क्या आपका संघर्ष एक्सक्लूसिव है?

बहुत दिनों तक मुझे लगता रहा कि मैं संघर्ष कर रहा हूं। कई लोगों ने यकीन भी दिलाया कि हां कर रहे हो। दफ्तर में मेरे अलावा कई लोग आते हैं जो लगता है कि इसलिए आते हैं कि वे संघर्ष कर रहे हैं। इस तरह का भाव कई लोगों के चेहरे पर देखता हूं जो दफ्तरों के लिए निकल रहे होते हैं। तो लोगों ने मुझे ये कहा कि संघर्ष करते रहो। इसी के बाद तो अच्छा टाइम आएगा। मुझे लगा कि संघर्ष गुड और बैड टाइम के बीच का ट्रांज़िशन पीरियड है। संघर्ष संक्रमण काल है। तो करना होगा। सब लोग कर गए हैं तो तुम भी करो। मैंने कहा नो प्रोब्लम। कर दूंगा। लेकिन कुछ दिनों से मैं अपनी लाइफ में उस अच्छे टाइम को और संघर्ष को लोकेट करने की कोशिश कर रहा हूं। दोनों लापता हैं। बल्कि अब लगता है कि कभी थे ही नहीं।

संघर्ष एक मानसिक अवस्था है। इस मानसिक अवस्था से गुज़रते हुए हम अपने शारीरिक श्रम को महिमामंडित करते रहते हैं। हिंदी समाज के बृहत्तर हिस्से में संघर्ष एक काम है। गल्प है। डिस्कोर्स है।। एक टाइप का इल्यूज़न यानी माया है। हर दिन लाखों लोग संघर्ष कर रहे हैं। इसी झांसे में वे जीये जा रहे हैं।

इसकी पड़ताल होनी चाहिए कि हमने संघर्ष को कब अपने डिस्कोर्स का पार्ट बनाया। १८५७ के पहले से या फिर सत्रहवीं सदी से या फिर हड़प्पा काल से। अकबर का संघर्ष क्या था? मीरा बाई का संघर्ष क्या था? कहां से ये शब्द हमारे मानस में ट्रांसप्लांट हुआ है?

मूल ज्ञात नहीं है। ब्याज दर बढ़ती जा रही है। हर संघर्ष करने वाला धीरज को अपना टूल यानी उपकरण बनाता है। यहीं पर बजरंग बली भी एंटर करते हैं और बंगाली बाबा भी। फोन कर नौकरी मांगने की प्रक्रिया भी संघर्ष के कैटगरी में है। जंतर मंतर पर धरना भी संघर्ष है। रोज प्रिंसिपल से झगड़ कर क्लास लेना भी संघर्ष है। कहीं ऐसा तो नहीं कि जो क्रिया है वही संघर्ष है।

संघर्ष क्या है? किसी महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किया गया प्रयास व सैलरी प्राप्ति के लिए किया जाने वाला दैनिक कार्य? या व्यक्तिगत महत्वकांझा या दैनिक जीवन में राशन की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए तप? या फिर नैतिकता के सवाल पर इस्तीफा देकर सड़क पर आने के लिए किया गया कार्य या फिर बॉस की बात से ताव में आकर अहं को साबित करने के लिए दिया गया इस्तीफा?

हिंदी प्रदेश(मैं सिर्फ इसी ज्यूग्रोफिकल मेंटल ज़ोन को जानता हूं)में महान होने का लोड लिये कई लोगों ने मुझे ख़राब किया। जब मैं सामान्य था तो ठीक था। जब से महान बनाने की दुकान में ढकेला गया हूं मूड ख़राब रहता है। अब लगता है कि किसी गिरोह ने ये अहसास कराया कि मैं जिस दफ्तर में पचास रुपये दिहाड़ी पर चिट्ठी बांटता था, वहां रिपोर्टर हूं तो ये सब मेरे संघर्ष की बदौलत हुआ है। पहले एकाध बार खुश हो जाता था(हर बार नहीं) लेकिन अब सोचता हूं कि संघर्ष नहीं था। ये तो एक सिस्टम में घुसने और कहीं से निकल कर कहीं पहुंचने की एक धूर्त प्रक्रिया भर थी। तो क्या इस प्रक्रिया को संघर्ष कहा जा सकता है? क्या हिंदी प्रदेश के लोग बिना संघर्ष और उद्देश्य के जीने की आदत नहीं डाल सकते? हर काम में उपलब्धि क्यों टटोलते हैं?

