बिस्मिल्लाह का बनारस

आदरणीय ख़ां साहब,

सोचा आपको एक ख़त लिखूँ । मैं आपकी मज़ार पर गया था । सहयोगी अजय सिंह की वजह से । अजय ने कहा कि वो मुझे कुछ याद दिलाना चाहते हैं । थोड़ी देर के लिए बिस्मिल्लाह ख़ान की मज़ार पर ले चलते हैं । दिलों दिमाग़ पर स्मृतियों की इतनी परतें हो गई हैं कि उनकी तह तक पहुँचने के लिए किसी पुरातत्ववेत्ता की ज़रूरत पड़ती है । अजय ने वही किया । उस साल की याद दिला दी जब आसमान बरस रहा था और नीचे खड़ा मैं माइक लिये दुनिया को बता रहा था कि बिस्मिल्लाह ख़ान को अपने बदन पर पड़ने वाली मिट्टी खुरदरी न लगे, कोई सख़्त टुकड़ा चुभ न जाए इसलिए आसमान बरस कर नम कर रहा है । रो रहा है । हम सब अगस्त की बारिश में भींग कर आपके चले जाने का शोक मना रहे थे ।

वो 2006 का साल था और ये 2014 का है । नेता आपकी मज़ार पर आने लगे हैं । शायद आप उन्हें मुसलमान नज़र आए हैं । राजनीति में कोई शहनाई के लिए नहीं आता । अख़बारों और टीवी पर खूब ख़बरें देखीं । अरविंद केजरीवाल आपकी मज़ार पर गए हैं । नरेंद्र मोदी के लोग आपके बेटों के पास गए हैं ताकि वे प्रस्तावक बन जायें । आपके बेटों ने मना कर दिया है । चर्चा चल रही है कि आपके ज़रिये गंगा जमुनी टाइप संकेत देने की कोशिश में आप ध्यान में आए हैं । शहनाई वाले में एक मुसलमान दिखा है । आप तो जानते ही हैं कि हमारी राजनीति ऐसे ही बिस्मिल्लाह करती है । 

हाँ तो मैं आपसे मज़ार पर जाने की बात कह रहा था । भारत रत्न बिस्मिल्लाह ख़ान की मज़ार पर । सोचा जो हिन्दुस्तान जिस बिस्मिल्लाह को हथेलियों पर रखता था वो उसकी ख़ाक को मोतियों की माला में जड़ कर पहनता ही होगा । भारत में ज़िंदा बच गए लोग कई लोगों के लिए भारत रत्न की मांग करते हैं । ख़ूब सियासत होती है । अब तो भारत रत्न की मांग का लाइव कवरेज़ होता है । जिसे मिलता है वो बैटरियों का विज्ञापन करता है । आपने तो ऐसा कुछ किया नहीं । कभी कभार टहलने के लिए राज्य सभा की मेंबरी नहीं माँगी । 

इन्हीं सब बातों को सोचते हुए अब मैं पूरी तरह आपके पास लौट आया था । याद आने लगी वो बात जब आपके पास मनाने गया था । आप ग़ुस्से में थे । गालियाँ दे रहे थे । मैंने तो इतना सा अर्ज़ किया था । कोई बुज़ुर्ग जब गाली देता है तो वो गाली नहीं होती आशीर्वाद है । ख़ा साहिब, मैं आने वाली पीढ़ी को बताऊँगा कि दुनिया ने बिस्मिल्लाह से शहनाई सुनी लेकिन मैंने गालियाँ सुनी हैं । आप हंस दिये । आपकी शक्ल मेरे नाना जैसी मिलती थी । हमने अपने नाना नानी को कम देखा जीया है । आपसे बातें होने लगी थी । आप इस बात पर भी शर्मा से गए थे ।

आपका ग़ुस्सा शहनाई पर धुन बनने के लिए बेचैन हो रहा था । आप ही ने कहा कि आजतक किसी के लिए अकेले नहीं बजाया । तुमको सुनाता हूँ । कैमरा चालू था । कमरे से बाक़ी लोग बाहर कर दिये गए ।आपका फेंफड़ा हाँफने लगा । मैं मना करने लगा तो आपने कहा कि कई दिनों से नहीं बजाया है इसलिए शहनाई रूठ गई है । मान जायेगी । एक बाप की तरह आप मेरे लिए बेचैन हो गए थे । 

तो आपकी मज़ार पर मैं खड़ा था । शाम हो गई थी । अजय वहाँ तक ले गए जहाँ तक आपका हिस्सा इस लोक की मिट्टी में बचा हुआ था । दीवार पर भारत रत्न बिस्मिल्लाह ख़ान का पोस्टर । दिलफेंक मुस्कुराहट । आपकी हँसी का कोई मुक़ाबला नहीं । ऐसा लगा जैसे पूछ रहे हों कि बताओ ये धुन कैसी लगी । सुनी तुमने बिस्मिल्लाह की शहनाई । आपकी शरारती आँखें । उफ्फ । जिस बनारस का आप क़िस्सा सुनाते रहें उसी बनारस में आप एक क़िस्सा हैं ।

लेकिन उसी बनारस में दस साल में भी आपकी मज़ार पूरी नहीं हो सकी । एक तस्वीर है और घेरा ताकि पता चले कि जिसकी शहनाई से आज भी हिन्दुस्तान का एक हिस्सा जागता है वो यहाँ सो रहा है । जो रेडियो सुनते हैं वो ये बात जानते हैं । मज़ार के पास खड़े एक शख़्स ने बताया कि आपकी मज़ार इसलिए कच्ची है क्योंकि इस जगह को लेकर शिया और सुन्नी में विवाद है । मुक़दमा चल रहा है । फ़ैसला आ जाए तो आज बना दें ।


