दिल सा कोई कमीना नहीं...दिल तो बच्चा है जी..

इश्क की अनगिनत नाकाम कथाओं के इस देश में सामाजिक बंधनों को सहलाने वाली तमाम कथाएं, गाने और तस्वीरें मन को सहलाती हैं। शादी की दहलीज़ पर पहुंचने से अनगिनत प्रेम के पल भ्रूण हत्या के शिकार हो जाते हैं। अहसासों को गरम कर उन पर पानी डालने वाला हमारा समाज रिश्तों में बंधकर उसमें बुढ़ा कर मर जाने वाली प्रेम कहानियां पैदा करता है। इसीलिए फिल्मी परदे में प्रेम कथाओं का अनंत सफर जारी है। एक नई कथा आ गई है। विशाल भारद्वाज और अभिषेक चौबे लेकर आ रहे हैं। इश्किया। प्रोमो और गाने ने मन मोह लिया है। जब भी दिल तो बच्चा है जी, कानों तक पहुंचता है, सब कुछ रूक जाता है। एक एक अल्फाज़ के पीछे मन चलने लगता है। म्यूज़िक में जब गिटार के तार झनझनाते हैं और हारमोनियम से निकली कोई बांसुरीनुमा धुन किसी जानी पहचानी इश्किया तकलीफों से जोड़ देती है तो गाना अंदर ही अंदर अमर होने लगता है। गुलज़ार के पास न जाने अहसासों का कितना बड़ा खजाना है जो आज तक भरा ही लगता है। विनीत और पंड्या के लेख के बाद भी लिखने का मन कर रहा है। आखिर कैस रोक लूं खुद को इस लाइन के सुनने के बाद----

हाय ज़ोर करे,कितना शोर करे
बेवजह बातों पे ऐं वें ग़ौर करे
दिल सा कोई कमीना नहीं
कोई तो रोके,कोई तो टोके
इश्क में अब खाओगे धोखे
डर लगता है अब इश्क करने में जी
दिल्ली तो बच्चा है जी,दिल्ली तो बच्चा है जी
थोड़ा कच्चा है जी,दिल्ली तो बच्चा है जी

अभिषेक चौबे ने इस गाने को बेहद खूबसूरती से फिल्माया है। जब पहली बार देखा तो लगा कि वाह। जब बार बार देखा तो और लगा..वाह। ऐसा गाना सुनने को मन करता है जी। अच्छा लगता है जी। सुंदर लगता है जी। सच्चा लगता है जी।

विशाल भारद्वाज के सीने में पश्चिम उत्तर प्रदेश के समाज का हिंसक चेहरा अटका हुआ है। ओमकारा के बाद लगता है एक बार फिर वो अपने दर्द को हलका करेंगे। नैना सूरमा और तमंचा किसी मेट्रो में पले बढ़े कहानीकार के सामान नहीं हो सकते। तभी तो ऐसे संवाद हैं- हमारे गांव में चूतड़ धोने से पहले तमंचा चलाना सीखाते हैं। प्रोमो फिल्म को देखने के लिए उकसा रहा है।

दो चोर एक ऐसी जगह में फंस जाते हैं जो सुरक्षित नहीं हैं। दो चोरों के बीच एक अल्हड़ सी दिखने वाली बालन है। उसकी बतियाती आंखें और दो अलग अलग उम्र के नायकों के साथ इश्क की सहजता। सीधा पल्ला की साड़ी। लंबे बाल। चूड़ीदार चोटी वाले। एक साहसिक फिल्म लगती है। वर्ना एक औरत दो मर्दो से बराबरी से प्रेम करते हुए कब पर्दे पर देखी गई। मेट्रो शहरों की कई सच्ची कहानियों में ऐसी लड़कियां हैं मगर छुप छुप कर। उनके साथी मर्दों को भी पता है मगर छुप छुप कर। सामंती समाज के कोठों पर एक औरत के कई आशिक रहे हैं। मुझे पता भी नहीं कि विद्या का किरदार तवायफ का है या एक आजाद औरत का। जो अपने संबंधों का फैसला और अंजाम दोनों खुद तय करती है। इश्क का फैसला उसका अपना है या बंदूक की कमज़ोरियों का। यही सवाल फिल्म देखने के लिए बेचैन करेंगे। लेकिन जब वो औरत बंदूक चला कर अपने आशिकों को ढेर करती हुई लगती है तो कहानी एक बार फिर से ओमकारा फ्रेम में घुस कर कुछ ढूंढने लगती है।

लेकिन प्रेम के इन अंतरंग और नितांत शहरी लम्हों को गांव या छोटे शहरों की सेटिंग में सहजता से फिल्माने का साहस विशाल भारद्वाज कर सकते हैं। अभिषेक चौबे के बारे में नहीं जानता लेकिन लगता है कि उन्होंने इस कहानी को खूब समझा है। लिखते लिखते गाना यहां आ पहुंचा है...

