वन-रूम सेट का रोमांस- दिल्ली मेरी जान(2)

गोविंदपुरी के शर्मा जी का वन-रूम सेट। तीसरी मंज़िल पर। टेबल फैन की औकात नहीं थी कि वो दिल्ली की गर्मी से राहत दिला दे। चटाई लेकर छत पर सो जाता था। बगल की छत पर सो रहे मज़दूरों के रेडियो से छन कर आते हिंदी गाने। किसी रात जाग रहा था। आसमान में ताकने के लिए कुछ नहीं था। इक शहशांह ने बनवा के हसीं ताजमहल, सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है। पहली बार तभी सुना था यह गाना। सोचता रहा कि कितनी मुश्किल हुई होगी रफी चचा को गाने में। जैसे किसी गद्य को उठाकर गा दिया हो। गाना खतम हुआ और मैं गोविंदपुरी के ताजमहलों को देखने लगा।


गज भर ज़मीन पर बने मकान। ऊंचे उठते चले आए थे। कुछ बन रहे थे और कुछ बन चुके थे। बाहर से आ रहे प्रवासी छात्रों और मजदूरों के लिए। मज़दूरों की डिल्ली और छात्रों की दिल्ली के लिए। गोविन्दपुरी प्रवासियों के लिए किसी सेज़ की तरह एकीकृत शहर के रूप में उभर रहा था। तब किसी गली का नाम नहीं होता था। नंबर होता था। इतनी गलियां थीं कि नाम रखने के लिए महान लोगों की सूची कम पड़ जाती। लाखों मकानों का अपना कोई चरित्र नहीं था। किसी भीड़ की तरह बने लगते थे मकान। हर मकान का नंबर होता था। मकान का नंबर बटा गली नंबर। इसी से बनता था पता। लाल किले से खरीदा गया बीस रुपये का रेडियो। वॉक मैन का भतीजा लगता था। कान में तार घुसा कर हिला हिला कर सुनना पड़ता था। हल्की सी आवाज़ भी गोविंदपुरी के भदेस मकानों को ताजमहल के रंग में रंग देती थी। किशोर के गीत हों या फिर कुमार शानू का गाना। तू मेरी ज़िंदगी है...तू ही मेरी पहली चाहत...तू ही आखिरी है। कोई रोको न दीवाने को...मन मचल रहा...कुछ गाने को।


जब बीस रुपये वाले रेडियो(ट्रांजिस्टर) से काम न चला तो पहली बार बाबूजी से अपने लिए कुछ मांगने की हिम्मत जुटा ली। बाबूजी से आंखें मिला कर कुछ मांगने की ये मेरी ज़िंदगी की पहली घटना थी। रेडियो चाहिए। उन्होंने पूछा कि किस लिए। तुम यहां गाना सुनने आए हो। पढ़ो। मुझे भी हिम्मत नहीं हुई कि कह दें कि गाना सुनना है। कह दिया कि बीबीसी सुनना है। आज पलट कर देखता हूं तो लगता है कि मीडिया की साख कितनी प्रभावशाली होती है। तभी ऑटो तेजी से लेडी श्रीराम कालेज के बगल से गुज़रा। बाबूजी के साथ रेडियो खरीदने को लेकर बहस चल रही थी। बीच में बात से बचने के लिए उनको दिखाया कि ये एलएसआर है। लड़कियों का सबसे अच्छा कालेज। बाबूजी ने कहा....तो। मैं चुप हो गया। सत्रह साल बाद वो उसी एलएसआर के सामने खड़े थे। अपनी बहू को छोड़ने गए थे। मेरी पत्नी वहीं पढ़ाती हैं। वो बताती हैं कि तब एलएसआर की तरफ देखकर रोने लगे थे। हमारे मां बाप ऐसे ही हैं। भावुक ज़्यादा। रोया नहीं तो संवाद ही पूरा नहीं हुआ। खैर सत्रह साल पहले की उस दुपहरी आटो भागा जा रहा था। बीच बीच में बाबूजी ड्राइवर से घर का पता पूछ रहे थे। कहां के हो। कौन ज़िला है, नाम क्या है। फलाने का मकान देखा है रे। तुम्हारे गांव में गए हैं। शादी में गए थे। प्रवासियों की बातचीत। खुश हो जाते थे कि बेटे का परिचय किसी अपने इलाके वाले से करा दिया है। लेकिन रेडियो की बात पर कोई वादा नहीं किया। काश समझ पाते कि जवान बेटा इस शहर में आकर अकेला हो गया होगा। क्या पता रेडियो से उसका मन बहल जाए। अगले दिन बाबूजी चुपचाप पहाड़गंज गए और रेडियो ले आए। इतने सख्त और बेरहम पिता से मुझे उम्मीद नहीं थी। वो ऐसे ही थे। बाहर से सख्त और अंदर से मुलायम। खेतिहर समाज के पिता ऐसे ही हुआ करते हैं। बाहर से एकदम पत्थर। उनसे घुलने मिलने की जगह बनानी पड़ती थी। लेकिन जब भी वो कोना खुलता था तो लगता था कि अभी उनसे लिपट जाएं। हमने अपने बाबूजी को ऐसे ही चाहा। दूर से।

