एक नई ऊंचाई पर ले जाता है। मैं काग़ज़ के फूल का रिव्यू नहीं लिख रहा उस फिल्म का लिख रहा हूं जो चलती भी हैं और बनती भी हैं।
इस फिल्म में गाने यादगार नहीं हैं। चिकनी चमेली टपकी हुई लगती है। दोस्त होते नहीं सब हाथ मिलाने वाले। इस कव्वाली के सेट पर जब कांचा और विजय दीनानाथ मिलते हैं तो ग़ज़ब का समां बंधता है। डैनी का ज़ोरदार अभिनय और बच्चन का स्टारडम एक किस्म की बराबरी का टक्कर पैदा करता है। वो हेलिकाप्टर से मांडवा में लैंड करता है। यहां नाव से ह्रतिक बाबू जाते हैं। शाट्स काफी अच्छे हैं। क्लोज़ अप शानदार हैं। कांचा भयावह है। गीता का पुनर्पाठ कर रहा है। उम्मीद है कि कोई गीता के इस पुनर्पाठ को लेकर रूस की अदालत नहीं जाएगा। ख़ैर। कांचा जब मांडवा में बैठ कर न्यूज़ चैनलों के ज़रिये लाइव रिपोर्ट देख सकता है तो फिल्म में सिक्के डालने वाले पब्लिक फोन रखने का क्या मतलब था समझा नहीं।
लेकिन गानों, हांडी फोड़ने के दृश्य विहंगम तरीके से रचे गए हैं। कव्वाली को बेजो़ड़ फिल्माया गया है। रऊफ लाला के बेटे को मारने का प्लाट शानदार है। और बीजू की बहन की नीलामी का दृश्य छाती तोड़ देने वाला। यह वही सीन है जब ह्रतिक पूरी तरीके से हीरो की तरह उभऱ कर फिल्म पर कब्ज़ा करते हैं। ठीक इसके बाद चौपाटी पर सूर्या को मारने का सीन शानदार है। यही वो सीन है जहां बीजू पहली बार अपना और अपने बाप के नाम वाला पूरा संवाद बोलता है। विजय दीनानाथ चौहान। बाप का नाम मास्टर दीनानाथ चौहान। करण मल्होत्रा ने पुरानी फिल्म से यह सबक सीख लिया था। इसीलिए इस संवाद के लिए वो दर्शकों को इंतज़ार करवाते हैं। कुछ संवाद तो बेहतरीन लिखे गए हैं। प्रबुद्ध खिलाड़ी। हा हा। मज़ा आ गया। कांचा का कहना कि अब भी माया मोह बाकी है। यह संवाद मांडवा की लड़ाई को फिल्मी कुरुक्षेत्र में बदल देती है। बिना माया मोह को त्यागे कोई ख़लनायक नहीं बन सकता। कोई नायक भी नहीं बन सकता। जब इसी झमेले से ह्रतिक निकलते हैं तो आखिरी सीन में उनका स्टंट छाप अभिनय बेजोड़ हो जाता है। संजय दत्त मोटे थुलथुल बचे खुचे खलनायक की तरह पेड़ पर लटका दिये जाते हैं। शायद यह निर्देशक की योजना होगी कि नायक को शुरू से नायक बनाकर नहीं रखना है। उसे बाद में स्थापित करना है।
इस फिल्म की रौशनी,संगीत,कविता के पाठ और पुनर्पाठ के दृश्य बेहतरीन हैं। मांडवा को उड़ाने का दृश्य हो या गणपति के विसर्जन या फिर हांडी फोड़ने का । रंगों को लेकर निर्देशक का फन नजर आता है। गाना ही इसकी कमज़ोरी है। किसको था खबर किसको था पता वी आर मेड फार इच अदर। दोस्त होते नहीं सब हाथ मिलाने वाले। चिकनी चमेली दारू के ठेके पर आबाद तो हो जाएगी मगर अग्निपथ की आत्मा नहीं कहलाएगी। फिल्म की समीक्षा नहीं की है मैंने। मुझे यह फिल्म शानदार लगी। एक ऐसे वक्त में जब सिनेमा हाल खाली हों और बोरियत भरी सर्दी अपना रजाई समेट रही हो, यह फिल्म कमा ले जाएगी। बस एक कमी को पूरी कर देती तो कमाल हो जाता। जज़्बातों को झकझोरने वाले संवादों और दृश्यों