बाबरी भवन में राम मंदिर





मेरी नज़र गंगा के तट पर बनी इस इमारत पर कैसे नहीं पड़ती। देखते ही जानने का मन करने लगा। जब इसके पुरोहित से पूछा कि भाई अयोध्या में लोग बाबरी मस्जिद गिरा आए और आपके यहां बाबरी भवन,वो कैसे? आप इस सनातन परंपरा में कब से घुले मिले हुए हैं? जवाब इतना साधारण था कि अपनी मूर्खता पर हंसी आ गई। पुरोहित मनीष शर्मा ने कहा कि वत्स तुम नहीं,हर दिन सैंकड़ों आकर पूछ जाते हैं। पूछते हैं कि गंगा के तट पर बाबरी भवन कैसे। मैं रोज़ सैंकड़ों लोगों को जवाब देता हूं। मुज़फ्फरनगर के पास एक गांव है जिसका नाम बाबरी है। वहीं के हिंदू ज़मींदार हैं,उन्होंने ही अपने गांव के नाम पर धर्मशाला बनवा दिया। कोई पचहत्तर साल पहले। हम लोग जयपुर दरबार के भी राजपुरोहित हैं। मनीष शर्मा ने बताया कि बाबरी भवन की पहली मंज़िल पर राम मंदिर है। इशारे से दिखा दिया। पहली तस्वीर में आप देखे सकते हैं कि पहली मंज़िल पर कोने में एक लाल इमारत है। वही राम मंदिर है। दोस्तों ने कहा कि रिपोर्ट करने से पहले ब्लॉग पर मत डालो। न्यूज़ चैनल वाले पहले कर लेंगे। एक बार फिर अपनी इस प्रतिस्पर्धी मूर्खता पर हंसी आई। गंगा तट पर ज्ञान प्राप्त हुआ कि कथा तो बार बार कही जाती है। हर कथा मुझसे पहले कही जा चुकी है। जो इमारत पचहत्तर साल से खड़ी है वो आज और कल में किसी न्यूज़ चैनल पर आ जाए तो मुझे फर्क नहीं पड़ता। बहुत देखा कंपटीशन का ड्रामा। तो दोस्तों बाबरी भवन में राम मंदिर। इस सनातन गंगा पर थोड़ा इतरा गया।धर्म में समन्वय की ही गुज़ाइश है। समन्वय से ही धर्म महान बनता है। कर्मकांड और झूठे नारों से नहीं। वर्ना क्या आप सोच सकते हैं जिस राम के लिए बाबरी मस्जिद उजाड़ कर लोग भारत राष्ट्र के वजूद के निर्माण में निकल कर सत्ता की खोज में जाने कहां भटक गए,उसी धर्म को ढोने वाली गंगा अपने किनारे बने बाबरी भवन को हर दिन राम का प्रणाम स्वीकार कर बहती जाती होगी। मुझे तो बहुत गुदगुदी हुई।

29 comments:

Shambhu kumar said...

सर बड़ा कन्फ्यूज करते हैं आप... आपको पढ़ने के बाद लगता है कि दुनिया में हर चीज मोह-माया और छल-कपट है... बस आप ही सच्चे हैं... लेकिन जैसे ही काम पर जाता हूं... बड़ी बड़ी गाड़ियां और बंगले देखकर चौंधिया जाता हूं... कृप्या इस मानसिक बीमारी का इलाज करे सर... ओ भूल गया था... आप तो ये सब अपने धंधे के लिए करते हैं... आपने अभी ही तो कहा था कि मेरे विचार को मेरे व्यवहार से न जोड़ा जाए... आपने तो इमानदारी से कह रखा है कि मेरे दिखाने के दांत अलग हैं और खाने के अलग... मैं भी निरा वेबकुफ ठहरा... कहां फंस जाता हूं... वो जमाना था जब भगत सिंह, मंगल पांडे, और बापू जैसे न जाने कितने लोगों ने पहले अपनी बातों को व्यवहार से रखा तब उसे विचार का जामा पहनाया... इस कलियुगी ज्ञान के लिए धन्यवाद सर... सिख रहा हूं... बेईमानी के पैसे को कैसे इमानदारी की चासनी में डूबोकर परोसा जाए... सिख भी जाऊंगा... और अगर न सिख पाया तो ज्यादा अच्छा होगा...

vijay gaur/विजय गौड़ said...

