वो जो बांबे हैं...जिसकी जान....शिखा त्रिवेदी की नज़र से देखिये























शिखा त्रिवेदी पिछले कई दिनों से बांबे पर काम कर रही हैं। बांबे में पढ़ी लिखी हैं तो उस शहर को अपने भीतर ढोते चलती हैं।
रहती दिल्ली में हैं लेकिन बात बांबे की करती हैं। वैसे शिखा का कोई एक शहर ही नहीं हैं। जयपुर,बनारस,बरेली,अहमदाबाद न जाने कितने शहरों को वो अपना शहर कहती हैं। शिखा त्रिवेदी की आपने डॉक्यूमेंट्री देखी होगी। पहले एनडीटीवी इंडिया के लिए भी बनाती थी लेकिन अब उनका काम अन्य वजहों से एनडीटीवी 24x7 तक ही सिमट कर रह गया है। लगन में कोई कमी नहीं आई है। इस बार वो अपने हिस्से का एक शहर बांबे लेकर आ रही हैं।

पिछले साल रीगल सिनेमा पचहत्तर साल का हो गया। चर्चगेट का इरोस भी सत्तर का हो गया है। इस साल लिबर्टी अपने साठवें साल में प्रवेश कर रहा है। एक विशिष्ठ कला शैली में बनी ये इमारतें सिर्फ बांबे की कंक्रीट पहचान नहीं हैं बल्कि ये बांबे वालों के भीतर किसी इमेज की तरह बनी हुई हैं। १९३० के दशक में पश्चिम से आई कला शैली के प्रभाव में ढली इन इमारतों ने बांबे को बांबे बनाया। ये वो टाइम था जब बांबे में ग्लैमर,मनोरंजन के नए रूप, बॉलरूम डांसिंग, जाज़, कैबरे और घुड़दौड़ सब आपस में घुलमिल रहे थे। एक शहर को शहर बना रहे थे। एक शहर का रोमांस पैदा हो रहा था। जो आने वाले कई सालों के लिए दूर दूर तक पसर कर फैलने वाला था।

शिखा कहती हैं कि धीरे धीरे यह कला(डेको)पूरे देश में फैलती है। यहां तक आज़ादी की पूर्व संध्या पर नेहरू स्वीसफ्रेंच वास्तुकार
Le Corbusier को आधुनिक भारत की बुनियाद रखने के लिए बुलाते हैं। यह भी ख्याल रखा जाता है कि पारंपरिक स्वरूप पर कोई असर न पड़े। नेहरू चाहते थे कि पूरे देश की इमारतों का एक सा चरित्र बने। बस यहीं से शुरूआत होती है डेको कला के अंत की। एक ऐसा आंदोलन था ये जो वास्तुकार राहुल मल्होत्रा के अनुसार मुंबई के आधुनिक जीवन शैली में सबसे पहले आया। लेकिन बाद में ये इमारतें मुंबई के विस्तार की बलि चढ़ती चली जाती हैं। लेकिन आज भी जब इनके करीब से गुज़रिये तो बांबे का रोमांस पैदा होने लगता है। लगता है कि बांबे में हैं।

शिखा इसी बांबे के अहसास को दिखाने की कोशिश कर रही हैं। आप इसे पंद्रह अगस्त के दिन NDTV 24X7 पर दोपहर तीन बजे और सोलह अगस्त को दोपहर एक बजे देख सकते हैं। थोड़ा वक्त निकालियेगा। मजा आयेगा। एक घंटे की इस डाक्यूमेंट्री का दूसरा हिस्सा दलित स्थापत्य और माया महात्म्य पर भी प्रस्तुति है।




14 comments:

राजन अग्रवाल said...

jaroor dekhenge,

sushant jha said...