क्या नौकरी में किये गये सारे प्रयास संघर्ष हैं? आम हिंदुस्तानियों के लिए नौकरी का अनुभव सिर्फ पचास साठ साल पुराना ही है। इससे पहले अंग्रेज़ों के टाइम में नौकरी का अनुभव सीमित लोगों को हासिल था। नौकरी सिस्टम में सबसे पहले ज़मींदार टाइप के लोग गए। कुछ ज़मींदार नौकरी को दुत्कारते रहे तो कुछ नौकरी से भाग कर आए तो उसे तीन नंबर का बताने में लगे रहे। अब ऐसी सामाजिक मानसिकता में जो नौकरी में टिक गया वो सामाजिक रूप से फंसा हुआ महसूस करने लगा होगा। फिर शुरू हुआ होगा अफसरी की महिमामंडन का दौर। फिर बताया जाने लगा होगा कि नौकरी में संघर्ष कर रहे हैं।

ये उसी टाइप का कांसेप्ट है जैसे आज कल का टाइम काफी खराब है। मैंने आज तक जीवन में कोई संघर्ष नहीं किया। काम किया जिसका पैसा मिला और ज़्यादा किया तो ज्यादा पाने की उम्मीद रही। साठ साल तक नौकरी करने की व्यवस्था सामाजिक रूप से विरासत में न मिली होती तो संघर्ष का यह मौका भी चला जाता। गांव में खेत जोतवा रहा होता। तो क्या वो भी संघर्ष कहलाता। आज कई लोग मुझे जुझारू बताने के लिए कहते हैं कि पत्रकारिता में आप ही हैं। लेकिन मैंने तो कभी पत्रकारिता के लिए कुछ नहीं किया। वेतन मिलने की जो शर्तें थीं उसे बस उसे ईमानदारी से निभाने की कोशिश करते रहता हूं। पेशेवर डिमांड को देखता हूं। कभी एक बार भी दिमाग में नहीं आया कि ये जो कर रहा हूं वो पत्रकारिता के लिए हैं। लेकिन जिनको पता नहीं था वो पूरे दावे के साथ बताते रहे कि हां पत्रकारिता के लिए ही तो कर रहे हो।


मैंने कई पत्रकारों को अपनी पीठ पर महानता और संघर्ष की ओवरलोडिंग किये हुए हाईवे पर दौड़ते देखा है। ये पत्रकार कांवड़ियों की टोली में डाक कावंड़िया जैसे दिखने की कोशिश करते हैं। जैसे वे रूक रूक कर नहीं दौड़ दौड़ तक पहुंचने में यकीन करते हैं। इस टेंशन में कइयों का हुलिया बेहद गंधाया हुआ हो जाता है। शक्ल सूरत जंगल की तरह हो जाती है और चिंतन एक मुद्रा की तरह शक्ल पर आसन जमा लेती है। टेंशन फ्री और लोड मुक्त कोई पत्रकार अच्छा या बुरा होने की कैटगरी में क्यों नहीं रह सकता? या तो वो महान है या फिर साधारण? या फिर संघर्ष कर रहा है? अगर कोई चैनल यह कह कर अपनी दुकान खोले कि आइये हमारे यहां पत्रकारिता का हर मानक होगा लेकिन सिर्फ चाय मिलेगी तो सबसे पहले उस चैनल को लात मारने वाला मैं रहूंगा। बाकियों की नैतिक पराकाष्ठा के बारे में मैं टिप्पणी नहीं कर सकता। आज तक मैंने कोई त्याग नहीं किया है। अब सवाल एक और है। जब त्याग ही नहीं किया तो संघर्ष कम्पलीट कैसे हो गया? इसका जवाब यह है कि मैंने कभी संघर्ष नहीं किया।

