रिपोर्टिंग के रिश्ते

सात साल की रिपोर्टिंग से न जाने कितने रिश्ते अरज लाया हूं। ये रिश्ते मुझे अक्सर बुलाते रहते हैं। जिससे भी मिला सबने कहा दुबारा आना। ऐसा कभी नहीं हुआ कि दुबारा उस जगह या शख्स के पास लौटा जा सके। तात्कालिक भावुकता ने दोबारा आने का वादा करवा दिया। मिलने वालों से स्नेह-सत्कार,भोजन और उनका प्रभाव इतना घोर रहा कि बिना दुबारा मिलने का वादा किये आया भी नहीं जाता था। सबको बोल आया कि जल्दी आऊंगा। अब आंसुओं से भर जाता हूं। एक रिपोर्टर सिर्फ दर्शकों का नहीं होता,वो उनका भी होता है जिनसे वो मिलता है,जिनकी सोहबत में वो जानकारियां जमा करता है और जिनके सहारे वो दुनिया में बांट देता है। रिपोर्टिंग में मिले इन सभी रिश्तों में झूठा साबित होता जा रहा हूं। क्या करूं उनका इंतज़ार खतम नहीं होता और मेरा वादा पूरा नहीं होता।

झांसी की मिसेज कैंटम आज तक इंतज़ार कर रही हैं। अक्सर फोन आ जाता है। हाउ आर यू माई डियर सन। गॉड ब्लेस यू। व्हेन आर यू कमिंग टू झांसी। न जाने वो किस जनम की मेरी मां है। अठारह सौ सत्तावन के डेढ़ सौ साल होने के वर्ष झांसी गया था। अस्सी साल की एक वृद्धा। एंग्लो-इंडियन। साधारण सा घर। मिसेज कैंटम आईं और पहले पूछा टेल मी सन,कभी एंग्लो इंडियान खाना खाया है? जवाब- नहीं। लेकिन जब आपने बेटा कह दिया तो पूछती क्यों हैं? खिला दीजिए न। स्पेशल रिपोर्ट की शूटिंग शुरू होने से पहले मेरे इस जवाब पर कैमरा मैन घबरा गया। मिसेज कैंटम ने कहा एंग्लो-इंडियन शैली में मटन बनाया है। तुम खाता है। क्या नाम बताया तुमने अपना? जी रवीश कुमार। यू नो,यू आर लाइक माइ सन। आई एम सो हैप्पी टू सी यू। छोटी सी मेज़ पर ऐसा रिश्ता बना कि क्या कहें। लगा कि ये किसी क्रांतिकारी की मां होगी। इस जनम में अपने क्रांतिकारी बेटे के हाथों मारे गए अंग्रेंजों की मौत का प्रायश्चित कर रही होगी। या फिर भारत की उदारता की निशानी को बचा कर रख रही होंगी। तभी उन्होंने डरते हुए कहा कि दरअसल,मैं जो काम करती हूं उससे कई लोगों को प्राब्लम होता है,सन। इतनी बार बेटा कहा कि मैं भी मिसेज कैंटम को मॉम कहने लगा। एक घंटे में ऐसा रिश्ता।