ये आपकी नहीं इस मुल्क की बदनसीबी है कि आपको एक अदद क़ब्र भी नसीब नहीं हुई । इसके लिए भी किसी जज की क़लम का इंतज़ार है । हम किस लिए किसी को भारत रत्न देते हैं । भारत रत्न देकर भी गोतिया पट्टीदार की पोलटिक्स से मुक्ति मिलेगी कि नहीं ।क्या शिया और सुन्नी आपकी शहनाई में नहीं हैं । क्या वो दो गज ज़मीन आपके नाम पर नहीं छोड़ सकते । क्या बनारस आपके लिए पहल नहीं कर सकता । किस बात का बनारस के लोग बनारस बनारस गाते फिरते हैं । 


आपकी शख़्सियत और शहनाई पर लिखने के क़ाबिल नहीं हूँ । इसलिए सोचा कि आपको ख़त लिखूँ । इस बात की माफ़ी माँगते हुए कि आपको मैं भी भूल गया हूँ । आप याद आते हैं पर कभी आपकी ख़बर नहीं ली । आपसे मिलकर लौटते हुए यही सोच रहा था कि कितना कम मिला आपसे मगर कितना ज़्यादा दे दिया है आपने । ठीक ठीक तो नहीं पर मुझे कुछ कुछ याद आ रहा है । जो मैं आपके निधन पर लाइव प्रसारण में बोल रहा था । बिस्मिल्लाह ख़ान बनारस के बाप थे । आज बनारस से उसके बाप का साया उठ गया है । हम सब ऐसे ही हैं ख़ां साहिब । आप जानते ही हैं । इसलिए आपको मुस्कुराता देख अच्छा लगा । इस बाप ने जीते जी कुछ नहीं चाहा तो एक क़ब्र या एक मज़ार की क्या बिसात । मैंने भी एक तस्वीर खिंचा ली । 

आपका 

रवीश कुमार एनडीटीवी वाला ।









77 comments:

Jitendra sharma said...

Ravish sir such kaha ye badnasibi khan sahib ki nahi balki hum logo ki hai jo ab tak Unki kabr ke liye bhi ek judge ki kalam ka intazar karna pad raha hai.
Aankhen phir num ho gai aaj.

MUKUND MISHRA said...

बेहद भावुक खत..बिस्मिल्लाह खान के लिए एक शेर-'ये आँखें नाज करती हैं तेरा दीदार करने को,दिल मजबूर करता है तुमसे प्यार करने को.'

संजय भभुआ said...

Shaandaar..ravish bhai aapka jawab nahin..

Nitin Shrivastava said...

As a Shahnai vadak we all respect Bismillah Khan ji but Bismillah Khan aapke baap hoge Banaras k nahi.Apne baap ke jankari sabko mat batao aur Banaras par mat thopo.

SHIVANI SRIVASTAVA said...

SIR JI kuch kahene layak aapne choda
hi nahi.

Pankaj Kumar said...

Ravishji Kaise aise likh lete ho ...aap to subah subah hi rula dete ho bahar se nahi bhitar se! Lekin ye rona bhi ek sukoon deta hai jo dikhta hai bahar bhi.
Shukriya! aap aise hi humein rulate rahein.

Manish Kumar said...

बहुत ही मार्मिक, रवीश भाई, आपकी कुछ चिट्ठिया इतनी मार्मिक होती है की दिल भर आता है। मैं अपने आप को सौभाग्यशाली मानता हूँ की ख़ा साहिब को लाइव सुना है, उनके गुस्से में भी अजीब प्यार था, बहुत देर तक सुनने के बाद लोगो ने कजरी की ख्वाइश की, वो थक गए थे(२००४ का साल था, उम्र हो गयी थी, मुंबई की गर्मी का मौसम), तो गुस्सा हो गए, फिर पुराने दिनों की कजरी की यादें बताने लगे और फिर जो कजरी सुनाई, वो मुझ जैसे संगीत के अनाड़ी को भी आज तक याद है।

वैसे "जिसे मिलता है वो बैटरियों का विज्ञापन करता है" क्या खूब कहा आपने।

Manish Kumar said...

रवीश भाई, आपके जिन रिपोर्टिंग का जिक्र किया है, अगर उसका वीडियो लिंक पोस्ट कर दे तो बड़ी मेहरवानी होगी।

Hirendra Jha said...
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Hirendra Jha said...

ईश्वर आपके चेहरे पर मुस्कान बन कर बिराजे!

MEENAKSHI chauhan said...

रवीश, आपका खत पढ कर कुछ लोगों की आँखें लाल हो गई होंगी....कुछ की नज्ररें झुक गई होंगी....कुछ की पलकें नम हो गई होंगी....लेकिन जिनके लिये ये खत लिखा गया है, यानि खान साहब,वो ज़रूर बच्चों की तरह निश्छलता से मुस्कुरा दिये होंगे।

Ranjit Kumar said...

शुक्रिया, इस ब्लॉग के लिए...
खां साहब याद आते रहे...और ऐसा जबकि हमने उन्हें कभी भुलाया भी नहीं था...
आपने जैसे लिखा.... आपके चाह की शिद्दत दिखाई दी..
शुक्रिया..

