जसवंत, जिन्ना बनना चाहेंगे- पार्ट वन





















जसवंत के जिन्ना धर्मनिरपेक्ष थे। वो जिन्ना का गुणगान कर रहे हैं। कोई रोक भी नहीं सकता। उनकी अपनी कोशिश है। लेकिन इतिहास इकतरफा फ़ैसले के काम नहीं आता है। जसवंत सिंह इतिहास का इस्तमाल करते लगते हैं। सब जानते हैं कि असहयोग आंदोलन तक आते आते जिन्ना पाकिस्तान की सोच को लेकर बहुत साफ नहीं थे। यही वो मोड़ है जहां से जिन्ना कांग्रेस और गांधी की लाइन से अलग होने लगते हैं। जिन्ना का यकीन संविधान और कानून पर चलते हुए ब्रिटिश हुकूमत के तहत स्वराज प्राप्त करना था। गांधी इस लाइन से आगे जा चुके थे। गांधी को आज़ादी चाहिए थी। अपने समय के दोनों ही दमदार नेता रहे। दोनों में खूबियां रहीं। खामियां भी।

जसवंत सिंह की किताब जिन्ना को सर्टिफिकेट देने के लिए लिखी गई है। जब तक आप राष्ट्रवाद की घिसी पिटी अवधारणाओं की नज़र से किसी इतिहास को देखेंगे,तब तक तस्वीर धुंधली नज़र आएगी। यह कहना इतिहास का सरलीकरण है कि नेहरू और पटेल ने जिन्ना को पाकिस्तान दे दिया। ये वो नेता कह रहा है कि जिसकी पार्टी आज तक तय नहीं कर पाई कि मुसलमानों के साथ तुष्टीकरण करने या नहीं करने के मुद्दे से आगे जाकर करना क्या है। जिसके परिवार की एक विचारधारा सभी को हिंदू बताने लगती है। पूर्वज एक होने का एलान करती है। धर्मनिरपेक्ष जिन्ना इसी सोच का विरोध तो करते थे।

पता नहीं जसवंत ने जिन्ना के बहाने संघ का विरोध किया है या कांग्रेस का। समझना मुश्किल है कि जिन्ना की बजाय नेहरू को ज़िम्मेदार बताने के पीछ मकसद क्या है? नेहरू की आलोचना होनी चाहिए लेकिन जिन्ना को एक लाइन का कैरेक्टर सर्टिफिकेट देना कहां तक सही है।

नागपुर अधिवेशन तक कांग्रेस और मुस्लिम लीग के अधिवेशन साथ साथ हो रहे थे। १९२० के इस अधिवेशन में ही साफ हो गया कि आगे चल कर जिन्ना किसी और लाइन की तरफ बढ़ेंगे। इसके पीछे तमाम तरह की स्थितियां थीं। जिसके लिए कई लोग ज़िम्मेदार रहे होंगे। जिन्ना अकेले नेता थे,जो भरी सभा में खड़े होकर असहयोग आंदोलन के गांधी का साथ देने के कांग्रेस के फैसले का विरोध करते हैं। नागपुर में जमकर नारेबाज़ी होती है,फिर भी जिन्ना अपनी बात कहते हैं। जिन्ना गांधी को महात्मा मिस्टर कहते रहते हैं। वीरेंद्र कुमार बरनवाल कहते हैं कि वे जिस स्टाइल के थे,उनके लिए महात्मा की बजाय मिस्टर गांधी कहना ही सूट करता था।

१९३७ में मुस्लिम लीग बुरी तरह हार जाती है। जिन्ना टूट जाते हैं। उससे पहले जिन्ना १९३० से लेकर ३४ तक लंदन रहने चले जाते हैं। अपने पासपोर्ट में स्थायी पता लंदन का ही देते हैं। १९३७ में यूपी में कांग्रेस को बहुमत मिला था। इसी के बाद मिथक गढ़ा गया कि लीग की तरफ से बहुत कोशिश हुई कि कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार मिलाये। क्यों? इसके पीछे भी लंबे चौड़े कारण हैं। जिसका खुलासा पहले लेख में किया गया है। जसवंत सिंह जैसा राजनेता ही इतिहास की इन जटिलताओं को राजनीतिक भाषण में बदल देने की कोशिश करता है। पिछले कई सालों से इस तरह के मिथक कुछ तथ्यों के आधार पर गढ़े गए हैं।

