विचारों का टुकड़ीकरण : सोशल मीडिया

फ़ेसबुक सरसरा रहा था यानी स्क्रोल कर रहा था । सरसराना इसलिए लिखा कि बचपन में हम स्लोप का मतलब जानने के लिए कोश देखने नहीं गए थे बल्कि खुद से ही सरसरऊआ शब्द का इस्तमाल करने लगे थे । कहीं किसी से सुनकर । अस्सी के दशक तक बनने वाले सरकारी और ग़ैर सरकारी घरों में दरवाज़े के सामने स्लोप होता था जो बाद में विलुप्त हो गया । तब आइडिया ये होगा कि इसके सहारे स्कूटर या सायकिल घर के भीतर लाया जा सके । तब तक स्कूटर को ड्राईंगरूम में ही पार्क करने का रिवाज बन गया था । सायकिल ड्राइंग रूम से होते हुए आँगन में । अब स्कूटर भी बाहर पार्क होता है । स्लोप ग़ायब है और चबूतरा जिस पर बैठ कर बातें होती थीं टूट चुका है । 

तो फ़ेसबुक को सरसराते हुए पाया कि कई लोग सोच परिवर्तन के काम में लगे हैं । कई लोग उन्हीं के स्टेटस के नीचे सामान बेच रहे हैं । मेरे पेज पर कोई नैना जैन हैं जो सत्रह हज़ार का रंगीन घाघरा बेच रही हैं । वैसे ख़ूबसूरत है । नैना जी बिना किराया दिये हमारे पेज के बैठकखाने में अपना घाघरा टांग गई हैं । फ्री में वो भी अनटचेबुल । कहीं कैंडी क्रश तो कहीं क्लियर ट्रीप वाला विज्ञापन ठेले हुए हैं । बाज़ार तो हमारे जीवन का अंग रहा ही है लेकिन जीवन बाज़ार हो जाए ऐसा कब रहा । हमारी सोच का विस्तार बाज़ार से घुलमिल गया है । ज़रा सोचिये कि घर में चार लोग बात कर रहे हों और एक बैग से घाघरा निकाल कर दिखा दे । दूसरा सेविंग क्रीम तो तीसरा जूता और कहे कि ब्रेक है यहाँ भी । जैसे बात को बीच में रोककर हम बिस्कुट खाने लगते हैं और ऐश ट्रे खोजने लगते हैं । हम सब किसी न किसी उत्पाद के एजेंट बन जायें और घर आए मेहमान को कंपनी का डमी उत्पाद दिखाने लगे । बाज़ार के स्पेस से हम बाहर नहीं रहे । हमारा मन बाज़ार में चलता है । 

दूसरी तरफ इस पन्ना(पेज) मार्केट में कई लोग सोच परिवर्तन में लगे हैं । हर घटना पर पचास एंगल है । इतने एंगल हो जा रहे हैं कि घटना ही बिला जा रही है । पर यह काम भी तो ज़रूरी है । लेकिन अपने अपने घर में तो हम फ़ेसबुक से पहले भी यही कर रहे थे । एक आदमी लेक्चर दे रहा है और ड्राईंगरूम में पाँच आदमी सर हिला रहे हैं । दो आदमी बात काट रहे हैं । चाय पर चाय चल रही है । बीच में चौकी या आसन पर बैठा मुख्य वक़्ता झाड़ा फिरने चला जाता है तो मौक़ा पाकर कई लोग मुख्य वक़्ता बनने लगते हैं । नई सामूहिक चेतना क्या बन रही है । मैं इस सवाल से क्यों टकराने लगा हूँ । क्यों अब स्टेटस पर कुछ लिखा हुआ देखकर घिसा हुआ लगता है । पर बात है कि करे क्या आदमी । बात करना भी तो ज़रूरी है लेकिन ये सारी बातें रूटीन सी क्यों लगती हैं । कई बार लगता है कि सहमति और असहमति गुटों में बँटकर बंटाधार हो गए हैं । 

ब्लाग ट्वीटर और फ़ेसबुक । हमारे अवचेतन का सार्वजनिक मंच । हर बात कहने की होड़ में मौन दाँव पर है । सोच परिवर्तन एक सीमित दायरे में हो रहा है । कई लोग एक ही फार्मेट में सभी घटनाओं को फ़िट कर रहे हैं । आलोचना या जागरूकता भी उसी तमाशे का हिस्सा लगने लगती है । इनदिनों ऐसी ही मानसिक अवस्था से गुज़र रहा हूँ । ख़ालीपन का अहसास भयानक है । हम क्यों अपना वक्त बर्बाद कर रहे हैं या इस बर्बादी का लिखित दस्तावेज आने वाले समय को सौंप कर जा रहे हैं । हर मुद्दे पर तुरंत लिख मारने की बौद्धिकता के प्रदर्शन की यह बीमारी हमें जागरूक और साहसिक होने का अहसास तो देती है पर क्या हम अपनी बातों का मट्ठा नहीं बना रहे हैं ।  चुप रहने से तो यही अच्छा है । 