की कमी रह गई। भावुकता से भरपूर सिनेमा न भी हो तो चलेगा मगर भावुकता ही न हो यह नहीं हो सकता। हम हिन्दी सिनेमा देख रहे हैं। कुरासोवा की फिल्म नहीं,जिनकी एक भी फिल्म मैंने नहीं देखी है। प्रियंका चोपड़ा ने काफी अच्छा अभिनय किया है मगर उसकी कोई कहानी नहीं है। कंबल फेंक कर गोली मारने के दृश्य में मारी जाती है। ऐसे दृश्य कई फिल्मों में आ चुके हैं। आप देखियेगा कि कैसे यह फिल्म अपनी ही पुरानी कथा का शानदार पुनर्पाठ करती है। बहुत चीज़ें बदल देती हैं। बहुत चीज़ें जोड़ देती है और एक अवसर बना जाती है कि एक तीसरी अग्निपथ ज़रूर बनेगी। उम्मीद है मेरे बिना नहीं बनेगी। अग्निपथ... अग्निपथ...अग्निपथ।
(कृपया रिव्यू पढ़ने के बाद फिल्म देखने न जाएं, रिव्यू एक व्यक्ति का नज़रिया है)
खैर चप्पल पांव का साथ छोड़ गए। हम नीचे से नंगे हो चुके थे। टिकट लेने के बाद होश ठीक से उड़ा कि इस हालत में घर गया तो वहां भी लाठी तय थी। किसी ने चप्पल का इंतज़ाम किया और पहले शो की तैयारी से हम फिर सिनेमा हाल के करीब पहुंच गए। मोना या रिजेन्ट में लगी थी अग्निपथ। यह वही साल था जब मुझे दिल्ली शहर के बारे में भारत की राजधानी से ज्यादा कुछ पता नहीं था। अग्निपथ देख चुके थे और अब बंद हो चुकी इलेवन अप से, जिसे दिल्ली एक्सप्रेस कहा जाता था, दिल्ली के लिए रवाना हो चुके थे। इन दोनों के बीच कुछ हफ्तों या महीनों का अंतराल ज़रूर रहा होगा। स्मृतियां लिखते वक्त ऐसा घालमेल हो जाता है। मगर विजय दीनानाथ चौहान। बाप का नाम मास्टर दीना नाथ चौहान। ऐसे संवाद दून स्कूल से पास होकर स्टीफंस पहुंचने वाले नौजवानों को लुभाते होंगे मगर वो इसे जी नहीं पाते होंगे। इस बात का सुकून तो था ही कि अग्निपथ देख चुके थे। उस टेलर की तलाश आज तक करता हूं जिसने कांचा के इतने अच्छे कपड़े सिले थे। अपने बाप के हत्यारे कांचा को मारने का जुनून लिए विजय दीनानाथ चौहान भी तो हत्यारे के दर्ज़ी को ढूंढ रहा था। ख़ैर ।
इसीलिए कहता हूं कि अग्निपथ एक ऐसी फिल्म है जिसमें मैं भी हूं। मुकुल एस आनंद की अग्निपथ में भी मैं था और करण जौहर द्वारा निर्मित और करण मल्होत्रा द्वारा निर्देशित अग्निपथ में भी मेरा रोल बचा रहा। दो फिल्मों के बीच का यह दर्शक दो दशकों की ज़िंदगी जी चुका है। गाज़ियाबाद के स्टार एक्स सिनेमा हाल में पहुंचने से पहले बदनाम हिन्दी चैनलों की बारात का वो बाराती बन चुका था जिसे कुछ लोग शरीफ समझते हैं। नाचना भले न आए मगर नगीनिया डांस की तड़प हमेशा रही है। अमर उजाला के एक पत्रकार से बाहर मुलाकात हुई। मैंने उनको यह कह कर रवाना कर दिया कि मैं अकेले रहना पसंद करता हूं। वो निराश हो कर चले गए कि सर कहने पर झड़प देने वाला यह मशहूर पत्रकार बदतमीज़ भी है। उन्हें नहीं मालूम था कि यह पत्रकार खुद अपनी प्रेरणाओं को नहीं समझ पाया इसलिए दूसरे जब इसे प्रेरणा बनाते हैं तो चिढ़ जाता है। तो बीस रुपये का पान बनवाया। तीन सौ रुपये के दस ग्राम वाले किमाम का एक छोटा सा हिस्सा पान के