चलो चलते हैं मथुरा में किसन की रास देखेंगे
किसन की बांसुरी से जागता अहसास देखेंगे
कभी बांके बिहारी को कभी राधा को देखेंगे
कभी मीरा की आंखों में मिलन की प्यास देखेंगे
कन्हैया लाल की भक्ति की रस में डूब जायेंगे
सुबह से शाम तक श्यामल की हम अरदास देखेंगे
दुखों के बोझ ने जिनके कदम आने से रोके हैं
सलोने सांवरे को वह ह्रदय के पास देखेंगे
हम भारत देश की माटी को चूमेंगे सराहेंगे
मुनव्वर सा मनोहर का कहीं जो दास देखेंगे
धर्म का धन-जागरण- भगवती जागरण बनाम साईं जागरण
भगवती जागरण बल्कि सौवां विशाल भगवती जागरण हमेशा मेरे भीतर रहस्य पैदा करता रहा है। कुछ ईमानदार होते हैं जो लिखने में शर्माते नहीं कि उनका विशाल भगवती जागरण पांचवां है। लेकिन कोई भी अपने जागरण को विशाल से कम नहीं बताता। हर जागरण विशाल क्यों हैं,यह जानने की बेचैनी मुझे दिल्ली की सड़कों पर भटका देती है।
जागरण की दुनिया पर बहुत शोध हुए हैं। मज़दूर वर्ग और व्यापारियों का काम शाम को ही बंद होता था। उसी के बाद शाम की आरती,भजन-कीर्तन और जागरण के लिए स्पेस बनता था। हमारे शहरी जीवन में ये सब इसी तरह प्रवेश करते रहे हैं। लेकिन जागरण की दुनिया बदल गई है।
दिल्ली में होने वाले विशाल भगवती जागरणों की जगह माता की चौकी लेती जा रही है। भगवती जागरण काफी लंबा चलता है। रात के बारह बजे से लेकर सुबह तक। क्योंकि भगवती जागरण में तारा रानी की कथा सुनाई जाती है जो चार बजे सुबह के वक्त ही शुरू होती है। अब दिल्ली बदली है। शाइनिंग इंडिया का रूप बदला है तो सबको बदलने वाला टाइम भी बदल गया है। रिज़ल्ट ये आउट हुआ कि लोगों की दिलचस्पी समय की कमी के कारण भगवती जागरण में कम हुई है।
नतीजा जागरण अब भी विशाल तो कहे जाते हैं लेकिन इनका लघु रूप कुछ सालों से लांच हो चुका है। माता की चौकी। इस नाम से कोई सीरीयल भी है। मैंने आज माता की चौकी, जागरण करने वाले पंकज शर्मा जी से बात की। अधूरी रह गई। पूरी बात बाद में होगी लेकिन सोचा लिखता हूं। कच्चा पक्का। शर्मा जी ने बताया कि टाइम नहीं है जी। इसलिए माता की चौकी लगाते हैं। मैंने पूछा ये क्या है। बोले कि कुछ नहीं इसमें सिर्फ तारा रानी की कथा नहीं होती। माता की चौकी दो तीन घंटे में खत्म हो जाती है। ये आप छह से नौ, नौ से बारह या बारह से तीन के टाइम से करा सकते हैं। बिल्कुल सलीमा के शो की तरह। वाह।
मेरी दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी। मैंने अब नेट पर जागरण सर्च करना शुरू किया। भला हो गूगल का। देवी मंदिर डॉट कॉम पर पहुंच गया। इसमें माता की चौकी की कहानी कुछ यूं है दोस्तों। आप इस कथा की कैटगरी में आते हैं तो ज़रूर करवाइये। क्या पता आपका इसके ऊपर की कैटगरी में प्रमोशन हो जाए। ध्यान रखिये आप कितनी भी अमीर क्यों न हो गए हों फार्च्यून फाइव हंड्रेड में नहीं पहुंचे तो क्या खाक अमीर हुए।
तो कनाडा से चलने वाली साइट देवी मंदिर डॉट कॉम जी हमें बता रहे हैं। दुर्गा सप्तशती में लिखा है कि अगर लोग साल में एक बार माता की चौकी लगायें तो उन्हें धन मिलेगा,काबिल बच्चे होंगे और बाधाएं दूर हो जाएंगी। अब आगे बताया जा रहा है कि माता की चौकी कैसे करें। चार घंटे की पूजा होती है जो भगवती जागरण की तरह रात भर नहीं चलती है।
माता की चौकी के लिए हम उनको आमंत्रित करते हैं जो बेहतर सुर में माता जी को समर्पित भजन गाने में सक्षम हों। चूंकि हम सब को सुर नहीं मिला है इसलिए अच्छे गायकों से माहौल बनता है। भक्ति का माहौल। तभी मां का आशीर्वाद मिलेगा। ( धंधे का जुगाड़ हो गया न) दूसरा तरीका है दान के ज़रिये। बिना दान के हम बाधायें दूर नहीं कर सकते। वेदव्यास ने कहा है कि कलियुग में दान ही उत्तम है। रामचरितमानस में तुलसीदास ने कहा है कि कलियुग में दान ही उत्तम है। वाह। सब कलियुग के अधर्मी टाइम के लिए धर्म का रास्ता सुझा गए। ग्रेट। जब तक धर्म से रोजगार के अवसर पैदा होते हैं( अंधविश्वास को छोड़ कर) मुझे कोई खास प्रोब्लम नहीं है। इसके आगे धर्म को कुछ मानता भी नहीं। हमारी संस्कृति के कई हिस्सों को अपने इन कर्मकांडों के ज़रिये ढो कर यहां तक लाया है इसलिए एक वाहक के रूप में धर्म के प्रति थोड़ा बहुत रेसपेक्ट है।
लेकिन ध्यान रहे। यहां से एक और चेंज यानी बदलाव एंटर कर रहा है। साईं बाबा का जागरण। भगवती जागरण वालों की जितनी डिमांड नहीं है उतनी साई भजन वालों की है। आजकल दिल्ली में साईं भजन की डिमांड खूब है। एक जागरण गायक ने बताया कि फिफ्टी फिफ्टी है जी। काफी पोपुलर हो रहा है। रिज़न यानी कारण। जवाब मिला कि सूफी टाइप के कुछ भजन है जो परेशान लोगों को अच्छे लगते हैं। बाकी तो वही भजन है तो दुर्गा जी के हैं। उन्हीं मे जोड़-मोड़ कर साईं भजन बना देते हैं।
भजन की दुनिया बदल रही है। मेरी पड़ताल अधूरी है। जल्दी ही पूरी रपट प्रकाशित करूंगा। धर्म की दुनिया कर्मशियल होकर टैरिफिक हो जाती है। आई लाइक दिस वर्ल्ड। नॉट फॉर प्रेयर बट फॉर पर्पस।
जागरण की दुनिया पर बहुत शोध हुए हैं। मज़दूर वर्ग और व्यापारियों का काम शाम को ही बंद होता था। उसी के बाद शाम की आरती,भजन-कीर्तन और जागरण के लिए स्पेस बनता था। हमारे शहरी जीवन में ये सब इसी तरह प्रवेश करते रहे हैं। लेकिन जागरण की दुनिया बदल गई है।
दिल्ली में होने वाले विशाल भगवती जागरणों की जगह माता की चौकी लेती जा रही है। भगवती जागरण काफी लंबा चलता है। रात के बारह बजे से लेकर सुबह तक। क्योंकि भगवती जागरण में तारा रानी की कथा सुनाई जाती है जो चार बजे सुबह के वक्त ही शुरू होती है। अब दिल्ली बदली है। शाइनिंग इंडिया का रूप बदला है तो सबको बदलने वाला टाइम भी बदल गया है। रिज़ल्ट ये आउट हुआ कि लोगों की दिलचस्पी समय की कमी के कारण भगवती जागरण में कम हुई है।
नतीजा जागरण अब भी विशाल तो कहे जाते हैं लेकिन इनका लघु रूप कुछ सालों से लांच हो चुका है। माता की चौकी। इस नाम से कोई सीरीयल भी है। मैंने आज माता की चौकी, जागरण करने वाले पंकज शर्मा जी से बात की। अधूरी रह गई। पूरी बात बाद में होगी लेकिन सोचा लिखता हूं। कच्चा पक्का। शर्मा जी ने बताया कि टाइम नहीं है जी। इसलिए माता की चौकी लगाते हैं। मैंने पूछा ये क्या है। बोले कि कुछ नहीं इसमें सिर्फ तारा रानी की कथा नहीं होती। माता की चौकी दो तीन घंटे में खत्म हो जाती है। ये आप छह से नौ, नौ से बारह या बारह से तीन के टाइम से करा सकते हैं। बिल्कुल सलीमा के शो की तरह। वाह।