बहरहाल मुस्लिम लीग की हार के बाद जिन्ना आहत थे। वीरेंद्र कुमार बरनवाल लिखते हैं कि १९३७ में जब उत्तर प्रदेश और बम्बई में कांग्रेस के साथ मुस्लिम लीग की सत्ता में भागीदारी का जिन्ना का सपना बुरी तरह छिन्न-भिन्न हो गया था और गांधी इसमें कोई सहायता नहीं कर पाए थे तब से जिन्ना के तेवर दिन-ब-दिन गांधी और कांग्रेस के खिलाफ उग्रतर होने लगे। एक बार गांधी के खिलाफ जिन्ना के किसी कथन की तुर्शी पर जब दुर्गादास ने उनसे कहा था कि इससे गांधी आहत हो सकते हैं तो जिन्ना ने कहा था कि दुर्गा,गांधी यही भाषा समझते हैं।

बरनवाल चौधरी खलीकुज़्‍ज़मा का हवाला देते हैं। कहते हैं खलीकुज़्ज़मा पाथ वे टु पाकिस्तान में ज़िक्र करते हैं कि जब १९३७ में मुस्लिम लीग ने अपने लखनऊ अधिवेशन में पूरी आजादी के ध्येय को अपने उद्देश्यों में शामिल करने के प्रस्ताव पर विचार करना शुरू किया था तो जिन्ना ने इसका विरोध किया था। जब चौधरी खलीक़ुज़्ज़मा ने उन्हें समझाया कि इसके विरोध का मतलब मुस्लिम लीग के ख़ातमे की पहल होगी तो वे मान गए। पर उन्होंने पूरी आज़ादी की जगह मुक्म्मल आज़ादी जैसे शब्द के प्रयोग पर सहमति जताई थी।( पेज-२३९)। पूरी आज़ादी या पूर्ण स्वराज जैसे शब्द पर उन्हें लगता है, इसलिए आपत्ति थी क्योंकि इसका प्रयोग सन १९२९ के लाहौर कांग्रेस के अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू ने रावी के किनारे पास किए गए अपने प्रस्ताव में किया था।

यहां से जिन्ना को लगने लगा था कि कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष पार्टी नहीं है। वो गांधी को ज़िम्मेदार मानते थे। जिन्ना अपनी बराबरी गांधी से ही करते थे। इसके बाद गांधी ने जिन्ना को लिखा था कि लखनऊ के भाषण में वे जिन्ना के राष्ट्रवादी रूप को नहीं ढूंढ पा रहे थे। गांधी ने आगे पूछा कि क्या वह अब भी वही जिन्ना थे? जिन्ना सफाई नहीं थे।

वीरेंद्र कुमार बरनवाल कहते हैं कि जिन्ना ने इसका करारा जवाब देते हुए लिखा था कि वह उनके( गांधी) के बारे में यह नहीं कहना चाहेंगे कि उनके संबंध में लोग सन १९१५ में क्या कहते थे और अब क्या कहने लगे हैं। अब जिन्ना को अपने को सम्प्रदायवादी कहे जाने पर भी कोई आपत्ति नहीं रह गई थी।

जसवंत सिंह की पूरी दलील उस अवधारणा पर टिकी है कि बाबरी मस्जिद का ध्वंस कांग्रेस के शिलान्यास की गलती के कारण हुआ। जैसे बीजेपी और आरएसएस, कांग्रेस की इस गलती को रोकने की कोशिश कर रहे थे।

जिन्ना की भूमिका की आलोचना और सराहना दोनों होती रही है। इतिहास की प्रक्रियाओं के संबंध में ही उनके व्यक्तित्व के विकास को देखना होगा। जिन्ना और गांधी में ज़मीन आसमान का फर्क है। फिर बरनवाल क्यों लिखते हैं कि १९४० में मौलाना आज़ाद के कांग्रेस अध्यक्ष बनने से जिन्ना बेहद खफा हो गए थे। इसे वह अपने और लीग के मुसलमानों के एकमेव प्रतिनिधित्व के दावे पर कुठाराघात मानते थे।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि इसी राष्ट्रीय आंदोलन की परिधि पर १९२५ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी खड़ा हो रहा था। जिस नागपुर से जिन्ना कांग्रेस और गांधी से दूर होने की राह पर चल देते हैं,उसी नागपुर में हिंदू राष्ट्र की कल्पना जन्म ले रही थी। उससे पहले तुर्की में खलीफा प्रथा को खत्म करने के मार्डन मुस्तफा के खिलाफ भारत में कट्टरवादी आंदोलन कर रहे थे। धार्मिक बहसें तेज़ हो रही थीं। हमें यह भी समझना होगा।