क्या हर संघर्ष महान होता है? क्या संघर्ष एक दुकान है वैसे ही जैसे हिंदी पत्रकारिता से लेकर साहित्य तक में महान होना एक परचून की दुकान है। क्या आप भी कुछ संघर्ष कर रहे हैं? क्यों कर रहे हैं? फ्री में कर रहे हैं या सैलरी के लिए कर रहे हैं? फिर जब ये सारा संघर्ष ही है तो काम क्या है? ज़िम्मेदारी क्या है? संघर्ष सामाजिक सामूहिक अनुभव नहीं हो सकता। कभी कभी हो सकता है लेकिन दाल भात की तरह नहीं हो सकता। अगर सब संघर्ष कर रहे रहे हैं तो मेरा संघर्ष कैसे एक्सक्लूसिव होगा। उसी के जैसा होगा तो मुझे वैसे ही संघर्ष नहीं करना है। संघर्ष एक्सक्लूसिव होना चाहिए। कलेक्टिव नहीं। फिर भी इतना लिखने के बाद मैं संघर्ष को डिफाइन नहीं कर पा रहा हूं। आप कर दीजिए न। मैं भी साठ साल पूरे होने से पहले एक बार संघर्ष करना चाहता हूं। आखिर मैं रहता तो हिंदी रीजन में न। बिना संघर्ष के मेरी पहचान डाइल्यूट हो जाएगी। प्लीज़। हेल्प मी। आई वांट टू स्ट्रगल।

31 comments:

sanjaygrover said...

अद्भुत ! रवीश भाई की अब तक लिखी (जितनी मैंने पढ़ी) सबसे अच्छी पोस्ट।
कभी मिलते-जुलते से ‘आयडिया’ पर एक लघुकथा लिखी थी। किसी दिन अपने ब्लाग पर छापूंगा। छापने को यहीं कमेंट में छाप देता पर ऊ संघर्ष में नहीं गिना जाएगा न !

अंशुमाली रस्तोगी said...

रवीश भाई, अपने संघर्ष की तो नहीं जानता पर कह सकता हूं कि दुनिया में सबसे अधिक हमारे हिंदी के बड़ेए महान और महत्वपूर्ण साहित्यकार किया करते हैं। यहां हर साहित्यकार अपने संघर्ष का अंडरवियर साथ पहनकर चलता है। आखिर 'लक' का मामला जो है।
साहित्यकार पुरस्कार के लिए संघर्ष करते हैं। कुर्सी के लिए संघर्ष करते हैं। स्त्री-विमर्श पर संघर्ष करते हैं। अपने-अपने जन्मदिवसों को मनाने के लिए संघर्ष करते हैं। अब तो यहां लौंड़ाबाजी पर भी संघर्ष होने लगा है।
वैसे इन दिनों हिंदी अकादमी में साहित्यकारों के बीच जो संघर्ष चल रहा है, वो वाकई अद्भुत है।

shubhi said...

संघर्ष केवल बचे रहने की जिद का हिस्सा भर है हिंदी पट्टी के सामान्य पत्रकारों के लिए वह भी खत्म हो जाता है जब परिस्थितियां उन्हें तोड़ देती है(सभी को नहीं) और मजबूर कर देती हैं पेशा बदलने की कवायद के लिए या उन्हीं गलियों में जाने के लिए जो उनके सीनियर पत्रकारों ने अपने बचने की जगह बनाई थी।

जयराम "विप्लव" said...

रविश जी ,अब तक लोगों से सुनता आया हूँ 'संघर्ष हीं जीवन है ' .ऐसा लगता है जहाँ आप पहुंचना चाहते हैं यानी मंजिल तक पहुँचने में गर संघर्ष नहीं तो वहां पहुँचने कि सफलता का स्वाद फीका मालूम होगा . अंशुमाल जी ने ठीक कहा हिंदी के 'साहित्यकार अपने संघर्ष का अंडरवियर साथ पहनकर चलता है। ;आपके बारें में कुछ लोग कहते हैं आप हिंदी वाले उन कम लोगों में से हैं जो आज कल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सक्रीय हैं . वरना आज कल तो अंग्रेजीदां लोगों का बोलबाला है .

JC said...

सिनेमा हॉल में बैठ फिल्म देखे हो न? सीट में बैठे-बैठे हीरो हेरोइने विल्लैन आदि आदि को देख सब प्रकार के इमोशन महसूस किये हो कि नहीं? तब कौन सा स्ट्रगल किये थे? फिर क्यूँ परेशां थे हीरो के साथ-साथ जब हीरो को 'No Vacancy' का बोर्ड दिखाई देता था हर कार्यालय के बाहर? या फिर मस्त मस्त गाने दोहराते उसके साथ जब गरीब हीरो पैसे वाली हेरोइने के साथ बगीचे में घूम रहा था? इत्यादि, इत्यादि...

