अपराध का नारीवाद



हरिद्वार के ऊपर मनसा मंदिर है। उसी की दीवार पर टंगा यह तत्वबोधात्मक निर्देश आपके सामने है। चोरी के जेंडर पर बहस करते रहिए।

27 comments:

मधुकर राजपूत said...

इस बात का अहसास एक बार बस में किया था, लेकिन आधिकारिक सूचना ट्रस्ट की तरफ से पहली बार पढ़ी है।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बाहर भी? घरों में तो एकाधिकार है ही।

रचना said...

ये बोर्ड केवल ये सूचित कर रहा हैं कि नारी भी अपराध कर रही हैं सो सावधान रहे लेकिन दिनेश कि टिप्पणी क्या कह रही हैं { हां पहले ही कह दूँ मुझे हास्य कि पहचान नहीं हैं } कि हर गृहणी घर मे चोरी करती हैं और अब बाहर भी चोरी करती हैं । पुरुष का ये दंभ कि नारी पर हसने का अधिकार सतत उसका हैं जेंडर बायस हैं ।
बोर्ड मात्र सूचना दे रहा हैं टिप्पणी नारी का मखोल कर के हर गृहणी को चोर साबित कर रही हैं

"अर्श" said...

yahan bhi kadam se kadam milaakar chal rahi hain. :)


arsh

डॉ टी एस दराल said...

भाई हम तो खुद मानते हैं की नारी पुरुष से किसी काम में कम नहीं है।
अब इस पर तो किसी को एतराज़ नहीं होना चाहिए।

अजय कुमार झा said...

इस तरह की सूचनाएं पहले भी पढी हैं ,और इसका अर्थ ये कि महिलाएं भी अपराधी हो रही हैं । अब बात टिप्पणी की तो जरूरी नहीं कि हर जगह इन मुद्दों को एक ही शक्ल दी जाए, या फ़िर शायद ये कुछ विशेष जताने/बताने के लिए होता है , हां हास्य बोध की समझ भी जरूरी होती है , कम से कम इतनी तो जरूर ही कि किसी की बात के अर्थ का अनर्थ न निकाल दिया जाए । मैंने एक पाठक के रूप में अपने विचार रखे हैं , जो मेरी निजी राय है

अजय कुमार झा

rashmi ravija said...

मैं एक नारी हूँ..और जहाँ जरूरत पड़ी है...इस विषय पर खुल कर बोली हूँ..शायद अब तक तो सारे ब्लॉग जगत वाले जानते होंगे....पर यहाँ, ना मुझे इस बोर्ड में कोई दोष दिख रहा है ना दिनेश राय जी की टिपण्णी में ..महिलायें भी जेब कतरी होती हैं,इस बात को कोई नकार नहीं सकता...यह बोर्ड सिर्फ यह बता रहा है...कि उनसे भी सावधान रहें..कई बार जहाँ सिर्फ महिलाओं का प्रवेश होता है...या जहाँ वे जमा होती हैं...अपने पर्स,अपने जेवरों के प्रति असावधान हो जाती हैं,यह बोर्ड सिर्फ उन्हें आगाह कर रहा है...एक बार महालक्ष्मी के मंदिर में महिलाओं के क्यू में खुद महिला कॉन्स्टेबल ने मुझे सचेत किया 'पर्स संभालो अपना'..यहाँ वही काम, ये बोर्ड कर रहा है.
दिनेश राय जी शायद कभी मेरे ब्लॉग पर नहीं आए हैं...ना मैंने कभी उनका ब्लॉग देखा है....पर अगर किसी पुरुष ब्लॉगर के लिए सबसे ज्यादा सम्मान मेरे मन में है तो वह दिनेश राय जी के लिए हैं...यह उनकी टिप्पणियों के कारण...हर नारी विषयक लेख पर दिनेश जी को हमेशा नारी के पक्ष में टिप्पणी करते देखा है...कई ऐसे पोस्ट्स पर भी जहाँ मुझे भी टिप्पणी देना व्यर्थ लगा है..वहाँ भी देनेश जी ने अपनी बात समझाने की कोशिश की है...यह आपकी नज़रों से भी छुपी नहीं होगी...फिर उनकी इस टिप्पणी को पुरुष दंभ से कैसे जोड़ा जा सकता है??...
हास्य- परिहास के लिए हमेशा जीवन में जगह होनी चाहिए...ऐसी बातों पे ऐतराज जता हम भी वही करेंगे जो कुछ पुरुष करते आए हैं.

rashmi ravija said...