सुंदर अंदाज है भाई !!!
काश जिस सहजता से आप चीजों को देख ले रहे हैं (आपकी पिछली पोस्टों को भी देखने के बाद कह रहा हूं), हर कोई देख पाता। मुझे उम्मीद है चीजों को देखने का आपका जो नजरिया है, वह निश्चित ही एक दिशा तक जाएगा।

tanu sharma.joshi said...

interesting...!!

रंजन said...

Shambhu jee , Seems You are a depressed personality ,Pls immediatetly stop this non sense . There are different way to say ur opinion .

Ravish Jee , Immediately put ur blog on MODERATION . DOn't get hurt - People may use wrong words .

परमजीत बाली said...

रोचक!!

शशांक शुक्ला said...

चलो कहीं तो इस मसले पर सही रास्ता दिख रहा है

Kulwant Happy said...

घरों के बाहर लगे बोर्ड अक्सर ही प्रतिभाओं को उजागर करते हैं, जब उससे मुलाकात होती है तब पता चलता है कि आखिर वो कितने पानी में हैं।

आप ने अपना ज्ञान हमको बाँटा अच्छा लगा। आप लेपटॉप लिए घूम रहे हैं शायद ऐ सा लगता है। मोबाइल अपडेट तो अच्छा ही होता है आपका

D.P.Mishra said...

Aap ka Andaz Bahut Pasand aaya hamari Subhkamnai.

Neeraj Tiwari said...

जिस राम के लिए बाबरी मस्जिद उजाड़ कर लोग भारत राष्ट्र के वजूद के निर्माण में निकल कर सत्ता की खोज में जाने कहां भटक गए,उसी धर्म को ढोने वाली गंगा अपने किनारे बने बाबरी भवन को हर दिन राम का प्रणाम स्वीकार कर बहती जाती होगी। मुझे तो बहुत गुदगुदी हुई।
Achha laga.....

आदर्श राठौर said...

:)

Shambhu kumar said...

रंजन जी... अब विचारों पर भी पाबंदी लगाने की सलाह दे रहे हैं रवीश सर को... बढ़िया है... पता नहीं आप इतना आहत क्यों हो गए... कहीं मैंने रवीश सर की नहीं बल्कि उनके विचार और व्यवहार में घालमेल न होने की आलोचना की, इसलिए तो नहीं उबल पड़े... दरअसल रवीश सर का मैं भी बड़ा फैन हूं... लेकिन विचारों का नहीं बल्कि पैकेजिंग का... खबरों की पैकेजिंग का... स्पेशल रिपोर्ट का... और उनके एंकरिंग का... और उनकी जैसी नौकरी के लिए भी लार टपकाता हूं... लेकिन जब उनका ब्लॉग पढ़ता हूं तो लगता है कि ये आदमी मीडिया जैसे बिजनेस के लिए नहीं बना है... ये तो संदीप पांडे जैसा त्याग, अरुंधति राय की तरह मोह त्याग समाज सेवा और समाज को दिशा देने के लिए बना है... ये तो देश में क्रांति ला सकते हैं... लेकिन अगले ही पल मोहभंग हो जाता है... क्योंकि वो लिखते हैं कि मैं कोई वादी नहीं हूं... मुझे किसी के खिलाफ या समर्थक न समझे... तो फिर ये शब्दों की बाजीगरी क्यों... सिर्फ दूसरों के सामने ईमानदारी का ब्रेकर बनाने के लिए... बस यही तो जानना चाहता हूं... रही बात मेरे उदास व्यक्तित्व की... तो बिल्कुल सही पहचाना आपने... उम्र के 25 साल पार कर चुका हूं... और हर जगह सिर्फ छलावा ही देखता हूं... चापलूसों की फौज रोज देखता हूं... कहीं कोई नेता का पैर छूता है तो कहीं कोई ब्यूरोक्रेट्स का तलवा चाटता है... सब के सब ट्रैफिक से बचने से लेकर बच्चा पैदा करने के लिए डॉक्टर के सामने तक अपने पहचान और पद की रौब दिखाता है या जुगाड़ लगाता है... क्या करूं इसी से परेशान हूं... इसी से उदास हूं... लेकिन सबसे ज्यादा दुख होता है...रवीश सर जैसे लोगों से... जिनकी कथनी और करनी के बीच प्रकाश वर्ष की दूरी है... ये मैं नहीं कहता वो खुद कहते हैं... भरोसा न हो तो उनके बारे में जो खुद उनने लिखा है, उसी को पढ़ ले... और आप तो वैसे भी इंजीनियर बनाने के क्षेत्र में हैं... पता नहीं आप सिर्फ नफा कमाने वाले फसल ही तैयार करते हैं... या बांग्लादेश के यूनुस खान की तरह सामाजिक बिजनेस मैन भी... बताएंगे... तो बड़ी खुशी होगी... वैसे रवीश सर के प्रति आपकी हठ भक्ति देखकर अच्छा लगा...