मेरी दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी। मैंने अब नेट पर जागरण सर्च करना शुरू किया। भला हो गूगल का। देवी मंदिर डॉट कॉम पर पहुंच गया। इसमें माता की चौकी की कहानी कुछ यूं है दोस्तों। आप इस कथा की कैटगरी में आते हैं तो ज़रूर करवाइये। क्या पता आपका इसके ऊपर की कैटगरी में प्रमोशन हो जाए। ध्यान रखिये आप कितनी भी अमीर क्यों न हो गए हों फार्च्यून फाइव हंड्रेड में नहीं पहुंचे तो क्या खाक अमीर हुए।
तो कनाडा से चलने वाली साइट देवी मंदिर डॉट कॉम जी हमें बता रहे हैं। दुर्गा सप्तशती में लिखा है कि अगर लोग साल में एक बार माता की चौकी लगायें तो उन्हें धन मिलेगा,काबिल बच्चे होंगे और बाधाएं दूर हो जाएंगी। अब आगे बताया जा रहा है कि माता की चौकी कैसे करें। चार घंटे की पूजा होती है जो भगवती जागरण की तरह रात भर नहीं चलती है।
माता की चौकी के लिए हम उनको आमंत्रित करते हैं जो बेहतर सुर में माता जी को समर्पित भजन गाने में सक्षम हों। चूंकि हम सब को सुर नहीं मिला है इसलिए अच्छे गायकों से माहौल बनता है। भक्ति का माहौल। तभी मां का आशीर्वाद मिलेगा। ( धंधे का जुगाड़ हो गया न) दूसरा तरीका है दान के ज़रिये। बिना दान के हम बाधायें दूर नहीं कर सकते। वेदव्यास ने कहा है कि कलियुग में दान ही उत्तम है। रामचरितमानस में तुलसीदास ने कहा है कि कलियुग में दान ही उत्तम है। वाह। सब कलियुग के अधर्मी टाइम के लिए धर्म का रास्ता सुझा गए। ग्रेट। जब तक धर्म से रोजगार के अवसर पैदा होते हैं( अंधविश्वास को छोड़ कर) मुझे कोई खास प्रोब्लम नहीं है। इसके आगे धर्म को कुछ मानता भी नहीं। हमारी संस्कृति के कई हिस्सों को अपने इन कर्मकांडों के ज़रिये ढो कर यहां तक लाया है इसलिए एक वाहक के रूप में धर्म के प्रति थोड़ा बहुत रेसपेक्ट है।
लेकिन ध्यान रहे। यहां से एक और चेंज यानी बदलाव एंटर कर रहा है। साईं बाबा का जागरण। भगवती जागरण वालों की जितनी डिमांड नहीं है उतनी साई भजन वालों की है। आजकल दिल्ली में साईं भजन की डिमांड खूब है। एक जागरण गायक ने बताया कि फिफ्टी फिफ्टी है जी। काफी पोपुलर हो रहा है। रिज़न यानी कारण। जवाब मिला कि सूफी टाइप के कुछ भजन है जो परेशान लोगों को अच्छे लगते हैं। बाकी तो वही भजन है तो दुर्गा जी के हैं। उन्हीं मे जोड़-मोड़ कर साईं भजन बना देते हैं।
भजन की दुनिया बदल रही है। मेरी पड़ताल अधूरी है। जल्दी ही पूरी रपट प्रकाशित करूंगा। धर्म की दुनिया कर्मशियल होकर टैरिफिक हो जाती है। आई लाइक दिस वर्ल्ड। नॉट फॉर प्रेयर बट फॉर पर्पस।
लव आज कल में शहर आज कल
इम्तियाज़ अली की फिल्म लव आज कल पसंद आई। बहुत दिनों बाद आई यह एक ऐसी फिल्म है जो शहरों से हमारे रिश्तों को जोड़ती है। हम सबके भीतर एक से ज़्यादा शहर होते हैं। एक से ज़्यादा मोहल्ले होते हैं। एक से ज़्यादा कहानी होती है। हम सब प्रवासी बटा अप्रवासी हैं। कहीं न कहीं से उजड़ कर कहीं न कहीं बसे हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में यह भी हुआ है कि नए शहर से हम सेंटिमेंटल रिश्ता नहीं बना सके। मुझे लगा कि इम्तियाज़ ने कैलिफोर्निया, सैनफ्रांसिस्को, कोलकाता और दिल्ली को ह्यूमनाइज़ यानी मानवीकरण किया है।
वो शहरों के अनजान कोनों और रास्तों पर जाकर अपनी कहानी गढ़ते हैं। एक गज़ब का कोलाज बनाते हैं कई शहरों के बीच। पिछले बीस साल में हिंदुस्तान में माइग्रेशन की प्रक्रिया काफी तेज़ हुई है। सिर्फ पंजाब ही विदेश नहीं गया। सिर्फ मज़दूर ही विदेश नहीं गए। बल्कि विदेश आने जाने वाला एक मध्यमवर्ग तैयार हुआ। यह एक शोध का विषय है कि कई शहरों में फ्लैट बदलते हुए इस तबके का शहर से रिश्ता बना या नहीं। उसकी यादों में ये शहर अपने बचपन के टाइम के मोहल्ले की तरह आते जाते रहे या नहीं।
हम सब शहर की समस्याओं को लेकर जूझते रहते हैं। कभी उसे रिश्ते की नज़र से नहीं देखा। जब भी मैं दक्षिण दिल्ली के गोबिन्दपुरी से गुज़रता हूं तो लगता है कि कोई अंदर खींच रहा है। १९९० से लेकर १९९३ का साल वहां गुजरा था। हमारे इलाके से आए कपड़ा मज़दूरों और किताबी मज़दूरो को मिक्स अप हो रहा था।
ढाबे में काम करने वाला गोरखपुर का वो शख्स(जिसका नाम याद नहीं) दाल में मटन का एक पीस डाल देता था। कहता था कहां पैसा है आपके पास। खा लीजिए आपको अच्छा लगता है। तो कभी मैं भी एक दो रुपये पूरी दरियादिली के साथ छोड़ आता था। सब मिलते थे तो गांव शहर का नाम पूछ कर खुश हो जाते थे। अब यह प्रक्रिया कम हो गई। क्योंकि अब मज़दूर और मैं दोनों शहर के लिए स्थायी हो गए। पहले किसी भोजपुरी भाषी को सुनता तो ज़रूर पूछता कि आप कहां के हैं। अब नहीं पूछता हूं। ऑटो वाले से पूछ लेता कि अच्छा बिहार के हो। अब नहीं पूछता। शायद इस शहर से अपने रिश्ते को समझ नहीं पाये।
इम्तियाज़ अली ने हमारे भीतर के कई शहरों को पकड़ लिया है। वो अपनी कहानी के पात्रों को तमाम गलियों मोहल्लों के नुक्कड़ों से भी ले जाते हैं और कैलिफोर्निया के अंडर पास और पैदलपाथ से भी। एक पुल किसी सुनहरे ख्वाब की तरह आता है तो पुराना किला की दीवारे ग्लैमरस हो जाती हैं। पुरातत्व को गैल्मराइज कर देते हैं और दीपिका को खूबसूरती से उस काम में ढाल कर बोरिंग विषय को सेक्सी बना देते हैं। पुरानी रेलगा़ड़ी और चमचमाची मेट्रो। ब्लैक कॉफी और काली चाय की कड़वाहट को मिला देते हैं। टैक्सी भी है और सेक्सी कार भी है। नया पुराना पानी में नमक की तरह घुलता जाता है। विज़ुअल आनंद मिलने लगता है।
इन सबके बीच पंजाब एक अनिवार्य तत्व के रूप मे मौजूद रहता है। पंजाब ने हमें कितनी खुशियां दी हैं। अपनी कहानियों से खुश रहने के तरीके दिये हैं। ये पंजाब ही कर सकता है। जितने गम और बंटवारों से पंजाब रौंदा गया है लेकिन इन सबसे अगर कोई दरियादिली के साथ निकला है तो वो पंजाब ही है।