जिन्ना एक जटिल व्यक्ति थे। वो एक भारत का सपना नहीं देख रहे थे। उनके भीतर भारत मे ही वो मुसलमानों के लिए अधिक अधिकार और क्षेत्र की सोच काफी साफ साफ दिखाई देती है। भले ही इतिहास के दस्तावेज़ साबित करें कि जिन्ना ने खुल कर पाकिस्तान की मांग नहीं की और जिस पाकिस्तान की मांग की वो हिन्दुस्तान का टुकड़ा नहीं था बल्कि उसी के भीतर एक व्यापक अधिकार क्षेत्र था। तो भी इसकी नियति विभाजन की तरफ ही ले जाती दिखती है। एक ऐसा तनाव जिसे लेकर भारत न जाने कितनी बार टूटने के कगार पर पहुंचता या टूट चुका होता। जिन्ना ने अपनी सोच का त्याग नहीं किया। न तो धर्मनिरपेक्षता के लिए न ही हिंदुस्तान के लिए। वो गांधी की तरह कांग्रेस छोड़ कर नोओखली नहीं गए। फर्ज कीजिए नेहरू गांधी ने जिन्ना की बात मान ली होती तो आज का भारत कैसा होता?

जसवंत सिंह की किताब ६९५ रुपये की है जब इतना खर्च करेंगे तो बरनवाल जी की किताब १५० रुपये में खरीद ही लीजिएगा। राजकमल ने छापी है। साथ में सलील मिश्र की किताब भी खरीदें ताकि एक साथ पढ़ने से बात को नया परिप्रेक्ष्य मिले।

30 comments:

sanjaygrover said...

मकसद नेहरु-गांधी परिवार के जादू को खत्म करना हो सकता है। वैसे जादू कैसा भी हो, लोकतंत्र के लिए तो ख़तरनाक ही होता है। मगर विकल्प (वाम पंथ, दक्षिणपंथ, भाजपा, सपा, बसपा वगैरह) भी तो लगातार अविश्वसनीय होते जा रहे हैं।

Aadarsh Rathore said...

पुस्तक बेचने के लिए कुछ तो मसाला होना ही चाहिए।
वैसे कुछ समय पहले एक पुस्तक पढ़ने को मिली थी। ध्यान नहीं कौन सी थी लेकिन उसमें लिखा था कि सर्वप्रथम इक़बाल साहब ने लंदन में पाकिस्तान राष्ट्र की संकल्पना की थी। सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान वाले गाने में से उन्होंने खुद ही हिन्दुस्तान को पाकिस्तान से रिप्लेस किया था। जिन्ना ने तो इस मामले को उठाया था और श्रेय लिया...

Ram said...

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bat pate ki said...

रवीशजी आप टीवी पर आजकल नजर नहीं आ रहे हैं...स्पेशल रिपोर्ट में आपको देखे महीना होते आ रहा है... आप कब वापस आ रहे हैं... आपके बिना स्पेशल रिपोर्ट देखने में मजा नहीं आता ...प्रोग्राम भी वैसा नहीं बनता जैसे आप बनाते है...

शशांक शुक्ला, +919716271706 said...

हर कोइ पुस्तक बेचने की जुगत में है और आज कल जिन्ना सबके फेवरेट है क्योंकि हर कोई मुस्लिम वोट के चक्कर में पड़ा हुआ है। जिन्ना के लिये मुल्क की आज़ादी जरुरी नहीं थी धर्म के लिहाज में मुस्लिमों के अलग मुल्क ज्यादा ज़रुरी था। और इसके लिये उसने माफ कीजियेगा शब्द के लिये लेकिन उसी ने देश के टुकड़े के लिये गांधी को बरगलाया और पाकिस्तान के लिये खुद को महान बनाया

Nilotpal said...

Rafiq Jakaria ne bhi Jinna ki biograpgy likhi thi - "The Man who Divided India". Unhone bhi unka mulyankan apni samajh aur drishti se poori pramanikta se kiya tha. Mere khyal se Jaswant Singhji ne bhi padhi/dekhi hogi. Pata nahin woh kya sochte hain is baare mein.

सुशीला पुरी said...

आपने अच्छा किया जो ३ किताबें एक साथ पढने की सलाह दी.......तभी सही मूल्यांकन हो ही पायेगा .

SACHIN KUMAR said...