मिसेज कैंटम झांसी के कैन्टोनमेंट के क्रबिस्तान की देखरेख करने लगी थी। उस दौर में मारे गए और अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए अंग्रेज अफसरों की कब्रों को फिर से सजा दिया था। कहा कि इतनी हालत खराब थी कि पूछो मत। यहां कोई आता नहीं था। लेकिन देखों मैंने कितना सुन्दर बना दिया। राष्ट्रवाद के झंझटों में फंसे बिना एक हिन्दुस्तानी महिला उनकी देखरेख कर रही है,जिसके दम पर हमारा राष्ट्रवादी आंदोलन गर्विला होता है। मैंने पूछा भी कि मॉम,ये एक प्राब्लम है। लेकिन भारत एक परिपक्व देश भी है। किसी को प्राब्लम नहीं होगा। भावुक तो हम दुश्मनों के लिए भी होते हैं। उस रिपोर्ट के बाद से आज तक मिसेज कैंटम अचानक फोन कर देती हैं। आवाज़ का ज़ोर बताता है कि एक मां अपने अधिकार से बेटे को बुला रही है। दुबारा कब आओगे। प्लीज कम न। अपनी वाइफ और बेटी को भी लाना। आई विल कूक फॉर यू। नाइस मटन। यू लाइक न। फोन रखने के बाद थोड़ा रो लेता हूं। फिर उस दफ्तर की नियति में खुद को झोंक देता हूं जिसने इन रिश्तों को पाने में मदद तो की लेकिन जोड़ कर रखने में साथ नहीं दिया। जानबूझ कर नहीं लेकिन रिपोर्टर तो घटनाओं का साक्षी होता है। ख़बर बदलते ही उसकी दुनिया बदल जाती है। एक साथ वो कई शहरों और कई संबंधों में रहता है।

इसी तरह से बीकानेर के शौकत भाई आज तक फोन करते हैं। छह साल हो गए बीकानेर गए। धर्मेंद्र चुनाव लड़ रहे थे। ट्रेन में जगह नहीं थी तो शौकत भाई ने कहा कि अरे रवीश भाई, चिन्ता मत करो, मेरी सीट पर बिकानेर चलो। तब से एक रिश्ता बन गया। पहले उनका फोन आता है, फिर उनकी पत्नी बात करती है और फिर उनकी बेटी। शौकत भाई बहुत शान से कहते हैं कि एक बार तो आ जाओ। तुम्हारा ही घर है। बीकानेर में कोई यकीन नहीं करता कि रवीश भाई अपने दोस्त हैं। मैं सबको बोलता हूं न। मेरी पत्नी तो हमेशा याद करती हैं आपको। हां इस साल देखिये, आ जाऊंगा। दिल कहता है कि मत बोल झूठ। फिर बोलने लगता हूं, शौकत भाई, मेरा इंतजार क्यों करते हैं? शौकत भाई का जवाब लाजवाब कर देता है। रवीश भाई, ये आपका घर है। घरवाले तो इंतज़ार करेंगे न।

जमालुद्दीन को आप सब नहीं जानते। लेकिन हो सके तो इनसे मिल आइये। एक मामूली दर्जी। आंखें कमज़ोर पड़ रही हैं। लेकिन ग्यारह किलो की कॉपी पर ताज महल की शक्ल में उसका इतिहास लिख रहे हैं। ग़ज़ब का काम है। आगरा में रहते हैं। जमालुद्दीन कहते हैं कि उन्हें अकबराबाद और ताज को देखते ही कुछ हो जाता है। इसलिए वो ताज के करीब नहीं जाते। जब वो ये बात कह रहे होते हैं तो उनके चेहरे पर ताज को बनाने वाले मज़दूरों की रूहें उतर आती हैं। लाल हो जाता है। हाथ लरज़ने लगते हैं। बहुत ज़िद की,जमाल भाई,चलो न,ताज के सामने। दो बार गया। मना कर दिया। जमालुद्दीन ने कहा कि नहीं,मैं ताज के सामने नहीं जा सकता। कहने लगे कि सामने शाहजहां को देखकर कांप जाता हूं। शाहजहां के किस्से और उस संगमरमर की इमारत का इतना शानदार कथाकार मुझे आज तक नहीं मिला। जमालुद्दीन आज तक फोन करते हैं। कुछ मदद कर आया था तो थोड़ी और आस होगी। लेकिन इसके लिए वो कभी फोन नहीं करते। उनकी चिंता यही है कि ताज पर जो इतिहास लिखा है वो दुनिया के सामने नुमाया हो जाए। जमालुद्दीन ने कितनी बार कहा, बेटा कब आओगे। उनका यह सवाल अपराधी बना देता है। लगता है कि किसी बूढ़े बाप को अकेला छोड़ आया हूं। दो साल पहले जब उनके घर से निकला तो जमालुद्दीन ने मुझे एक नक्श दिया। एक कागज़ का टुकड़ा। किसी भी ओर और छोर से देखिये तो अल्लाह लिखा मिलेगा। जमाल ने कहा कि बुरी नज़र न लगे। आज तक मेरी पर्स में वो नक्श है।


