मूर्ति पूजा का खंडित पक्ष





आरा से यह तस्वीर सहकर्मी दीपक कुमार के सौजन्य से प्राप्त हुई है। जयप्रकाश नारायण की मूर्ति है। जन्मशति के मौके पर उनके अनुयायी आस्था व्यक्त कर रहे हैं। जयप्रकाश नारायण के जितने भी सत्ताधारी चेले हुए वो सब फटीचर गति को प्राप्त हुए लेकिन तस्वीर में दिख रहे लोग पता नहीं क्यूं जेनुइन मालूम पड़ते हैं। इसी खौफ से बहन कुमारी मायावती ऊपी में मूर्ति रक्षा दल बना रही हैं ताकि इस तरह के दिन न देखने पड़े। लेकिन उन्हें भी समझना चाहिए,जब तक इस तरह के अनुयायी बचे रहेंगे,मूर्ति का बचाखुचा कोई भी हिस्सा आस्था व्यक्त करने के काम आता रहेगा। मुझे यह तस्वीर ग़ज़ब की लगी। इस मूर्ति के नीचे से किसी भी प्रकार के लोकतांत्रिक विचार आ जा सकते हैं। दो खंभों पर खुद को टिकाने का ही तो जेपी ने प्रयोग किया था। दो तरह के विचारों को भी।

21 comments:

विनीत कुमार said...

हमको तो लगा रहा है कि मूरती हमसे उंगली देखा के बोल रहा है कि उपर उठो चाहे तुमरे नींचे कुछ रहे या न रहे। मतलब जिस गरीब के पास कुछो नहीं है उसी को उपर उठने और आदर्श,नैतिकता का पालन करने के लिए कहा जा रहा है।..

एस. बी. सिंह said...

क्या कहूं! बहुत साल पहले यूं ही महात्मा गांधी की मूर्ति की हालात देखा कर एक कविता लिखी थी -

पूर्वज
चौराहों पर लगे
कौओं और कबूतरों की
बीट से लिथड़े
तुम्हारे बुत
तुम्हारी विस्मृति के
स्मृतिचिन्ह ।

Nikhil Srivastava said...

मायावती जी या उनके किसी चेले ने देख लिया आपका ये पोस्ट तो ये लोकतंत्र की जगह पत्थरों से भर दी जाएगी...हाहा.

अनामदास said...

क्या बात है, मन खुश कर दिया. देखिए, कोई कह रहा था कि लोग लेनिन सद्दाम सबको ढहा देते हैं, आपने दिखाया कि जिसे संजोना होता है लोग ऐसे संजो लेते हैं. आपने अधूरी बात पूरी कर दी.

http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2010/01/post-72.html

JC said...

जिसकी अनादी काल से पूजा 'भारत' में होती चली आई है, मात्र एक पत्थर, शिवलिंग तो सभी ने देखा ही होगा...और कुछेक 'पढ़े- लिखे' यह भी जानते होंगे शायद कि मानव को निराकार अनंत इश्वर यानि 'ब्रह्माण्ड' का प्रतिरूप माना गया है...

"मानो तो भगवान नहीं तो पत्थर" को यथार्त करते हुए सुंदर तस्वीर, जिसमें कम से कम एक 'घट', यानी सर, तो साबुत है और 'गुरु' की ओर संकेत करती ऊँगली भी...

'भारत' में सत्य उसको माना गया जो काल के प्रभाव से परे है..."सत्यम शिवम् सुंदरम"..."हरी अनंत/ हरी कथा अनंत, आदि..." अपने ही 'भारत' में आज भी तोते समान दोहराते आप अधिकतर 'हिन्दुओं' को पायेंगे, यद्यपि गीता में कोई भी पा सकता है लिखा कि सारी गलतियाँ अज्ञानता वश होती हैं...

कृष्ण को 'नटखट नन्दलाल' भी ऐसे ही नहीं कहा गया ;)

prakashmehta said...

this is your best and genuine blog entry keep it up sir jee

Archana said...

SACH HAI "मानो तो भगवान नहीं तो पत्थर" HUM BHARTIYA KI AASTHA AYE NAHI DEKHTI KI MURTI SANGMARMAR KI HAI YA SADAK KINARE SE UTTHYE HUE PATTHER KI...KHANDIT HAI , ANGADH HAATO KI KALAKARI HAI YA KISI MURTIKAR KI SARVOTTUM KALAKIRTI KISI BHI RUP MEIN ....SABSE JARURI HAI AASTHA...

ravi said...

jo mila hame usi se humne apni dil ki shradha vyakt kar di, mila tera ek ansh hi toh kya us ansh pe hi hamne apni sari bhakti jahir kar di, tera sapna hi toot gaya toh teri murti tooti toh kya ,par tera astitva mitne na paye itna toh karenge hi,

Tarkeshwar Giri said...