R N Thakur said...

रविश जी, मै काबिल नही कि इस पत्र का जवाब दे पाउ। बस इतना ही कह सकता हूँ। शानदार...
जिसे मिलता है वो बैटरियों का विज्ञापन करता है । आपने तो ऐसा कुछ किया नहीं । कभी कभार टहलने के लिए राज्य सभा की मेंबरी नहीं माँगी ।

ये आपकी नहीं इस मुल्क की बदनसीबी है कि आपको एक अदद क़ब्र भी नसीब नहीं हुई । इसके लिए भी किसी जज की क़लम का इंतज़ार है । हम किस लिए किसी को भारत रत्न देते हैं । भारत रत्न देकर भी गोतिया पट्टीदार की पोलटिक्स से मुक्ति मिलेगी कि नहीं ।क्या शिया और सुन्नी आपकी शहनाई में नहीं हैं । क्या वो दो गज ज़मीन आपके नाम पर नहीं छोड़ सकते ।

RAHUL VAISH said...

रवीश जी आजकल आपके प्राइम टाइम शो में युवा पत्रकार भी दौरे में है.. पर उनकी व्यथा को देख कर लगता है की उनका काम सिर्फ माइक पकड़ने भर है .. या तो आप उन्हें रिपोर्टिंग का मौका देना नहीं चाहते है या वो युवा पत्रकार आपसे रिपोर्टिंग का मौका झपटना नहीं चाहते है.. अगर इन युवा पत्रकारों से अनुभव के नाम पर सिर्फ माइक पकड़वाना भर था तो फिर उसके लिए कोई असिस्टेंट ही काफी था ... हमारी राजनीती में ही नहीं बल्कि मीडिया में भी कुछ ऐसा है की उम्रदराज पत्रकार युवा के लिए रास्ता देना ही नहीं चाहते.. उनका मानना ये रहता की इस देश में जिसके भी बाल सफ़ेद है वो युवा से ज्यादा योग्य है.. यही हाल है की हमारे देश में ज्ञान की कीमत कुछ भी नहीं भले ही आपने पीएचडी जनसंचार में क्यों न कर राखी हो आपका रिज्यूम तुरंत कूड़े दान में फेक दिया जाता है क्योंकि आपने इनके चल रहे स्कूल से डिप्लोमा जो नहीं लिया है और तो और इस स्कूल का डिप्लोमा भी यूजीसी से प्रमाणित नहीं होता .. मीडिया को ना तो नेट एग्जाम से मतलब होता है ना ही सेट एग्जाम से.. माफ़ कीजियेगा अगर अनुभव का अर्थ बाल का सफ़ेद होना और उम्रदराज ही इस देश में योग्ता की निशानी होती तो आज जिले की कमान कोई युवा आईएएस न सभल रहा होता.. पत्रकारिता तो बहुत छोटी चुनौती है.. संघ लोक सेवा आयोग आईएएस बनने के लिए आपके अनदर सिर्फ ज्ञान को तराशता है न की कोई उम्र को और अनुभव को .. क्या शानदार परखता है आयोग की आप क्षमतावान है और युवा रूप में जिले की चुनौतियों का सामना कर सकते है.. अगर मैं अपनी बात में गलत हूँ तो एनडी टीवी पत्र्कारिता की नौकरी के लिए मेरा लिखित एग्जाम और इंटरव्यू ले ना ताकि उचित कारण बताते हुए मुझे नकारे .. क्यों आपके चैनल की जॉब प्रक्रिया गुप्त राखी जाती है ? धन्यवाद.
राहुल वैश्य ( रैंक अवार्ड विजेता),
एम. ए. जनसंचार (राज्य पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण, हिमाचल लोक सेवा आयोग)
एवम
भारतीय सिविल सेवा के लिए प्रयासरत
फेसबुक पर मुझे शामिल करे- vaishr_rahul@yahoo.com और Rahul Vaish Moradabad

RAHUL VAISH said...

रवीश जी आजकल आपके प्राइम टाइम शो में युवा पत्रकार भी दौरे में है.. पर उनकी व्यथा को देख कर लगता है की उनका काम सिर्फ माइक पकड़ने भर है .. या तो आप उन्हें रिपोर्टिंग का मौका देना नहीं चाहते है या वो युवा पत्रकार आपसे रिपोर्टिंग का मौका झपटना नहीं चाहते है.. अगर इन युवा पत्रकारों से अनुभव के नाम पर सिर्फ माइक पकड़वाना भर था तो फिर उसके लिए कोई असिस्टेंट ही काफी था ... हमारी राजनीती में ही नहीं बल्कि मीडिया में भी कुछ ऐसा है की उम्रदराज पत्रकार युवा के लिए रास्ता देना ही नहीं चाहते.. उनका मानना ये रहता की इस देश में जिसके भी बाल सफ़ेद है वो युवा से ज्यादा योग्य है.. यही हाल है की हमारे देश में ज्ञान की कीमत कुछ भी नहीं भले ही आपने पीएचडी जनसंचार में क्यों न कर राखी हो आपका रिज्यूम तुरंत कूड़े दान में फेक दिया जाता है क्योंकि आपने इनके चल रहे स्कूल से डिप्लोमा जो नहीं लिया है और तो और इस स्कूल का डिप्लोमा भी यूजीसी से प्रमाणित नहीं होता .. मीडिया को ना तो नेट एग्जाम से मतलब होता है ना ही सेट एग्जाम से.. माफ़ कीजियेगा अगर अनुभव का अर्थ बाल का सफ़ेद होना और उम्रदराज ही इस देश में योग्ता की निशानी होती तो आज जिले की कमान कोई युवा आईएएस न सभल रहा होता.. पत्रकारिता तो बहुत छोटी चुनौती है.. संघ लोक सेवा आयोग आईएएस बनने के लिए आपके अनदर सिर्फ ज्ञान को तराशता है न की कोई उम्र को और अनुभव को .. क्या शानदार परखता है आयोग की आप क्षमतावान है और युवा रूप में जिले की चुनौतियों का सामना कर सकते है.. अगर मैं अपनी बात में गलत हूँ तो एनडी टीवी पत्र्कारिता की नौकरी के लिए मेरा लिखित एग्जाम और इंटरव्यू ले ना ताकि उचित कारण बताते हुए मुझे नकारे .. क्यों आपके चैनल की जॉब प्रक्रिया गुप्त राखी जाती है ? धन्यवाद.
राहुल वैश्य ( रैंक अवार्ड विजेता),
एम. ए. जनसंचार (राज्य पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण, हिमाचल लोक सेवा आयोग)
एवम
भारतीय सिविल सेवा के लिए प्रयासरत
फेसबुक पर मुझे शामिल करे- vaishr_rahul@yahoo.com और Rahul Vaish Moradabad

