धर्म का धन-जागरण- भगवती जागरण बनाम साईं जागरण

भगवती जागरण बल्कि सौवां विशाल भगवती जागरण हमेशा मेरे भीतर रहस्य पैदा करता रहा है। कुछ ईमानदार होते हैं जो लिखने में शर्माते नहीं कि उनका विशाल भगवती जागरण पांचवां है। लेकिन कोई भी अपने जागरण को विशाल से कम नहीं बताता। हर जागरण विशाल क्यों हैं,यह जानने की बेचैनी मुझे दिल्ली की सड़कों पर भटका देती है।

जागरण की दुनिया पर बहुत शोध हुए हैं। मज़दूर वर्ग और व्यापारियों का काम शाम को ही बंद होता था। उसी के बाद शाम की आरती,भजन-कीर्तन और जागरण के लिए स्पेस बनता था। हमारे शहरी जीवन में ये सब इसी तरह प्रवेश करते रहे हैं। लेकिन जागरण की दुनिया बदल गई है।

दिल्ली में होने वाले विशाल भगवती जागरणों की जगह माता की चौकी लेती जा रही है। भगवती जागरण काफी लंबा चलता है। रात के बारह बजे से लेकर सुबह तक। क्योंकि भगवती जागरण में तारा रानी की कथा सुनाई जाती है जो चार बजे सुबह के वक्त ही शुरू होती है। अब दिल्ली बदली है। शाइनिंग इंडिया का रूप बदला है तो सबको बदलने वाला टाइम भी बदल गया है। रिज़ल्ट ये आउट हुआ कि लोगों की दिलचस्पी समय की कमी के कारण भगवती जागरण में कम हुई है।

नतीजा जागरण अब भी विशाल तो कहे जाते हैं लेकिन इनका लघु रूप कुछ सालों से लांच हो चुका है। माता की चौकी। इस नाम से कोई सीरीयल भी है। मैंने आज माता की चौकी, जागरण करने वाले पंकज शर्मा जी से बात की। अधूरी रह गई। पूरी बात बाद में होगी लेकिन सोचा लिखता हूं। कच्चा पक्का। शर्मा जी ने बताया कि टाइम नहीं है जी। इसलिए माता की चौकी लगाते हैं। मैंने पूछा ये क्या है। बोले कि कुछ नहीं इसमें सिर्फ तारा रानी की कथा नहीं होती। माता की चौकी दो तीन घंटे में खत्म हो जाती है। ये आप छह से नौ, नौ से बारह या बारह से तीन के टाइम से करा सकते हैं। बिल्कुल सलीमा के शो की तरह। वाह।

मेरी दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी। मैंने अब नेट पर जागरण सर्च करना शुरू किया। भला हो गूगल का। देवी मंदिर डॉट कॉम पर पहुंच गया। इसमें माता की चौकी की कहानी कुछ यूं है दोस्तों। आप इस कथा की कैटगरी में आते हैं तो ज़रूर करवाइये। क्या पता आपका इसके ऊपर की कैटगरी में प्रमोशन हो जाए। ध्यान रखिये आप कितनी भी अमीर क्यों न हो गए हों फार्च्यून फाइव हंड्रेड में नहीं पहुंचे तो क्या खाक अमीर हुए।

तो कनाडा से चलने वाली साइट देवी मंदिर डॉट कॉम जी हमें बता रहे हैं। दुर्गा सप्तशती में लिखा है कि अगर लोग साल में एक बार माता की चौकी लगायें तो उन्हें धन मिलेगा,काबिल बच्चे होंगे और बाधाएं दूर हो जाएंगी। अब आगे बताया जा रहा है कि माता की चौकी कैसे करें। चार घंटे की पूजा होती है जो भगवती जागरण की तरह रात भर नहीं चलती है।

माता की चौकी के लिए हम उनको आमंत्रित करते हैं जो बेहतर सुर में माता जी को समर्पित भजन गाने में सक्षम हों। चूंकि हम सब को सुर नहीं मिला है इसलिए अच्छे गायकों से माहौल बनता है। भक्ति का माहौल। तभी मां का आशीर्वाद मिलेगा। ( धंधे का जुगाड़ हो गया न) दूसरा तरीका है दान के ज़रिये। बिना दान के हम बाधायें दूर नहीं कर सकते। वेदव्यास ने कहा है कि कलियुग में दान ही उत्तम है। रामचरितमानस में तुलसीदास ने कहा है कि कलियुग में दान ही उत्तम है। वाह। सब कलियुग के अधर्मी टाइम के लिए धर्म का रास्ता सुझा गए। ग्रेट। जब तक धर्म से रोजगार के अवसर पैदा होते हैं( अंधविश्वास को छोड़ कर) मुझे कोई खास प्रोब्लम नहीं है। इसके आगे धर्म को कुछ मानता भी नहीं। हमारी संस्कृति के कई हिस्सों को अपने इन कर्मकांडों के ज़रिये ढो कर यहां तक लाया है इसलिए एक वाहक के रूप में धर्म के प्रति थोड़ा बहुत रेसपेक्ट है।