पत्ते पर घिसवा कर दबाया और स्टार एक्स सिनेमा के भीतर। कुछ लोग पहचान रहे थे । कुछ हैरान कि भर मुंह पान दबाए ये फटीचर है या एंकर है। हॉल में पहुंचा तो दो बजे के शो के लिए लेकिन हाथ में टिकट था एक बजे के शो का। सिनेमा हाल का मैनेजर दिलफेंक सिनेमची समझता है इसलिए उसने एक मेहरबानी की। सलाम किया और उसी नंबर के टिकट पर दो बजे के हाल में सीट दिला गया। अब शुरू होने वाला था अग्निपथ। इस बार प्रोमो तो बने थे पर टीवी नहीं देखने के कारण एक भी नहीं देख पाया। लाठी नहीं चली और दोस्त नहीं थे। तब दर्जन भर थे अब अकेला। लेकिन फेसबुक और ट्वीटर के अपने मानस मित्रों की फौज को बताने की बेताबी ज़रूर थी। ढैन ढैन ढैन....अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
एक सुपुरुष घोती कुर्ताधारी मास्टरनुमा हंसमुख कवि। देखते ही पिता की याद आ गई। धोती कुर्ता में वो भी काफी जंचते थे। आंखें थोड़ी देर के लिए नम तो हुईं मगर मास्टर दीनानाथ चौहान के चेहरे पर अभिनय की कशिश उतरते देखी तो लगा कि मामला जंचेगा। कैमरा कमाल तरीके से काम कर रहा था। मांडवा । बच्चन की ज़ुबान पर जब मांडवा उच्चरित होता था तो लगता था कि भारत छोड़ो मांडवा में ही बसो। अपने गांव के बाद मांडवा का ही नाम लेने में मज़ा आता था, लगता था काश मांडवा में पैदा हुए होते। करण मल्होत्रा ने मांडवा को तो रखा मगर उसे पहचान की पटरी से उतार दिया। वो सिर्फ मुंबई के नक्शे के बाहर का गांव है जहां पुलिस मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के डर से नहीं पहुच पाती। खुद भी नहीं जाती और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी जाने के लिए नहीं कहती कि जाकर देखो मांडवा में क्या हो रहा है। खैर। हिन्दी सिनेमा को सिनेमा की तरह नहीं देखना चाहते तो दुनिया में बहुत अच्छे विश्वविद्यालय हैं जहां आप जाकर गंभीर पढ़ाई कर सकते हैं।
जल्दी समझ में आने लगा कि संजय दत्त ने फिल्म को लूट लिया है। फिर लगा कि कुछ माल ऋषि कपूर भी लूट रहे हैं। खलनायक में जोकर लगने वाले संजय दत्त इस अग्निपथ में वाकई खलनायक लगे हैं। बीस सालों में हमारे पर्दे का खलनायक हीरो की तरह कमनीय हो चला था। अमरीश पुरी के भयावह खलनायकी के बाद संजय दत्त ने उस क्रूरता को उभारा है। वांडेट का खलनायक नहीं भूलियेगा। खैर। मास्टर के मारने का दृश्य कमाल का है। समंदर के किनारे की हत्यारी शामें शायद ऐसी ही होती होंगी। बारिश और नीली काली लाइटिंग के बीच मशाल की पीली रौशनी उस क्रूरता को खूबसूरती से रचती है जिसे लेकर फिल्म आगे चलने वाली थी। मांडवा से मुंबई आते ही रऊफ लाला का किरदार। मक्कारी से लबरेज़ ऋषि कपूर ने मकबूल के पंकज कपूर के अभियन के करीब खुद को ला खड़ा कर दिया। आज के ज़माने में जब कसाई भी सूट पैंट वाले हो गए हैं और विधायकी का चुनाव लड़कर पसमांदा मुस्लिम के हकों की लड़ाई में शामिल हैं, गनीमत है कि मुस्लिम पात्र का यह चित्रण सांप्रदायिक दौर की मुंबई की पैदाइश नहीं लगता। कहानी कमज़ोर होती हुई अपने किरदारों से मज़बूत होने लगती है। विजय दीनानाथ चौहान बड़ा हो जाता है। पंद्रह साल गुज़रने का एलान होता है। माधवी बनी नर्स की जगह प्रियंका चोपड़ा ब्यूटी पार्लर वाली काली के रूप में जगह ले चुकी होती है।