पंजाब के रियाड़का गया था। गुरुदासपुर में। सच बोलने का स्कूल पर स्पेशल रिपोर्ट करने। पूरे परिवार से ऐसी दोस्ती हुई कि हर तीज त्योहार पर वहां से फोन आता है। कब आ रहे हो? आने का वादा मेरा ही था। दो दिन तक उस स्कूल में रहा। परिवार में ऐसे घुल मिल गया कि वादा कर आया कि अबकी परिवार के साथ आऊंगा। मौका ही नहीं लगा। स्पेशल रिपोर्ट के दौरान अमृतसर के एक स्कूल की प्रिंसिपल से मुलाकात हुई थी। वो अब कनाडा में हैं। उनका फोन आया था। कहां इंटरनेट पर आपकी आवाज़ आ रही थी तो हम सब दौड़ गए कि ये तो अपने रवीश कुमार की रिपोर्ट लगती है। वो बहुत भावुक थीं। कह रही थीं कि बेटे कभी कनाडा आना। हम हिन्दुस्तान आ रहे हैं तो ज़रूर मिलेंगे। मैं हंसने लगा। माता जी, कितना झूठ बोलूं मैं। दुबारा कब मिलना हुआ है। अरे क्या बात करते हो जी। आपको टाइम नहीं तो हम आ जायेंगे। रियाड़का स्कूल के प्रिंसिपल के बेटे गगनदीप आज तक एसएमएस करते हैं। कई बार पलट कर फोन करता हूं तो पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ जाती है। अद्भुत स्कूल है। इतना मोहित हो गया था कि खुद ही वादा कर दिया कि गर्मियों में पत्नी और बेटी के साथ यहां आकर रहूंगा। आज तक नहीं जा सका।

ऐसा ही इंतज़ार गुजरात में हो रहा है। मेरठ में डॉक्टर साहब कर रहे हैं,मैनपुरी में प्रोफेसर साहब कर रहे हैं,भिवानी में प्रीतम भाई कर रहे हैं,अलीगढ़ के दारोगा जी कर रहे हैं,बारामती में सुशील कर रहे हैं,जयपुर के चंद्रपरिहार साहब कर रहे हैं। आगरा के देवकीनंदन सोन कहते हैं कि आप से मिलने के बाद लगा कि कोई रिश्ता है। जब भी आपकी आवाज़ आती है घर में हंगामा मच जाता है। सब कहने लगते हैं कि अरे ये तो अपने रवीश भाई हैं। क्या बात है। इजाज़त हो तो भावुक हो लूं। इतराना अच्छा नहीं लगता। मेरा स्वभाव भी नहीं है। लेकिन क्या करूं इन रिश्तों का? कब तक दुबारा आने के भरोसे पर ये टिके रहेंगे। मालूम नहीं लेकिन जब इनलोगों का फोन आता है तो बहुत अच्छा लगता है। कम मिलने-जुलने वाला आदमी हूं और बिना मेहनत किये ऐसा खजाना मिल जाए तो सहेज कर रखने का लालच भी होता है। कई लोग ऐसे हैं जिनसे सिर्फ फोन पर रिश्तेदारी है। आवाज़ से उनको जानता हूं। कभी मिला नहीं। डर भी लगता है कि पांच साल से जिससे फोन पर बात कर रहा हूं, वो अचानक मिल जाए तो न पहचान पाने का असर कितना खतरनाक होगा। कहीं ये न सोच बैठे कि दंभी है।