ये और बात है कि उस रेडियो ने कभी बीसीसी नहीं पकड़ा। हिंदी गानों ने मुझे भरना शुरू कर दिया। जब कोई बात बिगड़ जाए,जब कोई मुश्किल पड़ जाए। ये गाना मुझे बेहद रोमाचिंत कर देता था। समझ में नहीं आता था कि कौन देगा मेरा साथ मुश्किल वक्त में। लेकिन किसी के होने का कोमल अहसास पनपता रहा। दिल्ली की बसों में सवार होने से पहले तय करने लगा कि गाना बजता है या नहीं। बिना स्टीरियो वाली बस में कभी नहीं चढ़ा। गाना अच्छा बजाया तो दो चार स्टॉप आगे तक चला गया। कभी ऐसा नहीं हुआ कि अपनी पसंद का गाना खतम होने से पहले बस से उतर गया। मुझे नींद न आए...मुझे चैन न आए...कोई जाए ज़रा ढूंढ के लाए..न जाने कहां दिल खो गया। दिल का गाना बज रहा था। कालकाजी मोड़ से बस निकलकर नेहरू प्लेस चौराहे पर आ गई थी। रफ्तार के साथ हवा तेज़ होने लगी। खिड़की वाली सीट पर बैठे दिल्ली को गुज़रते देखने का रोमांस चालू था। मैं धीरे धीरे इस शहर का अपना होने लगा था। उदित नारायण की आवाज़। माधुरी का डांस। हालत क्या है कैसे तुझे बताऊं मैं..करवट बदल बदल कर रात बिताऊं मैं...। पूछो ज़रा पूछो ज़रा क्या हाल है...हाल मेरा बेहाल है....। कोई समझ न पाए..क्या रोग सताए...कोई जाए ज़रा ढूंढ के लाए। फिरोज़शाह रोड की तरफ जाने वाली बस। एम-१३। खचाखच भरी हुई। मंडी हाउस के पास उतार देती थी। पैदल आईसीएचआर की लाइब्रेरी पहुंच जाते थे। ऐ सनम हम तो तुझ से प्यार करते हैं....तेरी उम्मीद..तेरा इंतज़ार करते हैं। लौटते वक्त इस टाइप का गाना सुनकर इक्कीसवीं सदी के आने से पहले की जवानियां सपनों में खो जाया करती थीं।


हिंदी फिल्मों के गानों से ही इस शहर से एक रिश्ता बना। मेरे वन रूम सेट का पूरी दिल्ली से एक संबंध कायम हुआ। कमरे में बजने वाला गाना जब बाहर बजता सुनाई देता था तो भरोसा हो जाता था कि कुछ तो है मेरी दुनिया में,जो सब तरफ है। बगल से कोई ऑटो गुज़र जाता था लेकिन उसका गाना ठहर जाता था। ऑटो के ओझल होने के बाद तक वो गाना भीतर ही भीतर बजता रहता था। पूरा होता रहता था। बस ड्राइवरों से दोस्ती होने लगी। मुझे देखकर वॉल्यूम बढ़ा देते थे। मूलचंद से डिफेंस कालोनी तक की खुली हवा और उसमें घुलती अलका याज्ञनिक की आवाज़। पैसे सीमित थे इसलिए फिल्में छूट रही थीं। बहुत ही कम हो गई। लिहाज़ा गानों पर निर्भरता बढ़ती गई। रेडियो से सुबह प्रसारित होने वाले कुछ अंग्रेज़ी गाने भी ज़िंदगी में उतरने लगे।