लाख भीड़भाड़ और वाटर मिसमनेजमेंट के वाबजूद देश का असली और ओरिजनल शहर तो बांबे ही है। इधर दिल्ली वाले वहां की पानी के जमाव पर मन ही मन नवढ़नाढ्य की तरह इतराते हैं लेकिन अगर बंबई जैसी बारिश दिल्ली में हो जाए तो यहां का पार्लियामेंट डूब जाए। दूसरी बात बांबे इसलिए भी असली शहर है कि उसका विकास कारोबार और श्रमजीवियों के जरुरतों के मुताबिक हुआ है...दिल्ली की तरह नहीं जो शासक वर्ग के अनुरुप बनाई गई है और अरबों रुपया यहां डंप किया गया है। उस हिसाब से दिल्ली मुफ्तखोरों का शहर हैं जहां के नागरिक कम टैक्स देकर बेहतर सड़क और मेट्रो का आनंद उठाते है। मुम्बई के बारे में बेहतरीबन किताब लिखी है सुकेतु मेहता ने-इसमें बीयरबार, ठाकरे, बच्चन, सुपारी,कपूर से लेकर स्लमडाग तक का जो जीवंत चित्रण है वो दूसरी जगह दुर्लभ है।
अब एक बात पर गौर कीजिए- केंद्रीय खजाने में मुम्बई का योगदान दिल्ली से तकरीबन 5 गुना ज्यादा है जबकि भारत सरकार दिल्ली पर मुम्बई की तुलना में 5 गुना ज्यादा खर्च करती है।

वैसे भी शहर की जो परिभाषा है वो ये कि कोई शहर तबतक शहर नहीं है जबतक वो नए विचारों या क्रान्ति की शुरुआत न करे। बंबई हिंदुस्तान का पहला शहर है जहां महिला सशक्तकरण और दलित मूल्यों को लेकर आन्दोलन हुआ। इस मामले में दिल्ली अर्धसामंती, अर्धशहरी, बहुत हद तक जाहिल और असभ्यो का शहर है। प्रसून जोशी के शब्दों में कहें तो बांबे हिंदुस्तान के पोपुलर कल्चर को प्रदर्शित करता है जबकि दिल्ली क्लासिकल कल्चर को। मुम्बई में जगह की कमी है,लोग भाई-2 की तरह रहते हैं दिल्ली में एक तरह की समाजिक दूरी है। (राज ठाकरे का संदर्भ अलग है) कई बार मुम्बई में छोटी-2 कंपनी के सीईओ भी आपको लोकल ट्रेन में मिल जाएंगे। लेकिन मजाल है दिल्ली में ऐसा हो। यहां तो किरानी भी गाड़ी में चढ़ता है क्योंकि यहां सामंती मूल्य अभी तक जिंदा है-इसलिए यह असली शहर नहीं है। दिल्ली में तो मुहल्लाछाप अखबार के एडीटर से भी वक्त मांगिए तो पीए फोन उठाता है। कुल मिलाकर,मुम्बई के साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है-जो शहर देश को सबसे ज्यादा राजस्व देता है वहां मेट्रो बाद में बनता है, और जहां नेताओं की खादी से बदबू आती है वहां पहले। फिर भी बांबे वाले जितने जिंदादिल होते हैं उतना शायद ही कोई हो।

Shesh Narain Singh said...

Aap ne jiss tarah se ek colleague ko introduce kiya , mujhe vah adaa bahut pasand aayee varna aajkal to saathion ko kamtar bataane ka fashion hai..Jahaan tak Bombay per banee documentary ka sawaal hai, vah yaqeenan achchhee hogee kyonki NDTV aur ICICI mein sab kuchh 5-star hee hota hai

Gajraj Rao said...
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Gajraj Rao said...

main Shesh Narain ji ki baat se sahmat hoon...

शशांक शुक्ला, +919716271706 said...

क्या रविश जी कुछ भी छापते है आप भी..मज़ा नहीं आया पढ़कर..अब ये मत कहियेगा कि मज़ा लेने कि लिये पढ़ते हो क्या..आप अच्छे लेखक है मज़ा का मतलब समझते होंगे

Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना said...

कहने की जरूरत नहीं की हर शहर का अपना इतिहास ,भूगोल और विशिष्ट सामजिक बुनावट और सांस्कृतिक पहचान होती है.बम्बई भारत का विशिष्ट महानगर है और इस नाते ढेरों खूबी खामी अपने में समेटे हुए है.पर हर को यह महानगर भये यह जरूरी नहीं.कोई इसके सम्मोहन पाश में मंत्रमुग्ध हो याके किसी को यह महानगर संभावनायों का अथाह समंदर लगे.साथ ही बहुतों को नगर और नागरिक जीवन की निकृष्टतम सम्भावान्यों का ठोस मूर्ति करण दिखे . बम्बई के अनन्त रूप हैं और इसपर परसपर विरोधी नज़रिए हैं.पर बमबई की तारीफ़ के लिए वेबजः प्यारी दिल्ली की तौहीन क्यों की जाय .