Shambhu kumar said...

'हैप्पी' तंज के लिए शुक्रिया... पानी में तो वो जाते हैं जिनको गंदगी हटाने की जरूरत होती है... रही बात प्रतिभा की तो वो चेहरे की चौहद्दी के आलावा भी होती है... हां ये अलग बात है कि इसे शायद लिंग विशेष से कबूलवाने की जरूरत नहीं पड़ती...

ravishndtv said...

शंभू जी, रंजन जी, हैप्पी जी

मैं आप सबके बीच का ही हूं। मुझे लेकर मत झगड़िये। शंभू जी आपकी बात सही है। चापलूसी से मैं भी दूर रहा हूं। रहता हूं। संदीप पांडे और मुझमें फर्क है। तुलना हो ही नहीं सकती। वो करते हैं। मैं कहता हूं। वो कहता हूं जो सोचता हूं। करने और कहने का फर्क रहेगा। दुनिया कैसी हो,इस पर मेरी भी राय है और आप कह दें कि जैसा चाहते हैं वैसा बनाने के लिए क्या करते हैं तो इसका जवाब ठीक नहीं होगा। करता हूं। वो व्यक्तिगत मामला है। हिन्दी में फेल होने वाला लड़का जब लिखने चला तो डर रहा था। इसलिए सोचा कि लोग गंभीरता से लेने लगेंगे तब क्या होगा। पढ़ाई कम की है। दुनिया को देखने निकला तो जो देखा वही लिखा। अब मैं कोई बात दावे के साथ कैसे कह सकता हूं। हां दिल से कह सकता हूं। इतना आज भी कह सकता हूं कि मैंने कभी बेईमानी नहीं की है। गलती हुई होगी। खराब पत्रकार हो सकता हूं लेकिन बेईमान नहीं। विचारों की उम्मीद मुझसे करना ठीक नहीं है। मेरे लेखों से मेरे विचार झलकते होंगे। लेकिन हर समय कैसे गंभीर रह सकता हूं। कभी तो आप चकल्लस करने देंगे। विचार की उम्मीद उससे की जानी चाहिए तो ज़मीन पर खट रहा है. किताबों को पढ़ रहा है। सोच रहा और समस्याओं से जूझ रहा है। क्या आपको वाकई लगता है कि पत्रकार इन तमाम स्तरों पर सक्रिय हैं? पूरा दिन दफ्तर में गुज़रता है। लाई गई खबरों को देखने लिखने में। तो आप बताइये कि इस मामूली काम को करने के बाद कोई बड़े बड़े दावे कर सकता है क्या? किस आधार पर करेगा? तमाम तरह के परिश्रमी लोगों तक पहुंच कर, उनकी कामयाबी, नाकामी को दूसरों तक पहुंचा कर आप संदेशवाहक हो सकते हैं, विचारवान नहीं। पांच सात साल के अनुभव में इतनी उम्मीद मत कीजिए दोस्त। बाकी आपकी आलोचनाएं सर आंखों पर। मैं दुनिया बनाने नहीं,देखने निकला हूं। एक हसीन दुनिया हो, ये आपका भी ख्वाब है और मेरा भी। सपनों के लिए मत दुत्कारिये भाई। मैं यहां लिखता हूं इसलिए कि खुद के विचारों को परख सकूं। स्वीकृति और अस्वीकृति के बीच अपने को समझने की एक प्रक्रिया है। टिप्पणीकार हैं हम सब। आप सब हमारे लिए प्रिय है। मैंने आप सबको अपने अच्छे खराब लेखों के ज़रिये अर्जित किया है। कैसे गंवा दूंगा। लेकिन आपने जिन बड़े लोगों का ज़िक्र कर दिया है उनका नाम देखकर मैं सचमुच डर गया हूं। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि मैं सिर्फ एक नौकरीजीवी ही हूं। समाज दुनिया के लिए करता हूं लेकिन वो बिल्कुल निजी है और मामूली है। आप बेबाक झटके देते रहिए।