बीजेपी नेताओं का जिन्ना प्रेम देखते ही बनता है। जसवंत सिंह ने भी अपना नाम इस सूची में डलवा लिया है। महान है जिन्ना…सेकुलर है जिन्ना...और भी बहुत कुछ है जिन्ना। आडवाणी को भी जिन्ना सेकुलर लगते है। पाकिस्तान के इतिहासकारों को कड़ी
टक्कर दे रहे है ये बीजेपी के नेता। कभी गांधी पर भी लिख लिया होता। पूरी दुनिया में उन पर ना जाने क्या-क्या लिखे गए...लेकिन गांधी पर लिखने से तो वोट सोनिया गांधी ले उड़ेंगी...किसी को जरा सा भी नहीं समझ आया तो महात्मा की जगह
सोनिया समझ लेगा और फिर कांग्रेस की जीत हो जाएगी....सो बेहतर है वैसे पर लिखो...जिसे कुछ लोग समझेंगे...जिन्ना को सेकुलर बता कर मैं भी सेकुलर की सूची में शामिल हो जाउंगा....फिर पार्टी में पूछ बढ़ेगी...एनडीए के घटक दलों में पूछ बढ़ेगी और फिर धीरे-धीरे मुस्लिम वोटर साथ आएंगे...हिंदू वोटरों को तो आसानी से हम मूर्ख बना ही देते है...कभी अयोध्या के नाम पर, कभी गोधरा के नाम पर, कभी रामसेतू के नाम पर,,,और कई मंदिर है देश में...जरूरत पड़ी तो उसे भी ले आएंगे...मूर्ख ही तो बनाना है...चलिए हिन्दू वोटों को तो इंतज़ाम हो गया...कांग्रेस को टक्कर देनी है तो कुछ मुस्लिम वोटों का भी उपाय कर लिया जाए....जिन्ना से बेहतर कौन हो सकता है....कुछ लोगों को (बीजेपी वालों को) ये समझ में आता है की हर मुस्लिम पाकिस्तान का समर्थक होता है...भारत-पाकिस्तान मैच में वो सचिन को जल्दी आउट होते देखना चाहता है और पाकिस्तान को जीतते....भाई साहब...कहां है आप...बड़ी गलती हो रही है...पूरी प्लानिंग ही चौपट है...ना तो राम मिलेंगे ना ही खुदा....आडवाणी जी ने भी गलती की थी...पीएम इन वेटिंग तो बन गए...लेकिन इससे आगे कहां तक जाते....आडवाणी अटल नहीं है वो सब जानते थे अबकी बार आडवाणी जी भी समझ गए....अब जसवंत जी की बारी है...शायद ये उम्र का तकाजा है....अटल जी भी इस उम्र ऐसा कर गए थे...मोदी पर सीधी कार्रवाई से बचते हुए उन्हे राजधर्म का उपदेश देकर छोड़ दिया था...आडवाणी जी भी जिन्ना को सेकुलर बता आए और फिर पार्टी अध्यक्ष पद बड़े बेआबरू होकर छोड़ने को मजबूर हुए....अब जसवंत जी का क्या होगा...बीजेपी तो कोई कार्रवाई करेगी नहीं...चिंतन बैठक को लेकर पहले से ही चिंता थी...अब चिंता और बढ़ गयी है... ऐसा लगता है बीजेपी ने राम प्रेम को छोड़ कर जिन्ना का राग अलापना शुरू कर दिया है...एक कार्टून छपी थी....राजस्थान की महारानी की जिन्होने इन दिनों बीजेपी आलाकमान की हालत खराब रखी है....कार्टून में लिखा है मुझ पर इस्तीफा का दबाव मत डालो वरणा मैं भी जिन्ना भर लिखना शुरू कर दूंगी....कोई समझा बीजेपी वाले को इन पर जिन्ना का भूत सवार हो गया है...ये जिन्ना-जिन्ना की रट लगाते रह जाएंगे और कांग्रेस इन्हे यू हीं दिन में तारे दिखाती रहेगी.....नेहरू भी गलत-पटेल भी गलत...वाह भाई...एक जिन्ना ने कितने भारतीय नेताओं में सेकुलर होने की होड़ मचा दी है...ना जिन्ना सेकुलर थे ना ये जिन्ना के बीजेपी प्रेमी....कोई दूसरी सब्जेक्ट लाते जसवंत जी...खूब टीआरपी होती...इसकी तो टीआरपी भी नहीं...कोई नहीं पूछता....हंगामा भी अगर मकसद है तो बहुत सारे सब्जेक्ट पड़े हैं हमारे देश में....कभी अपने नए क्षेत्र के लोगों से भी मिल लीजिए उनका भी हाल चाल ले लीजिए....कहा सेकुलरजिम के चक्कर में आप लोग पड़ते है...फायदा से ज्यादा नुकसान ही करवा लेते है...आडवाणी जी को देखकर तो कम से कम सबक ले सकते थे...लेकिन नहीं हम नहीं मानेंगे....आडवाणी तो अध्यक्ष थे....आपके पास तो कुछ भी नहीं है...पार्टी ने भी टिकट नहीं दिया था.....जबरदस्ती चुनाव लड़े थे...जीत गए तो अध्यक्ष बनना चाहते है.....पार्टी चलाना चाहते है....पीएम इन वेटिंग बनना चाहते है.....मत बनिए पीएम इन वेटिंग...बहुत दुख होता है इसमें...बनना है तो सीधे पीएम बनिए मनमोहन की तरह...अब आप तो ये भी नहीं कर सकते...आपकी पार्टी में सुषमा कोई सोनिया थोड़े ही है...वो थोड़े बलिदान करनेवाली है.....अब बीजेपी में पीएम इन वेटिंग पोस्ट के लिए भी मारामारी है....जिन्ना ही बचाए इन बीजेपी वालों से.....