अविनाश ने कहा कि इम्तियाज नए निर्देशकों की पौध में आते हैं। अच्छी फिल्में बनाते हैं। जिस तरह नया पुराना लव आज कल में आ जा रहा था लगा कि कोई है जो तेजी से बदले हिंदुस्तान में किसी संक्रमण काल की तरह मौजूद है। जो तमाम शहरों को अपना समझता है। मैं फिल्म देखते हुए यही सोच रहा था कि दिल्ली का कौन सा कोना है जिससे गुज़रते हुए मन रोमाटिंक होता है,नोस्ताल्जिक होता है। ऐसे तो बहुत हैं मगर क्या पता चलता है। इम्तियाज़ ने याद दिला दी।
वो शहरों के अनजान कोनों और रास्तों पर जाकर अपनी कहानी गढ़ते हैं। एक गज़ब का कोलाज बनाते हैं कई शहरों के बीच। पिछले बीस साल में हिंदुस्तान में माइग्रेशन की प्रक्रिया काफी तेज़ हुई है। सिर्फ पंजाब ही विदेश नहीं गया। सिर्फ मज़दूर ही विदेश नहीं गए। बल्कि विदेश आने जाने वाला एक मध्यमवर्ग तैयार हुआ। यह एक शोध का विषय है कि कई शहरों में फ्लैट बदलते हुए इस तबके का शहर से रिश्ता बना या नहीं। उसकी यादों में ये शहर अपने बचपन के टाइम के मोहल्ले की तरह आते जाते रहे या नहीं।
हम सब शहर की समस्याओं को लेकर जूझते रहते हैं। कभी उसे रिश्ते की नज़र से नहीं देखा। जब भी मैं दक्षिण दिल्ली के गोबिन्दपुरी से गुज़रता हूं तो लगता है कि कोई अंदर खींच रहा है। १९९० से लेकर १९९३ का साल वहां गुजरा था। हमारे इलाके से आए कपड़ा मज़दूरों और किताबी मज़दूरो को मिक्स अप हो रहा था।
ढाबे में काम करने वाला गोरखपुर का वो शख्स(जिसका नाम याद नहीं) दाल में मटन का एक पीस डाल देता था। कहता था कहां पैसा है आपके पास। खा लीजिए आपको अच्छा लगता है। तो कभी मैं भी एक दो रुपये पूरी दरियादिली के साथ छोड़ आता था। सब मिलते थे तो गांव शहर का नाम पूछ कर खुश हो जाते थे। अब यह प्रक्रिया कम हो गई। क्योंकि अब मज़दूर और मैं दोनों शहर के लिए स्थायी हो गए। पहले किसी भोजपुरी भाषी को सुनता तो ज़रूर पूछता कि आप कहां के हैं। अब नहीं पूछता हूं। ऑटो वाले से पूछ लेता कि अच्छा बिहार के हो। अब नहीं पूछता। शायद इस शहर से अपने रिश्ते को समझ नहीं पाये।
इम्तियाज़ अली ने हमारे भीतर के कई शहरों को पकड़ लिया है। वो अपनी कहानी के पात्रों को तमाम गलियों मोहल्लों के नुक्कड़ों से भी ले जाते हैं और कैलिफोर्निया के अंडर पास और पैदलपाथ से भी। एक पुल किसी सुनहरे ख्वाब की तरह आता है तो पुराना किला की दीवारे ग्लैमरस हो जाती हैं। पुरातत्व को गैल्मराइज कर देते हैं और दीपिका को खूबसूरती से उस काम में ढाल कर बोरिंग विषय को सेक्सी बना देते हैं। पुरानी रेलगा़ड़ी और चमचमाची मेट्रो। ब्लैक कॉफी और काली चाय की कड़वाहट को मिला देते हैं। टैक्सी भी है और सेक्सी कार भी है। नया पुराना पानी में नमक की तरह घुलता जाता है। विज़ुअल आनंद मिलने लगता है।
इन सबके बीच पंजाब एक अनिवार्य तत्व के रूप मे मौजूद रहता है। पंजाब ने हमें कितनी खुशियां दी हैं। अपनी कहानियों से खुश रहने के तरीके दिये हैं। ये पंजाब ही कर सकता है। जितने गम और बंटवारों से पंजाब रौंदा गया है लेकिन इन सबसे अगर कोई दरियादिली के साथ निकला है तो वो पंजाब ही है।
अविनाश ने कहा कि इम्तियाज नए निर्देशकों की पौध में आते हैं। अच्छी फिल्में बनाते हैं। जिस तरह नया पुराना लव आज कल में आ जा रहा था लगा कि कोई है जो तेजी से बदले हिंदुस्तान में किसी संक्रमण काल की तरह मौजूद है। जो तमाम शहरों को अपना समझता है। मैं फिल्म देखते हुए यही सोच रहा था कि दिल्ली का कौन सा कोना है जिससे गुज़रते हुए मन रोमाटिंक होता है,नोस्ताल्जिक होता है। ऐसे तो बहुत हैं मगर क्या पता चलता है। इम्तियाज़ ने याद दिला दी।
मां के हवाले से महात्मा गांधी
एक ठो छोटी चवन्नी चांदी का
जय जय बोलो महात्मा गांधी का
सन ५० से पहले मां ये गाना गाती थी। देवरिया पडरौना के आस पास के गांव में लोग गाते थे। मां कहती हैं कि यही दो पंक्तियां याद रह गईं हैं। गाना तो काफी लंबा है मगर भूल गई। लेकिन बचपन में हम सब खूब गाया करते थे। मां ने यह भी कहा कि आजकल लोग सोना नहीं लगाते। मैंने पूछा कि सोना क्या होता है तो कहा कि काग़ज़ में ग और ज के नीचे सोना लगता था। वाह। नुक्ता तब सोना होता था। मां बहुत गुस्से में है कि आजकल की पढ़ाई में सोना लगा कर कोई बोलता ही नहीं है। मेरी बेटी ने मां को अल्फाबेट पढ़ाना शुरू किया है। इंग्लिश आने से पहले स्कूल छूटा और फिर हम सबको पाल पोस कर बड़ा करने में वक्त बीता।
लेकिन गांधी जी पर यह कविता दिलचस्प लगी। मां जिस अंचल से हैं उसी अचंल से मशहूर इतिहासकार शाहिद अमीन हैं। उन्होंने इन इलाकों की स्मृतियों से चौरी चौरा और गांधी को ढूंढ कर एक शानदार किताब भी लिखी है। इवेंट मेटाफर एंड मेमोरी।
जय जय बोलो महात्मा गांधी का
सन ५० से पहले मां ये गाना गाती थी। देवरिया पडरौना के आस पास के गांव में लोग गाते थे। मां कहती हैं कि यही दो पंक्तियां याद रह गईं हैं। गाना तो काफी लंबा है मगर भूल गई। लेकिन बचपन में हम सब खूब गाया करते थे। मां ने यह भी कहा कि आजकल लोग सोना नहीं लगाते। मैंने पूछा कि सोना क्या होता है तो कहा कि काग़ज़ में ग और ज के नीचे सोना लगता था। वाह। नुक्ता तब सोना होता था। मां बहुत गुस्से में है कि आजकल की पढ़ाई में सोना लगा कर कोई बोलता ही नहीं है। मेरी बेटी ने मां को अल्फाबेट पढ़ाना शुरू किया है। इंग्लिश आने से पहले स्कूल छूटा और फिर हम सबको पाल पोस कर बड़ा करने में वक्त बीता।
लेकिन गांधी जी पर यह कविता दिलचस्प लगी। मां जिस अंचल से हैं उसी अचंल से मशहूर इतिहासकार शाहिद अमीन हैं। उन्होंने इन इलाकों की स्मृतियों से चौरी चौरा और गांधी को ढूंढ कर एक शानदार किताब भी लिखी है। इवेंट मेटाफर एंड मेमोरी।
मुर्गियों का गणतंत्र

मुर्गियों का यह रिपब्लिक दिल्ली के चित्तरंजन पार्क के मार्केट नंबर टू में है। पता नहीं इस गणतंत्र का संविधान और प्रावधान क्या है। परन्तु दुकानदारी कलाकारी का ही विस्तार है इसी की पुष्टि करता हुआ यह साइन बोर्ड दिलचस्प लगा। आज तक किसी ने इस आइडिया से मुर्गी नहीं बेची।
मैं कह रहा हूं यह समय कुछ और नहीं बल्कि आइडिया काल है। आइडिया युग। तरह तरह के आइडिया अवतरित हो रहे हैं। कमाल के टाइम में हम लोग रह रहे हैं। ऐश कीजिए। आइडिया दीजिए।
क्या आपका संघर्ष एक्सक्लूसिव है?