पहली अग्निपथ में अमिताभ बच्चन का नायकत्व छाया रहता है। वो अपने परिचय वाले संवाद को दोहराते दोहराते थकाते भी रहे और पकाते भी रहे। करण मल्होत्रा की अग्निपथ में विजय दीनानाथ आधी से ज़्यादा फिल्म में बीजू बन कर ही रहता है। वो मौत के साथ अपीटमेंट जैसी कामचलाऊ इंग्लिश की कोशिश नहीं करता। औरतों से भरे मोहल्ले में रहता है। औरतें उसकी ढाल हैं। मुकुल आनंद की फिल्म में कृष्णन अय्यर बाडीगार्ड था। करण मल्होत्रा की फिल्म में सीढ़ियों, बालकनियों और बरामदे में नज़र आने वाली असंख्य औरते बीजू की बाडीगार्ड हैं। रोहिणी हट्टंगड़ी और विजय के बीच गहरा रिश्ता बना रहता है। यहां ज़रीना वहाब पूरी फिल्म में टेंपोरेरी यानी अस्थाई मां लगती है। इन्हीं सब बिंदुओं पर फिल्म टूटती है। मगर शानदार बने रहने का रास्ता नहीं छो़ड़ती।
नई अग्निपथ में ह्रतिक रौशन मांडवा पहुंचने से पहले तक मोहल्ले का बागी से ज़्यादा नहीं लगता। उसके गुस्से की थरथराहट कंपकंपाहट पैदा करती है। लेकिन जब वो कमिश्नर के घर पहुंच कर जान बचाने की बात करता है तो डान की जगह मुखबिर नज़र आने लगता है। मुकुल आनंद की फिल्म में कमीश्नर और विजय दीनानाथ के बीच का रिश्ता ग़ज़ब का था। इस फिल्म में पड़ोसी का लगता है। इसीलिए ह्रतिक नायकत्व की उस ऊंचाई को नहीं छू पाते जिसे बच्चन ने छुआ। पहली अग्निपथ में बच्चन नायक थे मगर इस अग्निपथ में फिल्म नायक है। उस फिल्म में वृतांत बच्चन तय करते हैं, इस फिल्म में वृतांत यानी नैरेटिव निर्देशक अपने पात्रों के ज़रिये तय करता है। पहली फिल्म में विजय दीनानाथ बनने से पहले अमिताभ एंग्री यंग मैन की छवि को कई दशक जी चुके होते हैं। इस फिल्म में विजय बनने से पहले तक ह्रतिक चौकलेटी हीरो की छवि की तलाश में मुख्य से लेकर सहयोगी किरदार में भटकते रहे हैं। मगर आखिरी सीन में मांडवा पहुंचने के बाद ह्रतिक का अभिनय उन्हें एक नई ऊंचाई पर ले जाता है। मैं काग़ज़ के फूल का रिव्यू नहीं लिख रहा उस फिल्म का लिख रहा हूं जो चलती भी हैं और बनती भी हैं।
इस फिल्म में गाने यादगार नहीं हैं। चिकनी चमेली टपकी हुई लगती है। दोस्त होते नहीं सब हाथ मिलाने वाले। इस कव्वाली के सेट पर जब कांचा और विजय दीनानाथ मिलते हैं तो ग़ज़ब का समां बंधता है। डैनी का ज़ोरदार अभिनय और बच्चन का स्टारडम एक किस्म की बराबरी का टक्कर पैदा करता है। वो हेलिकाप्टर से मांडवा में लैंड करता है। यहां नाव से ह्रतिक बाबू जाते हैं। शाट्स काफी अच्छे हैं। क्लोज़ अप शानदार हैं। कांचा भयावह है। गीता का पुनर्पाठ कर रहा है। उम्मीद है कि कोई गीता के इस पुनर्पाठ को लेकर रूस की अदालत नहीं जाएगा। ख़ैर। कांचा जब मांडवा में बैठ कर न्यूज़ चैनलों के ज़रिये लाइव रिपोर्ट देख सकता है तो फिल्म में सिक्के डालने वाले पब्लिक फोन रखने का क्या मतलब था समझा नहीं।