Prateek Khandelwal said...

रवीश जी, हमेशा की तरह इस बार भी आपने कुछ अलग अंदाज़ में कुछ नई पेशकश जनता के सामने प्रस्तुत की है | आपका शो हमारा पूरा खानदान बैठ कर देखता है, और सबसे दिलजस्ब्त बात यह है की ६ साल से लेकर ७० साल के उम्र के व्यक्ति आपको एक साथ बैठ कर सुनते है और समझ पाते है |
आप कभी इन्दौर की तरफ श्री मुख कीजियेगा और हमारे यहा अवश्य पधारिएगा |

-स्नेह भाव
प्रतीक खण्डेलवाल, इन्दौर

jitendra kumar said...

Aapki kalam ka jawab nahi ravish Ji,aapke ravish ka roadshow,prime time ka bahut bada fan hu sir

bliss of solitude said...

Bhagti hui zindagi me koi thehirav la de,
aur samvedna ko marne se bacha le,
insan hone ka faraz yaad dila de,
aise jhonke ki tarah aaya ye aapka khat!

pawan mishra said...

बहुत उत्तम लिखते है ...आपके प्राइम टाइम का इंतज़ार सभी रामायण , महाभारत की तरह करते है!

किसी शायर ने कहा था ....

हजारो साल में कोई एक होता है "विस्मिल्लाह"
जमीं पे रोज सितारे कहाँ निकलते है.......!!

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुंदर प्रस्तुति.
इस पोस्ट की चर्चा, शनिवार, दिनांक :- 03/05/2014 को "मेरी गुड़िया" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1601 पर.

CA MANOJ JAIN said...

आपकी 2006 वाली रिपोर्टिंग का लिंक शेयर करो सर।...

Narendra Patel said...

sir दिल खुश कर दिया आपने …… ऐसा सजीव वर्णन से लग रहा है हम भी उस भारत रत्न-धारी के मज़ार से घूम कर आ गए है …… अद्भुत लेखन :)

CA MANOJ JAIN said...

अब आपकी क्या तारीफ़ करें सर .....आप के लेखन के तो हम कायल हैं।

Gopal Girdhani said...

अद्भुत ! अद्वितीय !!
बहुत ही मार्मिक पत्र !
सलाम आपको !!!!

Chandra Pal said...

बहुत खुब रविश सर, लगा कुछ गलत हो रहा है बनारस के साथ, बिस्मिल्ला साहब के दरबार में.सब अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा में देश के सुरों को भुलते जा रहे है.... आखिर कब तक हम बुजुर्गों के नाम पर जनता को धोखा देकर वोट से विनाश की ओर धकेलते रहेंगे...

Rachit G said...

आखिर एनडीटीवी एक मिडिया हाउस है या शबनम मौसी का कोठा ??
इसकी आधे से ज्यादा न्यूज एंकर किसी न किसी नेता की दूसरी बीबी बनी है
बरखा दत्त तो जम्मू कश्मीर बैंक के चेयरमैन हसीब दरबु की तीसरी बीबी बनी .
सोनिया शर्मा सिंह कांग्रेस नेता आर पी एन सिंह की दूसरी बीबी बनी
अमृता राय दिग्विजय सिंह की दूसरी बीबी बनी
निधि राजदान के उमर अब्दुल्ला से साथ रिश्तो के चलते उमर का तलाक हो गया

तो क्या एब एनडीटीवी हवस मिटाने का कोठा बन चूका है ??

ramchandra tiwari said...