Sriman ji, kan kan main hain RAM, Lekin mayawati kya chahti hain ye unhe bhi nahi pata

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सचमुच अलग तस्वीर है. निष्ठा यहाँ साफ़ दिख रही है.

JC said...

एक कहानी बचपन में पढ़ी थी कि कैसे एक मायादास (मिडास) की जन्मों की इच्छा पूरी कर दी भगवान् ने, कि वो जिस किसी को छू ले वो सोने में परिवर्तित हो जाए...और वो सारा दिन कुर्सी, मेज आदि को सोना बनाता रहा और खुश होता रहा...

किन्तु जब उसकी नन्ही सी, प्यारी सी, बेटी शाम को उसकी गोद में दुर्भाग्य वश आ बैठी तो वो भी सोने की मूर्ती में परिवर्तित हो गयी :(

कहानी का सारांश - यदि कुछ (भगवान से) माँगना हो तो आगे- पीछे सोच समझ के मांगना चाहिए, (हिंदी में सीधा रूपांतर), "कूदने से पहले दो बार सोच लीजिये!"

गिरिजेश राव said...

तस्वीर अपने आप में एक पोस्ट है। किसी तरह के लेखन की आवश्यकता ही नहीं थी

सुशीला पुरी said...

रवीश जी ! गजब की तस्बीर लगाई है आपने , मूर्ति रक्षा दल बना कर बहन मायावती क्या कर पायेंगी ,ये सबको पता है ......जय प्रकाश नारायण जी के विचारों
का जो दर्शन रहा है उस बल पर चलें तो चाहे कुछ हो .

VIKAS said...

Sir,

Main aapko kareeb ek saal se dekh/sun reha hoon... Nishchit hai is se pahle bhi aap isi tarah sunai or dikhai dete rehe honge, lekin mera durbhagy ki main is sabse vanchit raha... (Shayad apni agyanata or seemit dayre ki vajah se).. Kahne ko main bhi ek patrkaar hoon or pichhale 5 saal se rajsthan k sriganganagar jile mein tathakathit roop se patrkarita karta raha hoon or ab isi peshe ki badolat desh ki rajdhani aa pahunchha hoon... Aapki shaili or bebaaki ka teh dil se prshansak hoon or aapko AACHHARY DRON mankar aapka shagird bhi ho gya hoon... Yadi aap ise padhe to kripya kisi bhi madhyam se aashirvaad prdaan kare, taki main bhi aapki tarah kabhi patrkarita ke mandando par khara utrane mein safal ho sakoon..

Aapka,
VIKAS SACHDEVA
095822-21718

Aadarsh Rathore said...

विनीत जी वाह.....

Aadarsh Rathore said...

किन्तु आपकी प्रथम पंक्ति से ही सहमत हूं। दूसरी पंक्ति को और बेहतर बनाया जा सकता है।

DR. ANWER JAMAL said...

मूर्तिपूजा इसलाम में निषिद्ध है। इसलाम के सिद्धान्तों में मानवता मुक्ति है।
वैज्ञानिक नज़रिये से देखा जाये तो पवित्र कुरआन अल्लाह के वजूद की खुद एक बड़ी दलील है।
हज़रत मुहम्मद (स.) आज हमारी आँखों के सामने नहीं हैं लेकिन जिस ईश्वरीय ज्ञान पवित्र कुरआन के ज़रिये उन्होंने लोगों को दुख निराशा और पाप से मुक्ति दिलाई वह आज भी हमें विस्मित कर रहा हैै।
यह स्वयं दावा करता है कि यह ईश्वर की ओर से है। यह स्वयं अपने ईश्वरीय होने का सुबूत देता है और अपने प्रति सन्देह रखने वालों को अपनी सच्चाई की कसौटी और चुनौती एक साथ पेश करता है कि अगर तुम मुझे मनुष्यकृत मानते हो तो मुझ जैसा ग्रंथ बनाकर दिखाओ या कम से कम एक सूरः जैसी ही बनाकर दिखाओ और अगर न बना सको तो मान लो कि मैं तुम्हारे पालनहार की ओर से हूँ जिसका तुम दिन रात गुणगान करते हो। मैं तुम्हारे लिए वही मार्गदर्शन हूँ जिसकी तुम अपने प्रभु से कामना करते हो। मैं दुखों से मुक्ति का वह एकमात्र साधन हूँ जो तुम ढूँढ रहे हो।
पवित्र कुरआन में जल-थल का अनुपात
एक इनसान और भी ज़्यादा अचम्भित हो जाता है जब वह देखता है कि ‘बर’ (सूखी भूमि) और ‘बह्र’ (समुद्र) दोनांे शब्द क्रमशः 12 और 33 मर्तबा आये हैं और इन शब्दों का आपस में वही अनुपात है जो कि सूखी भूमि और समुद्र का आपसी अनुपात वास्तव में पाया जाता है।
सूखी भूमि का प्रतिशत- 12/45 x 100 = 26.67 %
समुद्र का प्रतिशत- 33/45 x 100 = 73.33 %
सूखी जमीन और समुद्र का आपसी अनुपात क्या है? यह बात आधुनिक खोजों के बाद मनुष्य आज जान पाया है लेकिन आज से 1400 साल पहले कोई भी आदमी यह नहीं जानता था तब यह अनुपात पवित्र कुरआन में कैसे मिलता है? और वह भी एक जटिल गणितीय संरचना के रूप में।