लेकिन ध्यान रहे। यहां से एक और चेंज यानी बदलाव एंटर कर रहा है। साईं बाबा का जागरण। भगवती जागरण वालों की जितनी डिमांड नहीं है उतनी साई भजन वालों की है। आजकल दिल्ली में साईं भजन की डिमांड खूब है। एक जागरण गायक ने बताया कि फिफ्टी फिफ्टी है जी। काफी पोपुलर हो रहा है। रिज़न यानी कारण। जवाब मिला कि सूफी टाइप के कुछ भजन है जो परेशान लोगों को अच्छे लगते हैं। बाकी तो वही भजन है तो दुर्गा जी के हैं। उन्हीं मे जोड़-मोड़ कर साईं भजन बना देते हैं।


भजन की दुनिया बदल रही है। मेरी पड़ताल अधूरी है। जल्दी ही पूरी रपट प्रकाशित करूंगा। धर्म की दुनिया कर्मशियल होकर टैरिफिक हो जाती है। आई लाइक दिस वर्ल्ड। नॉट फॉर प्रेयर बट फॉर पर्पस।

18 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत अच्छी धार्मिक रपट है।

JC said...

कहानी वो ही पुरानी है: आदमी के सम्पूर्ण ज्ञान को कभी नहीं पाने की, बस पोथी पढ़ पढ़ रह जाने की - भले ही कितनी भी 'तरक्की' करले और नए नए उपकरण बनाले...काश मोबाइल फ़ोन आदमी के पेट की भूख भी समाप्त करने में सक्षम होता...गरीब किसान आत्महत्या न कर रहे होते...यह तो किन्तु साफ है कि 'नेता' अपनी सात पुश्तों कि भूख ही समाप्त कर सकते हैं, आम आदमी की नहीं...

"जायें तो जायें कहाँ/ समझेगा कौन यहाँ/ दर्द भरे दिल की जुबां?"

किसी की भी चौकी हो, सुबह प्रसाद तो मिल ही जाता है :) फिर चौकी रोज क्यूँ नहीं - हर चौराहे पर?

मुनीश ( munish ) said...

देवताओं की उपासना से संसारी कामनाओं की पूर्ति १००%होती है ! जो लोग सारी दुनिया को चूना लगा दें वो लोग यूं ही इन कर्मकांडों को आयोजित करने में नहीं लगे होते और बिन फायदे के उनसे कोई कुछ करवा नहीं सकता . लेकिन हाँ , ये न तो अध्यात्म है , न ही धर्म है और न ही इस से शांति मिलती है और न ही कल्याण होता है . ये व्यापार है , देवताओं को दो और बदले में और लो .

मुनीश ( munish ) said...

Ur observation on changing trends of Jagratas is no doubt valid and very true and it all started in the decade of Seventies.

जयराम "विप्लव" said...

sab market ka khel hai . is tarah ke aayojno ka ek bada bazar hai desh mein . mujhe aashchary hua tha jab pahli dafa delhi mein dekha ki is dauram puje jani wali murtiyan bhi bhade par aati hai .

जयराम "विप्लव" said...

http://www.janokti.com/?p=492


see this sir !

sanjaygrover said...

बचबचा कर अपनी बात कही है आपने। जानकारी सही है कि साईं इज़ मोर पापुलर दैन माता ई.टी.सी. नाउअडेज़। वैल्ल, हमारे एकाध वैज्ञानिक मित्र भी साईं लीन हैं क्योंकि सांई सैकुलर कैटेगरी में आ जाते हैं। बाई द वे, अंजाम सबका वही होता है। कबीर शरीर छोड़ते हैं तो हिंदू-मुसलमान झगड़ पड़ते हैं और बाडी की जगह जो फूल मिलते हैं, फिटी-फिटी के रेश्यो में डिवाइड कर लेते हैं। अब देखना यह है कि कबीर, बुद्ध, अंबेडकर, माक्र्स, वगैरहा के नाम पर जागरण शुरु होने में इत्ती देर क्यों लग रही है !? बीजेपी तक ने कोई पहल नहीं की ! बहुत डिले हो रहा है।

अर्शिया अली said...