रवीश जी ! नमस्कार । इतने सुंदर और मार्मिक पत्र के लिये कोटिश : धन्यवाद ।विस्मिल्लाह खां साहब हम सबके अजीज हैं ।हर उपमा और तुलना से बड़े और परे हैं । उनका निश्छल स्वाभाव और बालसुलभ मुस्कान सर्वविदित है । आपका सौभाग्य है कि आपने उनकी गाली भी सुनी है जिसे आपने अपनी परम्परा में आशीर्वाद माना है । सुपात्र ने दिया और सुपात्र ने लिया । बहुत खूब ।शेष बिडम्बनाऔ की चर्चा आपने कर ही दी है ।
एक बात और - Mr. नितिन ( दिलजले ) के साथ अब copy & paste वाले IAS आकान्छी श्रीमान राहुल वैश्य भी आपकी तारीफ फुरसत से करने लगे हैं ।कहाँ की खीझ कहाँ निकाल रहे हँ ।
आप विस्मिल्लाह खां साहब की तरह ही अपनी पसंद की धुन बजाते रहेंगे - बिना किसी को गाली दिए बगैर - ऐसा विश्वास है । एक बार पुन : धन्यवाद ।

amrita said...

कस्बा खोलते ही इतना बेह्तरीन और भावुक ख़त | पढ़ कर लगा ...वक्त ठहर गया | आप अपनी भावनाओं को कितनी ईमानदारी और सरलता से व्यक्त कर जाते हैं.....

बाकि तो जो भी है वो इस देश का दुर्भाग्य ही है............

ANITA SINGH said...

Ravish ji aapke kasbe me aaye bina man nahi lagta. aapke 'lamhi-premchand' n 'gajipur' vale p.t. ka javab nahi. aise hi kabhi ' baba nagarjun' ke yeha bhi le chaliye.

SAMVEDNA said...

बिस्मिल्लाह!! दादा रसूल बख्श खान के होंठों से नवजात को देखकर यही शब्द निकला था। और उस नन्हें बच्चे का नाम बिस्मिल्ला खान हो गया। बड़े होने पर बिस्मिल्ला खान ने पिता-दादा- परदादाओं की शहनाई-वादन की कला-परंपरा को आगे बढ़ाया और समूचे देश की आवाज बन गये। एक असाधारण आवाज देशराग। उनकी शहनाई के स्वर हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत, प्रसिद्धि और जनमानस के अंतरंग में बसी हुक बन गये। सदियों पुरानी शहनाई में समाई आवाज उनके प्रयासों से शास्त्रीय हो गई। बिस्मिल्लाह और शहनाई एक-दूसरे के पर्याय बन गये। बिस्मिल्लाह खान के पुरातन वाद्य की स्वरलहरियां देशों-विदेशों में गूंजती और प्यार तथा शांति के राग छेड़ती जातीं। एक सहज -सरल भावुक एवं पारिवारिक इन्सान जो संगीत को आजीवन जीता रहा . एक अनमोल रतन . भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान .
आजीवन शइनाई का रियाज करते बिस्मिल्लाह खान वाराणसी के फातिमा कब्रगाह में अपनी शहनाई, जिसे वे ‘बेगम’ कहा करते थे के साथ नीम की ठंडी छांव में सदा के लिये सो गये। कहते हैं कि ध्वनियां कभी नष्ट नहीं होतीं। आज बिस्मिल्लाह खान अपनी खामोश शहनाई के साथ भले ही चिरनिद्रा में सो रहे हों उनकी स्वर-तरंगें आज भी बज रही हैं। म्यूजिक, थियेटर और डांस के क्षेत्र में संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली का ‘उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार’ के रूप में, उस्ताद की शहनाई के संगीत की आवाज कलाकारों के बीच थोड़ी-थोड़ी फैल रही है- अनूगूंज बनकर। उस्ताद कहा करते थे कि यदि दुनिया का अंत हो भी गया तो भी संगीत जिंदा रहेगा।

Prabhat Sinha said...

रविश जी, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब की याद दिलाकर आपने आज मुझे अभिभूत कर दिया। मेरे जैसा संगीत के अनाड़ी व्यक्ति को भी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब की शहनाई और शख्सियत पे उतना ही नाज है जितंना एक सँगीत के पण्डित को।
"आपकी शख़्सियत और शहनाई पर लिखने के क़ाबिल नहीं हूँ । इसलिए सोचा कि आपको ख़त लिखूँ ।".... सर, आपने एक दिल को छु लेने वाला खत लिखा है और ऐसा लग रहां है जैसे उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब आपके खत को पढ़ कर अपनी दिलफेंक मुस्कुराहट बिखेर रहे हैं। ये आपने बिलकुल ही सही लिखा है कि " इस बाप ने जीते जी कुछ नहीं चाहा तो एक क़ब्र या एक मज़ार की क्या बिसात "....
@Nitin Shrivastava - हम सब को पता है कि तुम्हारे लाख चाहने पर भीे भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ही रहेंगे ना कि नाथूराम गोडसे। ये बात अलग है की मोदी के सपना दिखाने पे तुम्हे कुछ भ्रम हो गया है।

AMIT KR. VERMA said...

@Nitin Shrivastava, tumhare jaise hi log din raat namo-namo ka rat lagate hain,aur agar koi bhi logical debate karo to koi javab nahi hota hai.RSS ne itna brainwashed kiya hai ki ab to language bhi tumahri unhi vali ho gayi hai.Din raat Hindu nationalist ka raag japne vale kabhi anusuchit jati/janjati ke logo ko apna ke dikaho.

Nitin Shrivastava said...

Abhi tak toh ravish kaa he tha lakin abhi Lagta hai Bismillah Khan kaiyon ka baap hai(Baap word mainey nahi aapke priyatam bahgwan Ravish ne use kiya hai).Bismillah na hua ND tiwari ho gaye

ravik. gupta said...
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Surender said...

