सनातन समागम का बेईमान गुणा-भागम

कुंभ में जाते तो हैं लेकिन क्या लेकर लौटते हैं? अपने पापों को तज कर और गंगा को अंजुरी में भर कर सूरज की तरफ उड़ेलने के बाद हम अपनी उस सामूहिकता का क्या करते हैं जिसके लिए कुंभ में जाना अनिवार्य माना जाता है। मंथन और मनन की प्रक्रिया के बिना कुंभ का कोई मतलब नहीं। देश भर के गांवों से लोग हरिद्वार के गंगा तट पर इसलिए जमा हो जायेंगे कि उन्हें डुबकी लगा कर लौटना है। अपनी तमाम सीमाओं को छोड़ समूह में घुल मिल जाने के लिए कुंभ होता है या समूह में जाकर अपनी सीमा रेखा को और गहरा करने के लिए कुंभ होता है? खंड-खंड और कई उपधाराओं में बंटी सनातन धारा को फिर से एक अमृत कलश चाहिए जिसे पीने से बराबरी का संदेश सनातन बन जाए।

हर की पौड़ी पर राजस्थान के लोगों की भीड़ देखकर रूक गया। दीवार पर पीले रंग की पुताई की गई थी। काले मोटे अक्षरों से लिखा था- पंडित गंगाराम। अनुसूचित जाति का एकमात्र पंडा। जिज्ञासा ने बेचैन कर दिया। यहां राजस्थान के कौन लोग आते हैं? पंडाजी ने जवाब दिया, ये सभी दलित हैं और हम सिर्फ दलितों का संस्कार करते हैं। हमारे अलावा कोई और हरिजनों को संस्कार नहीं करता। कई सौ साल पहले पंडित गंगाराम जी ने संत रविदास से दान लिया था तब से हमीं हरिजनों का दान लेते हैं।

अब कई सवालों के जवाब ज़रूरी थे। पंडाजी ने कहा कि यूपी और बिहार के हरिजन कम आते हैं। राजस्थान से ज्यादा आते हैं। वहां दलितों की आर्थिक हैसियत बदल गई है। उनमें जज, आईएएस और मंत्री सब हो गए हैं। यही लोग आकर हमें भारी चढ़ावा दे जाते हैं। सोचने लगा कि राजस्थान के दलितों की आर्थिक हैसियत बदल गई है तो सामाजिक हैसियत क्यों नहीं बदली है? क्यों उन्हें हरिद्वार के घाट पर अनुसूचित जाति के एकमात्र पंडा के यहां आना पड़ता है? अंतिम संस्कार के वक्त ऐसी गैरबराबरी किसी भी धार्मिक सामूहिकता के लिए बड़ी चुनौती होनी चाहिए लेकिन हम गज़ब के संस्कारवान लोग हैं। सामने खड़ी चुनौती को नज़रअंदाज़ कर पतली गली बना कर निकल लेते हैं।

राजस्थान से आए एक सज्जन ने कहा कि हमारे पास सब कुछ है लेकिन जब ऐसा व्यावहार होता है तो दिल टूट जाता है। अगर हम ग़लती से भी दूसरे पंडे के पास चले गए तो जाति का पता लगते हैं वो दान पुण्य कराने से इंकार कर देता है। हरिद्वार के घाटों की सुंदरता इस हकीकत से बदसूरत लगने लगी। हैरान भी हुआ कि इतनी गैरबराबरी झेलने के बाद कर्मकांडों में विश्वास कैसे बचा हुआ है। कहीं ऐसा तो नहीं कि राजस्थान के दलितों का वैकल्पिक राजनीतिक धारा में विश्वास कम रहा। उत्तर प्रदेश की घनघोर दलित राजनीति में तपने के कारण यूपी के दलितों को ऐसे घाटों पर जाना शायद अखरता होगा। इसीलिए उनकी संख्या कम है और राजस्थान के दलितों की संख्या ज़्यादा है।