Ratan Singh Shekhawat said...

जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष का सर्टिफिकेट तो नहीं दिया जाना चाहिए लेकिन ऐसी कौनसी परिस्थितियां बन गयी थी कि जिन्ना को कांग्रेस से अलग होकर अलग राष्ट्र की मांग करनी पड़ी इसकी विवेचना अवस्य होनी चाहिए और इसके लिए यदि नेहरु दोषी है तो उन पर दोष मढ़ने में दिक्कत क्यों होनी चाहिए |
फ़िलहाल जब तक जसवंत सिंह की पुस्तक नहीं पढ़ ली जाती किसी तरह की टिप्पणी करना बेमानी होगा |

JC said...

जंगल का राजा कौन? निसंदेह शेर! क्यूंकि सब जानवरों में वो - पिरामिड के समान - प्रकृति में व्याप्त विभिन्नता को दर्शाने समान सांकेतिक भाषा द्वारा उसकी चोटी पर बैठा दिखाया जा सकता है जबकि अन्य जानवर चारों दिशा में बढती संख्या में एक दूसरे के नीचे सीढ़ी की विभिन्न पायदान पर जैसे...

हर 'जानवर' का भोजन कोई न कोई उससे कमज़ोर 'जानवर' ही है, फिर भी उनका संसार चल रहा है...उनमें भी आवा-गमन का चक्र वैसे ही लागू है जैसे मानव में भी...और शायद पशु के माध्यम से प्रकृति में 'सेकुलरिस्म' क्या है जाना जा सकता है - यदि इतिहासकार अपना अपना विभिन्न राग अलापना छोड़ अंतर्मुखी हो सकें (ऐसा कह गए प्राचीन युगीन ज्ञानी जिन्होंने 'नटखट नन्दलाल' को हर एक के भीतर जाना :)

अबयज़ ख़ान said...

मज़े की बात ये है कि जिन्ना का जिन्न बीजेपी नेताओं पर ही क्यों चढ़ता है। पहले आडवाणी ने जिन्ना का चिराग रगड़ा था। नतीजा क्या निकला.. सब जानते हैं। अब जसवंत उसी चिराग को रगड़ रहे हैं। बीजेपी में एक बड़ा तबका संघ की वकालत करता है। तो आडवाणी और जसवंत जिन्ना का गुणगान कर रहे हैं। आडवाणी जी ने तो शायद मुस्लिम वोटबैंक के लिए ऐसा किया होगा, लेकिन जसवंत का जिन्ना प्रेम उन्हें पाकिस्तान का निशान-ए-इम्तियाज़ तो ज़रूर दिलवा देगा।

JC said...

इसका जवाब शायद इससे समझ में आये कि निजी जीवन में एक सभ्य माने जाने वाले प्राण नामक ऐक्टर को क्यूँ केवल विलेन के ही रोल मिलते थे?

आजाद भारत में पहले एक ही पार्टी होती थी, और उसका नाम कांग्रेस था (उसी प्रकार जैसे आरंभ में अर्धनारीश्वर शिव अकेले ही थे - अद्वैतवाद के मूल कर्णधार)...फिर शिव-पार्वती (पृथ्वी से चंद्रमा के अलग होने समान) से द्वैतवाद...और फिर उनके बच्चों आदि से अनंतवाद का आरंभ हुआ - ऐसे ही भाजपा इत्यादि अनेक पार्टी अपना अपना अलग राग अलापते दिखाई देते हैं आज (कूवों के मैंढक समान)...

sanjaygrover said...

बी जे पी वालों ने तो ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द का इस्तेमाल हमेशा गाली की तरह की तरह किया है (विश्वास न हो तो इसी चुनाव के दौरान ‘कस्बा’ की टिप्पणियां ही देख लीजिए)। अब क्या वे जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताकर उन्हें गाली तो नहीं दे रहे !?

