सभ्यता






सभ्यता के मतलब बदल रहे हैं। गाय कूड़ेदान से खा रही है और इंसान को कूड़ा फेंकने पर असभ्य कहा जा रहा है। पहली तस्वीर हरिद्वार के घाट की है और दूसरी राम झूले के पास की है। गाय का खाना पीना बदल गया है। बचपन में कई सालों तक गाय को पहली रोटी खिलाई है। मां दे देती थी और हम गाय को खिला आते थे। बाद में पता चला कि इसी पहली रोटी को पिछली रोटी कहते हैं। जब पहली रोटी के ऊपर बाकी रोटियों का थाक लग जाता था तब पहली पिछली हो जाती थी। ऊपर की रोटियां गिनती में आगे हो जाती थीं। हम सब कूड़ा उत्पादक शहरी सभ्यता में रह रहे हैं। इन संदेशों को देखकर यही लगता है कि भारत एक कृषि प्रधान नहीं बल्कि संदेश प्रधान देश है।

10 comments:

Aadarsh Rathore said...

क्या बात है

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

कूड़ा हर जगह, हमारी राष्ट्रीय पहचान है।

एस. बी. सिंह said...

बात कूड़े से बड़ी गाय के कूड़ा खाने और हमारे संस्कारहीन होते जाने की है। गाय को पहली (पिछली ) रोटी खिलाने की बात पर रवीश जी आप पिछड़े कहलाओगे।

JC said...

बहुत सही बात कही, "भारत एक ...संदेश प्रधान देश है"...किन्तु सतही रूप में किसी अज्ञानी मानव-श्रृंखला के एक, समय द्वारा की गयी, कमज़ोर कड़ी के माध्यम से लिखे सन्देश पढ़ सत्य का अनुमान किसी or युग में लगाना मूर्खता कहलाई गयी है...प्राचीन ज्ञानी लाइन के बीच में पढने का सुझाव दे गए - जो आधुनिक ज्ञानी की समझ के बाहर है...क्यूंकि काल की गति युग के ant में - प्रकृति के स्वाभाव के anusaar - tej ho jaati है...gaya का kooda khaana dikhai pada किन्तु aadmi का 'junk food' khaana एक garv की बात ;)

jaya go maata की :)

sanjaygrover said...

रवीश जी, कई बार आप ऐसी बातें लिख देते हैं कि हैरानी होती है कि आपने लिखी हैं। व्यापक संदर्भ में यही कहना चाहूंगा कि चाहे किसी भी धर्म-समुदाय के लोग हों अगर जानवर को इंसान पर तरजीह देते है तो कम-अज़-कम उन्हें तो यह शिकायत नहीं ही करनी चाहिए कि इंसान जानवर जैसा क्यों होता जा रहा है।

JC said...

एक समय था जब गाँव और कस्बों में रहने वाले हिन्दू 'गौ माता' को रोटी खिलाते थे - उनके दूध का ऋण चुकाने - अधिकतर बच्चों के माध्यम से, जिससे उनमें भी बड़े हो त्याग की भावना और अन्य प्राणियों के प्रति प्रेम बना रहे...कुमाओं आदि के पहाड़ों में जाड़ों में बेचारे काले (कृष्ण) कव्वों को शुद्ध घी के पकवान खिलाते थे मकर संक्रांति के दिन...

आज के आधुनिक बच्चे बड़े बन गए, नक़ल कर पास तो हो गए, किन्तु अज्ञानता वश प्रश्न करने तो लगे हैं, वैज्ञानिकों की भांति: क्यूँ? क्या? इत्यादि ;) यदि देर से ही समझ आजाये तो भी कोई खेद नहीं, किन्तु 'आधुनिक ग्यानी' तो समझने को तैयार ही नहीं दीखता - जैसे घोड़े समान उसके किसी ने आँख के दांये-बांये पट्टे लगा दिए हों, या तथाकथित 'कूप मंडूक' समान सीमित तारे ही...

