अपार्टमेंट आजकल- बिन बाज़ार हिन्दी





मोहल्लों की कब्र पर बने ये अपार्टमेंट अब बाज़ार का विस्तार बनते जा रहे हैं। पहले अख़बारों ने इनके गेट पर प्रायोजित बोर्ड लगाया,अब वो भीतर आने का जुगाड़ निकाल रहे हैं। आजकल अचानक ड्राइंग कंपटीशन की बाढ़ आ गई है। सतमोला चाय का इन बच्चों से क्या लेना देना लेकिन चाय वाले ड्राइंग कंपटीशन करा रहे हैं। बीच में थ्री इडियट का बेहूदा सुर में गाना बजता था और सतमोला चाय की खूबी बखान होती थी। बच्चे रंग रहे थे,नाच रहे थे और कंपटीशन में जगह पा रहे थे। सबको कुछ न कुछ प्राइज़ दिया गया। इस तरह से एक रविवार की दुपहर खराब कर सतमोला चाय का विज्ञापन हो गया। सर्टिफिकेट भी मिला। जिस रफ्तार से ये कंपटीशन हो रहे हैं,उससे तो यही लगता है कि ड्राइंग रूम में सतमोला, आईसीआईसीआई,महेंद्रा और महेंद्रा,मैगी,लक्स,पैराशूट नारियल तेल के सर्टिफिकेट टंग जायेंगे। घर के भीतर भी इनकी लघु-होर्डिंगिका भर जाएगी। देह के ऊपर लगने वाले और भीतर कोशिकाओं में धकेले जाने वाले सभी उत्पादों के ड्राइंग कंपटीशन बाल काल से ही जीत रहा हूं। इसका दंभ भऱता हुआ लिफ्ट के किसी किनारे कोई युवा हिन्दी अखबारों के अनुसार किसी युवती को गुलाब के फूल दे रहा होगा। अभी इसमें टाइम है। लेकिन होगा।

(नोट-हिन्दी के अखबारों में अक्सर ये कैप्शन होता है- बारिश में भींगती युवती, हिन्दी के अखबारों में कभी किसी युवक या वृद्धा को भींगते नहीं देखेंगे। सिर्फ युवतियां भींगती हैं)

मेरी बेटी ने भी महेंद्रा एंड महेंद्रा में प्राइज़ जीत लिया। उसकी खुशी में हम भी झूमे। वोडाफोन और टाटा इंडिकॉम के फोन से पटना कोलकाता फोन कर दिये। घर में पिकासो के बालागमन का एलान कर पितृत्व और मातृत्व की खुशी का ज्वाइंट अकाउट खोल बैठे। लेकिन हर हफ्ते सोसायटी के बोर्ड पर ड्राइंग कंपटीशन की सूचना आने लगी। उसके बाद महेंद्रा एंड महेंद्रा के लोगों ने फोन कर टार्चर कर दिया कि आप आइये और एक घंटा हमारा लेक्चर सुनिये,फिर पत्नी के लिए डायमंड सेट ले जाइये। हमने कहा कि भई जब विजेता हैं तो एक मिनट में प्राइज़ दो। नहीं दिया और हम नहीं गए। हीरे के लिए एक घंटा नहीं दे सकते। रख लीजिए अपना नकली नौलखा। न हम राजा कहीं के न वो महारानी। तीन नंबरी पत्रकार ने पूरे स्वाभिमान से बाज़ार की इस गुज़ारिश को रिजेक्ट कर दिया। नेपथ्य से तालियां बजने लगती हैं।

लेकिन दोस्तों,टीवी सेट के ज़रिये ब्रेकों में विज्ञापनों का असर कम हो रहा है क्या? ये लघु-होर्डिंगिका लेकर अपार्टमेंट में क्यों आ रहे हैं? पता नहीं,वो दिन दूर नहीं जब मेरा सोफा आईसीआईसीआई से प्रायोजित होगा,बदले में सोफे की कीमत पंद्रह फीसदी कम होगी, थाली की ऊपरी सतह पर लिखा होगा,पका है हाकिन्स में। ग्लास पर लिखा होगा,एक्वा की कसम। भीतर से घर बिना एमसीडी और बीएमसी के भय के बाज़ार में बदल जाएगा। एक मेज़ बची रहेगी जिस पर हम लिखा करेंगे,हिन्दी पत्रकारिता के समाजवादी संस्थानों में पहचाने जाने के लिए,बाज़ार का विरोध किया करेंगे।