बहुत दिनों तक मुझे लगता रहा कि मैं संघर्ष कर रहा हूं। कई लोगों ने यकीन भी दिलाया कि हां कर रहे हो। दफ्तर में मेरे अलावा कई लोग आते हैं जो लगता है कि इसलिए आते हैं कि वे संघर्ष कर रहे हैं। इस तरह का भाव कई लोगों के चेहरे पर देखता हूं जो दफ्तरों के लिए निकल रहे होते हैं। तो लोगों ने मुझे ये कहा कि संघर्ष करते रहो। इसी के बाद तो अच्छा टाइम आएगा। मुझे लगा कि संघर्ष गुड और बैड टाइम के बीच का ट्रांज़िशन पीरियड है। संघर्ष संक्रमण काल है। तो करना होगा। सब लोग कर गए हैं तो तुम भी करो। मैंने कहा नो प्रोब्लम। कर दूंगा। लेकिन कुछ दिनों से मैं अपनी लाइफ में उस अच्छे टाइम को और संघर्ष को लोकेट करने की कोशिश कर रहा हूं। दोनों लापता हैं। बल्कि अब लगता है कि कभी थे ही नहीं।
संघर्ष एक मानसिक अवस्था है। इस मानसिक अवस्था से गुज़रते हुए हम अपने शारीरिक श्रम को महिमामंडित करते रहते हैं। हिंदी समाज के बृहत्तर हिस्से में संघर्ष एक काम है। गल्प है। डिस्कोर्स है।। एक टाइप का इल्यूज़न यानी माया है। हर दिन लाखों लोग संघर्ष कर रहे हैं। इसी झांसे में वे जीये जा रहे हैं।
इसकी पड़ताल होनी चाहिए कि हमने संघर्ष को कब अपने डिस्कोर्स का पार्ट बनाया। १८५७ के पहले से या फिर सत्रहवीं सदी से या फिर हड़प्पा काल से। अकबर का संघर्ष क्या था? मीरा बाई का संघर्ष क्या था? कहां से ये शब्द हमारे मानस में ट्रांसप्लांट हुआ है?
मूल ज्ञात नहीं है। ब्याज दर बढ़ती जा रही है। हर संघर्ष करने वाला धीरज को अपना टूल यानी उपकरण बनाता है। यहीं पर बजरंग बली भी एंटर करते हैं और बंगाली बाबा भी। फोन कर नौकरी मांगने की प्रक्रिया भी संघर्ष के कैटगरी में है। जंतर मंतर पर धरना भी संघर्ष है। रोज प्रिंसिपल से झगड़ कर क्लास लेना भी संघर्ष है। कहीं ऐसा तो नहीं कि जो क्रिया है वही संघर्ष है।
संघर्ष क्या है? किसी महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किया गया प्रयास व सैलरी प्राप्ति के लिए किया जाने वाला दैनिक कार्य? या व्यक्तिगत महत्वकांझा या दैनिक जीवन में राशन की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए तप? या फिर नैतिकता के सवाल पर इस्तीफा देकर सड़क पर आने के लिए किया गया कार्य या फिर बॉस की बात से ताव में आकर अहं को साबित करने के लिए दिया गया इस्तीफा?
हिंदी प्रदेश(मैं सिर्फ इसी ज्यूग्रोफिकल मेंटल ज़ोन को जानता हूं)में महान होने का लोड लिये कई लोगों ने मुझे ख़राब किया। जब मैं सामान्य था तो ठीक था। जब से महान बनाने की दुकान में ढकेला गया हूं मूड ख़राब रहता है। अब लगता है कि किसी गिरोह ने ये अहसास कराया कि मैं जिस दफ्तर में पचास रुपये दिहाड़ी पर चिट्ठी बांटता था, वहां रिपोर्टर हूं तो ये सब मेरे संघर्ष की बदौलत हुआ है। पहले एकाध बार खुश हो जाता था(हर बार नहीं) लेकिन अब सोचता हूं कि संघर्ष नहीं था। ये तो एक सिस्टम में घुसने और कहीं से निकल कर कहीं पहुंचने की एक धूर्त प्रक्रिया भर थी। तो क्या इस प्रक्रिया को संघर्ष कहा जा सकता है? क्या हिंदी प्रदेश के लोग बिना संघर्ष और उद्देश्य के जीने की आदत नहीं डाल सकते? हर काम में उपलब्धि क्यों टटोलते हैं?