Shambhu kumar said...

रवीश सर जब भी आपको पढ़ता हूं... मन बेचैन हो जाता है... शायद ये गुस्ताखी भी उसी वजह से कर बैठता हूं... आपकी आलोचना भी करने का मन करता है... और आप अंतिम आशा भी नजर आते हैं... लेकिन जो विचार देने वाले हैं... शायद जवाब देने की जिम्मेदारी भी उनकी ही बनती है... आपके इस जवाब के लिए एहसानमंद रहूंगा... रही बात हर समय सीरियस न रहने की तो... दोस्तों के सामने शेखी बघारने के काम जरूर आएगा आपका ये स्नेह में लिपटा ठंड से बचाने वाला रजाईनूमा जवाब...

रंजन said...

रविश भाई , यही खासियत आपको अव्वल बना देती है - अत्यधिक प्रतिक्रिया नहीं देना ! लिखते रहिये - झटके खाते और खिलाते रहिये !

shyam parmar said...

जब दिवाली में छिपा है.... अली
और रमजान में छिपा है... राम
तो कौन हिंदू और कौन मुशलमान...

rohit said...

बंधू एक बाबरी मस्जिद एक मुस्लिम आक्रान्ता ने राम जन्म भूमि को ढहा के बनाया था तो इस बाबरी भवन को एक राम भक्त जमींदार ने दोनों में कुछ तो अंतर है ना लेकिन आप दोनों को एक ही चश्मे से देख रहे है जो की गलत है रही बात माँ गंगा की तो भैया वोह तो लोगो के पाप धोते - धोते खुद ही मैली हो गयी लेकिन बहुत से धार्मिक लोग गंगा सफाई अभियान से अपनी दरिद्रता का मेल जरुर दूर कर गए.

JC said...

भाषा कभी-कभी एक हास्यास्पद स्तिथि भी खड़ी कर देती है...एक पहाड़ी लड़के ने कभी हिंदी में कहा था, "बूजा हट जाने से देखो नाली कैसे ग्वाँ-ग्वाँ करके बह रही है" और सब हंस पड़े थे...इसी प्रकार थोड़ी-बहुत मैल हट जाने से, भले ही 'मैली गंगा' सामान, शब्दों का प्रवाह देख प्रसन्नता हुई...

सत्य युगी "गंगाधर" शिव शायद तांडव नृत्य कर बैठे थे उनका नाम न लिए जाने पर :)
त्रेता युग के अधूरे 'राम' के नाम पर कलियुग के शायद अंत में मस्जिद या मंदिर तोड़े जाने में मेहनत अधिक लगी और हल्ला भी बहुत हुआ,,,किन्तु अब गाँव का नाम शायद 'बाबरी' के स्थान पर 'राम' या 'शिव' रखने का कोई सुझाव आ सकता है, यदि रवीशजी के ब्लॉग को कोई नेता पढ़ रहा हो...क्यूंकि अब समय है पुरानी गलती के सुधार की - १९ साल अन्याय के बाद बाद न्याय मिलने की आस जैसे...

Sheeba Aslam Fehmi said...

Kitna sahi ja raha tha comments ka rich content, par dekhiye ek below mediocre ne widhwa-pralap kar ke iski chamak chheen li. Pitey huey dialogues k liye Raveesh ka qasba hi mila Bhalemanus ko?

anupam mishra said...