जयराम "विप्लव" said...

इतिहास को फिर से व्याख्यायित करने का काम होना चाहिए पर न तो कांग्रेसी चश्मे से न ही भाजपाई और न मार्क्सवादी /वामपंथी . लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है . जसवंत जी हो या रविश जी या आप सब किसी न किसी वाद के चश्मे से तथ्यों को देख कर शब्दों के जाल में लोगों को फंसाते हैं .

Mahendra Singh said...

Jaswant singh dwara Jinnah ka mahimamandan karne ke vichar se koi bhi asahmat ho sakta hai Lekin Bharat aur pakistan ka batwara jis roop main hua us karan us samay ke itihas ko log apne apne najriye se vishleshit karenge. Mulk ke azadi ke itihas main jaan dene wale se kahin zyada log Mulk ke batware main mare gaye shayad yehi teesh logon ko majboor kartee hai ke kya is ghatna ko roka nahin ja sakta hai. Yadi rokna sambhav nahi tha to batware ko is tarah kiya jata ki logon ko apni jaan nahin gawani padti. Yeh baat hamari samajh bhi nahi aati ki kya jinnah ko kad itna bada tha ki unkee sadarat main kisi mulk ki tameer hotee. Yeh use tarah lagta hai ki kisi vivadit dhanche ko masjid bana diya jata hia phir sarkaren milke use dhaha deti hai.Doosre roop main hum yeh bhi kah sakte hai ki Yeh kuch kangresiyaon ki sarkar main bada ohda pane ki chahat thi aur unhone yeh vichar bana liya tha ki muslimo ko alag desh ke roop main alag kar diya jai kuonki ke yeh hamare sath nahi rah sakte. Akhir 15 Aug,1947 Ke din Rashtra pita urf Bapu Dilli main kyun nahi the.

अर्शिया अली said...

Ho sakta hai, man men chaah chhipee ho.
( Treasurer-S. T. )

Pakhi said...

Ek sath itni Books....Its tough job Uncle.

JC said...

अरे बेटा किसी ने तुम्हें अभी तक पुरानी कहावत नहीं सुनाई, "पढोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब / खेलोगे कूदोगे तो बनोगे ख़राब"?...नेहरु परिवार का इलाहबाद में आनंद भवन था और जिन्ना की मालाबार हिल मुंबई में पैट्रिक संपत्ति है - और अधिकतर 'नेता' पुराने राज घरानों से रिश्ता रखते हैं (नई बोतल में पुरानी शराब जैसे)...

खुशदीप सहगल said...

एक बहुत पुराना गीत था मंडुए तले गरीब के दो फूल खिल रहे. ऐसी ही कुछ कहानी जिन्ना के गमले में दो फूल खिलने की है. एक फूल खिलाया था आडवाणी ने 4 जून 2005 को पाकिस्तान में जिन्ना की मजार पर जाकर उन्हें सरोजिनी नायडू के हवाले से हिन्दू-मुस्लिम एकता का महान राजदूत करार देकर. वहीँ दूसरा फूल खिलाया जसवंत सिंह ने 17 अगस्त 2009 को अपनी किताब में जिन्ना के कसीदे पढ़कर. जसवंत के जिन्ना नायक है और नेहरु-पटेल खलनायक. आडवाणी संघ के तीर सहने के बाद भी पार्टी में नंबर एक बने रहे. वहीँ संघ को खुश रखने के लिए जसवंत पर आँख झपकते ही अनुशासन का डंडा चला दिया गया. कभी party with difference का नारा देने वाली बीजेपी आज party with differences बन चुकी है. इन दोहरे मानदंडो में ही बीजेपी की हर समस्या छिपी है या यूं कहिये समाधान भी.

imnindian said...