क्या नौकरी में किये गये सारे प्रयास संघर्ष हैं? आम हिंदुस्तानियों के लिए नौकरी का अनुभव सिर्फ पचास साठ साल पुराना ही है। इससे पहले अंग्रेज़ों के टाइम में नौकरी का अनुभव सीमित लोगों को हासिल था। नौकरी सिस्टम में सबसे पहले ज़मींदार टाइप के लोग गए। कुछ ज़मींदार नौकरी को दुत्कारते रहे तो कुछ नौकरी से भाग कर आए तो उसे तीन नंबर का बताने में लगे रहे। अब ऐसी सामाजिक मानसिकता में जो नौकरी में टिक गया वो सामाजिक रूप से फंसा हुआ महसूस करने लगा होगा। फिर शुरू हुआ होगा अफसरी की महिमामंडन का दौर। फिर बताया जाने लगा होगा कि नौकरी में संघर्ष कर रहे हैं।
ये उसी टाइप का कांसेप्ट है जैसे आज कल का टाइम काफी खराब है। मैंने आज तक जीवन में कोई संघर्ष नहीं किया। काम किया जिसका पैसा मिला और ज़्यादा किया तो ज्यादा पाने की उम्मीद रही। साठ साल तक नौकरी करने की व्यवस्था सामाजिक रूप से विरासत में न मिली होती तो संघर्ष का यह मौका भी चला जाता। गांव में खेत जोतवा रहा होता। तो क्या वो भी संघर्ष कहलाता। आज कई लोग मुझे जुझारू बताने के लिए कहते हैं कि पत्रकारिता में आप ही हैं। लेकिन मैंने तो कभी पत्रकारिता के लिए कुछ नहीं किया। वेतन मिलने की जो शर्तें थीं उसे बस उसे ईमानदारी से निभाने की कोशिश करते रहता हूं। पेशेवर डिमांड को देखता हूं। कभी एक बार भी दिमाग में नहीं आया कि ये जो कर रहा हूं वो पत्रकारिता के लिए हैं। लेकिन जिनको पता नहीं था वो पूरे दावे के साथ बताते रहे कि हां पत्रकारिता के लिए ही तो कर रहे हो।
मैंने कई पत्रकारों को अपनी पीठ पर महानता और संघर्ष की ओवरलोडिंग किये हुए हाईवे पर दौड़ते देखा है। ये पत्रकार कांवड़ियों की टोली में डाक कावंड़िया जैसे दिखने की कोशिश करते हैं। जैसे वे रूक रूक कर नहीं दौड़ दौड़ तक पहुंचने में यकीन करते हैं। इस टेंशन में कइयों का हुलिया बेहद गंधाया हुआ हो जाता है। शक्ल सूरत जंगल की तरह हो जाती है और चिंतन एक मुद्रा की तरह शक्ल पर आसन जमा लेती है। टेंशन फ्री और लोड मुक्त कोई पत्रकार अच्छा या बुरा होने की कैटगरी में क्यों नहीं रह सकता? या तो वो महान है या फिर साधारण? या फिर संघर्ष कर रहा है? अगर कोई चैनल यह कह कर अपनी दुकान खोले कि आइये हमारे यहां पत्रकारिता का हर मानक होगा लेकिन सिर्फ चाय मिलेगी तो सबसे पहले उस चैनल को लात मारने वाला मैं रहूंगा। बाकियों की नैतिक पराकाष्ठा के बारे में मैं टिप्पणी नहीं कर सकता। आज तक मैंने कोई त्याग नहीं किया है। अब सवाल एक और है। जब त्याग ही नहीं किया तो संघर्ष कम्पलीट कैसे हो गया? इसका जवाब यह है कि मैंने कभी संघर्ष नहीं किया।
क्या हर संघर्ष महान होता है? क्या संघर्ष एक दुकान है वैसे ही जैसे हिंदी पत्रकारिता से लेकर साहित्य तक में महान होना एक परचून की दुकान है। क्या आप भी कुछ संघर्ष कर रहे हैं? क्यों कर रहे हैं? फ्री में कर रहे हैं या सैलरी के लिए कर रहे हैं? फिर जब ये सारा संघर्ष ही है तो काम क्या है? ज़िम्मेदारी क्या है? संघर्ष सामाजिक सामूहिक अनुभव नहीं हो सकता। कभी कभी हो सकता है लेकिन दाल भात की तरह नहीं हो सकता। अगर सब संघर्ष कर रहे रहे हैं तो मेरा संघर्ष कैसे एक्सक्लूसिव होगा। उसी के जैसा होगा तो मुझे वैसे ही संघर्ष नहीं करना है। संघर्ष एक्सक्लूसिव होना चाहिए। कलेक्टिव नहीं। फिर भी इतना लिखने के बाद मैं संघर्ष को डिफाइन नहीं कर पा रहा हूं। आप कर दीजिए न। मैं भी साठ साल पूरे होने से पहले एक बार संघर्ष करना चाहता हूं। आखिर मैं रहता तो हिंदी रीजन में न। बिना संघर्ष के मेरी पहचान डाइल्यूट हो जाएगी। प्लीज़। हेल्प मी। आई वांट टू स्ट्रगल।
संघर्ष एक मानसिक अवस्था है। इस मानसिक अवस्था से गुज़रते हुए हम अपने शारीरिक श्रम को महिमामंडित करते रहते हैं। हिंदी समाज के बृहत्तर हिस्से में संघर्ष एक काम है। गल्प है। डिस्कोर्स है।। एक टाइप का इल्यूज़न यानी माया है। हर दिन लाखों लोग संघर्ष कर रहे हैं। इसी झांसे में वे जीये जा रहे हैं।
इसकी पड़ताल होनी चाहिए कि हमने संघर्ष को कब अपने डिस्कोर्स का पार्ट बनाया। १८५७ के पहले से या फिर सत्रहवीं सदी से या फिर हड़प्पा काल से। अकबर का संघर्ष क्या था? मीरा बाई का संघर्ष क्या था? कहां से ये शब्द हमारे मानस में ट्रांसप्लांट हुआ है?
मूल ज्ञात नहीं है। ब्याज दर बढ़ती जा रही है। हर संघर्ष करने वाला धीरज को अपना टूल यानी उपकरण बनाता है। यहीं पर बजरंग बली भी एंटर करते हैं और बंगाली बाबा भी। फोन कर नौकरी मांगने की प्रक्रिया भी संघर्ष के कैटगरी में है। जंतर मंतर पर धरना भी संघर्ष है। रोज प्रिंसिपल से झगड़ कर क्लास लेना भी संघर्ष है। कहीं ऐसा तो नहीं कि जो क्रिया है वही संघर्ष है।
संघर्ष क्या है? किसी महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किया गया प्रयास व सैलरी प्राप्ति के लिए किया जाने वाला दैनिक कार्य? या व्यक्तिगत महत्वकांझा या दैनिक जीवन में राशन की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए तप? या फिर नैतिकता के सवाल पर इस्तीफा देकर सड़क पर आने के लिए किया गया कार्य या फिर बॉस की बात से ताव में आकर अहं को साबित करने के लिए दिया गया इस्तीफा?
हिंदी प्रदेश(मैं सिर्फ इसी ज्यूग्रोफिकल मेंटल ज़ोन को जानता हूं)में महान होने का लोड लिये कई लोगों ने मुझे ख़राब किया। जब मैं सामान्य था तो ठीक था। जब से महान बनाने की दुकान में ढकेला गया हूं मूड ख़राब रहता है। अब लगता है कि किसी गिरोह ने ये अहसास कराया कि मैं जिस दफ्तर में पचास रुपये दिहाड़ी पर चिट्ठी बांटता था, वहां रिपोर्टर हूं तो ये सब मेरे संघर्ष की बदौलत हुआ है। पहले एकाध बार खुश हो जाता था(हर बार नहीं) लेकिन अब सोचता हूं कि संघर्ष नहीं था। ये तो एक सिस्टम में घुसने और कहीं से निकल कर कहीं पहुंचने की एक धूर्त प्रक्रिया भर थी। तो क्या इस प्रक्रिया को संघर्ष कहा जा सकता है? क्या हिंदी प्रदेश के लोग बिना संघर्ष और उद्देश्य के जीने की आदत नहीं डाल सकते? हर काम में उपलब्धि क्यों टटोलते हैं?