इन गानों के अलावा और क्या था। पटना से चलते वक्त सारे रिश्ते टूट गए थे। उनका खींचाव तो था लेकिन धीरे-धीरे अहसास गहराने लगा कि अब मुझे उन सब पुराने रिश्तों के बिना जीना पड़ेगा, जिनके सहारे यहां तक बड़ा हुआ। इसीलिए बहुत गौर से देखता था गोविंदपुरी को। उसकी गलियों को। आज भी जब यहां से गुज़रता हूं तो गोविंदपुरी अंदर तक रूला देता है। बुला लेता है। कहने के लिए कि जब कुछ नहीं होगा तुम्हारे पास तो फिर से आ जाना मेरी गलियों में। याद दिला देता है कि जब सब छूट गए थे तो तुम यहीं तो आए थे। मेरे अकेलेपन का पनाहगार-गोविंदपुरी। इन उजाड़ मकानों में मेरे जैसे हज़ारों अपनी ज़मीन से बिछुड़ कर रह रहे थे। टीवी नहीं था। दुकानों के कोने में रखे टीवी पर सचिन को खेलते देखता था। भीड़ बढ़ती थी तो दुकानदार तंग आकर बंद कर देता था। हम अगली दुकान की तलाश में बढ़ जाते थे। जीत के किसी निर्णायक मोड़ पर तमाम मकानों से आती आवाज़ मुझे गलियों में भगाने लगती थी। अगली दुकान की तरफ। सचिन के शॉट को देखने के लिए। टीम इंडिया के प्रदर्शन से भीतर धौंकनी बढ़ती थी और जीत से गुदगुदी होती थी। घर को भूलने का ज़रिया बनता जा रहा था क्रिकेट। मैं चलता था गोविंदपुरी में और दिखता था पटना।

अपने अकेलेपन को गोविंदपुरी के मकानों की भीड़ से बांटने लगा। खूब चलता था इसकी गलियों में। एक गलि से निकल कर दूसरी गलि में। देखता रहता था दिल्ली को। ढाबे से आने वाली टमाटर प्यूरी की गंध। हर सब्ज़ी को एक ही तरी में बनते देखना अजीब लगता था। पैन में आलू फ्राई की और फिर तरी में डाल कर रसदार बना दिया। चिकन और मटन के साथ भी यही होता था। हर चीज़ में अजनबीयत। जो भी बिहार और पूर्वी यूपी का मिलता था लगता था कि ये अपनी रिश्तेदारी में है। भोजपुरी बोलने वाला मिलता था तो लगता था कि भाई ही होगा। इसी चक्कर में एक ढाबे वाले से दोस्ती हो गई थी। प्रवासी था। गोरखपुर का। दाल में एक पीस मटन डाल देता था। वो जानता था कि मुझे मटन पसंद है लेकिन हर दिन खरीद कर खाना बस की बात नहीं। धीरे-धीरे लघु वित्त मंत्री बनने लगा था। मेरी पसंद के ठिकाने बनने लगे। कहां चाय पीनी है और कहां खाना खाना है। घर से निकल कर पैदल चल कर ढाबे तक पहुंचना अब भोजन करने का नया रूटीन था। रसोई के बाहर पालथी मार कर खाने की आदत समाप्त हो गई।


फिर भी ये सारे मकान मेरे अकेलेपन को नहीं बाट सकें। दोस्तों की मटरगस्तियां उनकी थीं। उनमें शामिल होकर भी बाहरी हो जाता था। दोस्त बनने लगे। इनके सहारे अगले दस साल का सफर कटने वाला था। एक दूसरे की आदतों से एडजस्ट करना। कई ऐसे थे जिनसे मुलाकात गोविंदपुरी में ही हुई। पहली बार फ्लैट में रहने का सपना इन्हीं मुलाकातों में जवान हुआ। चार लोगों ने अपना बजट मिला दिया। फ्लैट लिया गया। लेकिन भीतर पहुंचते ही हम वैसे ही रहने लगे जैसे वन-रूम सेट में रहते थे। एक कमरे में दो लोग। किचन साझा और बाथरूम अपना। इस बार बड़ा लेकिन वन-रूम सेट ऐसे सेट हो गया कि हम आज तक इसी पैटर्न पर रहते आए हैं। मज़ाक करता हूं अपने दोस्तों से। लाइफ वन रूम सेटहा हो गई है।

32 comments:

Rohit Tripathi said...