गौ माता का बहरी आँखों से कूड़ा खाना तो दिखाई पड़ता है आम आदमी को, किन्तु खुद का उसी भाँती 'जंक फ़ूड' खाने पर पर्दा उठाने में कष्ट होता है, क्यूंकि वो केवल अंदरूनी आँखों (आतंरिक चक्षु) से ही दिखना संभव है ;)

जैसे मैंने पाया, दिल्ली में बहुत अवसर मिलते हैं यह देखने को कि कैसे कई प्राणी, आदमी से चूहे तक, कूड़े के एक ही ढेर में से अपने-अपने लायक कुछ न कुछ उपयोगी पदार्थ पा लेते हैं. जैसे विभिन्न समाचार पत्र / ब्लॉग आदि से भी पाया जा सकता है, यदि चाह हो...मानो तो गंगा मैय्या नहीं तो मैला पानी ;)

जय (निराकार) माता क़ी कहना पड़ेगा?!

डॉ टी एस दराल said...

सभी सभ्य नागरिक कूड़ा कूड़ेदान में ही डालते हैं।
लेकिन गाय कूड़ेदान से क्यों न खाए, जब कूड़ेदान में लोगों के झूठे बचे हुए पिज्जा, परांठे , सब्जियां और नॉन-वेज भी खाने को मिल जाये।
हम शहर के राइस्ज़दे जितना खाते हैं, उससे ज्यादा झूठा छोड़ने में शान समझते हैं।

Pratibha said...

ravish ji...
amar ujala me aap ke ek post 'lekhak bara ya geetkar'par jo pratikriya de gai h..agar aap ko asuvidha na ho to kya aap mujhe us post ki link bhej dege..aap ke blog me mujhe wah post nahi mil pai h..
mera e-mail..pkushawaha.6@gmail.com

अज्ञात... said...

रवीशजी। सभ्यता अच्छा लगा देखकर। वैसे ऊपर वाले फोटो की हिन्दी के भी क्या कहने? समझ नहीं आता नागरिक... नागरिग कैसे बन गया। वाह री हमारी हिन्दी... सोचता हूं हिन्दी की इस बरबादी के लिये आखिर रोया किस पर जाये? अपने आप पर, क्योंकि हम पढ रहे हैं या उस पर जिसकी आज्ञा से लिखा गया है या फिर उस पेंटर पर जिसने इसे लिखा या और फिर उस पर जिसने इसे जांचकर लगवाया.... सलाह दें... हिन्दी की दुदर्शा पर रोने का मन कर रहा है।

JC said...

अज्ञात जी को 'ग' ('गन्दगी') तुरंत दिखाई पड़ गयी...सच कहूं तो मैंने हर बार 'नागरिक' ही पढ़ा था! 'प्रूफ रीडिंग' अच्छी की...

वैसे पढने का सत्य यह है कि हर व्यक्ति, जो किसी विशेष भाषा के माध्यम से पढ़ा-लिखा होता है, वो हर अक्षर को नहीं पढता, यद्यपि बचपन में, आरंभ में, एक-एक अक्षर पढता है ऑर फिर पूरा शब्द पढता है. बाद में, किसी स्थान पर सही शब्द उसको लगता है, वो ही पढता है...इसी कारण प्रूफ रीडर की आवश्यकता होती है. और समाचार पत्रों आदि में भी त्रुटि फिर भी रह ही जाती है कई बार...इस पर अपने छः भाई-बहनों में सबसे छोटे भाई का एक उदाहरण याद आ गया:

वो जोर-जोर से दोहराए जा रहा था, "नदी कल कल (कौ ल कौ ल) करके बहती है." हमारे सबके कान 'खड़े हो गए'. उसको हम भाई-बहनों ने सबने सही करना चाहा. वो 'क' और 'ल' को सही बोला 'कल'...इस पर बड़े भाई ने पूछा कि यदि दो 'कल' को मिला दो तो क्या बनेगा? उत्तर में उसने बाल सुलभ अंदाज़ में कहा, "परसों!"...हम सब हंस पड़े, और वो रोने - बेईज्ज़ती हो जाने पर ;)