अरे महाराज छोड़िए न खटरागियों को । बोझिल व्यस्त समय में चकल्लस के लिए भी थोड़ा मौका होना चाहिए।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

भाई साहब, आपने तो बाबरी नाम को एक ब्रैण्ड बना दिया। जबकि यह ‘एक खास स्थान पर बनायी और ढ़हाई गयी इमारत’ के नाम से ही जानी जानी चाहिए। यदि किसी अन्य स्थल, भवन या गाँव का नाम संयोगवश बाबरी पड़ गया है तो उसमें भी इस ‘दंगाई बाबरी’ का अक्स देखना या न देखने पर अचम्भित होना कहाँ का विचार है। मेरा एतराज दर्ज करें।

प्रभु जी, आप अब साधारण प्लेटफ़ॉर्म पर नहीं खड़े हैं। आप जो बोलेंगे या लिखेंगे वह मुहावरा बन जाएगा। इसलिए हुजूर थोड़ा सम्हालकर विचार व्यक्त करें। दुनिया वैसे ही बहुत शरारतपूर्ण व्यवहार करने वाले लोगों से भरी पड़ी है।

बड़े लोगों को बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है।

deepti said...

sir jo babri masjid ka virodh karte hai unhe babri alfaz se jyada takliif nahi hai unhe to uske sath judi masjid taklif derahi hai jabki agar thodi bhi katuta kam karke dekhe to ram ka mandir jis sadya ko paane ka zariya hai wahi zariya bhar hai babri maszid...to babri bhawan en logo ki soch me koi badlaav nahi la sakta kyunki inhe acchi tareh se pata hai ki kis kahani se sirf apne matlab ki cheege khojkar samaj me vightan paida karna hai..kyuki nahi ram ka mandir inhe sadmarg digha payeha aur na hi ganga ke kinare bana babari bhawan

vedvyathit said...

aap ne to islam se prichit hain aur n hi hindu dhrm se jis pr aap khus ho rhe hain vh ek hindu ne hi bnaya hai ydi itna hi smbhav hai to muslman kyon ram ka mndir bnva dete kyo kafir shbd ko htva dete kyo jihad chaloo hai mere bhai hindu hi shn shil hai doosra koi nhi hai nhi to kashmeer se kyo pndit bhgaye jate ve apne hi vtn me kyo shrnarthi ho jate vha ja kr aap dhrm smjhao tb aap ko pta chlega ki smbhav kya hai aap jaise log jo asliyt nhi jante ya jante huye bhi nhi mante ve hi to ksoorvar hain schchai kojnana hr aadmi ka dhrm hai
dr.vedvyathit@gmail.com

rohit said...
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rohit said...

बंधू आज कल हिन्दुओ का विरोध करो और सेकुलर कहलाओ इसका फेशन आ गया है . हिन्दू अगर राम मंदिर की बात करे तो गलत है बाबरी मस्जिद गिरी तो तूफ़ान आ गया कश्मीर में कितने ही मंदिर गिरे तो किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी. आतंकवादी सैनिको को मारे तो कोई समस्या नहीं लेकिन सेना आतंकवादियों को मारे तो मानवाधिकार आड़े आ जायेगा. बाबरी नाम से इन लोगो की इतनी सहानभूति है की जैसे यह इनके किसी प्रिय की याद में दिया गया था.

SACHIN KUMAR said...