रिपोर्टर दुबारा क्यों नहीं जा पाता और नहीं जा पाता है तो पहली बार में ऐसे रिश्ते क्यों बनाता है? रिश्तों के बिना हर रिपोर्टर अधूरा है। काश इन सब को संभाल पाता। दुबारा जा पाता। इन सबका अपराधी तो हूं लेकिन इन्हीं लोगों से पूरा भी होता हूं। हम रिपोर्टरों को कितना कुछ मिलता है। इनती सारी मायें, इतने संगे संबंधी सब इसी पेशे में मिले हैं। ग़ज़ब का काम है ये पत्रकारिता। दुनिया के सबसे आसान कामों में से एक लेकिन रिश्ते इतने मुश्किल कि भावुक कर तोड़ देते हैं। सारे रिपोर्टर को भावुकता के इन लम्हों से गुज़रना होता होगा। सबको मरना पड़ता होगा।

36 comments:

Arvind Mishra said...

चलिए अभी तक बनारस ने आपको धर्मसंकट में नहीं डाला .....राहत मानिए !

ALOK PURANIK said...

सत्य वचन रिपोर्टिंग के रिश्ते बहुत रुलाते हैं। ´

आओ बात करें .......! said...

रिपोर्टर का जीना-मरना, सब कुछ मिलने-बिछुड़ने में ही समाहित है......यायावर होना उसका चरित्र है....उसे स्वचालित पुर्जा मान लिया गया है....वो खबर लाता है...दिखाता है....फिर चल देता है...कंही किसी ओर....
उसका किसी से कोई नाता भी होता होगा.... इससे शायद ही किसी का कोई मतलब हो.....ये एक दर्द है, जिसे मैंने भी 8 साल तक झेला है...अब रिपोर्टर नहीं रहा....टीवी चैनल का अहम् कारिन्दा माना जाने लगा हूँ.....आज यूँ ही 'क़स्बे' से गुजरा तो लगा रवीश के पास इस 'अव्यक्त' को व्यक्त करने की हिम्मत कहाँ से आई होगी????

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप ने बड़ी आसानी से रिपोर्टर के काम को आसान कह दिया। मुझे तो नहीं लगता कि आसान है।

Manish Kumar said...

आपका काम बड़ी सहजता से आपको ऍसे लोगों की जिंदगी से जोड़ देता है जिनके जीवन में झांकने की कल्पना भी नहीं की होगी। उन प्यारे रिश्तों को निभा ना पाने की विवशता बड़ी संजीदगी से उभर कर आई इस पोस्ट में।

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

कभी कभी लगता है कि मीडिया की नौकरी ने इतने नाते दिए हैं ये संभलेंगे कैसे।

प्रिंट मीडिया में तो रिश्‍ते बनते हैं और इतने टिकाऊ होते हैं कि एक समय बाद कई लोग परिवार का हिस्‍सा लगने लगते हैं।

सुशीला पुरी said...

अरे लखनऊ के साथ ऐसा मत करना रवीश जी ....वादा करो तो करके निभाना .

pratibha said...

वैसे सारे रिपोर्टर इतने इमोशनल नहीं होते रवीश जी.
ये व्यक्तिगत खूबी होती है...हाँ ये प्रोफेशन मौके ज़रूर देता है...लोगों से जुड़ने के...आप जिन यादों को लेकर इमोशनल हैं उन्ही यादों के चलते लोगों को गुरूर करते भी देखा है...

Krishna Kumar Mishra said...

रिस्तों की सच्चाई का बयान भावनात्मकता के आफ़ाक पर है बड़े भाई, मैं तो कहूंगा कि आप के पास स्नेह का भयानक वायरस है जो कई मीटर नही बल्कि किलो-मीटर तक संक्रमित करने की कूबत रखता है।
खैर मानव ह्रदय की इस खूबसूरत प्रवृत्ति का संरक्षण सभी को करना चाहिए.........ताकि जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरति देखी तिन तैसी....भावना सुन्दर रह सके......जैसे कब्रिस्तान की देखरेख करने वाली एंग्लों-इंडियन महिला में आप ने मां की सूरत देखी.............वैसे मेरा अनुरोध है कि अपने पद-चिन्हों पर दुबारा कदम रखे और उन सबसे जरूर मिले...
मुनव्वर राना साहब का शेर याद आ गया!
ये ऐसा कर्ज है जिसे मै अदा कर ही नही सकता
मैं जब तक घर न लौटूं माँ मेरे सज़दे में रहती है।

तो भाई ब्याज ही अदा कर आइए।

मधुकर राजपूत said...