क्या नौकरी में किये गये सारे प्रयास संघर्ष हैं? आम हिंदुस्तानियों के लिए नौकरी का अनुभव सिर्फ पचास साठ साल पुराना ही है। इससे पहले अंग्रेज़ों के टाइम में नौकरी का अनुभव सीमित लोगों को हासिल था। नौकरी सिस्टम में सबसे पहले ज़मींदार टाइप के लोग गए। कुछ ज़मींदार नौकरी को दुत्कारते रहे तो कुछ नौकरी से भाग कर आए तो उसे तीन नंबर का बताने में लगे रहे। अब ऐसी सामाजिक मानसिकता में जो नौकरी में टिक गया वो सामाजिक रूप से फंसा हुआ महसूस करने लगा होगा। फिर शुरू हुआ होगा अफसरी की महिमामंडन का दौर। फिर बताया जाने लगा होगा कि नौकरी में संघर्ष कर रहे हैं।
ये उसी टाइप का कांसेप्ट है जैसे आज कल का टाइम काफी खराब है। मैंने आज तक जीवन में कोई संघर्ष नहीं किया। काम किया जिसका पैसा मिला और ज़्यादा किया तो ज्यादा पाने की उम्मीद रही। साठ साल तक नौकरी करने की व्यवस्था सामाजिक रूप से विरासत में न मिली होती तो संघर्ष का यह मौका भी चला जाता। गांव में खेत जोतवा रहा होता। तो क्या वो भी संघर्ष कहलाता। आज कई लोग मुझे जुझारू बताने के लिए कहते हैं कि पत्रकारिता में आप ही हैं। लेकिन मैंने तो कभी पत्रकारिता के लिए कुछ नहीं किया। वेतन मिलने की जो शर्तें थीं उसे बस उसे ईमानदारी से निभाने की कोशिश करते रहता हूं। पेशेवर डिमांड को देखता हूं। कभी एक बार भी दिमाग में नहीं आया कि ये जो कर रहा हूं वो पत्रकारिता के लिए हैं। लेकिन जिनको पता नहीं था वो पूरे दावे के साथ बताते रहे कि हां पत्रकारिता के लिए ही तो कर रहे हो।
मैंने कई पत्रकारों को अपनी पीठ पर महानता और संघर्ष की ओवरलोडिंग किये हुए हाईवे पर दौड़ते देखा है। ये पत्रकार कांवड़ियों की टोली में डाक कावंड़िया जैसे दिखने की कोशिश करते हैं। जैसे वे रूक रूक कर नहीं दौड़ दौड़ तक पहुंचने में यकीन करते हैं। इस टेंशन में कइयों का हुलिया बेहद गंधाया हुआ हो जाता है। शक्ल सूरत जंगल की तरह हो जाती है और चिंतन एक मुद्रा की तरह शक्ल पर आसन जमा लेती है। टेंशन फ्री और लोड मुक्त कोई पत्रकार अच्छा या बुरा होने की कैटगरी में क्यों नहीं रह सकता? या तो वो महान है या फिर साधारण? या फिर संघर्ष कर रहा है? अगर कोई चैनल यह कह कर अपनी दुकान खोले कि आइये हमारे यहां पत्रकारिता का हर मानक होगा लेकिन सिर्फ चाय मिलेगी तो सबसे पहले उस चैनल को लात मारने वाला मैं रहूंगा। बाकियों की नैतिक पराकाष्ठा के बारे में मैं टिप्पणी नहीं कर सकता। आज तक मैंने कोई त्याग नहीं किया है। अब सवाल एक और है। जब त्याग ही नहीं किया तो संघर्ष कम्पलीट कैसे हो गया? इसका जवाब यह है कि मैंने कभी संघर्ष नहीं किया।
क्या हर संघर्ष महान होता है? क्या संघर्ष एक दुकान है वैसे ही जैसे हिंदी पत्रकारिता से लेकर साहित्य तक में महान होना एक परचून की दुकान है। क्या आप भी कुछ संघर्ष कर रहे हैं? क्यों कर रहे हैं? फ्री में कर रहे हैं या सैलरी के लिए कर रहे हैं? फिर जब ये सारा संघर्ष ही है तो काम क्या है? ज़िम्मेदारी क्या है? संघर्ष सामाजिक सामूहिक अनुभव नहीं हो सकता। कभी कभी हो सकता है लेकिन दाल भात की तरह नहीं हो सकता। अगर सब संघर्ष कर रहे रहे हैं तो मेरा संघर्ष कैसे एक्सक्लूसिव होगा। उसी के जैसा होगा तो मुझे वैसे ही संघर्ष नहीं करना है। संघर्ष एक्सक्लूसिव होना चाहिए। कलेक्टिव नहीं। फिर भी इतना लिखने के बाद मैं संघर्ष को डिफाइन नहीं कर पा रहा हूं। आप कर दीजिए न। मैं भी साठ साल पूरे होने से पहले एक बार संघर्ष करना चाहता हूं। आखिर मैं रहता तो हिंदी रीजन में न। बिना संघर्ष के मेरी पहचान डाइल्यूट हो जाएगी। प्लीज़। हेल्प मी। आई वांट टू स्ट्रगल।
चीरहरण टॉयलेट पेपर

हम आइडिया काल में जी रहे हैं। www.designtemplestore.com क्लिक किया तो चीरहरण टॉयलेट पेपर दिखा। लिखा है कि यह हैंड ग्रैबिंग टॉयलेट पेपर दुष्ट राजा दुर्योधन से प्रेरित है जिसने चीरहरण यानी साड़ी उतारने का आदेश दिया। यह घटना 4.B.C की है। वो साड़ी कभी खुल नहीं सकी। उसका कोई अंत नहीं था। ये टॉयलेट पेपर भी कभी खत्म नहीं होगा। आप देख ही रहे हैं कि दुर्योधन जी मूंछ ताने किसी मॉडल टाइप खड़े हैं। इस साइट पर तमाम चीज़ों को अलग नज़रिये से पेश किया गया है। काफी दिलचस्प है। दुकान दिल्ली में है।
गोबर-हमारे टाइम का सबसे बड़ा आइडिया
सीन-एक
लम्पटर्जुन- हे देव। कुरुक्षेत्र में तटस्थ रहते हुए किसी पत्रकार की तरह देश-दुनिया की चिंता में डूबे रह कर तीर चला सकते हैं।
देव- लम्पटर्जुन। तुम तीर चला दो। चिंता करना तुम्हारा काम नहीं। आत्मा का डिपार्टमेंट अलग है और चित्त का अलग। दोनों में कैम्युनिकेसन गैप होता है। तुम बस दागते जाओ। क्रिटिक से मत डरो। क्रिटिक हमला करेगा। तुम गिरगिट की तरह रंग बदलो। युद्ध करो।
लम्पटर्जुन- क्या युद्ध के मैदान में कुछ देर के लिए कविता कर सकता हूं। भेजा फ्राइ हो रहा है। कपार भन्न भन्न कर रहा है। कुछ लिख दें देव। तीर चलते रहेगा। ऑटोमेटेड वाण खरीद दिये हैं भैया युद्धिष्ठिर। चीन से लाए हैं।
देव- लिखो। तुम युद्ध के मैदान से कविता रचोगे तो गोबर निकलेगा।
लम्पटर्जुन- गोबर को अइसन वइसन बुझे हैं का। क्रिटिक आउर आप दोनों को नहीं मालूम। ज्ञान झा़ड़ना बंद कीजिए। हमारा इंस्टेंट महाकाव्य सुनिये।
सीन-दो
गोबर
हमारे टाइम का सबसे बड़ा आइडिया
हगने के तुरंत बाद नरम रहता है
सूखने पर सख्त हो जाता है
जब यह नदी गंगा सूख जाएगी एक दिन
उसकी तलछटी को गोबर से ही लीपा जाएगा
रेमण्ड के सूट में पन्डी जी,ग्ल्ब्स पहिन कर
बिसलेरी के पानी को अंजुरी में भर कर
छिड़क देंगे तलछटी पर
यही सीन सीधा कैमरे में घुस कर
ड्राइंग रूम में टीवी फाड़ कर करोड़ों दर्शकों के घर में उतर जाएगा
एग्झीक्यूटिव हो चुका एक बड़ा पत्रकार कमेंट करेगा
गोबर लीप कर भारत के पीएम ने एक नदी का अंतिम संस्कार कर दिया है