"हमने अपने बाबूजी को ऐसे ही चाहा। दूर से। "..... bahut achi post ravish ji, hamesha ki tarah, jhakjhor ke le jati hai hume bhi apne bachpan ki galiyo mein, apne gaon ki galiyo mein jaha bijli jane ke baad hum 120 ki speed se daudte hue Chandrakanta dekhne ke liye Rammuri ku dukan pe jate the aur waha ja ke pata chalta ki size chota hone ke karan pul ke upar khade hokar dekhna padega aur itne mein kanjus beta uska sala tv band kar deta tha aur hum mayus agle hafte ka intezaar akrne lagte :D.. bahut sundar Ravish ji

MUKHIYA JEE said...

कुछ ऐसा ही मेरा सम्बन्ध "बंगलौर" से था ! बहुत कुछ याद दिला दिया और आप ने गोविन्दपुरी के छत को भी ढक दिया !

alka sarwat said...

आपके ब्लॉग वार्ता और कस्बा की तो मैं एक साल से प्रशंसक हूँ ,लेखों में एक प्रवाह मिलता है ,ऑटो और बस के गाने तो मुझे भी मोहित करते हैं ,लेकिन यही गाने पूर्वांचल के क्षेत्रों में गुस्सा दिलाते हैं ,कई बार तो मैंने बसों के टेप जबरन बंद करवाए हैं

रंजन said...

कस्बों से बडे़ शहर में आना और उसके अनुसार ढलना कला है.. पुरी जिवंता से बयान किया रवीश जी आपने..

अनिल कान्त : said...

हम भी कई बरस रहे हैं ऐसे ही इस दिल्ली में

डॉ टी एस दराल said...

रवीश जी, लगता है बहुत स्ट्रगल किया है आपने। बाहर से आने वाले को करना ही पड़ता है।

ये महानगर होते ही ऐसे हैं।

आपकी पोस्ट को पढ़कर हमें अपने देशबंधु कॉलिज में गुजारे गए दिन याद आ गए , जब मैंने प्री-मेडिकल किया था, वहां से।

वहीं पर ग्रेटर कैलाश भी है, जहाँ हम अर्चना सिनेमा पर पिक्चरें देखते थे।

Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना said...

"बीच में बात ..........ये एल एस आर है लड़कियों का सबसे बढ़िया कॉलेज ....... बाबूजी ने कहा .. तो , मैं चुप हो गया ''. " लौटते वक्त इस टाइप का गाना सुनकर इक्कीसवीं सदी के आने से पहले की जवानियां सपनों में खो जाया करती थीं। '' रविश जी आप का वर्णन किशोरावस्था के स्वप्निल दौर में पहुंचा देता है.
"मैं चलता था गोविंदपुरी में और दिखता था पटना। " मैं तो तक़रीबन तीस सालों के बाद भी चलता हूँ दिल्ली और हुडको में और और दीखता रहता है गाँव का घर पटना और बिहार .
और यह मनः स्थिति बेमजे को मजेदार और आनंद को काफूर करती रहती है.
अपने हवाले आप उस दौर की कथा कह रहे हैं. इसी तरह कहते रहें . हो सके तो क्यों न इसे सुनियोजित ढंग से लिख कर छपवा दिया जाए .
सादर

archana said...

Ravish Ji
aapka likha padhkar apne pan ka ehsaas hota hai...

अखिलेश चंद्र said...

Ravish Ji aaj bhi muhe aap bilkul akele lag rahe hain!Aisa mujhe aapki post padhne ke baad lag raha hai. kya vaastav men aisa hai? Agar yeh sawaal aapko behad niji lage to mujhe maaf kar dijiega.

dharmendra said...

ravish bhaiya. emotional lekh par lekh. itna bhauk nahi karein. hume lagta hai ki aap jis stithio se gujre hain, usi stithi se hum bhi gujar rahen hain. har bihar aur east up ka aadmi lagta hai ki apne hain. jab 2 years pahle humlog patrakarita ka course karne delhi aaye the tab bihari patrakaro ke bare me pta lagate thi ki acchi position me kaun kaun hai. unke office ke bahar bhi chahalkadmi karte the. lagta tha ki apna hai kuch help karenge. aap jaise logo ko dekh kar lagta tha ki koi apna hai yahan. jaat pat se upar uthakar sochnelage hain. lekin

मधुकर राजपूत said...