अशोक वाजपेयी दुखी हैं आजकल कि जयपुर फेस्टिवल में कोई हिन्दी वाला नहीं गया,अपने लेखक से आटोग्राफ लेने। हिन्दी का साहित्य संसार कालजयी रचनाओं के लोड से दबा जा रहा है। योगदान से कम भाव पर कोई साहित्य रचना हो नहीं रही है। पोपुलर होंगे नहीं लेकिन पब्लिक को ढूंढेंगे। महान लेखकों के श्रमदान की पाठकों ने ऐसी कीमत लगाई कि प्रकाशक भी बिना पैसे दिये किताब छापता है।

तभी एक चीख सुनाई पड़ती है... नहीं....महारानी..हम इस कालखंड को खंड खंड कर तीन वॉल्यूम छापेंगे लेकिन अपने हिन्दी के पाठकों के लिए नहीं। बाज़ार के लिए। प्रतिवाद होता है- साहित्य और समाजवादियों बाज़ार से मत डरो। बुलाओ किसी अमर सिंह को। वीर संघवी ने कह दिया कि जब हर पार्टी को अमर सिंह चाहिए तो साहित्य को क्यों नहीं चाहिए। जवाब दो। कालजयी कलमकारो। सतमोला चाय वाले ड्राइंग कंपटीशन करा सकते हैं तो क्या हम लेखक पांच सौ शब्दों की लघु कहानी की प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकते। सेल्फ कांफिडेंस लाओ,साहित्य अकादमियों के पूर्व विजेताओं। सेल्फ कांफिडेंस लाओ। वो आता है मार्केट वैल्यू से। मूर्खों।

तभी प्रकारांतर से आवाज़ आती है...नहीं...बलेश्वर...ऐसा मत कहो। अपमान मत करो। क्यों गुप्तेश्वर...हिन्दी के लोग अपमानरहित जीवन चाहते हैं क्या? तुम अपार्टमेंट की कुंठा का व्यापक अप्लीकेशनीकरण मत करो। गंभीर दिखो। हिन्दी के लेखक हो..कुंठा से ही कालजयी रचनाएं बहरती हैं। हहराकर बाहर आने दो। करमजरू कहीं के,ग्लैमरसविहीन हिन्दी वाले। आव तनी एन्ने...बतइते हऊ तोरा..हम..। तभी एक धीर- गंभीर आवाज़ आती है..पहली विदेश यात्रा से खरीद कर लाए गए कंबल में लिपटा एक साहित्यकार बाज़ार मीमांसा करता है।

हर प्रभाव के लिए ज़िम्मेदार अगर कोई है तो वो बाज़ार है। जहां कोई प्रभाव नहीं हैं,वहां कोई बाज़ार नहीं है। बाज़ार के खिलाफ लिखीं कविताओं को सैमसंग रविद्रनाथ टैगोर पुरस्कार में चयनित होने के लिए भेज दो, नेशनल अवार्ड के लिए सुधीश पचौरी से सिफारिश लगा दो। ढूंढो मथुरा जाकर, किस किस ने खेले हैं बाल सुधीश के साथ कंचे। वहीं दिलायेंगे अवार्ड। शर्तिया और एलानिया कहता हूं। फ्री के इस जनसंदेश के साथ अपार्टमेंट में विज्ञापन तलाशने की संभावना पर यह लेख यहीं समाप्त होता है। तालियां। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गुमनाम अपितु स्थानीय स्तर पर ख्यातिप्राप्त हिन्दी के इस पत्रकार की यह अल्पकालिक कालजयी रचना यहीं समाप्त होती है।

26 comments:

रंजन said...

