फिल्मों में दारोगा का प्रमोशन हो गया है।

जगदीश राज और इफ्तिख़ार की याद आ गई। सब-इंस्पेक्टर और इंस्पेकटर का किरदार इन्हीं दो के नाम रहा। पर्दे पर जब भी आए दारोगा बन कर। अमिताभ,शशि कपूर और शत्रुध्न सिन्हा जैसे बड़े कलाकारों ने भी अपनी फिल्मों दारोगा की वर्दी पहनी है। लेकिन अब फिल्मों से दारोगा का रोल गायब हो रहा है। सेंट्रल कैरेक्टर में दारोगा कब से नहीं है। इस बीच में शायद शूल ही एक फिल्म रही जिसमें दारोगा का रोल महत्वपूर्ण रहा। वर्ना अब इन सारे दारागाओं का प्रमोशन हो गया है। सरफरोश में आमिर खान ने एसीपी की भूमिका अदा की थी। वेडनेसडे में अनुपम खेर पुलिस कमिश्नर बनते हैं। जिस तरह से सिनेमा से फ्रंट स्टाल गायब हो गए उसी तरह से फिल्मों से हमारी ज़िंदगी के आस-पास के ये किरदार भी गायब कर दिए गए। सदाशिव अमरापुरकर और ओम पुरी ने दारोगा के किरदारों की विभत्सता को बखूबी उभारा था। इन किरदारों में एक किस्म की चुनौती होती थी। वो भिड़ते थे और जान भी दे देते थे। वेडनेसडे में पुलिस कमिश्नर अनुपम खेर को कंप्यूटर की हैकिंग के बारे में पता तक नहीं। पंद्रह साल का एक बच्चा आकर मदद करता है। लगता है अब जल्दी ही फिल्मों पुलिसवाले रिटायर्ड अफसर की भूमिका में आयेंगे। दारोगा से कमिश्नर बनने के बाद तो अगली सीढ़ी वही बचती है। सक्सेना और माथुर अब रिटायर्ड होने के बाद किसी घोर आतंकवादी संकट में सरकार की मदद करेंगे। प्रेमचंद ने दारोगा का अलग चित्रण किया है। मेरी मामी कहा करती थीं कि दारोगा का मतलब होता द रो गा के। यानी रोते गाते रहिए लेकिन घूस दीजिए।

24 comments:

prabhat gopal said...

समय के साथ किरदार बदलते रहते हैं। पहले बीडीओ-दारोगा आडिएंस के दिमाग पर हावी थे, आज-कल कमिश्नर की पोस्ट हावी है। तो बस फिल्मवाले कैश करने में लगे हैं। बाजार के हिसाब से ही तो हर बात तय होती है।

मधुकर राजपूत said...

दारोगा और इसकी बुलेट का अलग ही रौब होता था फिल्मों में। एक और चीज़ थी डार्क ब्राउन ऊंचा वाला लिफ्टर जूता और उसकी ठक ठक। अब नहीं दिखती। वर्दी के डिज़ाइन बदल गए हैं फिल्मों में। सलमान खान की पुलिस ऑफिसर वाली वर्दी फैशनेबल अंदाज़ में सिली गई होती है।

abhishek annapurna pandey said...

सर आप बोलते भी अच्छा हैं और लिकते भी अच्छा है.

Kulwant Happy said...

दरोगा ही नहीं, रामू काका, खलनायक, पटकथा, जोरदार संवाद॥ सब कुछ गायब है।

मधुकर राजपूत said...

एक और चीज़ ग़ायब है दारोगा की, चमड़े की पिस्तौलदानी। उसकी जगह होल्सटर ने ले ली है।

CSNikhilesh said...

Aam admi ka aspiration ab badh gaya hai.. to jyada bari baten hin logon ko appeal karti hai.

Filmon men ab Park ke beech gane nahin filmaye jate... Europe, USA aur Australia ke location dekhaye jaate hain.

Hindi cinema ab "LIFT" ho gaya hai. :)

JC said...

छोटे पर्दे यानि टीवी पर कानून से सम्बंधित सारी चर्चा आदि में तो बहुत पहले से 'भूतपूर्व' पुलिस कमिशनर/ अफसर आदि ही भाग लेने के लिए आमंत्रित किये जाते हैं...अंग्रेजों के ज़माने में शायद एक हिन्दुस्तानी केवल दारोगा ही बन सकता था और उसका अलग ही रुतबा पब्लिक के मन में होता था...जैसा पुरानी फिल्मों में देखने को मिलता था, लाठी तो वो ही चलाता/ चलवाता था...

डॉ .अनुराग said...

बाय दी वे जगदीश राज के नाम सबसे ज्यादा पोलिस वाले का किरदार निभाने का वर्ल्ड रिकोर्ड भी है

Dipti said...