चलिये आप लोग जाइये,इतिहास बन चुका है,आप लंच कर लीजिएगा
गोबर
हमारे टाइम की सबसे बड़ी ख़बर है
भिन्नाती हुई मक्खियों का स्वर्ग है
मच्छरों को भगाने का कारगर मंत्र है
तभी तो पाथ पाथ कर हर ख़बर को दिन भर
टीवी स्क्रीन पर गोइठा सूखाया जाता है
और कहां पथेगा गोबर
न नदी बची न बचे हैं फुटपाथ
अतिक्रमण के इस दौर में गोबर के लिए जगह है
तो सिर्फ पत्रकारों के कपार के भीतर बनी गौशाला में
ख़बरों में आज भी बचा हुआ है गोबर
जिस देश में गंगा तक नहीं टिक सकी
वहां टिका है गोबर
हमारे टाइम का सबसे बड़ा आइडिया बनकर
पाश की रचनाओं पर लीपने पोतने के काम गोबर ही आता है
सपनो के मर जाने के इस ख़तरनाक दौर में
अंत्येष्टि का सामान है गोबर
कुरुक्षेत्र से लौट कर पत्रकार ने लीप पोत लिया खुद को गोबर से
गंगा से बेसी टाइम के लिए बचे रहने के लिए
किसी समय के निरपेक्ष इस समय में
कौंतेय के अधकचरे ज्ञान के झांसे से बचकर
गोबर में सब तर हो रहे हैं
आइडिया की तरह ज़मीन पर गिरते हैं
बाद में कलेंडर की तरह दीवार पर सूखते रहते हैं
रेटिंग की तारीखों में छुप छुप कर झूलते रहते हैं
पत्रकारों की अहमियत क्या है
मृत्यु शैय्या पर लेटे लेटे भीष्म ने उत्तर दिया है
कहा वे सिर्फ गोबर हैं
लीपने-पोतने के काम ही आएंगे
इतिहास की तारीखों को कीटनाशकों से बचाकर
स्मृतियों में अमर करते रहने के लिए
उनका एक ही काम है
चरना और हगना
जो गिरेगा वो नरम होगा
जो सूखेगा वो गोइंठा होगा
मूल्यांकन काल के इस विकराल टाइम में
गोबर एक टिकाऊ और बिकाऊ आइडिया है
अच्छी तरह सान कर पाथ दो स्क्रीन पर
कुछ ब्रेक से पहले सूखेगा
कुछ ब्रेक के बाद सूखेगा
गुलाल फिल्म के गानों की आइरनी की तरह
मोबाइल के टावर से टकरा कर वेवलेंथ के सहारे
पत्रकारों की वाणी पहुंचेगी आपकी अवेयरनेस तंत्रिकाओं में
तभी तुम गंगा को प्रणाम करना
पत्रकारों को तुम नहीं बचा सकी
गोबर ने बचाया है
तभी तो
गोबर
हमारे टाइम का सबसे बड़ा आइडिया है
तभी तो कहता हूं देव
धंस जाइये गोबर में
धंसते जाइये
खबरों को दांत पीस कर कचर मचर कर
पढ़ते जाइये
मुंड को झटकिये
थूथना फूला दीजिए बेलून की तरह
इस देश को बचना है तो
एसएमएस करना ही होगा
ज्योतिष की रंगशालाओं में आज के दिन के लिए
नतमस्तक होना ही होगा
लेकिन जो नहीं करेगा उसका क्या
उसे भी गोबर से लीप कर बचा लिया जाएगा
किसी रविवार को आइडिया की तरह चला देने के लिए
वर्ना किसी एक दिन
टीवी के स्क्रीन से जब गोबर सूख कर गिरेगा
घर में बदबू की तरह फैल जाएगा
हमारे टाइम का सबसे बड़ा आइडिया
सीन-३
लम्पटर्जुन- देव आय मीन कौंतेय। गांडीव ले जाओ। कुरुक्षेत्र की लड़ाई का नतीजा सिर्फ तुम्हारे हक में है। मैं कंवींस नहीं हूं। हज़ारों साल बाद आज अपने टाइम में देख रहा हूं। गीता बिना कापीराइट के बिक रही है। कई पब्लिसर पइसा बना रहे हैं। जीतने के बाद मुझे स्वर्ग भेज दिया गया। नैतिकता का पाखंड रच कर पार्थ तुमने मुझे हथियार बनाया है। मैं अपने भाइयों को काटता रहा और तुम उपदेशों का ब्लॉग रचते रहे। रेलवे स्टेशनों पर बिकने के लिए। तुम्हारे संदेश सिर्फ हारे हुओं की दुकानदारी बढ़ाते हैं। दावा करो,कौंतेय,क्या तुमने जीत का कोई मानक तय किया है। मैं तुम्हारा पात्र नहीं हूं। मैं कुरुक्षेत्र से जाना चाहता हूं। मैं तुम्हारे किसी भी प्लॉट का हिस्सा नहीं बनना चाहता। तुम्हारी लड़ाई व्यर्थ है। सेमिनारों में चर्चा के लिए की जाने वाली लड़ाइयां हम सबको निहत्था करती हैं। टी ब्रेक का बिस्कुट तुम भकोसो न,कौंतेय। मैं तो बन खाता हूं। बटर लगा के। पूरा खानदान साफ करा के तुमने हासिल क्या किया। अर्जुन पुरस्कार के अलावा मैं और किस काम आता हूं।
भीष्म- अरे लम्पटर्जुन। तुम तो सिर्फ कौंतेय के आइडिया पर चल रहे थे। जो उपदेश देगा किताब उसी की बिकेगी।
लम्पटर्जुन- भीष्म और कौंतेय। मैं जा रहा हूं। गोबर का लिजलिजा सिलसिला जारी रहेगा। तुम बिना कापीराइट के लेखक हो। मैं कोई और लड़ाई लड़ूंगा। गोबर पाथ कर काउडंग केक क्यों बनाऊ मैं। गंगा मिट जाये तो मेरी बला से। ख़बरों को कबर में गाड़ दिया जाए मेरी बला से। पाथो पाथो कौंतेय, तुम भी तो गोबर पाथो। मैं तो चला बरिस्ता। कॉफी और ब्राउनी के साथ मस्ती करूंगा। काव्य लिखूंगा। सत्या क्या है। आत्मा क्या है। फटीचर सिद्धांत रच कर नोबल जीतूंगा। तुम करो न ख़बरों की दुकानदारी। देश क्या ख़बरों के बाद चलता है? फुट...कुरुक्षेत्र इवेंट मैनेजमेंट की लड़ाई है। द्रोपदी का चीरहरण झूठ था। मैं ग्राफिक्स एनिमेशन के झांसे में आ गया। जा रहा हूं चौपाटी। लाइन मारूंगा। थिंक पोज़िटिव एक किताब लिखूंगा। दुनिया के सबसे बड़े सिनिक का फारवर्ड होगा। सोच को बदल दूंगा। देखना। टीवी पर आएगा। लाइव।
पटाक्षेप।
लम्पटर्जुन- हे देव। कुरुक्षेत्र में तटस्थ रहते हुए किसी पत्रकार की तरह देश-दुनिया की चिंता में डूबे रह कर तीर चला सकते हैं।
देव- लम्पटर्जुन। तुम तीर चला दो। चिंता करना तुम्हारा काम नहीं। आत्मा का डिपार्टमेंट अलग है और चित्त का अलग। दोनों में कैम्युनिकेसन गैप होता है। तुम बस दागते जाओ। क्रिटिक से मत डरो। क्रिटिक हमला करेगा। तुम गिरगिट की तरह रंग बदलो। युद्ध करो।
लम्पटर्जुन- क्या युद्ध के मैदान में कुछ देर के लिए कविता कर सकता हूं। भेजा फ्राइ हो रहा है। कपार भन्न भन्न कर रहा है। कुछ लिख दें देव। तीर चलते रहेगा। ऑटोमेटेड वाण खरीद दिये हैं भैया युद्धिष्ठिर। चीन से लाए हैं।
देव- लिखो। तुम युद्ध के मैदान से कविता रचोगे तो गोबर निकलेगा।
लम्पटर्जुन- गोबर को अइसन वइसन बुझे हैं का। क्रिटिक आउर आप दोनों को नहीं मालूम। ज्ञान झा़ड़ना बंद कीजिए। हमारा इंस्टेंट महाकाव्य सुनिये।
सीन-दो
गोबर
हमारे टाइम का सबसे बड़ा आइडिया
हगने के तुरंत बाद नरम रहता है
सूखने पर सख्त हो जाता है
जब यह नदी गंगा सूख जाएगी एक दिन
उसकी तलछटी को गोबर से ही लीपा जाएगा