मेरा पुत्र भी एयरटेल के ऐसे ही एक प्रतियोगिता में कोलाज बनाने में प्रथम आया था ! बजाज स्कूटर से हम चार लटक के शिप्रा माल से वो ' प्राईज़' लाये थे ! घर में कहाँ रखें पर बहस शुरू हो गयी थी ! बचपन में कई ऐसे घर देखा था - जहाँ कई ट्राफी और शील्ड सजा कर रखे हुए रहते थे ! बेटा 'कोलाज' में कुछ जीता था ..ट्राफी को टी वी के ऊपर सजा कर रख दिया ! बचपन से समाचार सुनाता आया हूँ - अब आपसे समाचार सुनाता हूँ ..बीच बीच में ऐड आता है :) सत्मोला के बहाने ...बच्चे थोड़ी देर के लिए ..खुश तो गए ! 'बाज़ार' है तभी तो आप हैं :)

विनीत कुमार said...

अद्भुत,मजा आ गया पढ़कर। अपने को एक नंबर का पत्रकार नहीं कहने पर आपके प्रति सम्मान बढ़ा कि चलो अपने हिस्से की ईमानदारी बची है आपमे। दू नंबर का सुनने में खराब लगता है। अगर पत्रकार के लिए इस्तेमाल हो तो दुनिया के सारे ऐब उसमें शामिल मान लिया जाता है। लड़की को कह दें तो साफ मानिए कि वो बहू-पत्नी बनने लायक नहीं मानी जाती। लेकिन तीन नंबर लिखकर आप जिस श्रेणी की बात कर रहे हैं उसके बारे में जरा डिटेले में लिखें। मतलब चाल-चरित्र,बात-व्यवहार जिससे कि हम बचे पत्रकारों के लिए आगे की कैटेगरी बना सकें,चाल-चरित्र डिफाइन कर सकें।...हिन्दीवालों पर आप लिखते हैं तो छुट्टा सांड जैसा सींग लड़ाने वाला प्लेजर दे जाते हैं। अंदर से गुदगुदा जाते हैं। निंदा रस के हम जैसे कद्रदानों को मोह जाते हैं। शुक्रिया।..

सतीश पंचम said...

एक अंग्रेजी फिल्म आई थी जिसका नाम तो याद नहीं पर उसमें हिरो को यह काम मिलता है कि वह एक मॉल में कुर्सी लगाकर बैठे और लोगों को ऑटोग्राफ दे, लोग चीजें खरीदने आएंगे तो तुमसे प्रभावित हो ऑटोग्राफ जरूर लेंगे।

सुबह से शाम हो जाती है लेकिन कोई ऑटोग्राफ नहीं आता। मॉल में बैठे बैठे अपने टेबल की जगह भी चेंज करता है कि शायद अब यहां ज्यादा पब्लिक उसे देखेगी, यहां उस प्रोडक्ट के पास लोग ज्यादा आते हैं वहां बैठा जाय......लेकिन नहीं। थक कर उस हिरो को अपनी काबलियत पर शक होने लगता है। फिल्म का अंत तो मैं चूक गया हूं लेकिन उसमें एक बच्चे को हीरो की ओर बढते दिखाया गया था कि तभी उसकी मां उस बच्चे को रोक लेती है कि स्ट्रेंजर से बात नहीं करनी चाहिये :)

मुझे लगता है कि हम हिन्दी वालों की हालत उस हीरो सरीखी तो नहीं हो गई है। यहां टेबल लगाओ, वहां टेबल लगाओ... लेकिन विदेशी लक्जरी चीजों का उपयोग करते हुए, सिगरेट पीते हुए थोथी नैतिकता और थोथे उच्च आदर्शों की पुंगी बजाते हुए टेबल लगाओ ....लोग दूर से ही उस आवाज को सुन निकल लेते हैं....Don't talk to strangers का भाव लिये हुए क्योंकि अब थोथे उच्च आदर्शों की पुंगी की कीमत एक लुंगी से भी कम हो गई है जिसे कि अब लोग शायद कम ही पहनते हैं।

(फिलहाल लुंगी पहन कर ही कमेंट कर रहा हूँ :)

Kulwant Happy said...

शायद आपके मोबाइल अपडेट से चूक गया हो..या फिर दिल्ली में वो आया ही न हो। कल इंदौर के रीगल चौराहे पर साईकल टायर का होर्डिंग़ देखा..वहां टायर साइकिल नही, बल्कि एक सुंदर कन्या पहने हुए दिखाई गई। युवती को हर जगह चिपकाया जा रहा है......