अब टारगेट ऑडिएन्स बदल गई हैं। पहले वो देश के गांवों और कस्बों के लोग थे लेकिन, अब वो एनआरआई और मल्टीप्लेक्स में फ़िल्म देखनेवाले हैं। अब उनकी समझ में दरोगा फ़िट नहीं होते है...

prakashmehta said...

pahle patrakar hote the ab tv journalist ,,bite dete hai..bite bite ya byte byte

pankaj mishra said...

अच्छा है रवीश जी बहुत अच्छा है। आपने लिखा तो याद आया बिल्कुल सही है। जब सबका प्रमोशन हो रहा है तो फिर दरोगा का क्यों नहीं साहब। बैसे कुम्भ में क्या खास है इस पर भी लिखिये कुछ।
please visit my blog www.udbhavna.blogspot.com

विजय प्रताप said...

"द रो गा के। यानी रोते गाते रहिए लेकिन घूस दीजिए।" ये व्याख्या सबसे सटीक हैं. भले से रो गा के द, लेकिन द .

विनीत कुमार said...

द रो गा- दारु के लिए रोते रहने और दारु के लिए गाते रहनेवाला शख्स दारोगा कहलाता है। अनेक शब्दों के एक शब्द टाइप।.

JC said...

दारू से याद आया की कभी एक कव्वाली सुनी थी, जिसमें उन्होंने पुलिस के 'पी' का मतलब समझाया था, जैसे दिल्ली के डीपी का मतलब 'डेली पी', पंजाब के पीपी का मतलब 'पी', और फिर फिर 'पी', आदि आदि समझाया :) टीवी पर भी कई बार एचपी के द्वारा 'हदसे ज्यादा पी' के दृश्य देखने को भी मिले हैं - उसको सार्थक करते हुए :)

Jai Prakash Pathak said...

namaskaar!

aapane darogaa jii ko jilaa diyaa haii. aamgawaii aadamii kasbaaii aadamii darogaa ko hii baDaa samajhataa hai. ab sab shaharaatii ho gaye hain. to acp hii filmon men aayenge. ab daroga kohii nahii bahut logon ko ro gaa ke denaa padataa hai. naukarii ke liye bhii chunaav ke tikat ke liye bhii.

namaskaar.

sahespuriya said...

रविश भाई आप की लेखनी का भी jawab नही,हर बात मैं अपनापन लगता है. ज़ोरे क़लम और ज़्यादा...

Kuchh Bhi Kaho! said...

Raveesh ji Naskaar,
Jindagi ke safar me kafi kuchh peechhe chhut ta hi jata hai. Dher saari cheeje bhulati bhi rahati hai. Aaj aap ke blog par 'DAROGA JI' ke bare me padh kar man ek to jaise flash back me chala gaya. Premchand ki ukti jitna us samay saamayik rahi hogi, usse kam aaj bhi nahi.
Blog ke chhetra me mai nausikhiya hu. Prarthna hai aapse ki ek nazar mere bhi blog pr daal le. Aap ke sujhav ki aasha me-
Ashok Singh Raghuvanshi
Faizabad.
My blog:
www.kuchhbhikaho.blogspot.com

Suraj Singh Solanki said...

waqt ke sath sath logon ki soch aur pahuch bhi badli hai wo aaj daroga per wiswaas nahi kar sakte lihaaja usne aur unche aadhikariyo tak paith bana li hai jiska ashar hum na sirf filmo me balki kahi bhi dekh sakte hai.

कुमार आलोक said...

लास्ट लाइन पंचिंग बा....

ishtiyak said...

Ravishji lagata hain ab chahe filmon mein ya aam logon mein "Daroga" ki jagah "Encounter Specialist" ne le li hain.

Shekhar Mallick said...

गज़ब है यहाँ भाई कि न सिर्फ किरदार गायब होते हैं, अब तो किरदारों के पीछे का वह आदमी भी पटल से गायब हो रहा है.

सुशीला पुरी said...

वसंत पंचमी की बधाई !!!रवीश जी

ravishndtv said...

आप सबको बसंत पंचमी की बधाई।

umar said...

Ravish ji aap sahi keh rahe hai lekin ek sawal ye bhi oothta hai ki kya ab bhi bollywood me us tarah ki filme ban rahi hai jaisi . iftikhar ji aur jagdis ji ke jame me bana karti thi . aaj kal to bade bade star chote chote role k liye produser aur directer se apni sato par kaam kate hai . aaj k actor sirf money baba k liye kaam karte hai .na ki apne andar ki kala ko nikharne k liye . aaj ka zamana mahmmod ji aur jhony waqar ka nahi balki vijay raj aur raj pal yadav ka hai.