घर घर चूल्हे मटियारे, मिलती जुलती सी कहानी होती है कुछ ज़िंदगियों की, चलो आपने अतीत का आईना औंधा नहीं किया और अगर कर भी देते तो शक्ल कहां बदलने वाली थी। अब पुरानी यादें ऐसा खिलौना हैं जिसे ना फेंका जा सकता है और जो ना दिल ही बहला सकता है। नॉस्टेलजिया का बंद बोरा फाड़ दिया।

सुशील कुमार छौक्कर said...

क्या कहे रवीश जी कभी कभी लिखे अक्षर बहुत कुछ कह जाते है और आदमी निशब्द हो जाता है। दिल्ली ऐसे सस्मरण का समंदर है।

अवधेश कुमार मौर्या said...

Ravish ji..... kafi achachaa, likha hain ......... agar ye kahoon to aap ki taunhin hogi....
mai aap ko bahut dino se padhta aa raha hoon. lakin ye aap ka pahala post hai jise maine poora padhane se apane aap ko nahee rok paya...
kyon ki ye kahanee aam insan se mail khati hai.....
vase sahee kaha mera bhee radio dilli me bbc nahee pakdta hai.. nhjet par aakar sunna padata hai.....
thanx.....

shikha varshney said...

आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ..और काफी रोचक सामग्री पढने को मिली...काफी अच्छा लिखते हैं आप.

सतीश पंचम said...

काफी संजीदा किस्म की यादें हैं रवीश जी। इन यादों को बांटने के लिये शुक्रिया।

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छा संस्मरण। बधाई स्वीकारें।

Vidhan C Rana said...

कुछ दस साल पहले की दिल्ली की यादे ताज़ा हो गयी । मै उस्स समय कटवरिया सराय मॆ रेहता था। आइसे ही कुछ हालात थे। आज दिल्ली से काफ़ी दूर हू। पर यादे हरी हो गयी। दिल ने कहा बस पुणे छोडो और दिल्ली का रुख कर लो ।

अमृत कुमार तिवारी said...

हमारी लाइफ तो अभी भी वन रूम सेटहा ही चल रही है। हर लाइन उकेर रही है। प्लीज आप इसे स्टाप नहीं करें। आगे भी इसी विषय को बढ़ाते हुए लिखते रहिए। प्लीज...

mrinal said...

रवीश भाई.....सुन्दर, अतिसुन्दर.....हमेशा की तरह. बहुत अपना अपना सा लगा.आपकी इन यादों के हमसफर आपके कई साथी भी थे जिनके साथ कालेज़ की सीढीयों पर या कैंटीन मे कुछ या यूं कहें की बहुत वक्त गुज़ारे गये थे. कभी एक ब्लाग उनपर भी हो जाये ताकि यादों का ये सिलसिला आगे बढे.

मृणाल

mrinal said...

रवीश भाई.....सुन्दर, अतिसुन्दर.....हमेशा की तरह. बहुत अपना अपना सा लगा.आपकी इन यादों के हमसफर आपके कई साथी भी थे जिनके साथ कालेज़ की सीढीयों पर या कैंटीन मे कुछ या यूं कहें की बहुत वक्त गुज़ारे गये थे. कभी एक ब्लाग उनपर भी हो जाये ताकि यादों का ये सिलसिला आगे बढे.

परछाईं said...

रवीश भाई,
हम सबकी ऐसी दास्तां ही है। कुछ मिलती, कुछ जुदा...। ये खुदा की नेमत है कि आपकी तर्ज़े बयानी इतनी खूबसूरत है कि दिल के हर तार को छेड़ जाती है। खुदा आपको ऊंचा मकाम दे और नीचे हमें नीचे वाली दुकान। आमीन
नाचीज़
खालिद अल्वी

Rahul said...

Bahut Sunder Bayaan Kiya Hai Raveesh Ji

SM said...

ravish g,
Patna mein transfer per aya hooin,jo imotion ap likh sakte hain,uska jabab nahi.ap kitab likhiye,meri ichha hai

Sheetal Tewari said...

ravish ji...bahut hi badhiya...man ko chu gaya...

mohit said...

"हमने अपने बाबूजी को ऐसे ही चाहा। दूर से।
Ye Line Dil Ko Chhu Gayi.Kyunki meri jindagi ki haqikat bhi yehi hai.

ravishndtv said...