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

जिधर देखिए बाजार है। आप को खरीददार बनाने पर तुले हैं। पर जेब उस की सीमा में दाल और शक्कर भी नहीं आ रहे हैं।

मधुकर राजपूत said...

रवीश कमाल लिखा है। पिछली दो पोस्टों से बहुत बढ़िया पंच मार रहे हो। समां बांध दिया इसमें। दो एक ज़ुमले और लफ़्ज ईज़ाद कर लिए। बाज़ार को धार मार दी। अभी तो बाज़ार अपार्टमेंट तक ही पहुंचा है देखना कि आने वाले वक्त में निजी टॉयलेटों में व्हिस्की से लेकर कब्जतोड़ चूरनों का प्रचार मिलेगा।

apne-apne ajnabi said...

ham abhi bhi 1 room set ke sath romance kar rahe hain, isliye apartments ke andar ke haal zyada maloom nahin, jo har jagah ho raha hai, wohi apartment k andar bhi, isi aadhar par aapki baat manne ka man karta hai, vishwas dilane k liye chaspan hui do photuen jo aapne uplabdh karwain hain, uske liye dhanyawad, waise sarcasm accha laga,

सुशीला पुरी said...

बढिया लिखा आपने ...रवीश जी .....,पर आप सिर्फ अपना ही पढवाना चाहते हैं ?

ravishndtv said...

अपना ही पढ़वाना चाहते हैं...मतलब समझा नहीं। दूसरों का भी लिखा पढ़ता हूं। अगर ये शिकायत है तो और ठीक करूंगा। दरअसल होता ये है कि ब्लॉगवाणी पर जितनी भी रचनाएं आती हैं उनमें से कई को पढ़ता हूं। इससे मुझे अपने पेशे में फायदा भी होता है और नया भी पता चलता रहता है।

Archana said...

KYA BAZAR AJ PALE SE HI HAMARE GHARO MEIN NAHI GHUSA HAI. SUBAH UTHKAR PEPSODENT SE BRASH KARTE HUYE , RED LEBAL KI CHAI PITE HUYE..CORNFLEX KA NASHTA KHAKER, ASHIRVAAD(AATA) KI ROTI BANAKAR.........RAAT KO SONE SE PAHLE ALL-OUT JALAKAR ....BHOUTIK SAPNO MEIN KHO JANA...
HUM BHI AJIB HAIN...MAHNGAAI KA RONA ROYEYNGE...PER BAGAL KI KIRANE KI DUKAN CHHODKAR JAYENGE "MAAL" MEIN..
BCOZ WE ARE ENGLISH SPIKING PEEPLE NA...BACHHE KO BHOJPURI BOLNA SIKHAYE.......ARE YAA PAAGAL HO BACHHA PICHHAD GAYA TO....AFTER AAL COMPITION KA JAMANA HAI...
HINDI MEDIUM SCHOOL NA NA NA...DIMAG KHARAB HO GAYA...KAUN SE JAMANE KI BAAT KAR RAHE HO....

AYE TO SIRF BAANGI HAI...FEHRISHT TO KAFI LAMBI HAI..INKE JIMMEDAR KAUN HAI...KYA HUM KHUD NAHI....
FIR KIS BAAT KA RONA..

shreesh said...

रवीश जी निदा फ़ाज़ली साहब का एक शेर याद आता है
अच्छी नहीं है शहर के रस्तों कि दोस्ती
आँगन में फ़ैल जाये न बाज़ार देखना,
आज जब लोग अपने घरों को तोड़कर बाज़ार में तब्दील कर रहे हों तो बाज़ार घर तक पहुँचने लाग जाये तो कोई नई बात नहीं है, अब ये बात अलग है ये तै करने किसके पास है कि किसे घर से बाज़ार बना दिया जाये और किस घर तक बाज़ार पहुंचा दिया जाये

SACHIN KUMAR said...

