मत लिखो भाई

हर दर-ओ-दीवार पर जब हम लिख आयेंगे
इमारतों के साये से भी लोग घबरायेंगे
खुलेंगी खिड़कियां तो शब्द लटकते नज़र आयेंगे
आएंगी आंधियां तो मतलब उखड़ जायेंगे
कितना लिखोगे कबीर तुम कब तक छपोगे
पढ़ने वाले पढ़ कर तुम्हें कहीं भूल आयेंगे

11 comments:

Neeraj Tiwari said...

raveesh ji....
jab talak ji jaan hai hum likhte jayenge
marne se pahle yakinan kuchh kar jayenge
khulengi khidkiyan hawa ke jhoke bhi honge
magar wo meri likhawat yaad dilayenge
Are kahna aasan hai 'mat likho dosston'
magar qayamat ke roj use kya munh dikhayenge

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

ढाई आखर प्रेम का ...........


धन्यवाद भाई.

Kulwant Happy said...

सोचा तो कभी दफा है। लेकिन कमबख्त लिखे बिन चैन नहीं आवत।

विनीत कुमार said...

आमीन।.

परमजीत बाली said...

बढ़िया लिखा है बधाई।

अजित वडनेरकर said...

"आएंगी आंधियां तो मतलब उखड़ जायेंगे"

अजी हम तो कहे हैं कि नए साल में ये कबीर चोला पहने रहिए। भले भले से लग रहे हैं।
सच्ची...

JC said...

ॐ से जगत उत्पन्न हुआ
ॐ में ही समां जायेगा
नाटक तो पंचतत्व और अष्ट चक्र का है
बस 'ढाई आखर' की गंगा बहाते चलो
"राह में आयें जो दींन-दुखी
सबको गले से लगाते चलो"...

डॉ .अनुराग said...

ये शायर अक्सर बीच बीच में जागता रहता है ....

प्रवीण शाह said...

.
.
.
कितना लिखोगे कबीर तुम कब तक छपोगे
पढ़ने वाले पढ़ कर तुम्हें कहीं भूल आयेंगे


पर ये दीवाना, बावरा, टोटली इम्प्रैक्टिकल कबीर कभी माना है जो आज मानेगा ?

बवाल said...

बहुत गहरी और लाजवाब बात कही आपने रवीश जी।

pallavi trivedi said...

भले ही शब्द साथ छोड़ जायेंगे
किताबों में छापना बंद हो जायेंगे
पर लिखना न छोड़ पायेंगे.....:)