inme sabse achchi tippani mahendra ji ki lagi jahir hai wo ptrakar nahi hai. nahi to unka ek party line to pacca hoti, vested interest bhi hote. isliye unke lekh me aam admi ka dard ubhara hai, ki batware ke baad jyada log mare gaye azadi ki ladai ki tulna me.
asal me politics ka hi matlab hota hai power. koi politics me power ke liye aata hai charity ke liye nahi. JL Nehru, Jinna dono isliye hi politics me the.Jinna ko lagta tha ki muslimo ko azad bharat me pura /jyada power sharing nahi milega isliye wo alag muslim desh ki vakalat karte the. par sochne wali baat yah bhi hai ki unko kahi na kahi samarthan to mil raha tha warna wo politics se bahar hote. No wonder Nehru bhi politics me power ke liye hi the warna wo PM ka post sweekar nahi karte , kuch aur bante , koi aur post lena chahte,like home. defence. Nehru ka PM post ke liye dawedari thokna unke ambition ko darshata hai.agar bahut cruel ho kar dekha jaye to unho ne gandhi ka istemal kiya. prashn yah bhi uthata hai kyo gandhi ke bina unhone desh ki azadi ka ailan kiya, kyo wo bapu ko manane nahi gaye/ kyo congress aant me gandhi ke haath se bahar ho gayee thi ? bahut sare prashn hai.
Next mujeh sanjay grover ki tippani pasand aayee. jaswant singh ne ek kitab se nehru ko katghare me khada kardiya ki batware ke liye wo bhi jimmedar the. Ye baat to nusli wadia (jinna ke nati jo bharat me bombay dying ke malik hai) ne ek tv interview ke dauran kahithi.
theesari baat , humare desh me aaj tak hindu-muslim ekta ka nara khatam nahi hua.matab differences aaj bhi hai in dono kaum ke bheetar. congress aaj tak iski tusti karan ki raj niti kar ke satta me rahi hai.aur aage bhi rahegi kyo ki humare pass abhi better vikalp nahi hai.congress power manage karna janti hai.
waise satta me aa kar bjp ne bhi koi behtar sushasan nahi diye.
isliye aaj bhi hum do rahe pad khade hai.
last : sonia gandhi ne PM ka post sacrifice nahi kiya. kin karno se wo baan nahi paye wo bahas ka vishay hai.par power me wo rahna janhi hai, grace fully . warna media hi kyo chilllati ki asli power 10 janpath me hai, 7 race cource me nahi.
kyo sonia ji ne A P J KALAM ji ko dubara President banne nahi diya.
there is so many things. basas honi chahiye
bahas se democracy majboot hoti hai.jaswat singh par bhi honi chahiye,is tarah vnka nikale jana bemani hai.... democracy ke liye bhi.
democracy me virodhiyo ke vichar sunnane ki kshamata honi chahiye hum sab ko. ye JL Nehru hi kaha karte the....

भूतनाथ said...

आपकी बात पढ़-कर सच मन की बांछें खिल-खिल गयी....कितने खूबसूरत ढंग से आपने इस किस्से का सच बयाँ किया है.....!!

स्वप्नदर्शी said...

I think an important perspective of Partition was written by V. S Naipaul in his book "an Islamic Journey". More than Zinna, Iqbaal formulated the theory of Islamic republic and propagated it through his writings. Zinna implemented it or used the opportunity to cash this issue for his own political ambitions.

Undoubtedly, Nobody has shown the courage, and Humanity, equivalent to Mahatma Gandhi. and Gandhi and Zinna are not equivalent in any respect.
It is unfortunate that Jaswant and his colleagues are using such lowly tactics to defeat congress, it shows their political bankruptcy in ideas and leadership.

JC said...

केवल 'हिन्दू' ही जानता है "एक नूर से सब जग उपजा..." यानि जब नादबिन्दू विष्णु ने श्रृष्टि की रचना ब्रह्मनाद (Big Bang) से करी तब आरंभ में विष, जो विष्णु के भीतर सिमटा हुआ था, चारों दिशा में फैल गया...देवता और दानव दोनों त्राहि त्राहि कर उठे और शिव (विष का उल्टा) से प्रार्थना करने पर उन्होंने विष, हलाहल या कालकूट, को अपने गले में धारण धारण कर लिया और नीलकंठ (दिगंबर) कहलाये...फिर कालचक्र के साथ श्रृष्टि/ विश्व कि उत्पत्ति संभव हो सकी और अनंत ब्रह्माण्ड अनंत काल से आज भी हमारे सामने उपस्थित है ("प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं"!) जबकि पृथ्वी पर अस्थायी जीवों का आवागमन अनंत काल से चालू है...

उपरोक्त को ध्यान में रख, क्या किसी को भी 'बुद्धजीवी' कहा जा सकता है जो केवल सतह पर उठती अस्थायी लहरों को ही देखने की क्षमता रखता हो???? और अक्षर 'ज' से आरंभ होने वाले, जवाहर, जिन्ना, आदि क्या सब चंद्रमा को पृथ्वी से बाहर करने के लिए, यानि पृथ्वी का बटवारा करने के लिए भी दोषी ठहराए जा सकते हैं???