Jaagran matlab ....
{ Treasurer-S, T }

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

दुर्गा सप्तर्षी नहीं जी दुर्गा सप्तशती है!!
लेकिन उसमें माता की चौकी/जागरण के बारे में कहीं कुछ नहीं लिखा है। सब ग्राहक को प्रभावित करके माल बटोरने के धन्धे बना रखे हैं लोगों नें!!

विजय प्रकाश सिंह said...

रवीश जी, ७० के दशक का हाल भी लिखियेगा | जब चंचल जैसे स्टार इसी जागरण से बने |

विजय प्रकाश सिंह said...

रवीश जी, ७० के दशक का हाल भी लिखियेगा | जब चंचल जैसे स्टार इसी जागरण से बने |

anil yadav said...
This comment has been removed by the author.
anil yadav said...

जब तक धर्म से रोजगार के अवसर पैदा होते हैं( अंधविश्वास को छोड़ कर) मुझे कोई खास प्रोब्लम नहीं है। इसके आगे धर्म को कुछ मानता भी नहीं। ....
हां साहब आप धर्म को कैसे कुछ मान सकते हैं क्योंकि आप छद्म धर्मनिरपेक्ष पत्रकार हैं और आपको तो अभी पत्रकारिता में कई नए मील के पत्थर स्थापित करने हैं जो कि अपने आप को नास्तिk और नकली कम्युनिष्ट घोषित किए बिना संभव ही नहीं है....चिंता मत करिए इस रेस में आप अकेले नहीं है....

सतीश पंचम said...

Micro पूजा का दौर भी रोचक होता है। पंडित की आवाज और मंत्र उच्चारण की क्रिया देख लगता है कि भुनभुना रहा है, सुनने वाले डाईबिटीज ग्रस्त भक्त को देख लगता है कि छूटते ही पहले बाथरूम भागेगा, और प्रसाद लेने वाले भक्तों को लगता है प्रसाद जल्दी मिले तो घर जाउं, कपडे प्रेस करवाना है, सब्जी लाना है, रास्ते में जाते हुए टूटी चप्पल बनवाना है.....वहां तक तो घिसटते हुए चप्पल चली ही जाएगी......दूध भी लेना है औऱ क्या कहा था बचलाल की माई ने...हां...सवाईन फूलू वाला मास्स भी लेना है :)

Micro पूजा में एसे Micro चिंतन आ ही जाते हैं :)

मुनीश ( munish ) said...

@ Satish Pancham --U 've got d' style sir ji , u have it ! Style can;t be bought and u HAVE it !! What a bomb comment,what a marvellous hit!

सतीश पंचम said...

@ मुनीष जी,

धन्यवाद मुनीष जी। बस लिख डाला.... जो मन ने कहा :)

मुनीश ( munish ) said...

@ Satish Pancham-- This is ur modesty , but wat a picture of words u weave , superb !

JC said...

"आया था किस काम को/ सोया चादर तान रे"...

'जागरण' शब्द स्वयं ही प्रतिबिंबित करता है मानव का हर क्षण सुप्त अवस्था में ही गुजार देने की...

कई विदेशी प्राचीन भारत में आम आदमी को प्रश्न करते देख दंग रह गए कि वो कहाँ से आया है? क्या उसे यहाँ किसी ने भेजा है? यदि हाँ, तो किस काम के लिए? क्या वो कार्य सम्पन्न हो जाने पर उसे कहीं और जाना है? इत्यादि इत्यादि...

सत्य जानने हेतु दूसरों कि आँख से देखना पड़ेगा शायद और क्या ही बढ़िया हो जब वो त्रिनेत्र-धारी शिव की आँख हो! किन्तु उनके अनगिनत रूप भटकाने का ही काम करते हैं - कह गए ज्ञानी :)

स्वामी रंगानाथनन्द के मुंह से पचास के दशक के अंत में सुना कि कैसे हम भारतीय सीधे केंद्र पर नहीं पहुँचते, और जैसे हम बताते हैं कि जूता हमें कहाँ काट रहा है वैसे ही नहीं बता पाते हैं जब अध्यात्मिक विषय पर चर्चा करते हैं...