गीता पढोगे जब तब पाओगे कि ऐसा ही इस मानव जीवन को भी बताया गया है ज्ञानी योगियों द्वारा...आसान है समझना, किन्तु कठिन है निजी जीवन में उतार पाना - तथाकथित 'माया' के कारण...

JC said...

और गहराई में जाओगे तो संभवतः जान सकते हो कि हर कोई एक ही अनंत परमात्मा का ही अंश, आत्मा, है और जैसे आप अँधेरे हॉल में बैठ फिल्म, या 'निजी ज़िन्दगी' में भी बहिर्मुखी हो देख कर विभिन्न अनुभूतियाँ महसूस कर रहे होते हैं, वैसे ही भूतनाथ ने कभी अपने जीवन के प्ररम्भिक काल में उसी मार्ग से चल करी थीं, आप-हम सभी के रूप में...अनंतोगात्व सारे संघर्षों के पश्चात उसने, सतयुग के अंत में, धन्यभाग्य अपने गंतव्य (और हमारा भी) पा लिया :) किन्तु हम अटके पड़े हैं कलियुग के ही दृश्य पर और इस कारण आनंद नहीं उठा पा रहे तो दोष किसका है?

Aadarsh Rathore said...

विज्ञान का नियम है कि ब्रह्मांड की हर वस्तु MAXIMUM STABILTY प्राप्त करने की कोशिश करती है। मानव की प्रकृति भी वैसी ही है। मानव मन भी स्थिर होना चाहता है, वह तृप्त होना चाहता है। तृप्ति एक ऐसी मानसिक अवस्था है जिसमें मन स्थिर हो जाता है। तृप्ति के बिना ये स्थिरता कभी आ नहीं सकती। लेकिन मन तृप्त नहीं पाता। वह संतुष्ट होकर ही क्षणिक स्थिरता का आनंद उठाने की कोशिश करता है। ये तृप्ति या संतुष्टि उसे तभी मिलेगी जब वह नीयत उद्देश्यो की पूर्ती कर ले। निरंतर वह उन उद्देश्यों की पूर्ती के लिए प्रयत्न करता है। और यही प्रयत्न संघर्ष कहलाता है। अपनी समझ और अपनी ताकत दोनों का सही इस्तेमाल करना संघर्ष है। जिंदगी तो हर कोई जी सकता है लेकिन उसे सही ढंग से जीने के लिए सही फैसले और सही राह का चुनाव करना पड़ता है। जिंदगी की राह में कई बार मुशकिलें भी आती हैं। इन सबसे निपटने की कला है संघर्ष। ये एक सतत प्रक्रिया है। लक्ष्यों का निर्धारण करना और उन्हें सफलतापूर्वक प्राप्त करना संघर्ष है।

आपने सही कहा कि ये मानसिक अवस्था है। संघर्ष लड़ाई, कलह, युद्ध आदि शब्दों का पर्यायवाची नहीं। संघर्ष का अर्थ है किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाने वाला प्रयत्न। ये उद्देश्य किसी भी तरह का हो सकता है। और बिना उद्देश्य के, बिना कुछ उमंगों के जीना मानव के लिए संभव नहीं। इसलिए हर कोई संघर्ष करता है... अपनी-अपनी ज़रूरत के हिसाब से, अपने-अपने लक्ष्यों को प्राप्त करके तृ्प्त/संतुष्ट होने के लिए। कोई फोन करके नौकरी मांगना भी संघर्ष है क्योंकि वह अपने लक्ष्य (नौकरी) को प्राप्त करके संतुष्ट होना चाहता है। प्रिंसीपल से झगड़कर मांग मंगवाने में भी संघर्ष है। आदमी रोज़ संघर्ष करता है.. और यहां तक कि कई बार वह खुद से भी संघर्ष करता है...। अपनी मांगें मंगवाने के लिए आंदोलन करना भी संघर्ष है। हम बैठे-बैठे तो जिंदगी नहीं जी सकते न? सरल शब्दों में कहें तो संघर्ष सिर्फ जिंदगी जीने की कला है...।

शशांक शुक्ला said...