क्या वाकई कोई मनुष्य ऐसा ग्रंथ कभी रच सकता है?
क्या अब भी पवित्र कुरआन को ईश्वरकृत मानने में कोई दुविधा है?
see more
http://hamarianjuman.blogspot.com/

Prashank said...

Aap ke post ka subject kya tha?? bhai Dr.(?) Anwer jamal ji ki commentry dekh ker laga...ki aadmi sunta wahi hai jo woh sunna chahta hai....kahan..JP ka prasang..aur kahan...Pavitra sura, Kuraan etc leker yeh aadmi baith gaya..bhai mere kya prasang chal raha hai yeh bhi dekh liya ker!

Romesh said...

sahi kaha aapne , in tasbir to dekh kar yahi lag raha hai jaise do tute nabo par ek sabar ho,

JC said...

श्री रवीश का विषय ही "मूर्ति पूजा का खंडित पक्ष" है...इस लिए डॉक्टर अनवर जमाल साहिब ने भी सही लिखा है और अपना पक्ष इस विषय पर रखा है...सही/ गलत का निर्णय तो केवल एक अनंत ईश्वर ही ले सकते हैं, और दुर्भाग्यवश उनके विषय में भी अनंत धारणाएं हैं हर स्थान और काल में - कौन सही कौन गलत? :(

कठिनाई यह है कि हर आदमी, यानी हर जानवर अस्थायी है...हर एक का जन्म किसी एक परिवार में एक माता के माध्यम से होता है और जैसे रंगरेज एक कपडे को उस रंग की हौदी में डाल रंग देता है जिसे कोई व्यक्ति-विशेष चाहता है, ऐसे ही हर एक जानवर किसी गाढे रंग में रंगता जाता है समय के साथ, और रंग हल्का पड़ने पर ही किसी दूसरे रंग का चुनाव कर सकता है...यानि हर जानवर की अपनी कोई एक विशेषता हर अन्य किसी जानवर को भिन्न- भिन्न दिखाई पड़ना लाजमी है, जैसे उदहारण के तौर पर चूहे को केवल बिल्ली ही नहीं खाएगी, कुछेक अन्य प्राणी और स्वयं आदमी भी खाना सही मानेंगे समयानुसार, जैसी परिस्थिति हो...

इस प्रकार इस धरती पर किसी भी काल में अनंत नमूने दिखाई पड़ेंगे. अंग्रेजी में जैसे कहा गया कि "जो एक आदमी के लिए भोजन है वो दूसरे के लिए विष है"...

धरती के किसी भी बिंदु को यदि लेलें तो उस से चार दिशायें आसानी से समझी जाती हैं: उत्तर, पूर्व, दक्षिण, और पश्चिम कहते हैं जिन्हें हिंदी में. किसी एक बिंदु से यदि आप चलें तो हर दिशा में भौगोलिक परिस्थिति तो कम से कम भिन्न दिखाई देने की आशा की जा सकती है...और भारत में तो हर कोई जानता है हर बीस मील में भाषा भी बदल जाती है और आस्थाएं तो अनंत हैं ही यह किसी से छिपा नहीं है...यह 'प्रकृति' भी दर्शाती है...इसे शायद मजबूरी ही कहलें की प्रकृति के उपर किसी का जोर नहीं चलता - कोसी में बाढ़ आती है तो रोने के अलावा या किसी व्यक्ति या संस्था को हम कोस कर ही रह जाते हैं और शायद 'प्रलय' का अनुमान भी लगा सकते हैं :(

"न रहेगा बांस/ न बजेगी बांसुरी"...शायद करोड़ों साल से चल रही ये धरती ही बता सकती है कि शायद यही सत्य है, और इस कारण, शायद हम सभी, कभी-कभी शास्टांग प्रणाम करते हैं किसी दिशा को मुंह कर, या किसी भी मूर्ति के सामने कोई-कोई...

Mahendra Singh said...

Aisee Moorti pahli bar dekhi hai.JP ke vichar bache hain iseeliye unkee yeh moorti bhi bachee hai sath main unke chahnewale bhi. Bahin ji baat karna suraj ko diya dikhane jaisa hai.