दोस्तों,

आप सबको यह सीरीज़ पसंद आ रही है,मुझे अच्छा लगा। मैं इस वक्त किसी बुजुर्ग लेखक की तरह सराहे जाने से भावुक महसूस कर रहा हूं। बहुत दिनों से वन रूम सेट से जुड़ीं यादें मुझे परेशान कर रही थीं। बाहर आना चाहती थीं। तीनों लेख आपकी यादों से जुड़ने में सफल रही है, यह जानकर मुझे बहुत अच्छा लगा रहा है। हम सबके भीतर यादें भी वहीं है। साझा करना सहेज कर रखने से हमेशा अच्छा होता है।

riju said...

gr8,,,,just gr8,,,,,
mai to aapka prasansak aarso se hu,,,par aaj pahli bar apka blog padha,,,
aur aaj ke bad jab v net knolunga orkut chek karu ya na karu apka blog jaroor padhunga,,,
its touches da core,,,,,seems 2 b like my stori..

मनीष राज मासूम said...

अपने अकेलेपन को गोविंदपुरी के मकानों की भीड़ से बांटने लगा। खूब चलता था इसकी गलियों में। एक गलि से निकल कर दूसरी गलि में। देखता रहता था दिल्ली को। ढाबे से आने वाली टमाटर प्यूरी की गंध। हर सब्ज़ी को एक ही तरी में बनते देखना अजीब लगता था। पैन में आलू फ्राई की और फिर तरी में डाल कर रसदार बना दिया। चिकन और मटन के साथ भी यही होता था। हर चीज़ में अजनबीयत। जो भी बिहार और पूर्वी यूपी का मिलता था लगता था कि ये अपनी रिश्तेदारी में है। भोजपुरी बोलने वाला मिलता था तो लगता था कि भाई ही होगा।
!!क्या कहूँ तारीफ के शब्द नहीं हैं बस इतना की ना कितनों के अनुभवों को शब्द दिया है!!बहुत ज़्यादा खूब!जय हो!!!!

akanksha said...

hi sir, m a big fan of urs...
bt its the 1st time that i hv visited ur blog..
its true ki "hamare yaha k khetihar pita yaise hi hote hai andar se narm aur bhar se shakhat."
aapki bato ne mujhe bhi aape bite dino ki yaad dila di ,,,
aapko dekh k lagata hai HAMARA CHAMPARAN kafi aage hai...

alok said...

इतनी गलियां थीं कि नाम रखने के लिए महान लोगों की सूची कम पड़ जाती।..bahut bada kataksh hai abhi k samay par...
sir jee mai patna ka hoon aur abhi mai chattissgarh me hoon durg-bhilai me,agar is nachij se koi kam pade to jaroor yad karna..khushi ki baat hogi hamare liye..
December 14, 2009 5:02 AM
Harsh said...
रवीश जी आपसे जानना चाहता हूँ पत्रकारिता में जाना है यह आपने पहले से तय कर लिया था.......या यू पी एस सी की तैयारी करते करते पत्रकारिता में यू ही आना हो गया....| वैसे मैंने एक चीज कोमन देखी है सभी बड़े पत्रकार यही कहते है पत्रकारिता में जाना है यह तय नहीं होता है.....आप इस से कहा तक इत्तेफाक रखते है?
aapka HARSH ko diya gaya jawab dil ko chhu gaya..mai abhi engineering kar raha hoon bt mera bhi maan patrakarita me jaane ka tha...B.E. ki degree complete karne k bad isi khetra me aaunga..aapka ashirwad chahta hoon!!!
ALOK,B.I.T,DURG

zealot said...

Ravish jee,
kafi din ke bad hindi aur wo bhi apne andaj main...
one room flat... Delhi , Babgalore ya hyderabad sabhi jagah ek jaise hain... Bihar ka rahne wala huun lekin kabhi Delhi nahi gaya ( ye alag bat hai ki 10-12 alag alag jagah pe apna basera bana chuka hun pichle 8 saloo main ).. apke ess post ne phir se bataya ki jagah badal jayenge lekin samaj , log aur unka rahne ka tarika ek hi jaisa hai...
apko ess post ke liye Dhanyawad!
Niel

manshes said...

जब आपने इसे लिखा होगा तो मेरे पास न तो लैपटॉप था और न ही इन्टरनेट लेकिन अब समय निकाल कर एक तरफ से आप का ब्लॉग पढ़ रहा हूँ......
आपने सबसे अच्छा लिखा या
मैंने सबसे अच्छा पढ़ लिया
लेकिन "वन-रूम सेट का रोमांस- दिल्ली मेरी जान(१) और पहले के भाग कहाँ हैं........