संघर्ष क्या रविश जी, जब पहली बार चलना सीखा होगा तब भी तो कई बार गिरें होंगे उस वक्त ध्यान है क्या कि वे भी एक संघर्ष होगा, लेकिन उस वक्त ध्यान नहीं जाता बस चलना होता है, लेकिन जब हम किसी काम को बहुत दिनों तक करते है लेकिन सफल नहीं होते तब हमें लगता है कि यार चलों ये संघर्ष है, करते रहो...लेकिन अगर लक्ष्य पता है औऱ सच में उसे पाना है तो संघर्ष क्या है उसे भूल जाओं बस करते रहो...आप भी करते रहिये, संघर्ष जैसी कोई चीज नहीं होती है...बस हमारा दिमाग है जो कई असफलताओं को संघर्ष नाम देकर जीने की आशा जगाता है औऱ जीतने की ओर एक कदम और चलवाता है

Yachna said...

रविश जी
संघर्ष को बहुत सतही अंदाज में ले गए हैं आप। अगर आपने व्यंग्य किया है तो ये सही से स्थापित नहीं हो पा रहा और अगर आप सीरियस होकर संघर्ष की खिल्ली उड़ा रहे हैं तो बात और भी गंभीर है। बचपन में हेरफेर कहानी तो पढ़ी ही होगी, उसी तरह का असर लग रहा है, संघर्ष तो आपने भी किया ही होगा।

Pramod Singh said...

अब देखो, इस तरह का जादुई जथार्थबाद बिना आत्‍मा का अंदर फावड़ा और कुदाली चलाये बिना थोड़े न आता है? अइसे ही दौड़ते रहे तो देखोगे, संघर्सबात में केतना जल्‍दी परंगत हो जाओगे..

prabhat gopal said...

sahi baat ko uker kar rakh diya hai aapne

अर्शिया अली said...

संघर्ष के बारे में इतने शानदार तरीके से पहली बार पढ़ रही हूँ.
{ Treasurer-TSALIIM & SBAI }

आनंद said...

आपके लेख से मेरे ज्ञानचक्षु भी खुल गए। संघर्ष काम से पहले का फेज़ है। पहले संघर्ष कीजिए, यह फ्री में या 'चाय' के एवज में किया जाता है। फिर जब काम मिल जाए तो काम कीजिए। काम वह है जिसके बदले दाम मिलते हैं। जब दाम न मिले तो समझो संघर्ष चल रहा है। फिल्‍मों के स्‍टार पहले संघर्ष करते हैं, फुटपाथ पर सोते हैं, फिर काम मिलता है तो जूहू या बारसोवा में बंगला ले लेते हैं। जमीनी स्‍तर के कार्यकर्ता पहले-पहल संघर्ष करते हैं। अन्‍याय के खिलाफ आंदोलन करते हैं, बंद कराते हैं। और जब कोई बड़ा ठेका या टिकट मिल जाता है तब उनका संघर्ष पीछे छूट जाता है।

जहाँ अच्‍छे खासे काम को संघर्ष कहा जा रहा हो, तो समझो ज़रूर कोई पर्दादारी है। या तो इसमें दाम नहीं है, यदि है तो भी आपके पल्‍ले कुछ नहीं पड़ने वाला है।

- आनंद

ssa said...

interesting and honest..:)
newton has said f1=-f2 :)
by the way what is your goal :)

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

रवीश जी,
अच्छा आलेख है। मैं तो जीवन को और बुरा होने से बचाने और उसे बेहतर बनाने के लिए काम करने को संघर्ष कहता हूँ। जब यह संपूर्ण मानवता के लिए हो तो यह महान हो जाता है।

रंगनाथ सिंह said...
This comment has been removed by the author.
चन्दन कुमार said...

इस बात ने आज मुझे झकझोर दिया कि आख़िर हमारा संघर्ष क्या है, हम कैसे उसे डिफाइन करते हैं। ये हम सब पर डिपेंड करता है, फिर भी से कि हम सभी इसी सोसायटी के हिस्से हैं और हमीं ने इसके क़ायदे -क़ानून बनाए हैं जो कभी हमें अच्छे लगते हैं तो कभी दकियानुसी और ओल्ड कहकर ख़ारिज कर देते हैं।....आज आगर इसे समझने की ज़रूरत इसलिए आन पड़ी कि ये हमें झकझोर रहा है कि हम अपनी ज़िंदगी में कर क्या रहे हैं............

vikas said...