प्रेम की मारे कटार रे
तौबा ये लम्हे कटते नहीं क्यों
आंखो से मेरी हटते नहीं क्यों
डर लगता है मुझसे कहने में जी
दिल्ली तो बच्चा है जी

एक और गाना हिट होने जा रहा है। इब्न बतूता का। फिल्म चलेगी,लगता है। मैंने फिर से इस गाने को रिवाइंड कर दिया है....

ऐसी उलझी नज़र उनसे,हटती नहीं...
दांत से डोर रेशम की कटती नहीं....
डर लगता है इश्क करने में जी..
दिल तो बच्चा है जी..

क्या बात है,साल की शुरूआत बेहतरीन गानों से हो रही है। इश्क में सब बेवजह होता है। बेवजह के ये गाने कसक पैदा कर रहे हैं।

15 comments:

गिरीन्द्र नाथ झा said...

मुझे इस गीत को सुनकर अजीब सी अनुभूति होती है इसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है। खासकर यह सुनकर- दिल सा कोई कमीना नहीं कोई तो रोके कोई तो टोके..।

शब्द और संगीत दोनों धीरे-धीरे कान से दिल में कब घर बना लेते हैं पता ही नहीं चलता है। राहत फेतह अली साब जब यह बोलते हैं- दांत से डोर रेशम की कटती नहीं....तो कई यादों में खो जाने का मन करने लगता है।

विनीत की पोस्ट के बाद इसे पढ़कर अलग कोण से सोचने को मजबूर हुआ। मन में पाले अनगिनत लव स्टोरी की याद जाता हो गई। साल के शुरुआत में बच्चा होने का जी करता है जी...।

शुक्रिया।

sanjaygrover said...

हर फ़िल्म में गुलज़ार का एक गाना और उसमें भी मुखड़ा लोगों की ज़ुबान पर चढ़ ही जाता है। ‘चप्पा-चप्पा चरखा’ और ‘थपई-थपई के थप-थप’ जैसे अनुप्रासी प्रयोग उन्होंने उबाऊ हो जाने से पहले ही छोड़ दिए। एक महिला द्वारा एक से ज़्यादा पुरुषों से एक साथ प्रेम करने की कहानी, सुनते हैं, महेश भट्ट की फ़िल्म ‘मंज़िलें और भी हैं’ में भी थी। जो कि उस वक्त लाप हो गयी थी। एक गाना शबाना आज़मी की किसी फ़िल्म में भी था कि ‘ हम तेरे बिना भी नहीं रह सकते और तेरे बिना भी नहीं रह सकते‘।

मधुकर राजपूत said...

गाना वाकई शहद की तरह कानों में घुल जाता है और कच्चे अहसास सच्चे लगने लगते हैं। कई बार सुन चुका हूं बार बार वाह गुलज़ार कह देता हूं। उतना ही मन विशाल के काम के लिए आदर से भर उठता है। वाकई गड्ड मड्ड होते सपनों को किनारे से खड़ा करके एक तस्वीर काढ़ देते हैं ये अल्फाज़। सारे अल्फाज़ एक कनवेंशन से बाहर हैं। गुलज़ार ने माहौल के स्थानीय लफ्ज़ों को लपककर इस गीत को बुना है। एक बार फिर इसने बच्चा और कच्चा बना दिया है। वाह गुलज़ार, वाह विशाल और वाह रवीश, आपने भी खूब तार जोड़े हैं गाने के साथ।

Arvind Mishra said...

दिल तो बच्चा है -इस परिचयात्मक सेशन के लिए शुक्रिया !

PD said...

हम भी इसे सुनकर बच्चा हुये जा रहे हैं जी.. कुछ अपने इस पोस्ट में लिखे की तरह.. :)

शायदा said...

सचमुच दिल सा कोई कमीना नहीं, हमें भी बढि़या लगा गीत। लगातार सुन रहे हैं दिल भरने तक। बहुत सादे से बोल, सादा सा संगीत और आवाज़ भी आसानी से कानों से दिल तक उतरती हुई। पोस्‍ट पढ़कर भी मज़ा आया।

anita said...

tumne theek likha raveesh bada pyara gana hai..gulzar ji ne likha badia hai par rahat ne gaya bhi badia hai perfect combination of lyrics, singing & music...tum sabse pyari line likhna bhool gaye?.... kisko pata tha pehlu me rakha dil aisa pazi bhi hoga , hum samajhte the hum jaisa koi hazi hoga...

बिक्रम प्रताप सिंह said...

वैसे मैं कोई गाना रिंग टोन नहीं बनाता लेकिन आजकल ये अपने फोन की हर घंटी पे बजता है।

Aman said...

Please excuse my inability to use devnagri fonts.

The lyrics are indeed very provocative. The best line is 'Koi to roke, koi to toke, Is umr mein ab khaoge dhokhe'
Gulzar has expressed the futility and faliure of love at 'this age'but at the same time expressed his helplessness. The music has a latin american touch.

Finally Vidya Balan has got a script which will allow her to display her acting prowess. Her eyes do the talking in the promos.
Eagerly awaiting the release.


Vidya Balan may have found the

Aman said...

Please excuse my inability to use devnagri fonts.