कोई धर्म सनातन कैसे बनता है? क्या सिर्फ हज़ारों सालों से चले आने से या चलते रहने की इस अनंत यात्रा में अपने गुण-दोषों के परिष्कार करने से? कुंभ में जाने वाले सभी लोग क्या उस घाट पर जाकर अनुसूचित जाति के पंडे से अपना संस्कार करायेंगे। मुज़फ्फरनगर के अमित वर्मा ने साफ इंकार कर दिया। पंडित गोपाल रूआंसे हो गए। कहने लगे कि हम भी ब्राह्मण हैं लेकिन दूसरे ब्राह्मण हमारे हाथ का पानी तक नहीं पीते। घाटों और नदी की देखरेख करने वाली संस्था गंगा सभा हमें सदस्य नहीं बनाती।

जाति के अलावा हैसियत के आधार पर भी हरिद्वार के घाटों का वर्गीकरण हो चुका है।आश्रमों और धर्मशालाओं के अपने-अपने घाट हैं। वीवीआईपी के लिए अलग घाट बनाये गए हैं। आश्रमों के भीतर भी सनातन सामूहिकता दरकती नज़र आती है। सांसारिक मोहमाया का भ्रम तोड़ने वाले ज़बरदस्त संदेश और बाबाओं की अपनी भंगिमाएं। आश्रमों की सज्जा ऐसे की गई है जैसे वो कोई शहरी मॉल हों।

तय करना मुश्किल हो जाता है कि फलां बाबा अच्छे है या फलां बाबा कारोबारी। समन्वय की जगह प्रतिस्पर्धा दिखती है। हरिद्वार प्रवेश करते ही चौक पर बाबाओं के बड़े-बड़े होर्डिंग। साबुन-तेल वाले विज्ञापनों के मॉडल की मानिंद बाबा लोग भी मॉडल लगते हैं। वो अपना प्रचार क्यों करवा रहे हैं? क्या हर बाबा अपने आप में ब्रांड हैं? अगर आध्यात्म का रास्ता एक ही है तो सामूहिक प्रयास क्यों नहीं हैं ताकि दलित और सर्वण सबका सामूहिक धार्मिक अनुभव एक जैसा हो। बराबरी का हो।


सारे बाबाओं के होर्डिंग हैं लेकिन वहीं गंगा प्रदूषित हो रही है। जिन धार्मिक मंचों से गंगा के लिए आवाज उठती है वो इतने राजनीतिक हो गए हैं कि सबकी माता होने के बाद भी गंगा को लेकर सामूहिकता नहीं बन पाती। गंगा को लेकर कोई चिंतन नहीं है। गंगासागर की तरफ जाने वाले मार्ग में गंगा की हालत देखी नहीं जाती। हरिद्वार के ठीक ऊपर पहाड़ों को देखिये। वृक्ष कट गए हैं। वृक्ष की जगह होर्डिंग उग आए हैं। मुख्यमंत्री के चेहरे से लेकर मोहन पूरी वाले का बोर्ड दूर से दिख जाएगा। कहीं से नहीं लगता है कि हरिद्वार आध्यात्मिक जगह है।

दरअसल तीर्थों की सात्विकता को बचाने के कोई प्रयास ही नहीं हुए। कुंभ के लिए हरिद्वार पहले से ज्यादा कंक्रीट में बदल चुका है। अकेले हरिद्वार में इकतालीस पुल बन गए हैं.। गंगा के किनारे के हर घाट को कंक्रीट में बदल दिया गया है। मल्टी लेवल पार्किंग, तरह-तरह के होटल और रंग बिरंगे आश्रम पहले से ज्यादा बन चुके होंगे। इसकी चिंता किसी को नहीं होगी। सांकेतिक रूप से पर्यावरण और गंगा को लेकर नारे ज़रूर लगाये जा रहे हैं लेकिन तीर्थों को होटल में बदलने को लेकर कोई चिंतित नहीं है। अब तीर्थ जाना वीकेंड मनाना होता है। चिंतन और मनन की प्रक्रिया खतम होती जा रही है। ऐसा नहीं है कि आने वाले लोगों की श्रद्धा कम हो गई हो। वो आज भी उतनी ही श्रद्धा से डुबकी लगाते हैं, अपने पीतरों को याद करते हैं और पूजा करते हैं। कुंभ का असली मतलब तो यही है कि हम समाज को बेहतर बनाने के लिए सामूहिक चिंतन करें। बराबरी लाने के लिए संघर्ष करें। तीर्थों का उत्साह तब औऱ दुगना हो जाएगा।
(यह लेख राजस्थान पत्रिका में छप चुका है)

12 comments:

Archana said...