संघर्ष लड़ते रहने की जिद है, कई बार किसी वजह से,कई बार बिना वजह!
काम करना एक चीज़ है,संघर्ष करना दूसरा पहलू है!
किसी सीमा पर जब कोई जवान लड़ता है,तो गोलियां चलाना, रणनिति बनाना उसका काम है! पर लड़ाई में जीतने की उसकी जिद उसका संघर्ष है!
२५००/- की नौकरी उसका काम हो सकती है,पर अपने बीबी-बच्चो, माँ बाप का पेट भरना उसका संघर्ष है!
काम पर जाना मज़बूरी हो सकती है, पर 50 आदमियों के साथ खिरकी पे लटक कर ज़िन्दगी दाव पर लगा के वहां पहुंचना, उसका संघर्ष है!
80 साल की उम्र में मरना एक अच्छी मौत हो सकती है,पर अपने पौते की शादी देखने के लिए जिंदा रहने की उसकी ख्वाइश, उसका संघर्ष है!
सूखे के बाद भी,भूखे मरने की हालत के बावजूद,अगले साल फिर से खेती करना उसका संघर्ष है!
अब यह भी ज़रूरी नहीं की जीने के लिए संघर्ष १०० फीसदी जरुरी है!
रविश जी, आप को अगर लगता है की आप ने संघर्ष नहीं किया तो आप खुश नसीब है!
कई बार संघर्ष काम करवाता है और कई बार काम संघर्ष करवाता है!
गौर से देखेंगे तो कही न कही संघर्ष को जरुर ढूंड पाएँगे!

pragya said...

Struggle is started the moment you are conceived in your mother's womb which continues till you die,of course there are breaks in between ,but the eternal struggle for various type of things keeps on going.Amitabh Bachchan is struggling still with his growing age and Bill Gates is struggling with his own set of problems.

WE would die the moment we don't struggle.Struggle creates challenges and new discoveries.

To be human is to struggle.

regards,
Pragya

jia raja banaras said...

darasal, ravish ji dusaron se sunnana chate hain ki unhone jo kiya wo sangharsh hai. vaise jaha tak aap pahuche hain ravish ji wo apka sangharsh hi hai. agar yeh zahir taur per apko nahi maloom to aap mahan ki category me chale jate hain agar aap jante hain to bhi aur use mante nahi to bhi aap mahan hi hain lekin aap mankar bhi kahalwana chathe hain to bhaiya aap maje ue patrkar hai. ama khabre nikal rahe hain kya. vaise apke sangarsh ko mera salaam.

SHASHI SINGH said...

संघर्ष को ठीक-ठीक पहचानने के लिए भी बड़ा संघर्ष है! अब देखिये न आपको और मुझे लेकर अबतक 22 लोग (टिप्पणियों के सहारे) इस संघर्ष में लग गये हैं।

आदित्य आफ़ताब "इश्क़" said...

मैं आपको समझाने का संघर्ष नहीं कर सकता .............

मधुकर राजपूत said...

क्यों संघर्ष की बीन बजा रहे हो रवीश? कुछ तो छोड़ो उनके लिए जो चप्पल घिसते हुए रोड मास्टरी करने को संघर्ष कहते हैं और कहते हैं उनके अनुयायी होंगे और वो उनके चप्पल घिसड़ मार्ग को अपना मक्का कहेंगे।
संघर्ष की खूब छिछालेदर की है, क्या होगा उनका जो खुद की पारखी नज़र की जमकर तारीफ करते हुए कहते हैं कि इतने साल का अनुभव संघर्ष से आया है।
सब संघर्ष कर रहे हैं, रवीश नहीं करते। इमानदारी यही है। भैया मुझे खुद संघर्ष साला भेडिया नज़र आता है, जो पसलियों का मास नोचकर खाने की जुगत में रहता है। सिगरेट पहले ही उस मास को नोच रही है, अब संघर्ष से भी नोचवाएं। नहीं। मैं खुद रोटी का जुगाड़ करने के लिए काम करता हूं। दाम की लालसा मुझे भी रहती है, हर बार लगता है कि कम मिल रहा है। जब कोई पीछे बंध जाएगी तो और ज्यादा हाथ पैर मारेंगे।
संघर्ष क्या है। बाइस परिभषा पढ़ीं। हम तो यही कहेंगेष संघर्ष छोडो संन्यास की राह पर निकलो, मिला ठीक नहीं मिला फिर भी ठीक। हंसते रहो तो संघर्ष से थोबड़े पर आने वाली शिकन की ऐसी तैसी।

राज-नीति said...

aap ke post ko keval patrakarita ke khache me phit karke dekhana thik nahi hai. lagbhag har kisi ki yahi dasata hai.
aakhirkhar koi kisliye 'sangharsh' kar raha hai ya yesa sochata hai. maine pahali baar aap ko pada. Mai khush hu ies liye.