कई माओं का लाल, कई बापों का सपूत। रवीश।

sushant jha said...

लाजवाब...आज लगा कि आपके अंदर सिर्फ आक्रोश की ज्वाला ही नहीं है-भावुकता की फुहार भी उतनी ही है....

Harsh said...

रवीश जी एक टीवी पत्रकार को २४ घंटे मुस्तैद रहना पड़ता है......यह नौकरी भी ऐसी नहीं है कि10 बजे से शुरू होकर ५ बजे तक चले....घुमक्कड़ी करते रहनी पड़ती है .... खबरे तेजी से बदलते रहती है.... मैं खुद अभी पत्रकारिता की पदाई छोटी रहा हू.... मेरा मानना है इस काम में आपको हर दिन नया सीखने को मिलता रहता है.. नए लोगो से मिलना तो लगा रहता है... पर काम की व्यस्तताओं के चलते उनसे बहुत मेल जोल नहीं हो पाता...आप हर पोस्ट में अपनी बात साफगोई से रखते है ...यह पोस्ट भी अच्छी लगी .... अच्छा रवीश जी आप यह बताएं आप साल में कितने बार अपने घर जा पाते है ?

ravishndtv said...

एक या दो बार। छु्ट्टी का बंटवारा दो भागों में होता है। आधा हिस्सा घर के लिए और आधा ससुराल के लिए। वो भी मेरा ही घर है। इससे ज्यादा की छुट्टी होती नहीं। घर के लोग भी अब आने लगे हैं। जैसे हम छुट्टियों में उनसे मिलने जाते हैं वैसे वो भी हमारे यहां आते हैं।

Mahendra Singh said...

Blog padhkar man bhar aya.Yeh rishtey hote hi aise hain.Ek reporter ke hone ke karan shyaad apke saath aisa hoga ya apke saafgoi unko apka mureed bana detee hogi.

सुबोध said...

आप तो भावुक कर गए रवीश बाबू

amit yadav said...

जो कुछ भी हो रिश्तों की इस जुदाई का भी अपना अलग मजा है....कोई तो है जो आपको याद करता है वरना इस भागती-दौड़ती दुनिया में किसके पास इतना वक्त रखा है कि वो किसी को याद करे....आप खुशनसीब हैं....

Shekhar Mallick said...

रिपोर्टर भी सबसे पहले एक आदमी होता है रवीश भाई. और रिश्ते तो, पत्रकारिता जैसे सम्वेदनशील पेशे में कदम-दर कदम बनते रहेंगे. तसल्ली है की आप जैसे पत्रकार अभी इस संवेदना से खली नहीं हुए हैं.

Shekhar Mallick said...

रिपोर्टर भी सबसे पहले एक आदमी होता है रवीश भाई. और रिश्ते तो, पत्रकारिता जैसे सम्वेदनशील पेशे में कदम-दर कदम बनते रहेंगे. तसल्ली है कि आप जैसे पत्रकार अभी इस संवेदना से खाली नहीं हुए हैं.

Kulwant Happy said...

रिश्ते बड़ी अजीब चीज हैं। आपका चेहरा असल में फरेब रहित है। सच में। झूठ नहीं आता मुझे। मेरी माँ के जाने के बाद माताएं तो बहुत मिल गई, आशीर्वाद दे दिया..बहुत आगे बढों..माताएं मिलती गई..कुछ छूटती गई, लेकिन दिल में सदैव रहती है। जिन्दगी दौड़ ही ऐसी है। रविश जी।

archana said...