Swami Somdeva said...

ऊफ्ह ! ये आदमी इतना क्यों लिखता है !

JC said...

जैसे हम कहते हैं कि ब्रह्माण्ड/ संसार दस दिशाओं से बना है, आठ दिशा मैं आठ दिग्गजों ने इसे सम्हाल के रखा है और नौवी और दसवीं दिशा शनि के नियंत्रण में, उसी प्रकार मानव को भी दस शक्ति के स्वरुप से बना पाया योगियों ने... इसे 'दशानन' और 'दशरथ' द्वारा त्रेता के पात्रों द्वारा भी दर्शाया गया: 'दशानन' के दस सर के बीच द्वंद चलता रहता है जबकि 'दशरथ' दर्शाता है 'सूर्यवंशी राजा' का मस्तिष्क उसके स्वयं के नियंत्रण में रहना - जैसे द्वापर में भी कृष्ण रुपी 'रथ चालक' का अर्जुन के रथ को रणभूमि में भी नियंत्रण में रख पाना और अर्जुन आदि पांडवों का 'कौरवों' (बुराइयों) का नाश कर पाना...

मुंबई संसार के आठ में से एक हाथ के सामान है, और संसार का मस्तिष्क हिमालय (धरती के सर पर ताज जैसे) जाना ज्ञानियों ने...किन्तु 'दशानन' भटकाने का ही काम करते दिखाई पड़ते हैं कलियुग के प्रभाव से - 'Unity in diversity' :)

sanjaygrover said...

फिलहाल टीवी से दूर हूं मगर कमी सुशांत झा के यथार्थपरक लेखन ने पूरी कर दी।
मज़ा आया।

रचना गौड़ ’भारती’ said...

आज़ादी की 62वीं सालगिरह की हार्दिक शुभकामनाएं। इस सुअवसर पर मेरे ब्लोग की प्रथम वर्षगांठ है। आप लोगों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष मिले सहयोग एवं प्रोत्साहन के लिए मैं आपकी आभारी हूं। प्रथम वर्षगांठ पर मेरे ब्लोग पर पधार मुझे कृतार्थ करें। शुभ कामनाओं के साथ-
रचना गौड़ ‘भारती’

JC said...

"परिवर्तन प्रकृति का नियम है"...

हर एक का - काल के अनुसार - 'बाम्बे' अलग-अलग होता है...जो उसे कभी 'मुंबई' के नाम से जानते थे, उस अनंत मुम्बा देवी के निवास-स्थान को जहाँ से हर सागर-जल की बूँद की यात्रा, जल-चक्र, आरंभ होती है और पेयजल रूप में 'Seven Sisters' अर्थात सप्तभगिनी राज्यों में समाप्त, 'सप्त-द्वीप' अर्थात 'seven islands' के नाम से जानते थे, और कभी भी जान भी सकते हैं जैसे इन्द्रधनुष के सात रंगों को कभी-कभी बरसात में हर कोई देख सकता है...

हर्षवर्धन said...

रवीश ये आपने अच्छा काम किया। शिखा त्रिवेदी निस्संदेह टीवी न्यूज की सबसे अच्छी रिपोर्ट पेश करने वालों में से हैं मैंने उनकी कई रिपोर्ट पहले भी देखी है। बांबे से मुझे भी मोह है। साढ़े चार साल वहीं बिताकर दिल्ली लौटा हूं। दिल्ली से और ज्यादा मोह है और अपने शहर इलाहाबाद से वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में home sickness है। हर शहर का अपना मिजाज है मिजाज पकड़ में आ जाए और उसे टीवी पर उतार दिया जाए तो, मजा आ जाता है। पक्का देखूंगा।

हर्षवर्धन said...

रवीश
शिखा की रिपोर्ट ने बहुत निराश किया। बड़ी वजह रही कि आपके ब्लॉग के जरिए मैं बांबे .. मेरी जान शिखा की नजर से देखने चला गया। क्योंकि, ये डॉक्युमेंट्री तो पत्थरों पर थी - नाम ही था raomancing the stones .. पूरे एक घंटे में बांबे ढूंढ़ने की कोशिश करता रहा कहीं नहीं मिला। पूरे एक घंटे टीवी पर खराब किया।