Sahi Kaha Apne .Aaj Politics Ho Ya Dharm ,Sabhi KaroBari Ho Gaye Hai.Jis Desh Mein Aaj Bhi Chhua-Chhut,Unch-Neech ,aur Samanti Partha Ka BolBala Hai,Waha Kya Sudhrega.Aye Sochkar hasi Bhi Aati Hai Ki Apne PAAP Dhonewale Aour Unke PAAP Dhulwane Ka Maadhyam Bane Pande Is PAAP Kp Badhawa Dene Ke Sabse Bade Bhigidar Hain.Rahi Baat Ganga Ki To PAAPIYO Ke PAAP Dhote Dhote Uska Yahi Hasra ?Hona Thha.Intejaar Kare Kisi BHAGIRATH Ka ,Warna Kuchh Aour To Honewala Nahi.

JC said...

रवीश बाबू ~ यदि आपने अमेरिका द्वारा किसी रॉकेट छोड़े जाने की फिल्म देखी हो तो आप ने पाया होगा कि गिनती उलटी पढ़ी जाती है - १०, ९,,,,,,,१, फायर! शून्य पर पहुँच विस्फोट या 'बिग बँग', अर्थात नादबिन्दू का "ब्रह्मनाद", जिससे श्रृष्टि कि रचना शून्य से आरंभ हुई और अनंत तक पहुँच गयी - जो हम और आप सबके बीच 'ब्रह्मा के अंडे' यानी ब्रह्माण्ड के रूप में उपस्थित है...और आप, एक तरफ विकास कि बात करते हो, और दूसरी ओर हमारे समान ही समय के सताए पण्डे के चक्कर में घूम रहे हो - और शायद दूसरे को भी घुमाते रह जाओगे :)

प्राचीन भारतीय ज्ञानी भी पहले ही कह गए हैं कि काल-चक्र उल्टा चलता है - सतयुग से घोर कलियुग तक :)

Harsh said...

रवीश जी आपकी बातो से पूरी तरह से सहमत हू....आज के दौर में सामूहिक चिंतन तो दूर की कौड़ी लगता है.... मैं खुद उत्तराखंड से हू.... हरिद्वार कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो गया है.... गंगा का पानी आचमन करने लायक नहीं है.. फिर भी लोग इसमें आस्था की डुबकी लगाया करते है... उत्तराखंड की सरकार तो इस दूषित जल को विदेशों में बेचने की तैयारी कर रही है..

Tarkeshwar Giri said...

Very Nice, Acchha Kaha hai Apne, Hame aagae aana hoga, in buraiyon ko door karne ke liye.

सर्वत एम० said...

दान-पुण्य का मामला हो या न हो लेकिन कमाई का मामला तो है ही. पता नहीं किसी गंगाराम ने सैकड़ों वर्ष पहले संत रविदास से दान लिया भी कि नहीं परन्तु इस स्लोगन से दलितों का धन पं. गंगाराम की झोली में जा तो रहा है. जातिवाद हमारे समाज में सैकड़ों वर्षों से व्याप्त है, जाएगा भी नहीं. अभी तो एक गंगाराम नजर आए हैं, आने वाले दिनों में हर बिरादरी के गंगाराम दिखाई देंगे.
रह गयी बाबाओं की बात, ये खुद को प्राडक्ट तो बनाकर पेश कर ही रहे हैं. हरिद्वार में में इनके आश्रम नहीं बंगले-कारखाने हैं, ए. सी. कक्ष, वाहन भला सन्यास की वस्तुएं हैं या भोग की, ये तो उनके शिष्यगण सोचें-समझें, आम आदमी तो हकीकत से वाकिफ है.
बचीं गंगा जी, हरिद्वार तक तो फिर भी गनीमत कही जाएंगी, नीचे आने के बाद उनका जो हश्र है, उस पर सिर्फ सर पीटा जा सकता है. सनातन धर्म है, इस लिए पाप ही नहीं, कूड़ा-कचरा, मल-मूत्र- राख-फूल और सबका बाप पालीथिन सभी कुछ गंगा जी की ही गोद में डाला जाएगा. पढ़े-लिखे लोग तक इससे बाज़ नहीं आने वाले, फिर गंगा की सफाई पर क्या कहा जाए.
आपके लेख हिंदुस्तान में लम्बे अरसे से पढ़ रहा हूँ और आपका फैन हूँ. पहली बार ब्लाग पर आया हूँ, देर आमद दुरुस्त आमद की तरह.
आपने लेख बहुत ही अच्छा लिखा.