डॉ .अनुराग said...

हमारे शहर के कई साहब जादे भी टोयटा गाडी में अलन सोली की शर्ट पहनकर कहते है स्ट्रगल कर रहे है..
शुक्र है की संघर्ष का पेटेंट पत्रकारों ओर साहित्यकारों ने नहीं करवाया .वर्ना कई टेंडर खुलते ओर कई संघर्षकारी रोज सेंसेक्स की माफिक ऊपर नीचे होते...औसत हिन्दुस्तानी जब तक अपना काम नहीं निकलवा लेता .संघर्ष में है ऐसे इलुसन में ही रहता है ...सॉफ्टवेयर इंजिनियर हो.या किसी सरकारी महकमे का क्लर्क ....अलबत्ता इस वर्ड का इस्तेमाल वो नहीं करता ...क्यूंकि इसका कोपी राइट पहले साहित्यकारों के पास था .अब सुना है पत्रकारों के पास भी है....
रिक्शा वाले ओर मजदूर बेचारे बिना ये जाने की संघर्ष क्या है पूरी उम्र उसी में गुजार देते है ...इस दुनिया में नोर्मल बने रहना भी संघर्ष है....ओर कुछ लोगो के लिए रोज जीना भी.....पर छोडिये प्रमोद जी कहते है न....कुदाल उठाये बगैर कैसे मिलेगा ..पर क्या खोदोगे वो भी जरूरी है.....

ASIT NATH TIWARI said...

रवीश भइया संघर्ष करना सीखिए। मैं भी अब तक समझता था कि संघर्ष कर रहा हूं। बेहतर एंकर बनने के लिए संघर्ष , बेहतर बूलेटिन प्रोड्यूसर बनने के लिए संघर्ष, पहचान के लिए संघर्ष, और न जाने कितने संघर्ष। पर सच से साबका पडा तो गुमान काफूर हो गए। अब आप संघर्ष करें, मैं देख-पढ के सीख लूंगा।
असित नाथ तिवारी, बेतिया

sanjaygrover said...

डॉ .अनुराग said...


रिक्शा वाले ओर मजदूर बेचारे बिना ये जाने की संघर्ष क्या है पूरी उम्र उसी में गुजार देते है ...इस दुनिया में नोर्मल बने रहना भी संघर्ष है....ओर कुछ लोगो के लिए रोज जीना भी.....

ye baat kuchh jami..

ravi_journalist@yahoo.com said...

apki tarah mai bhi sawal ki talash kar raha hu ..mil jayega to jaroor bata dunga

himanshu said...

I think the word 'sangharsh' has been grossly misused over the years. At the time of independence, this word had a very positive connotation. It was often used to connote our "Struggle for Independence", for instance. Our existentialist search for a 'good and meaningful' life or the urge to 'achieve' is often misconstrued as 'struggle' today...Thank You Sir for deconstructing this concept...

himanshu said...

I think the word 'sangharsh' has been grossly misused over the years. At the time of independence, this word had a very positive connotation. It was often used to connote our "Struggle for Independence", for instance. Our existentialist search for a 'good and meaningful' life or the urge to 'achieve' is often misconstrued as 'struggle' today...Thank You Sir for deconstructing this concept...

अजय यादव said...

रविश जी,
संघर्ष नहीं, अभिशप्त कहिए।
जब काम आपकी इच्छाओं के विरुद्ध लगने लगे...जब काम स्वाभाविक और लोग अस्वाभाविक हो जायें...जब आप जैसे लोग काम को काम जैसे करने का उपदेश झाड़ने लगें...जब आदमी के सपनें उसे हास्यास्पद बनाने लगें...जब आपकी ब्लॉगीय डकार किसी को निराश करने लगे...बहुत मन करता है कहने को कि आप का काम आप या आप जैसों को मुबारक...लेकिन कोई विकल्प(हैसियत भी कह सकने में अब कोई संकोच नहीं रह गया) नहीं...