आदम का आइफोन संस्करण

आइफोन आदम है । बाक़ी के फ़ोन उसकी संतानें । सब उसकी तरह दिखने लगे हैं । सारे ब्रांड के फ़ोन लंबे दुबले और चौड़े हो रहे हैं । बाज़ार में हर फ़ोन पतले हैं । आदमी मोटू है । तोंद बालकनी की तरह किनारे से लटके रहते हैं । पतला होना उसका सेल्फ़ है और स्मार्ट फ़ोन उसी सेल्फ़ का विस्तार । सब फ़ोन पर उँगलियाँ ऐसे रगड़ रहे हैं जैसे कोई माचिस की तीली सीमेंट की चिकनी सतह पर रगड़ रहा हो । 

विचित्र प्रकार से तमाम फ़ोनों का आइफोनीकरण हो रहा है । जैसे सारे चैनल एक से लगते हैं । उनका विवादीकरण हो गया है । हर तरफ डिबेट ही डिबेट । सारे शहर एक से लगते हैं । उनका अपार्टमेंटीकरण हो रहा है । आइफोन इसी प्रक्रिया की अभिव्यक्ति है । सारे शहर में गुमटियां एक सी हैं । वे भी छोटे माॅल की तरह लगते हैं । एयरपोर्ट एक से लगने लगे हैं । उनका सौंदर्यीकरण हो गया है । हर एयरपोर्र्ट में मामूली अंतरों के साथ चमकते टाइल्स के समंदर जगमगाते रहते हैं । 

सारे दल एक से लगने लगे हैं । उनका एकीकरण हो गया है । अलग नाम और नेता लेकर एक ही तरह का आचरण कर रहे हैं । शुक्ला जी और जैटली जी एक हैं । हर घर में ब्रेड अंडा नाश्ते में खाया जाने लगा है । इसी क्रम में फ़ेसबुक पर एक कमेंट के लाखों लाइक्स मिल रहे हैं । हमारी पसंद एक सी होती जा रही है । हम एक ही तरह से जंगली होते जा रहे हैं । एक ही तरह की पतलून और कमीज़ पहनने लगे हैं । अपने अपने 'एक' से तंग आने का समय आ रहा है । स्मार्ट फ़ोन ही ब्रांड है तो नोकिया ब्लैक बेरी और आइफोन का क्या काम ।

एक और विज्ञापन आने लगा है । एक आदमी सोफ़े पर बैठ कर उँगलियाँ भांज रहा है । छूमंतर टाइप और सोफ़े के सामने रखे टीवी में चैनल बदलने लगते हैं । अभी तो टच का ज़माना है बाद में बिना टच किये ब्राह्मणवादी तरीके से टीवी फ़ोन का कर्मकांड किया जाने लगेगा । हम सब पहले से कहीं ज़्यादा एक हैं । 

6 comments:

Brij ka baashinda said...

'Brahminvaadi tareeqa' ha ha ha. Gud sense of Sarcasm...

Dr Sarvapriya said...

कुछ अलग करने की चाह भी सभी में 'एक' सी है। सब एक तो हैं पर कोई पहला है तो कोई आखिरी। कोई सामान्य है तो कोई बेहतर है।

amrinder riyaaz said...

पहले जूता जूता था पर आज जूता नाइके,लोटो,आदिदास,प्यूमा, etc हो गया है ...अभ बच्चा क्या मांगता है ममी पापा का समज नही आता

Rajeev Ranjan said...

अच्छा लिखा है, मित्र! शऊरदार आदमी की तरह। मेरे पास टच-स्क्रीन(फालतू है, अगड़म-बगड़म) मोबाईल नहीं है....और तुम्हारे पास भी नहीं है। कितनी अच्छी बात है। है न! फोन के बदले तुम अपनेआप को कोंचते होगे बैठे-ठाले(मेरी तरह)...! यह भी एक तरह से एकीकरण है। अपने मन का एकान्तीकरण है। इससे दिमाग हाथ(औकात) में रहता है। मुझे लगता है, अपने बारे में ‘हुंआ...हुंआ’ बोलने वाले से अधिक न बोलने वाले हैं इस दुनिया में। ज्यादा काबिल, होशियार, तेज-तर्रार। लेकिन, वे मुँह पर ताला लगा अपना काम करते हैं। बतुआते नहीं फिरते हैं हरदम। देश-दुनिया के फलतुआ ‘ढिशुम-ढिशुम’ में इनका जी नहीं लगता है। लेकिन ये भी है कि ये जुआन लड़कवन जैसा आपलबी-मतलबी नहीं है। कान मे ठेपी डालकर रखने वाले इन जींस-पैंटियन के बगल मे खड़ा होकर चिचियाते रहिए....जरा-सा नहीं सुनेंगे। उलटे आप ही को पगलेट समझेंगे। ठीक-ठीक खाना की जगह अमलेट-ब्रेड खाकर आईना में अपना चेहरा देखते इन लोगन को बिना चेहरे पर क्रीम लगाए न तो खाना पचता है...और न ही नींद आती है। चलो, ठीक है। तुम्हारे कस्बे में आज कमेंट कर दिया हूँ। रोज नहीं कर सकता। मित्र, अपनी भी तो रेजगारी-रोजगारी है। अपने सेहत पर ध्यान देना। इन बकलोलों जैसा तुम भी आदम न हो जाना।

प्रवीण पाण्डेय said...

बाजार के आकार में स्वयं को अटा लेते हर व्यवसाय।

nptHeer said...

Communisum ka marketisation :) ghoom fir ke duniya ki total pidaayen aur total kabjakhor taakaten samaan rahti hai..har ek samay main...E=mc^2 :) hahaha