ओह्ह!!...ये पोस्ट यहाँ से नारी ब्लॉग के लिए ली गयी थी??...मैंने ध्यान नहीं दिया..वरना कमेंट्स नहीं करती...मुझे ऐसी किसी बहस में भाग लेने का कोई शौक नहीं था...इस बोर्ड के चित्र लगाने का क्या अर्थ है..कि नारी को देवी होना चाहिए..कोई अवगुण नहीं होने चाहिए उनमे?..वे भी मानव ही हैं...सारी खूबियों और कमियों से परिपूर्ण

PD said...

ha ha ha...

pata nahi kis par hans raha hun.. "us board par" ya "apne samaj par" ya "yahan ke comments par".. pata nahi.. :)

Ek ziddi dhun said...

दिनेशराय द्विवेदी ji se is tippani ki ummeed nahi hai.

सतीश पंचम said...

दिनेश जी की टिप्पणी हास्य को छू रही है और मस्त मौला अंदाज में टिप्पणी की गई है। उनकी टिप्पणी में कोई बुराई नहीं है। हास्य कवि सुरेश शर्मा की चार लाईना तो ज्यादातर इसी तरह अपनी पत्नी पर या पत्नियों की कारगुजारियों पर हास्य बटोरे रहती हैं। और उसी तरह पतियों पर भी जमकर कटाक्ष किया जाता है। ये हास परिहास तो जिंदगी का हिस्सा होना चाहिये।

पति की जेब से पैसे निकाल लेना या खर्चों में से कटौती कर उससे मिले पैसों को आगे के लिये या बुरे समय के लिये सावधानी वश पति की नजर से बचा कर रखना यह अक्सर पत्नियों की एक विधा है जिसे हम सभी जानते भी हैं और मानते भी हैं। यह भी माना जाता है कि पति अक्सर खर्चीले होते हैं। यह एक प्रकार की एक दूसरे के प्रति मान्य डकैती है और यह गहन अनूभूति का हिस्सा है। इसे समझने के लिये नजर चाहिये।

कभी कभार (हमेशा नहीं) जब वक्त बेवक्त जरूरत पडती है तो पति अपनी पत्नी से कुछ उम्मीद रखता है कि तुम्हारे पास कुछ हो तो दो बाद में ले लेना। अब यह उम्मीद इसी दम की जाती है कि पत्नी ने जरूर कतर ब्योंत कर कुछ पैसे रखे होंगे जो कि गाढे वक्त पर काम आएंगे। पैसे होते हैं तो पत्नी थोडी ना नुकुर के बाद दे देती है वरना तो दूसरा कोई जुगाड सोचना पडता है।

यह हालत मेरे हिसाब से ज्यादातर भारतीय घरों में होती है। हम सब उसी परिवेश से जु़डे हैं और इस पारस्परिक लेनदेन और हास परिहास को भली भांति समझते हैं।

चण्डीदत्त शुक्ल said...

हंसिए, भाई हंसिए...जी ना जलाइए। स्त्री और पुरुष भारत-पाकिस्तान नहीं हैं। इनमें दीवार ना खींचिए...हा हा हा।
चौराहा

ravishndtv said...

दोस्तों,

मेरा काम है चित्रों के ज़रिये समाज को जैसा व्यक्त किया जा रहा है उसे यहां ला कर रख देना। अक्सर जेंडर के आधार पर अपराध से बचने की चेतावनी पट्टिका कम होती है। यहां दिखी तो लाकर पटक दिया। मतलब यह नहीं है कि नारी को सिर्फ देवी ही होना चाहिए। मतलब यह भी नहीं है कि महिला के अपराधी होने से नारीवाद की घोषणाओं को कमतर समझा जाए। बल्कि देखा जाए कि किन किन मामलों में समाज और सरकार और संगठन किस तरह की अभिव्यक्तियों का सहारा लेते हैं।

शशांक शुक्ला said...