Ravish ji..please cover one story about the मुसहर caste in eastern UP specially in Varanasi and Bhadohi area. The condition of this caste is pathetic. They are called the दलितों में भी महादलित. Only you can bring the real picture of them.




Atul Kumar said...

rula dete ho Ravish Bhai . apni nakamiyo , chota hota wajood aur bhangit Banarsipan ki anubhiti kara di apne Kashi walon ko.

shikwa tujhse se nahi teri taqdeer se kiya;

nashar-e-tehzeeb tujhe chu ke jo guzra tha .
nashar- propagator

deep chand said...

Shandaar! Thanks Rabish ji.

deep chand said...

Shandaar! Thanks Rabish ji.

nitu pandey said...

करीब दो सालों बाद मैं आपका ब्लॉग पढ़ी.हमेशा की तरह वहीं ताजगी का एहसास हुआ.अपनी निजी कारणों से इतने दिनों से इंटरनेट की दुनिया से दूर रही.जब मैने अपना ब्लॉग खोला तो मुझे लगा था कि आप इतने व्यस्त एंकर हो चुके है ब्लॉग को कहां टाइम दे पाते होंगे पर मैं ग़लत साबित हुई.खैर आपने बहुत अच्छा लिखा है बधाई हो.

nitu pandey said...
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nitu pandey said...
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nitu pandey said...
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Mayank Gautam said...

In the height of Media's fascination with elections, newsmakers, debates, discussions etc., mention of Bismillah khan is refreshing. Brings back memories of listening to Khan saheb. Once, I sat right in front of him at a Delhi venue with temperatures soaring at 44C. It was an outdoor venue and Khan Saheb was sweating profusely. He kept playing unaware of how hot it was. Organizers were arranging to put a cooler next to him. He got upset with them as it was interfering with his concentration. He got the coolers removed. Khan Saheb was an epitome of devotion to his art. It’s sad to even think about his religion or political affiliation. He was an asset to humanity and he should be remembered like that.

Sanku said...

Ravish,

Everyday my respect towards you as a journalist and as a human being increases. The sensitivity with which you approach issues in such an insensitive society as India in amazing.
I can only say that thank you for reminding us of this great human being and agree that it is our misfortune that someone like Bismillah khan cannot get a decent memorial in one year.

Chin2 said...

You sir rock!

Ashhar Ahmad said...

रवीश भाई आपके अंदाज़े बयाँ का तो मै हमेशा से कायल हूँ तो उसके बारे मे क्या कहूँ। आप जैसे टी वी एंकर की वजह से ही शायद घर में समाचार सुनने का शौक़ हम जैसे लोगों में बाक़ी बचा है।

ख़ैर , जो बात मैं कहना चाह रहा था वो ये है कि मज़ारों और क़ब्रों को पक्का न करवाना ही सही तरीक़ा है। इस तरह सोचिये कि भारत की आबादी कितनी है और कितने तो पहले ही मर चुके हैं। तो अगर क़ब्रें पक्की करवाते चलते तो शायद आज लोगोँ को दफ़नाने के लिये क़ब्रिस्तान ही न बचे होते। इस तरह अगर देखा जाये तो फिर आने वाली नस्लें कहाँ जाएँगी क्योंकि मरना तो सबको ही है।

RAHUL VAISH said...

देश के महाभ्रष्ट इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (महाभ्रष्ट इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इसलिए क्यों की उसका उल्लेख मैं अपने पूर्व के ब्लॉग में विस्तारपूर्वक कर चूका हूँ अत: मेरे पूर्व के ब्लॉग का अध्यन जागरणजंक्शन.कॉम पर करे ) के उन न्यूज़ चैनलों को अपने गिरेबान में झाँक कर देखना चाहिए जो न्यूज़ चैनल के नाम के आगे ”इंडिया” या देश का नॉ.१ इत्यादि शब्दों का प्रयोग करते है. क्यों की इन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कुँए के मेढक न्यूज़ चैनलों का राडार या तो एन.सी.आर. या फिर बीमारू राज्य तक सीमित रहता है. कुए के मेढ़क बने इन न्यूज़ चैनलों को दिल्ली का “दामिनी” केस तो दिख जाता है लेकिन जब नागालैंड में कोई लड़की दिल्ली के “दामनी” जैसी शिकार बनती है तो वह घटना इन न्यूज़ चैनलों को तो दूर, इनके आकाओं को भी नहीं मालूम पड़ पाती. आई.ए.एस. दुर्गा नागपाल की के निलंबन की खबर इनके राडार पड़ इसलिए चढ़ जाती हैं क्यों की वो घटना नोएडा में घटित हो रही है जहाँ इन कुँए के मेढक न्यूज़ चैनलों के दफ्तर है जबकि दुर्गा जैसी किसी महिला अफसर के साथ यदि मणिपुर में नाइंसाफी होती है तो वह बात इनको दूर-दूर तक मालूम नहीं पड़ पाती है कारण साफ़ है की खुद को देश का चैनल बताने वाले इन कुँए का मेढ़क न्यूज़ चैनलों का कोई संबाददाता आज देश उत्तर-पूर्व इलाकों में मौजूद नहीं है. देश का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जिस तरह से न्यूज़ की रिपोर्टिंग करता है उससे तो मालूम पड़ता है की देश के उत्तर-पूर्व राज्यों में कोई घटना ही नहीं होती है. बड़े शर्म की बात है कि जब देश के सिक्किम राज्य में कुछ बर्ष पहले भूकंप आया था तो देश का न्यूज़ चैनल बताने वाले इन कुँए का मेढ़क न्यूज़ चैनलों के संबाददाताओं को सिक्किम पहुचने में २ दिन लग गए. यहाँ तक की गुवहाटी में जब कुछ बर्ष पहले एक लड़की से सरेआम घटना हुई थी तो इन कुँए के मेढक न्यूज़ चैनलों को उस घटना की वाइट के लिए एक लोकल न्यूज़ चैनल के ऊपर निर्भर रहना पड़ा था. इन न्यूज़ चैनलों की दिन भर की ख़बरों में ना तो देश दक्षिण राज्य केरल, तमिलनाडु, लक्ष्यद्वीप और अंडमान की ख़बरें होती है और ना ही उत्तर-पूर्व के राज्यों की. हाँ अगर एन.सी.आर. या बीमारू राज्यों में कोई घटना घटित हो जाती है तो इनका न्यूज़ राडार अवश्य उधर घूमता है. जब देश के उत्तर-पूर्व या दक्षिण राज्यों के भारतीय लोग इनके न्यूज़ चैनलों को देखते होंगे तो इन न्यूज़ चैनलों के द्वारा देश या इंडिया नाम के इस्तेमाल किये जा रहे शब्द पर जरुर दुःख प्रकट करते होंगे. क्यों की देश में कुँए का मेढ़क बने इन न्यूज़ चैनलों को हमारे देश की भौगोलिक सीमायें ही ज्ञात नहीं है तो फिर ये न्यूज़ चैनल क्यों देश या इंडिया जैसे शब्दों का प्रयोग करते है क्यों नहीं खुद को कुँए का मेढक न्यूज़ चैनल घोषित कर लेते आखिर जब ये आलसी बन कर देश बिभिन्न भागों में घटित हो रही घटनाओं को दिखने की जहमत ही नहीं उठाना चाहते. धन्यवाद. राहुल वैश्य ( रैंक अवार्ड विजेता), एम. ए. जनसंचार एवम भारतीय सिविल सेवा के लिए प्रयासरत फेसबुक पर मुझे शामिल करे- vaishr_rahul@yahoo.कॉम और Rahul Vaish Moradabad