प्राचीन 'ज्ञानी हिन्दू' आदमी को ब्रह्माण्ड/ गंगाधर पृथ्वी का स्वरुप कह गए और सबको अपने मस्तिष्क के भीतर ही विद्यमान 'मानसरोवर' को खोजने का उपदेश दे गए...अफ़सोस आज के 'वर्तमान बुद्धजीवी', कस्तूरी मृग समान, भटकने को ही अपना गंतव्य मान बैठा है...(नटखट नन्दलाल, यानि कृष्ण इसके लिए अज्ञानता को दोषी ठहरा गए, पर आज, कलिकाल वश, 'गीता पर हाथ रख सत्य बोलने की कसम खाने वाला हिन्दू' असत्य ही बोलता है - रसना के दोष के कारण क्यूंकि ड्रामा में 'विदूषक' का रोल भी महत्वपूर्ण है :)

"पहले आती थी हंसी हर बात पर/ अब किसी बात पर नहीं आती"...

Mahendra Singh said...

Abhi parso ek TV channel main yeh bahas ho rahi thi ki jaswant singh ne yadi patel ji ko na lapeta hota to BJP unhe parti se nahi nikalti.Kyonki Patel ko log bahut izzat dete hai.Jaswant singh ji kahte hai ki RSS par sabse pahle pratibandh Patel ji ne lagya tha aur muslim league ko chod diya.Gulam Bharat ka Itihas Angrejo aur kuch hindustaniyano nelikha likha. Azad Bharat ka Itihas congresiyon ni likha. Nehru ke khandan ke log aaj tak shashan main hai. Unkee khamiyan nikalne ka kisi ko koi mauka nahi mila. NDA ko mauka mila to Woh itna hi kar sake ki unhone Bhagat singh ko atankwadi se krantikari bana diya.

JC said...

टीवी पर चर्चा करने वालों, या जसवंत सिंह से क्या कोई पूछ सकता हैं कि भगत सिंह पहले आया कि 'भगवान' श्री विष्णु? या 'जगदीश' पहले आया कि जवाहर लाल या जिन्ना?

इंटरवल के बाद सिनेमा हॉल में घुस, थोडी सी पिक्चर देख, क्या कोई रहस्यमय फिल्म की पूरी कहानी सुना सकता है जिसका अभी अंत चाहे निकट ही क्यूँ न हो? मीडिया के अनुसार अंत अब निकट ही है क्यूंकि बर्फ पिघल रही है, आधा भारत सूखे की चपेट में है, आवश्यक वस्तुओं के दाम आकाश छू रहे हैं और सरकार भी आकाश की ओर ही देख रही है...प्राचीन 'माया सभ्यता' ने भी २०१२ के बाद कैलेंडर बनाया ही नहीं, इत्यादि इत्यादि...

shashank sharma said...

baat sirf jaswant singh ki nahi hai.unke jaise kai log hain jo itihaas ko apni tarah se sabit kar lena chahte hain.jinna ko lekar bawaal mach raha hai par un logo ka kya jo har baar aate hain aur hamare gaal par aatankwad ka tamacha maar kar chale jate hain...aur kahte hain ki hum to tumhe aise hi maarenge jo kar sakte ho kar lo..afjal, kasab, dawood aur na jane kitne.....kal sirf ek pakistan bana tha, aaj bikhre to tukde gine nahi jayenge.
.......aur kisi leader me dtermination nahi ki ek sakht kadam utha le.....

shashank sharma said...

sahi mayno me secular to koi nahi...media walon k liye secularism ka matlb sirf minorty ki baat karna hai.agar bat karni hai to sabhi ki karo.aaj jinna pe bawaal machaane ki bajay afjal, kasab aur daawood jaise logo se niptane ki bat honi chahiye.....inka goernment kuch kar nahi sakti kyunki yahan vote bank juda lagta hai.....aatankwadi har bar yahi kahte hain ki hum to tumhe aise hi marenge tum jo kar sakte ho kar lo.....
vyapak socho mere yaaro.....

pragya said...

aapka lekh padker kafi jankaari mili ..

Pankaj Upadhyay said...

जानकारी के लिये धन्यवाद....फ़ीड से आपकी पिछ्ली ४-५ पोस्ट्स एक सास मे पढ डाली....

और राजनीति से और मन भर गया...आज के इस आइडिया युग मे भी हम राजनीति मे आइडियाज़ नही ला पा रहे है...

शिशिर उइके (वनमानुष) said...

इतिहास का एक तथ्य बड़ा ही रोचक है-
"टू नेशन थ्योरी" को सपोर्ट करने वाले प्रथम व्यक्ति "मुस्लिम लीग के सर्वेसर्वा जिन्नाह" थे तथा इसे सपोर्ट करने वाले दुसरे व्यक्ति "हिन्दू महासभा के अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर" थे.