पेन्टागन और कुम्भ में क्या संबंध हैं?




कुंभ कलश से छलकी अमृत बूंदों से भावी काल में मॉल बनेंगे इसकी कल्पना किसी वेद-पुराण ने क्यों नहीं की,नहीं मालूम।किसी ब्लॉग या अख़बार में एक लेख पढ़ रहा था कि उत्सवों को बाजार यानी मार्केटिंग की ज़रूरत नहीं पड़ती। लेकिन मार्केटिंग को उत्सवों की ज़रूरत पड़ती है। हम कितना भी संचय कर लें,ऐसे मौकों पर दान देकर खुद को महादानी समझने का अहसास ज़रूर पाना चाहते हैं। अपने उन तमाम जाने-अनजाने पापों को याद करते हुए जेब से जब एक अठन्नी निकल कर भिक्षापात्र में खनकती है या नदी में प्रवाहित होती है तो लगता है वाकई कोई सज़ा चोरी छुपके काट ली है। कुंभ की शुरूआत हो रही है। देव-असुरों के युद्ध को छोड़िये कोक-कपड़ों के युद्ध के शिकार होकर कुछ दान कर आइये। हरिद्वार से ऐसी कई तस्वीरें आप लोगों तक ले कर आऊंगा। एनडीटीवी इंडिया पर भी रिपोर्ट देख सकते हैं। शाम के किसी वक्त। अभी वक्त तय नहीं है लेकिन आ ही जाऊंगा। आध्यात्म की इस सनातन यात्रा में शामिल होने जा रहा हूं। उसके सार को समझने के लिए उसी में विलिन हो जाऊंगा। कभी छिटक कर बाहर से भी देखूंगा। संत होना आईएएस होने से कम है क्या वैसे। बाबा नाम केवलम।

12 comments:

मधुकर राजपूत said...

त्यौहार पर सजने की पुरानी परंपरा है भारत में इसलिए बाज़ार को त्यौहार का इंतज़ार रहता है।

शशांक शुक्ला said...

आपको क्या लगता है कि बाज़ार त्यौहारों को यू ही बढावा देते है, बजा़र सिर्फ खरीददारी करवाने का मौका ढूढते है

अजित वडनेरकर said...

हरिद्वार के रूप न्यारे हैं।

JC said...

रवीश जी ~ पेंटागन का मतलब होता है पांच सामान्य रेखाओं से बनी एक आकृति. और हिन्दू मान्यतानुसार इस अनंत ब्रह्माण्ड में कोई भी भौतिक आकार की बनावट में, और उसके अस्तित्व के पीछे भी, केवल पंचतत्व या पंचभूत का हाथ होता है: पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि, वायु, एवं जल - जिसमें निराकार वायु के बाद साकार, जीवनदायी, जल का महत्व कौन नहीं जानता? भले ही वो किसी भी मत का हो, केवल हिन्दू ही नहीं.

"जल ही जीवन है" यही हिन्दुओं द्वारा अमृत भी कहलाया गया, और इसका श्रेय विष्णु के 'मोहिनी रूप' चन्द्रमा को दिया गया [गंगा चन्द्रमा से ही - भागीरथ/ भागीरथी(?) के अथक प्रयास से - अवतरित हुई इस शिव रुपी धरा पर 'सागर राज के पुत्रों', यानी काल-चक्र में फंसे सभी प्राणी, को फिर-फिर जीवन दान देने को ;]

जय माता दी :)

archana said...

Ravish Ji

Waise to ganga mein ja na jaane kitni baar snan kia hai kyunki mera gaon ganga kinare basa hai, lekin Aaj tak kabhi kumbh mein snan nahin kiya hai, soch rahi hoon iss baar main bhi apnae saare paap ganga mein dho loo.Isiliye Kumbh ki reporting ke saath saath wahan kahan thahra jaye, khaya jaye aadi baaton ki bhi reporting kijiyega, taaki hum jaise log aasani se kumbh ki yatra kar paaye.

kirtan said...

yah hoti hai patrakarita. apke bhitar ke patrakar ko salam.Kya kumbh bhi ab bazar banta ja raha hai?

lamho ki guzarish said...

बाजारवाद के इस समय में अपनी आस्था का छौंका लगा कर हम खुद को अपने अपराध-बोध से मक्त करने की ऐसी नाकाम कोशिश करते हैं।
स्मिता मुग्धा
भारतीय जनसंचार संस्थान

प्रबल प्रताप सिंह् said...

very nice.

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

बाजारवादम केवलम

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

रवीश जी ,
नमस्ते -
नव - वर्ष पर , शुभकामना
आपकी पैनी नज़र ने ये विरोधाभास भी देख लिए -
- आगे आपकी रिपोर्ट पढने की प्रतीक्षा रहेगी
हमारे देश में, इसी तरह,
कोइ भी नाम
किसी भी व्यापार के साथ प्रयुक्त किया जाता है --
यहां "पेंटेगोंन " -- नाम
पसंद किया गया -
- सब के मन की मौज निराली है
- लावण्या

KARMWAR said...

I Want state only that festivals with fair like kumbh is unique property of Indian culture . but matter of donation is direct link to advance booking of seat in sawarg after lossing all critiria of eligibility as well. so some people searching place ,media,or bahaana to do same in liu of peace of soal name as atma ki santi .but why and how aatma get asant? is here any solution for this? this solution may hamper some but best enough for more . if i hertz any body than please pardon me .this my right of expression too?

Sandeep Mamgain said...

haridwar mein to mahakumbh 12 saal mein hota hai, aajkal to MALL hi mukhya Kumbh-sthali hain,
,, "Mall adhunik Teerh-sthal hai"