रेमण्ड के सूट में पन्डी जी,ग्ल्ब्स पहिन कर
बिसलेरी के पानी को अंजुरी में भर कर
छिड़क देंगे तलछटी पर
यही सीन सीधा कैमरे में घुस कर
ड्राइंग रूम में टीवी फाड़ कर करोड़ों दर्शकों के घर में उतर जाएगा
एग्झीक्यूटिव हो चुका एक बड़ा पत्रकार कमेंट करेगा
गोबर लीप कर भारत के पीएम ने एक नदी का अंतिम संस्कार कर दिया है
चलिये आप लोग जाइये,इतिहास बन चुका है,आप लंच कर लीजिएगा
गोबर
हमारे टाइम की सबसे बड़ी ख़बर है
भिन्नाती हुई मक्खियों का स्वर्ग है
मच्छरों को भगाने का कारगर मंत्र है
तभी तो पाथ पाथ कर हर ख़बर को दिन भर
टीवी स्क्रीन पर गोइठा सूखाया जाता है
और कहां पथेगा गोबर
न नदी बची न बचे हैं फुटपाथ
अतिक्रमण के इस दौर में गोबर के लिए जगह है
तो सिर्फ पत्रकारों के कपार के भीतर बनी गौशाला में
ख़बरों में आज भी बचा हुआ है गोबर
जिस देश में गंगा तक नहीं टिक सकी
वहां टिका है गोबर
हमारे टाइम का सबसे बड़ा आइडिया बनकर
पाश की रचनाओं पर लीपने पोतने के काम गोबर ही आता है
सपनो के मर जाने के इस ख़तरनाक दौर में
अंत्येष्टि का सामान है गोबर
कुरुक्षेत्र से लौट कर पत्रकार ने लीप पोत लिया खुद को गोबर से
गंगा से बेसी टाइम के लिए बचे रहने के लिए
किसी समय के निरपेक्ष इस समय में
कौंतेय के अधकचरे ज्ञान के झांसे से बचकर
गोबर में सब तर हो रहे हैं
आइडिया की तरह ज़मीन पर गिरते हैं
बाद में कलेंडर की तरह दीवार पर सूखते रहते हैं
रेटिंग की तारीखों में छुप छुप कर झूलते रहते हैं
पत्रकारों की अहमियत क्या है
मृत्यु शैय्या पर लेटे लेटे भीष्म ने उत्तर दिया है
कहा वे सिर्फ गोबर हैं
लीपने-पोतने के काम ही आएंगे
इतिहास की तारीखों को कीटनाशकों से बचाकर
स्मृतियों में अमर करते रहने के लिए
उनका एक ही काम है
चरना और हगना
जो गिरेगा वो नरम होगा
जो सूखेगा वो गोइंठा होगा
मूल्यांकन काल के इस विकराल टाइम में
गोबर एक टिकाऊ और बिकाऊ आइडिया है
अच्छी तरह सान कर पाथ दो स्क्रीन पर
कुछ ब्रेक से पहले सूखेगा
कुछ ब्रेक के बाद सूखेगा
गुलाल फिल्म के गानों की आइरनी की तरह
मोबाइल के टावर से टकरा कर वेवलेंथ के सहारे
पत्रकारों की वाणी पहुंचेगी आपकी अवेयरनेस तंत्रिकाओं में
तभी तुम गंगा को प्रणाम करना
पत्रकारों को तुम नहीं बचा सकी
गोबर ने बचाया है
तभी तो
गोबर
हमारे टाइम का सबसे बड़ा आइडिया है
तभी तो कहता हूं देव
धंस जाइये गोबर में
धंसते जाइये
खबरों को दांत पीस कर कचर मचर कर
पढ़ते जाइये
मुंड को झटकिये
थूथना फूला दीजिए बेलून की तरह
इस देश को बचना है तो
एसएमएस करना ही होगा
ज्योतिष की रंगशालाओं में आज के दिन के लिए
नतमस्तक होना ही होगा
लेकिन जो नहीं करेगा उसका क्या
उसे भी गोबर से लीप कर बचा लिया जाएगा
किसी रविवार को आइडिया की तरह चला देने के लिए
वर्ना किसी एक दिन
टीवी के स्क्रीन से जब गोबर सूख कर गिरेगा
घर में बदबू की तरह फैल जाएगा
हमारे टाइम का सबसे बड़ा आइडिया
सीन-३
लम्पटर्जुन- देव आय मीन कौंतेय। गांडीव ले जाओ। कुरुक्षेत्र की लड़ाई का नतीजा सिर्फ तुम्हारे हक में है। मैं कंवींस नहीं हूं। हज़ारों साल बाद आज अपने टाइम में देख रहा हूं। गीता बिना कापीराइट के बिक रही है। कई पब्लिसर पइसा बना रहे हैं। जीतने के बाद मुझे स्वर्ग भेज दिया गया। नैतिकता का पाखंड रच कर पार्थ तुमने मुझे हथियार बनाया है। मैं अपने भाइयों को काटता रहा और तुम उपदेशों का ब्लॉग रचते रहे। रेलवे स्टेशनों पर बिकने के लिए। तुम्हारे संदेश सिर्फ हारे हुओं की दुकानदारी बढ़ाते हैं। दावा करो,कौंतेय,क्या तुमने जीत का कोई मानक तय किया है। मैं तुम्हारा पात्र नहीं हूं। मैं कुरुक्षेत्र से जाना चाहता हूं। मैं तुम्हारे किसी भी प्लॉट का हिस्सा नहीं बनना चाहता। तुम्हारी लड़ाई व्यर्थ है। सेमिनारों में चर्चा के लिए की जाने वाली लड़ाइयां हम सबको निहत्था करती हैं। टी ब्रेक का बिस्कुट तुम भकोसो न,कौंतेय। मैं तो बन खाता हूं। बटर लगा के। पूरा खानदान साफ करा के तुमने हासिल क्या किया। अर्जुन पुरस्कार के अलावा मैं और किस काम आता हूं।
भीष्म- अरे लम्पटर्जुन। तुम तो सिर्फ कौंतेय के आइडिया पर चल रहे थे। जो उपदेश देगा किताब उसी की बिकेगी।
लम्पटर्जुन- भीष्म और कौंतेय। मैं जा रहा हूं। गोबर का लिजलिजा सिलसिला जारी रहेगा। तुम बिना कापीराइट के लेखक हो। मैं कोई और लड़ाई लड़ूंगा। गोबर पाथ कर काउडंग केक क्यों बनाऊ मैं। गंगा मिट जाये तो मेरी बला से। ख़बरों को कबर में गाड़ दिया जाए मेरी बला से। पाथो पाथो कौंतेय, तुम भी तो गोबर पाथो। मैं तो चला बरिस्ता। कॉफी और ब्राउनी के साथ मस्ती करूंगा। काव्य लिखूंगा। सत्या क्या है। आत्मा क्या है। फटीचर सिद्धांत रच कर नोबल जीतूंगा। तुम करो न ख़बरों की दुकानदारी। देश क्या ख़बरों के बाद चलता है? फुट...कुरुक्षेत्र इवेंट मैनेजमेंट की लड़ाई है। द्रोपदी का चीरहरण झूठ था। मैं ग्राफिक्स एनिमेशन के झांसे में आ गया। जा रहा हूं चौपाटी। लाइन मारूंगा। थिंक पोज़िटिव एक किताब लिखूंगा। दुनिया के सबसे बड़े सिनिक का फारवर्ड होगा। सोच को बदल दूंगा। देखना। टीवी पर आएगा। लाइव।
पटाक्षेप।
राम का टेढ़ा मार्ग

( यह तस्वीर दक्षिण दिल्ली के मूलचंद फ्लाइओवर के नीचे ली गई है। आप जब आश्रम की तरफ से मूलचंद आते हैं तो फ्लाइओवर के नीचे से बायीं तरफ चिराग दिल्ली जाने के लिए मुड़ते हैं। मोड़ से कुछ मीटर पहले श्रीरामशरणम करके एक संस्था लोकप्रिय होती जा रही है। शनिवार और रविवार को काफी भीड़ रहती है। इस साइनबोर्ड पर एक साल से नज़र थी। आज कार रोकी और मोबाइल से तस्वीर ले ली। समझ में नहीं आया कि सीधी सड़क के किनारे बने रामशरणम स्थल तक पहुंचाने वाले इस बोर्ड में तीर के निशान में मोड़ क्यों हैं। शायद राम तक पहुंचने का रास्ता टेढ़ा होगा)
ये कश्मीर है-२
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