अरे आश्चर्यचकित न हो, महिलायें भी कंधे से कंधा मिला रही है तो आश्चर्य कैसा

newspostmartem said...

आदरणीय रवीश जी प्रणाम आपका मेल मुझे नहीं मिल सका इसलिये इसे संपर्क का माध्यम बना रहा हूं. दरअसल मेरे शहर की एक घटना मुझे लगातार परेशान कर रही है. ऐसे में मुझे आप याद आये. गलती के लिये क्षमा कीजियेगा.
मैं आपको उस खबर की जानकारी देना चाह रहा हूं जो मीडिया जगत के लिये खबर होकर भी खबर नहीं बन सकी तो डींगे हांकने वाले आला अधिकारी भी खामोश बैठे है. यह मामला सतना जिला अस्पताल की एक ऐसी महिला चिकित्सक का है जो बच्चों की गहन चिकित्सा ईकाई (एससीएनयू)में नियुक्त रही और उसने एक जिंदा नवजात को सिर्फ इस लिये मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कर दिया क्योंकि उसे अपने नर्सिंग होम जाना था और उसे लग रहा था कि जल्द ही वह बच्चा मर जायेगा. हालांकि इसके लिये नर्सिंग स्टाफ द्वारा मना भी किया गया लेकिन उसने यह कह दिया कि बच्चे को बचना तो है नहीं. तुम परेशान मत होओ. यह कह कर वह चली गई. तब अन्य डाक्टरों को बुलाया गया और उसका उपचार प्रारंभ किया गया और स्थिति नियंत्रण में आने पर उसे मेडिकल कालेज रिफर किया गया .
इस मामले को दबाने के जहां पूरे उपाय किये गये तो कलेक्टर के संज्ञान में आने के बाद भी इस मामले में खामोशी ही ओढ़ रखी गयी है. वहीं प्रदेश के स्वास्थ्य सचिव श्री मोहंती भी इनके काफी क्लोज बताये जाते हैं.
अब अपने आप में स्पष्ट है कि इतना गंभीर मामला होकर भी कोई कार्यवाही क्यों नहीं हो रही.
मेरा आप सबसे निवेदन है कि इस मामले को यदि देश प्रदेश स्तर पर उठा सकते हैं तो शायद चिकित्सा जगत व दीन हीन मरीजों पर उपकार होगा. यह घटना अभी एक माह के अंदर की ही है.
आपकी जरूरतों के लिये मैं संबंधित मोबाइल नम्बर भी दे रहा हूं.
सिविल सर्जन जिला अस्पताल सतना - डॉ प्रमोद पाठक 09425810372
सीएमएचओ सतना - डॉ. आर.एस. दण्डोतिया 09826448899
एससीएनयू इंचार्ज - डॉ. आर.पी.पटेल 09826136160
कलेक्टर सतना - सुखबीर सिंह 9893738222


- newspostmartem.blogspot.com

वाणी गीत said...

यह एक सूचना मात्र है ...जब महिलाएं पुलिस अधिकारीं , सैनिक , टेक्सी ड्राईवर आदि बनी सकती हैं तो अपराधी भी हो सकती हैं ....इसमें आपत्तिजनक क्या लगा ...?
दिनेश राय द्विवेदी जी की टिप्पणी एक सरल हास्य ही है ....इसे हास्य से जोड़ कर ही देखा जाना चाहिए ...
महिलाएं पति की जेब से पैसे निकलती हैं ...जब सीधी अंगुली से घी नहीं निकलता तो टेढ़ी करनी ही पड़ती है ...जब जरुरत पर पैसे अपने आप नहीं दिए जाएँ तो जेब से निकलना परम धर्म है ...उन महिलाओं के लिए जो अर्थ के लिए अपने पति पर ही निर्भर है ....ऐसे ही कामकाजी पत्नियों के पर्स से नहीं तो फर्जी हस्ताक्षर से बैंक अकाउंट से पैसे निकलने की घटना कई बार सुनी और पढ़ी है ...:) ...