The lyrics are indeed very provocative. The best line is 'Koi to roke, koi to toke, Is umr mein ab khaoge dhokhe'
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kabad khana said...

bahut hi sahi farmaya ravishji aapne ,,, dil sa to wakai koi kameena nahi he ,,, aajkal in sms ki books ne to gazab ka hi dha rakha he.. aajkal sms me bhi veg non veg ki choices aane lagi hai ...
kafi achhi rachna ,,,
http://kabadkhana.blogspot.com/2010/01/blog-post_15.html
mere blog par padharkar sewa ka avsar jarur de ,,,

alok ranjan said...

गाना आपको गुनगुनाने पर मजबूर कर देता है... लेकिन इसे गाने वाले राहत फतेह अली खान को भी नहीं भूलना चाहिए...जब वो बच्चा और कच्चा कहते हैं... तो बरबस ही गला उनकी नकल करने लगता है... इन दोनों शब्दों ने पूरे गाने में जैसे सुपर जान डाल दी है...

प्रवीण द्विवेदी की दुकान said...

फिल्म का तो पता नहीं रवीश जी पर गुलज़ार साहब के बारे मे क्या कहें उनकी कलमकारी पर फ़िदा होने को जी चाहता है ..गाने के एक लाइन जिसपर आपने कुछ नहीं कहा वो अपने आप मे कई अर्थ समेटे हूए है - डर लगता है तनहा सोने मे जी
दिल तो बच्चा है जी ,थोडा कच्चा है जी

Neeraj Singh said...

ऐसी उलझी नज़र उनसे हटती नहीं...
दांत से रेशमी डोर कटती.. नहीं...
उम्र कब की बरस के सुफेद हो गयी
कारी बदरी जवानी की छटती नहीं

वर्ना यह धड़कन बढ़ने लगी है
चेहरे की रंगत उड़ने लगी है
डर लगता है तन्हा सोने में जी

दिल तो बच्चा है जी
दिल तो बच्चा है जी
थोडा कच्चा है जी
हाँ... दिल तो बच्चा है जी

ऐसी उलझी नज़र उनसे हटती नहीं
दांत से रेशमी डोर कटती नहीं
उम्र कब की बरस के सुफेद हो गयी
कारी बदरी जवानी की छटती नहीं

रा रा ऱाआ … रा रा ऱाआ ….
रा रा ऱाआ … रा रा ऱाआ ….
रा रा ऱाआ … रा रा ऱाआ ….

किसको पता था पहलु में रखा
दिल ऐसा बाजी भी होगा
हम तो हमेशा समझते थे कोई
हम जैसा हाजी ही होगा

हाँ यह जोर करें , कितना शोर करें
बेवजा बातें पे ऐंवे गौर करें

दिलसा कोई कमीना नहीं

कोई तो रोके , कोई तो टोके
इस उम्र में अब खाओगे धोखे
डर लगता है इश्क करने में जी

दिल तो बच्चा है जी
दिल तो बच्चा है जी
थोडा कच्चा है जी
हाँ दिल तो बच्चा है जी

ऐसी उदासी बैठी है दिल पे
हंसने से घबरा रहे हैं
सारी जवानी कतरा के काटी
पीरी में टकरा गए हैं

दिल धड़कता है तो ऐसे लगता है वोह
आ रहा है यहीं देखता ही ना हो
प्रेम कि मारें कटार रे

तौबा ये लम्हे कटते नहीं क्यूँ
आँखें से मेरी हटते नहीं क्यूँ
डर लगता है तुझसे कहने में जी

दिल तो बच्चा है जी
दिल तो बच्चा है जी
थोडा कच्चा है जी
हाँ दिल तो बच्चा है जी

http://sound18.mp3pk.com/indian/ishqiya/ishqiya01(www.songs.pk).mp3

vivek tiwari said...

आपने लिखा है कि अभिषेक चौबे के बारे में आप नहीं जानते, मैं बता दूं...मूल रूप से अभिषेक उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद जिले के रहने वाले हैं. उनके पिता आनंद मोहन चौबे पेशे से बैंक अधिकारी रहे हैं. दादा मथुरा प्रसाद चौबे फैज़ाबाद के बेहद सम्मानित लोगों में से थे. फैज़ाबाद के नियावां चौराहे पर आज भी चौबे परिवार रहता है. अभिषेक का ननिहाल लखनऊ में हैं लेकिन उनकी शुरुआती शिक्षा-दीक्षा जमशेद पुर और रांची में हुई. जहां उनके पिता नौकरी करते थे. ग्रेजुएट दिल्ली के हिंदू कॉलेज से हुए हैं. अभिषेक बच्चन की फिल्म शरारत से जुड़ने के पहले अभिषेक चौबे कुछ विज्ञापनों में काम कर चुके हैं. मकड़ी से वो विशाल भारद्वाज की टीम से जुड़े..मकबूल, ओमकारा,कमीने जैसी फिल्मों में असोसिएट डॉयरेक्टर और स्क्रीनप्ले लिखा.इस समय उनकी उम्र 29-30 साल से ज्यादा नहीं होगी.बचपन से फिल्मों के प्रति दीवानगी रही और आज यहां तक पहुंचे हैं.