रंजना said...

Aapke is saargarbhit aalekh se shabdsah sahmat hun ...

Aapne sabkuchh kah diya,isme aur kuchh bhi jodne ki gunjaaish nahi...

Sadhuwaad aapka...

sanjaygrover said...

"वहां दलितों की आर्थिक हैसियत बदल गई है। उनमें जज, आईएएस और मंत्री सब हो गए हैं। यही लोग आकर हमें भारी चढ़ावा दे जाते हैं। सोचने लगा कि राजस्थान के दलितों की आर्थिक हैसियत बदल गई है तो सामाजिक हैसियत क्यों नहीं बदली है? क्यों उन्हें हरिद्वार के घाट पर अनुसूचित जाति के एकमात्र पंडा के यहां आना पड़ता है? अंतिम संस्कार के वक्त ऐसी गैरबराबरी किसी भी धार्मिक सामूहिकता के लिए बड़ी चुनौती होनी चाहिए लेकिन हम गज़ब के संस्कारवान लोग हैं। सामने खड़ी चुनौती को नज़रअंदाज़ कर पतली गली बना कर निकल लेते हैं।"
ispar ChandraBhan Prasad ji ko bhi sochna chahiye.

Jai Prakash Pathak said...

namaskaar
puraane karmakaand binaa logon kaa man nahiin maanata adhunik karmakaand (subidhaa shulk ) binaa kaam nahiin hotaa. sabake apane apane kumbh hain. chaahe aap hon chaahe koii bhii kumbh yaatrii. aur gangaa maiyaaa paap dhote dhote maily ho gaii hain. yaa logon kii behayaaii dekhte dekhte sharmaa gayiin hain.
lage raho rabiish bhaaii!
namaskaar

meri najar mei said...

sir,

andar ki ganga jab maili ho chuki ho to bahar ki ganga use saf nahi kar sakati hai. dalito ke sath bhed dhi sanatan ho chuka hai.yaha to rajnitik vivashata hai,nahito unaka mudda bhi nahi uchalata.

JC said...

एक पुरानी कहानी है जो 'सत्य की खोज' में बाहरी आवरण से बचने की सलाह देती है :

एक सियार गलती से एक रात शहर में आ गया और एक रंगरेज़ द्वारा हौदी में तैय्यार किये नीले रंग में अँधेरे के कारण गिर गया ('कुम्भ स्नान' की डुबकी जैसे) ,,,और सौभाग्यवश जंगल में सुबह सवेरे सुरक्षित पहुंच गया...भिन्न दिखने के कारण उसे कोई दैवी पशु मान उसकी खूब खातिरदारी हुई दिन भर - किन्तु रात में उसकी पोल खुल गयी जब अन्य सियार मिलकर ""हुआ हुआ" बोले - और आदत से मजबूर वो भी "हुआ हुआ" बोल पड़ा :)

नवीन कुमार 'रणवीर' said...