JC said...

रविशजी अपने दृष्टिकोण से मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं में 'कुछ नया' देख उनको भोजन समान परोस रहे हैं. द्वैतवाद के कारण, जिसको मिर्च खाने की आदत नहीं होती है वो तो अवश्य शिकायत करेगा ही जबकि संभव है अन्य ग्राहकों को भोजन मसाले के कारण ही अधिक स्वादिष्ट लगे...

जीवन का सत्य है कि मनुष्य की यह प्रकृति है कि वो 'शुद्ध जल' नहीं पी सकता...सामान्य जल का स्वाद उसमें घुले हुए कुछ रसायनों आदि के कारण होता है...किन्तु किसी जल में मिलावट यदि सीमा से अधिक हों तो वो जल विषाक्त माना जाता है...यह दूसरी बात है कि शिव समान मीरा तो हलाहल भी पी गयी थी!

अब तो गंगा भी मैली हो गयी, किन्तु फिर भी कहीं-कहीं पर उसका जल आज भी शहर निवासियों की पहुँच से बाहर क्षेत्रों में होने से सीधे पीने योग्य होगा...और सब जानते हैं कि यमुना के किनारे बसे इस दिल्ली शहर ने कभी भी किसी एक सभ्यता को पहले पनपने तो दिया है किन्तु उसके ध्वंस का कारण भी ये ही बनी...यही नहीं सारी सभ्यताओं के बसने और, अंततोगत्वा, उसके पतन का कारण 'जल' ही होता है - यही प्रकृति का नियम है...

संगीता पुरी said...

आपके पोस्‍ट से भी बडी बडी टिप्‍पणियां पढने को मिल रही है .. यह बोर्ड लोगों को सावधान करते हुए कह रहा है कि महिलाएं सबकुछ कर सकती हैं .. इसमें आपत्ति वाली कोई बात मुझे नहीं दिखती .. अपने स्‍वभाव और परिस्थितियों से कोई लाचार भी तो हो सकता है !!

Mithilesh dubey said...

सही है पीछे क्यों रहें,

बेचारे द्विवेदी जी, नेकी कर दरिया मे डाल ।

Arvind Mishra said...

दिनेश जी को संबोधित -मैं अपवाद हूँ मैं घर में अक्सर उनकी जेब या जेबी या बटुआ या बटुई जो भी काट लेता हूँ और उन्हें पता तक नहीं चलता हा हा -यह प्रति हास्य है .

काजल कुमार Kajal Kumar said...

सीधी सी बात पर भी टिप्पणी करने की हिम्मत नहीं हो रही है :-(

Krishna Kumar Mishra said...

nice capture, and these line are showing here that women have good status in our society......mahilaaye bhi.............अत्र नारी पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता,.....जै हो

अखिल कुमार said...
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अखिल कुमार said...
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अखिल कुमार said...

कहने वाले कह गए कि
नारी भी अपराध कर रही हैं सो सावधान रहे

जबकि बोर्ड कह रहा कि
महिलाएँ भी जेबकतरी हो सकती हैं

घरों की बात वही कर सकते हैं जिनका घर हो

राज भाटिय़ा said...

दिनेश राय जी की टिपण्णी मेरी समझी जाये मै उन से सहमत हुं, अरे हर समय कुडना सडना क्या अच्छा लगता है कभी कभी खुल कर हंसना भी चाहिये, ओर फ़िर पति की जेब पर एक मात्र पत्नि का ही तो अधिकार होता है...

imnindian said...

अरे लोग ये क्यों भूल जाते है की चोरी करना भी औरतो ने पुरुषो से सीखा है , ये महिला जेब कतारनेवालिया क्या पैसे अपने पास रख पाती है या गिरोह द्वारा एक "SOFT INSTRUMENT TO GET WORK DONE " भर है .रुपया कोई और ( पुरुष )(PL DON'T KILL ME FOR THIS WORD ) ले जाता है और ये बेचारी बस नाम भर की रह जाती है .