SACHIN KUMAR.
पर आप सिर्फ अपना ही पढवाना चाहते हैं ? I SUPPORT SUSHILA PURI...ALTHOUGH THERE IS CLEARANCE BUT STILL I SUPPORT SUSHILA. THIS IS SUCH A WONDERFUL ROMANCE OF BLOGS....HARDLY TO FIND ANY WHERE..BUT DEAR READER WHAT TO DO YOU THINK ABOUT MRINAL PANDEY COMMENT IN WHICH SHE SAYS BLOGGING IS ALMOST BEKAR OR SAY USELESS...AS FAR AS THIS APARTMEN AAJKAL IS CONCERN AS MUCH YOU SAY IT WILL BE LESSER

gyan ghosh said...

share the views of archana

kathan said...

its a big prob ..these days every brand intrpting in our life through kids

JC said...

सतमोला चाय का स्वाद कैसा था? 'लोपचू' सा या 'रेड लेबेल, ब्रुक बोंड' सा? या...
जहां तक 'बाज़ार' का प्रश्न है, प्राचीन ज्ञानी इस संसार को ही एक झूठा बाज़ार कह गए जहां झूट के सिवाय कुछ नहीं बिकता...वो भले ही हिंदी में बेचो चाहे कोई और भाषा में...
हमारे एक टीचर कह गए कि उर्दू जुबान में गाली भी ऐसी लगती है जैसे मखमल के कपडे में लपेट जूता मारा गया हो :)

umar said...

ravish ji aap ka lekh padh kar mujhe film phir bhi dil hai hindustani ka wo scene yaad aa gaya jisme paresh ji ke pure kapde par vigyapan chapa tha aur shayad wo din dur nahi jab ye filmi parde se nikal kar real life me hone lagega..

Jai Prakash Pathak said...

namaskaar
abhii to baajaar men ham dhiire dhiire aa rahen hain. aage aage dekhiye hota hai kyaa.

namaskaar.

हर्षवर्धन said...

ye wala bahut dhansu likh mara hai. sidhe samajh men ghusta hai

Chandan Kumar said...

achcha laga sir. .. bahut achcha..
.. kuch logon ko achcha nahe laga.to sir doha bhe hai.. nindak niarre raakhiye !!!

ravishndtv said...

अर्चना,

हम बाज़ार-संसार में जी ही रहे हैं। मैं तो इसके बहाने फिर से खुद को देख रहा हूं। इसके बिना अब जीवन की कल्पना मुश्किल है। हममें से कोई कुटिया में जाकर नहीं रहने वाला। आने दीजिए बाज़ार-साहूकार को। देखी जाएगी।

मेरे इस लेख को कत्तई बाज़ार विरोधी रूप में न देखा जाए। मैं तो इसके यत्र-तत्र बिखरे रूप को जोड़ कर कोलाज बनाता रहता हूं।

Archana said...

I TOTLEY AGREE WITH YOU SIR..
AAJ KOI BHI IS BAAZAR SE BACHKAR NAHI RAH SAKTA..SAHI KAH AAPNE KI.
हममें से कोई कुटिया में जाकर नहीं रहने वाला। आने दीजिए बाज़ार-साहूकार को। देखी जाएगी।
AYE HUMPER HAI KI HUM UNHE APNI JINDAGI MEIN KITNI JAGAH DE....
BCOZ ITS MY LIFE.....

dr aqeel said...

RAVEESH JI,KASBAA BHI BADIYAA LAGAA....INTERNET 10 SAAL SE USE KAR RAHAA HOON LEKIN PEHLI BAAR BLOG PAR ITNA TIME DIYA HOON

stock ki duniya said...
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stock ki duniya said...
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stock ki duniya said...
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stock ki duniya said...

Ravish ji mein apki reporting ke aandaj aur aapki bhasha shayali ka toh kaayal phele se hi tha.aur aaj yeh lekh padkar aapki izzat dil mein aur bhad gaye.magar mein ek baat janana chata hun ki hindi patrkar is baazar se kyun darte hai?shayad yeh baazar hi jo hume aache se aur aacha karne par mazboor karta raheta hai aur iske liye jagah bhi pardan karta hai.yeh baazar ki race hi hai jo hume humesha yuva banaye rakhti hai.hum is ko nakar nahi sakte,yeh darwin ke sidhant ki tarah hai.yedi sabbit nahi kaaroage toh fail ho jayege.aap yuva patkaro ke aadarsh hai,aap hume bhavishay ke is race ke hissab se tyaar kare "parivartan hi zindagi hai".

February 3, 2010 1:55 PM