A Srivastava said...
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A Srivastava said...

Beautiful piece ! .. Aapka blog padh ke apne aap ko hindi sabhyata ke kareeb mahsoos karte hain .. waise toh kab ki chhut gayi hindi , dasvi class mein hi . Par hain hum Ganga kinare wale, although abhi Pacific Ocean ke kinare bas gaye :D

राकेश श्रीवास्तव said...

भावपूर्ण खत.

Banaj Kumar said...

भाई रवीश जो कुछ आपने दिखाया है और लिखा है उसने मेरे ह्रदय को आंसुओं से तरबतर कर दिया है भाई हम सबको मिलकर कुछ ऐसा करना चाहिए कि ऐसी दारुण परिस्थति से हमें नहीं गुजरना पड़े पिछले पेंसठ सालों में हम चाहते क्या थे पर हमें मिला क्या इस बारे में विचार करने का वक्त आ गया है ये अगर अभी नहीं सोचा गया तो शायद इसके बाद समय ना मिले

हिमांशु सोनी said...

bismillah...

Devendra said...

sir apki bat hi nirali hai .........
ap kaise patrakar hai jo lime light se dur ki chije cover karta hai ye hi apke post ko kaljayi banati hai bhale ap kaljayi n banana chahe

प्रवीण पाण्डेय said...

शहनाई से निकली एकता की सरगम..

Neetu Singhal said...

पत्राकारिता जबसे दासी बन गई है, उसके स्थान पर सुरसा मुख सी 'मीडिया' आ गई है, सम्पादक, पत्रकार, संवाददाता भी वो नहीं रहे, उनके स्थान पर मैक्सी, मिडी, मिनी और माइक्रो आ गए हैं..... ये क्या है.....?

Vikram Pratap singh said...

Umda!!

deepikaa said...

Mr Ravsih,
I follow your stories sitting here in my corner of the world- Amsterdam.
Its cold here most time of the year but watching your program brings back the 'feeling of the warm rural India' strange..that the mind can smell n feel all that it can imagine from its past.
I watch a lot of different kind of programs in different languages, some I understand with words, some with eyes. Iam most impressed with your true, candid and wholesome approach to the world of India that is increasingly becoming more polarized. I also happen to be some ways connected to your Bihar. Iam married to a Bihari!. Well the reason i wrote to you is this.

I am fascinated with India - west in terms of how things appear and how they are interpreted. Iam from a Gandhi following family.. growing up with baba weaving and singing the Sarawati Vandana and the whole black shadow and the eclipse of the British raj, they rulers-we slaves feeling.. or going out of the way to prove otherwise.
I am watching a series of BBC program that shows that the worlds of poor in Britain and colonized India were the same. Actually much worse in UK... but somehow the traces in our memories are that, the British loved their own poor and hated Indians poor.. that i feel now is a myth.
I thought maybe it interests you to draw parallels and make something that could sooth the nerves of us or our ancestors who suffered and believed that we were inferior to the poor in Britain, we were not, we were richer by a simple calculation of weather. The cold here is heartless to all, specially to the poor.

https://www.youtube.com/watch?v=k1QtmV_rnNQ

Maybe of interest to you.