लेकिन गानों, हांडी फोड़ने के दृश्य विहंगम तरीके से रचे गए हैं। कव्वाली को बेजो़ड़ फिल्माया गया है। रऊफ लाला के बेटे को मारने का प्लाट शानदार है। और बीजू की बहन की नीलामी का दृश्य छाती तोड़ देने वाला। यह वही सीन है जब ह्रतिक पूरी तरीके से हीरो की तरह उभऱ कर फिल्म पर कब्ज़ा करते हैं। ठीक इसके बाद चौपाटी पर सूर्या को मारने का सीन शानदार है। यही वो सीन है जहां बीजू पहली बार अपना और अपने बाप के नाम वाला पूरा संवाद बोलता है। विजय दीनानाथ चौहान। बाप का नाम मास्टर दीनानाथ चौहान। करण मल्होत्रा ने पुरानी फिल्म से यह सबक सीख लिया था। इसीलिए इस संवाद के लिए वो दर्शकों को इंतज़ार करवाते हैं। कुछ संवाद तो बेहतरीन लिखे गए हैं। प्रबुद्ध खिलाड़ी। हा हा। मज़ा आ गया। कांचा का कहना कि अब भी माया मोह बाकी है। यह संवाद मांडवा की लड़ाई को फिल्मी कुरुक्षेत्र में बदल देती है। बिना माया मोह को त्यागे कोई ख़लनायक नहीं बन सकता। कोई नायक भी नहीं बन सकता। जब इसी झमेले से ह्रतिक निकलते हैं तो आखिरी सीन में उनका स्टंट छाप अभिनय बेजोड़ हो जाता है। संजय दत्त मोटे थुलथुल बचे खुचे खलनायक की तरह पेड़ पर लटका दिये जाते हैं। शायद यह निर्देशक की योजना होगी कि नायक को शुरू से नायक बनाकर नहीं रखना है। उसे बाद में स्थापित करना है।
इस फिल्म की रौशनी,संगीत,कविता के पाठ और पुनर्पाठ के दृश्य बेहतरीन हैं। मांडवा को उड़ाने का दृश्य हो या गणपति के विसर्जन या फिर हांडी फोड़ने का । रंगों को लेकर निर्देशक का फन नजर आता है। गाना ही इसकी कमज़ोरी है। किसको था खबर किसको था पता वी आर मेड फार इच अदर। दोस्त होते नहीं सब हाथ मिलाने वाले। चिकनी चमेली दारू के ठेके पर आबाद तो हो जाएगी मगर अग्निपथ की आत्मा नहीं कहलाएगी। फिल्म की समीक्षा नहीं की है मैंने। मुझे यह फिल्म शानदार लगी। एक ऐसे वक्त में जब सिनेमा हाल खाली हों और बोरियत भरी सर्दी अपना रजाई समेट रही हो, यह फिल्म कमा ले जाएगी। बस एक कमी को पूरी कर देती तो कमाल हो जाता। जज़्बातों को झकझोरने वाले संवादों और दृश्यों की कमी रह गई। भावुकता से भरपूर सिनेमा न भी हो तो चलेगा मगर भावुकता ही न हो यह नहीं हो सकता। हम हिन्दी सिनेमा देख रहे हैं। कुरासोवा की फिल्म नहीं,जिनकी एक भी फिल्म मैंने नहीं देखी है। प्रियंका चोपड़ा ने काफी अच्छा अभिनय किया है मगर उसकी कोई कहानी नहीं है। कंबल फेंक कर गोली मारने के दृश्य में मारी जाती है। ऐसे दृश्य कई फिल्मों में आ चुके हैं। आप देखियेगा कि कैसे यह फिल्म अपनी ही पुरानी कथा का शानदार पुनर्पाठ करती है। बहुत चीज़ें बदल देती हैं। बहुत चीज़ें जोड़ देती है और एक अवसर बना जाती है कि एक तीसरी अग्निपथ ज़रूर बनेगी। उम्मीद है मेरे बिना नहीं बनेगी। अग्निपथ... अग्निपथ...अग्निपथ।
(कृपया रिव्यू पढ़ने के बाद फिल्म देखने न जाएं, रिव्यू एक व्यक्ति का नज़रिया है)
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