Main bhi midea main hoon, halanki mera logon se milna julna nahin hai lekin mere aas paas kai log hain jinka kaam logon se milna julna hain, lekin kabhi inn logon ko itna bhavuk hote nahin dekha, yeh to bas use and through ki niti apnaate hai.Ek baar kaam nikal gaya to dobara uss vyakti ko yaad bhi nahin karte. Aise logon ko dekhkar iss peshe mein hote huye bhi mujhe iss peshe se nafrat si hone lagi thi, aisa lagta hai jaisa media main bas dikhava hai, logon ke imotiona se inhein koi matlab nahin.
.....Aapke jyadatar post main creativity se jyada mujhe bhavukta ka ehsaas hota hai.Aapke iss post se aisa lagta hai ki dikhave ki iss dunia main hote huye bhi aap ne apne andar badlao nahin aane diya hai.

hamesha aise hi rahiega, dher shari shubhkaamnaen.

CSNikhilesh said...

bahut badgiya likha hai Ravishji. Badhayi aapko.

Nikhil Srivastava said...

आपने रिश्ते बनाये हैं तो ये बन पाए हैं, आपने इन्हें रिश्ते का नाम दिया है तो ही ये आज भी आंसूं बनकर आँखों में तैर जाते हैं. तेज तर्रार छवि के पीछे एक भावुक से, दोस्त से, दुलारे से रवीश सर से मिलकर बहुत ख़ुशी हुई. ऐसा ही सही, पर एक रिश्ता लखनऊ से भी बना लीजिये न. वैसे ये भी अपने आप में अजीब है कि ये रिश्ते हमें हमसे ही मिला देते हैं कभी कभी. क्यों ?

JC said...

"...जानबूझ कर नहीं लेकिन रिपोर्टर तो घटनाओं का साक्षी होता है।"
Uprokt mein geeta ka saar chhupa hai, ki har ek ko manav jiwan mein saakshi bhav se rahna chahiye...

Vivek kumar said...

aapne is post me Reporter ki biography hi likh di. Reporting agar man se ho to waakai me aasan hai, jajba jaroor chahiye iske liye. Thankyou sir....coz mujhe bhi wo saari baaten yaad karne ka mauka mila jo mai pichle kuch saalon me piche hi chhod aaya tha.

kalim said...

Dear Raavish Ji aapne tou zindagi ka sach bahut aaram se apne lekh mai likh diya hai...shayad log aap ki pareshani nahi samjhe lekin main khud ek journalist hun isliye samjh sakta hun...aap hamesha se sach likhte hai woh bhi dil se....

vibhu said...

Ek hee saans mein aapke Blog ke pehle page ke saare lekh padh gaya! Yeh to khaas taur par achha laga. Abhi Hindi Blogs ko zayada nahin padhta to devenagri mein comment nahin likh pa raha - tariqa hee nahin maalum!
Beharhaal, "Reporting Ke Rishtey" ke alawa aapka TRP sambandhi Post bhee gazab ka tha. Agar aap kuchh pramukh TV patrkaar ikathe mil baith kar iss baare mein baat karte rahenge to koi na koi raasta zarur niklega. Aap sab (TV channels ke pramukh log) Mahine mein kam se ek baar zarur lunch ya dinner par kahin mil liya karen - kabhi kabhar kisi ko bahar se bhee bula sakte hain. Mujhe maalum hai yeh kitna mushkil ho sakta hai par phir bhee do teen ghanta saath aap log rahenge to zarur raasta niklega. Kya pata aapka ye informal group hee iss TRP ke farce ko puri tarah expose kar de !

Vibhu
(vbarora@gmail.com)

पंकज बेंगाणी said...

अच्छी जिंदगी है.

कही- अनकही... said...

कुछ ऐसे बंधन होते हैं जो बिन बांधे बंध जाते हैं ,जो बिन बांधे बंध जाते हैं वो जीवन भर तड़पाते हैं ...

Dr. Anil Kumar Tyagi said...