Greetings
Deepikaa Shiromany from Amsterdam

Unknown said...

kabhi kabhi lagta hai sir, insaan kud se zyada kabhi kuch dekh hi nahi payega ...

SUJIT CHOWDHURY said...

Bahut marmik varnan ! Jis saksh ke dhun se Bharat jagta hai use " do gaz jameen bhi na mili kuch-e-yar me "
Meena Kumari ki nazm Yaad aa gayi aapka aalekh padhkar " ajnabi desh ke rasto pe bhatakte rahi ; maine socha hai ke aaj tumhe khat likkhoon "
By the way Ravish Ji , teen char saal pahle mere magahi ke blog per aapne Navbharat Times me tippani ki thi " internetwa par magahi Ka bolbala "

pragati sinha said...

aapke chahne wale yaha bhi aa gye aapka picha karte karte... jane dijiye ignore kariye..inka man nae lagta aapko gali diye bina..iske paise milte hain na..apna kaam imandari se kar rahe hain :)

pragati sinha said...

aapke chahne wale yaha bhi aa gye aapka picha karte karte... jane dijiye ignore kariye..inka man nae lagta aapko gali diye bina..iske paise milte hain na..apna kaam imandari se kar rahe hain :)

Abhishek Raj Singh said...

बहुत ही खुशनसीब हूँ जो ये पत्र पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पढ़ कर क्या लिखूं, आपके लिखने की काबलियत की तारीफों के पुल बांधू या फिर मरहूम बिस्मिल्लाह साहब की मजार की स्थिति हालत पर अफसोस जताऊ, या फिर इस समाज को कोसू जिसका हिस्सा मै खुद भी हूँ। ऐसा क्यों है कि सब कुछ तेजी से बदल देना या फिर कहें की भूल जाने की आदत सी हो गई है। क्या अब हमें ऐसे ऐतिहासिक महापुरुषों से कुछ भी खास नहीं मिलेगा जिसका अपने समाज में कुछ महत्व दिया जाता है।

Kriti Bhargav said...

Beautiful

ish madhu talwar said...

DIL KO CHHOO LENE WAALA ANDAAZ...GHALIB MEIN AUR KYA THA? RAVISH JI AAPKO TOPI UTAAR KAR SALAAM.

ish madhu talwar said...
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ish madhu talwar said...

DIL KO CHHOO LENE WAALA ANDAAZ...GHAALIB MEIN AUR KYA THA...RAVISH JI AAPKO TOPI UTAAR KAR SALAAM.

dr.mahendrag said...

बहुत सुन्दर रवीशजी , ये देश ऐसा ही है,विवाद खड़े करना हमारी फितरत बन गयी है कब्र केलिए क्या सुन्नी क्या शिया?भारत रत्न को जितना हल्का इन सियासतदानों ने बनाया है उस के बाद पुरुस्कृत व्यक्ति खुद को ठगा सा महसूस करता है आपने लापरता अच्छा किया पर इन चिकने घड़ों पर कहाँ पानी ठहरेगा?

devdeep said...

रवीश भाई..आपकी बैचेनी नजर आती है..बिस्मिल्‍लाह खान हमारे दिलो दिमाग में,हमारी धरोहर है...आपकी इस पोस्‍ट के लिए साधुवाद.....

Akhil Raj said...

जिसका नाम ही बिस्मिल्लाह हो उसके बारे में क्या कहें ,पर आपने अहसास करा दिया मानो मैं वहीँ हो के आया हूँ ...साधुवाद

Kamal Lakhera said...

Hum Bhartiye, Khud mein pehle Dharm aur fir Jaati ko dhoondhte hain. "Jaati na poochho sadhu ki, poochh lijiye gyan, mol karo talwar ka, pade rehne do myaan."

suneel narang said...

श्री फ़्रीवास्तव अपना डीएनए चैक कराओ मुझे यकीन है गोडसे से मैच करेगा या दादी का पुराना सामान ढूंढना गोडसे का कोई फोटो या लवलैटर मिल ही जायेगा

Aanchal said...

आज के हिंदुस्तान अखब़ार में इस पोस्ट को पढ़ा । और उसके बाद यहाँ आकर दुबारा से पूरा पढ़ा । न सिर्फ़ राजनेता, बल्कि हम सबको साहित्य और संस्कृति पर भी राजनीति करने के बजाय इसे संजोने की तरफ़ कदम बढ़ाने की ज़रुरत है । शुक्रिया आपका इस खूबसूरत ख़त के लिए ।

कमल/Kamal said...

प्यारे रविश,
बड़ा बढ़िया लगा आपकी ए कहानी पढ़के। ऐसा लगा की खान साहब अब भी शहनाइ बजा रहे है। कभी खान साहब से मिलाने क मौका तो नहीं मिला परन्तु आपके लेख से उनको जानने क मौका मिल गया।
धन्यवाद

Lata Upadhyay said...

प्रिय रवीश जी , हमारे देश की शान , इतने महान शहनाइवादक स्वर्गीय बिस्मिल्ला खान की याद हम सबको दिलाने के लिए आप साधुवाद के पात्र हैं। उनकी याद मे आँखे नम हो गईं .....

Prakash Joshi said...

बहुत खूब लिखा। सच्चाई उजागर करती अत्यंत मार्मिक अभिव्यक्ति।

Gopal Mahesh Dayma said...
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Gopal Mahesh Dayma said...

Ravish Sir , Aapki Kalam se nikale Shabdo ka Javab nahi hai.....
Aise hi hame Prerna dete rahiye....