रवीश जी, मुझे अफसोस होता है कि हमारे साथी लोग जो किसी भी मुद्दे पर जोर-जोर से हल्ला बोलकर यहां अपनी बात कहते हैं। वो लोग जातिगत छूआछूत से संबंधित लेखों पर क्यों नहीं बोलते? केवल 10 लोगों की उपस्थिति ये बताती है कि कैसे लोग किस विषय पर बोलना जानते हैं। आप यदि अभी दिल्ली की बुराई कर रहे होते या मायावती के मूर्ति लगवानें पर कुछ लिख दिए होते तो कमेंट्स की संख्या 50 के पार होती, ये मेरा दावा है।
हम भारतीयों को ये बीमारी है कि जब भी कोई हमें आईना दिखानें की कोशिश करता है तो हम तिलमिला उठते हैं, ये बिलकुल स्वदेस फिल्म के फ्लॉप होनें और भारतीय फिल्मकारों की स्लमडॉग को ऑस्कर मिलनें पर नाराज़गी सा लगता हैं।
मैं खुद उस पं.गंगाराम के यहां जाता हूं। मेरे पूर्वजों के नाम वहां लिखे हैं। मुझे नहीं पता था कि वो केवल दलितों के पंडित है। दादा जी के लिए 90 में वहां गए थे। तब मैं 9 साल का था। उत्तर प्रदेश के एक औऱ धार्मिक स्थल औऱ कुंड सौंरों जी(कासगंज) में भी ऐसा ही कुछ है। वहां भी जाति के नाम से पंडित बुलाते हैं और कर्मकांड करवाते हैं।
राजस्थान के दलित आज भी धार्मिक आडंबरों से मुक्त नहीं हो पाए। यूपी में मायावती के आनें के बाद अंबेडकर का दर्शन प्रभावी हुआ है। परंतु राजस्थान के दलित आज भी अपनें को उसी स्थिति में देखते हैं। आज भी वहां पर नाई की दुकान में ही आप से जाति पूछ ली जाती है। तो आईएएस बननें से या पैसा आ जानें से भारतीयों की मानसिकता नहीं बदली है आज भी। कोई भी कितनें पैसावाले दलित के सवर्ण तो क्या पिछड़ा भी बेटी-रोटी का रिश्ता नहीं रखता। सामाजिक आधार पर समाज विघटन आज भी जस का तस है। अगर आरक्षण ना होता तो मैं आपके इस लेख पर अपनी बात कहनें का दम भी रख पाता... शायद!

JC said...

आज गंगा नदी का नाम लेते ही सबके मस्तिष्क में "(राम तेरी) गंगा मैली हो गयी" आता है - मायावी सिनेमा जगत के कारण - यद्यपि हर पढ़ा लिखा ही नहीं कोई भी वृद्ध अनपढ़ भी जानता होगा कि कुछ ही वर्ष पहले इसी नदी का जल स्वच्छ ही नहीं अपने प्राकृतिक सद्गुण के कारण एक अद्भुत चमत्कारिक जल माना जाता था अन्य भारतीय नदियों के जल कि तुलना में...और आज भी कहीं कहीं, अपने उद्गम स्थान के निकट, इसकी प्रकृति में अंतर नहीं आया होगा...
सबको पता है कि गंगा मैली नहीं हुई, हमने ही इसे मैला किया है, अज्ञानता वश, और यदि भागवद गीता पढ़ी होती पश्चिम की चकाचौंध से भटके हुए युवकों ने, विशेषकर नेताओं ने, तो शायद जान पाते कि क्यों 'कृष्ण' ने भी हजारों साल पहले कहा था कि सब गलतियों का कारण 'अज्ञानता' है...अपने निजी जीवन में मुझे भी अफ़सोस हुआ था कि मैंने इसे इतनी देर से क्यूँ पढ़ा (४६ वर्ष की आयु में),,,और यह भी समझ में आया कि कृष्ण "नटखट नन्दलाल" क्यूँ कहलाये, अर्थात कैसे काल के प्रभाव से हर व्यक्ति की इस जीवन में यात्रा परम सत्य से आरंभ तो होती है किन्तु समय के साथ उसकी भौतिक इन्द्रियाँ उसे 'धृतराष्ट्र-समान' असत्य के गढ़े में जैसे धकेलते जाती हैं (आँखों वाले अंधे?)...१३ वर्ष की आयु में मैं आसानी से नैनीताल के स्तर से नैना पीक चढ़ पाया और फिर बढती उम्र के साथ नैनीताल पहुँच थोड़ी सी चढ़ाई में हांफते हांफते सोचता रहता था कि वो सत्य था या स्वप्न?
हिन्दू मान्यता, कि सतयुग में हर आत्मा शिव ही थी, मुझे अब, कलियुग में, संभव लगती है :)

प्रश्न केवल दृष्टिकोण सही करने का है...किसी ने सही कहा कि मानो तो भगवान नहीं तो पत्थर,,,तथाकथित अहल्या समान जिसे इन्द्र के 'माया' या छल के कारण राम के चरण स्पर्श पाने का इंतज़ार करना पड़ा :)