मेरे भारत की संस्कृति अतिथी देवो भव: की जो स्वाभाविक प्रेरणा देती है उसी का परिणाम है कि हम ना चाहते हुऎ भी रिस्तों की अटूट डोर में बंध जाते है। जिनको निभाने से ज्यादा तोडना कठिन है।

संतोष त्रिवेदी SANTOSH TRIVEDI said...

आत्मीय रिश्तों की महक व्यावसायिक रिश्तों से बिलकुल अलग होती है,कम-काजी रिश्ते थोड़ी मजबूरी लिए होते हैं जबकि अपनी जड़ों से जुड़े रिश्ते सुखद !

dr prem dhingra said...

hello ravish ji
blog padhkar emotional ho gaya aur ye bhi aj mehsoos hua ki media ke log bhi itne bhavuk hote hai... i nvte u to visit hanumangarh (rajasthan).. plz jab bhi rajasthan aana ho to yahan jarur aayiyega hum bhi apka intzzar karenge
regards
dr prem dhingra

Aniirban Bose said...

आपकी सरल भाषा शैली,भावनाओं एवं कार्यक्षेत्र की विवशताओं को अनोखे रूप से मिलाकर रख देती है जिसमे एक मासूमियत है |भूपेन दा का एक गीत याद आता है......"आमी एक यायावर "..... बहुत ही अच्छा लिखा है सर जी!!!

राजू मिश्र said...

निश्चित रूप से यी बेहद पीड़ादायक स्थिति होती है। बात इन रिश्‍तों को महसूस करने की है, आप कम से कम याद तो करते हैं इन रिश्‍तों को।

kumar said...

ravish ji

riste rishte
yadon ke chilman se
kya khoob jhanka hai aapne

aapke shabd stabdh kar dete hain yaar

चित्रकूट said...

एक ऐसा रिश्‍ता जो केवल और केवल ब्‍लाग से उपजता है इसे ब्‍लागी रिश्‍ता कह सकते हैं पर वास्‍तव में अंतस की प्‍यास बुझाने को क्‍या कुछ छल शब्‍दों के आवरण से काम चल सकता है या पिफर समाज, देश या ि‍फर पूरी दुनिया के हितों को साधकर कुछ करने की जरुरत है तो केवल दो ही सवाल उपजते हैं वे है मैं क्‍यों जी रहा हूं या ि‍फर मुझे कैसे जीना चाहिये। आदरणीय रवीश्‍ा जी क्‍या आपने अर्न्‍तमन के अन्‍दर झांक कर कभी यह भी जानने का प्रयास किया है। आपकी ही जमात का एक छोटा सा पौधा संदीप रिछारिया चित्रकूट

याज्ञवल्‍क्‍य said...

दादा, दिलचस्‍प है आप की परेशानी, जिस खूबसूरती से आपने उसे बताया वह मोहक है, पर आपकी परेशानी और बढा रहा हूं, मेरे जैसे कई है, जो आपको याद करते है और कई खबरों पर यह सोचते है कि, यदि आप होते तो क्‍या लिखते, मेरी कई खबरें आपसे मानसिक गूरू शिष्‍य रिश्‍ते के बाद बनी है, जिनकी जानकारी आपको कभी नहीं हूई, मैं छत्‍तीसगढ के सरगुजा में हूं। आपने मुझसे भी रिश्‍ता बनाया है, और फिर याद दिलाउं मूझ जैसे कई है जो आपको देखकर सीखते है। इन रिश्‍तों में मुलाकात की अभी तो कोई संभावना नहीं, और कभी मिलेंगे भी तो आपको कहेंगे भी क्‍या, आखिर अपने गूरू और पितातूल्‍य वरिष्‍ठों के सामने हम कह भी क्‍या सकते है, आपको प्रणाम। यही कामना है,अप्रत्‍यक्ष ही सही, आपका आशीष मिलता रहे, आपको दूर से देखकर ही सही मगर हम सीखतें रहे।