SACHIN KUMAR
दोस्तों ने कहा कि रिपोर्ट करने से पहले ब्लॉग पर मत डालो। न्यूज़ चैनल वाले पहले कर लेंगे। एक बार फिर अपनी इस प्रतिस्पर्धी मूर्खता पर हंसी आई। गंगा तट पर ज्ञान प्राप्त हुआ कि कथा तो बार बार कही जाती है। हर कथा मुझसे पहले कही जा चुकी है। जो इमारत पचहत्तर साल से खड़ी है वो आज और कल में किसी न्यूज़ चैनल पर आ जाए तो मुझे फर्क नहीं पड़ता। बहुत देखा कंपटीशन का ड्रामा। तो दोस्तों बाबरी भवन में राम मंदिर। इस सनातन गंगा पर थोड़ा इतरा गया।
I THOUGHT I WILL STOP COMMENTING ON QASBA TILL SOME THING EXTRA ORDINARY DOES NOT COME...IT WAS ONLY THREE TO FOUR POST HERE IT IS. WHAT HAPPENED ON 6th DEC IS BEYOND DOUBT A SHAMFUL ACT WHICH SHOULDNOT HAPPEN IN INDIA. NOW WHAT I AM LOOKING FORWARD IS THAT KAS AYODHYA ME MANDIR BHI HO AUR MASJID BHI...LOG AAYE TO PEHLE SOCHE KI KAHA JAYE...YE BHI KAHI AUR NAHI HO SAKTA. IT WILL HAPPEN ONLY IN INDIA..KAAS HAMRE POLITICIAN AISE HOTE...O TO GHYAL POLICE WALO KI MADAD TAK NAHI KAR PAA RAHE....

S A Naqvi said...

रवीश भाई नमस्कार,मैं हिन्दुस्तान में आपका कालम नियमित रूप से पढता हूँ.आपके ब्लॉग में कुछ टिप्पणीकार की स्तरहीन प्रतिक्रया दे रहे है.बाहर क्या धर्मान्ध लोगो कि कमी है जो ये लोग एक साफ़-सुथरे ब्लॉग को धार्मिक जामा पहनाने कि कोशिश में लगे हुए है.सैकड़ों साल पहले हुई भूल को सुधारने के लिए धार्मिक उन्माद फैलाकर किसी भी धार्मिक स्थल को ध्वस्त करने को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता.एन.डी.टी.वी. इमेजिन पर पूर्वजन्म के ऊपर आधारित सीरियल आ रहा है.पिछले दिनों एक्टर किशन कुमार ने स्वीकार किया कि उन्होंने अपने पिछले जन्म में ३ लोगो की ह्त्या की थी क्या अब उन्हें इस अपराध के लिए फांसी पर लटकाया जाएगा?सच्चाई यह है कि हिंदुत्व और मंदिर निर्माण के नाम पर देश-विदेश से अरबों-खरबों रूपये उगाहने वाले तथाकथित नेताओं कि मंशा विवादित स्थल पर मंदिर बनवाने की कभी नहीं रही क्योंकी एक बार वहा मंदिर बन जाने के बाद उनके हाथ से वह मुद्दा निकल जाएगा जिसके बलबूते पिछले कई दशको से उनकी दूकान चल रही है.जेड कैटगरी सुरक्षा के साये में चलने,आग उगलने और फाइव स्टार लाइफ स्टाइल के आदी इन तथाकथित धर्म के ठेकेदारों से आप कुछ भी उम्मीद न करे.कारसेवा में मारे गए स्वंयसेवको के परिजनों का आज कोई पुरसाहाल नहीं है.केवल चुनाव के वक्त भोली जनता को ठगने के लिए घडियाली आंसू बहाने वाले इन बहरूपियों से हमारे आदरणीय हिन्दू भाइयों को होशियार रहने कि ज़रूरत है.

Sheeba Aslam Fehmi said...

नक़वी साहेब ,
सारे कीड़े हिंदुत्वा समर्थकों में ही हैं या कुछ बुराइयाँ मुस्लिम क़यादत के नाम भी दर्ज होंगी? एक तरफ़ा समर्थन या विरोध आप के सही ऐतराज़ को भी बे -माने कर देता है. पावर की भूख जब तक है, जहाँ है, हर इदेओलोज्यी का ग़लत इस्तेमाल होता रहेगा. चाहें वोह धर्म हो या नास्तिकता , लोकतंत्र हो या सल्तनत , मार्क्सवाद हो या पूंजीवाद.
मुस्लिम नेत्रत्वा अपनी दुकान चलने के लिए कुछ कम पाप नहीं कर रहा इस देश में और दुनिया भर में.
शीबा असलम फ़हमी

"अर्श" said...

rochak rahi bhaaee ..

magar baabari sach me brand hai aajkal


arsh