कई बार लगता है कि फ़ेसबुक और ट्विटर ने विचारों को एक फार्मेट में ढालकर कतारबद्ध कर दिया है । सारे विचार एक ही मात्रा और लंबाई में सेना की क़तार में खड़े हैं और किसी घटना के आदेश मिलने पर क़दमताल करने लगते हैं । जहाँ पता नहीं चलता कि कौन सर पटक रहा है और कौन पाँव । बस परेड शानदार लगती है । कई बार इस लिहाज़ से भी बातें अच्छी लगती हैं । क़दमताल करती अभिव्यक्तियाँ भाती हैं लेकिन कई लोगों को लगातार पढ़ने और पसंद करने के बाद ऐसा लगता है कि वे अपने कुएँ में घूम रहे हैं ।कुछ नया पढ़ा नहीं और कुछ नया देखा नहीं अपितु हरपल निंदनीय टीवी को देखकर व्याकुलता झाड़ दी । बतंगड़ी सामाजिक अभिव्यक्ति है । हमारी ज़्यादातर बातों का टेकआफ प्वाइंट टीवी का कोई घटिया शो है और किसी नेता की करतूत । एकदम गाँव की चचेरा भौजाई की तरह रेडिमेड टापिक । हर बात में उसी को लसारे रहो । लसारे रहो का मतलब घसीटे रहो । करे भी तो क्या करे । 

क्या फ़ेसबुक ने विचारों का एकतरह से रेजिमेंटेशन किया है ? टुकड़ीकरण हिन्दी कैसी रहेगी ? सब अलग अलग वर्दी में । सेना भी तो लोकतंत्र का अंग है । वो क्या लोकतांत्रिक स्पेस से अलग है ? फ़ेसबुक ट्विटर ने आपकी हर सोच को मूर्त रूप दिया है जिसके कारण आप एक सैंपल की तरह कई तरह की रणनीतियों की निगाह में हैं । बाज़ार और सियासत दोनों की । इसके कारण आंदोलन अचानक हुए हैं तो इसी के कारण उन्हें मैनेज करना भी आसान हुआ है । इसी टुकड़ीकरण के कारण पार्टियों के दफ्तर में आईटी सेल बन रहे हैं । परेड तैयार है बस उन्हें जैसे किसी कमांडर का इंतज़ार है । अभिव्यक्ति मैनेजमेंट लोकतंत्र की मान्यता प्राप्त गतिविधि है । बस क़दमताल का आदेश देना पड़ता है । 

मैं खुद ट्वीटर और फ़ेसबुक का क़ायल रहा हूँ बस इन मंचों को दूसरे नज़रिये से समझना चाहता हूं ।  इससे हमारी सामाजिक राजनीतिक अभिव्यक्तियाँ कैसे बदल रही हैं । मूल प्रश्न ये है । हम भले ही नए मंचों की शक्ति का गुणगान कर रहे हैं लेकिन क्या नहीं लगता है कि उन्हीं पुराने मुद्दों और दलीलों के मोह और खोह में फँसे हैं । ये हैं तो यही कहेंगे, यह भी सही है पर क्या कोई नया नज़रिया नहीं है । यह कैसे हो सकता है कि हमारी बातों का बुनियादी या आसमानी ढाँचा एक सा ही है । सारे पोज़िशन फिक्स हैं ।  राजनेताओं की तरह निंदा प्रशंसा जारी करने से हमारी समझ समृद्ध हो रही है या रूटीन होती जा रही है । फ़ेसबुक और ट्विटर नया है पर बातें भी नईं हैं क्या ? क्या सारी बातें साहसिक तरीके से कही जा रही हैं ? और जो लोग कह रहे हैं उन्हें लाइक करने के बाद बाक़ी कहाँ भाग जाते हैं । 

हमारे यहाँ शोध की परंपरा नहीं है । होती तो अभिव्यक्तियों के सामाजिक आचार व्यवहार पर कई अलग अलग तरीके के ठोस अध्ययन सामने आते । वक्त आ गया है कि थोड़ा डिटैच होकर इन अभिव्यक्तियों को समझें । ख़ासकर हिन्दी लोकजगत में ब्लाग फ़ेसबुक और ट्वीटर ने बदलाव भी किया है या पुरानी टूटी मेज़ की जगह नई मेज़ और माइक लगा दी गई है । जिस पर शारदा रेडियो एंड कंपनी की जगह फ़ेसबुक लिखा है । ये टाइमलाइन है या असेंबलीलाइन दोस्त । 

10 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही गड़बड़िया ढलानें हैं फ़ेसबुक में, चलना सम्हल सम्हल के।

पुष्यमित्र said...

एंथ्रोपोलॉजी के लिहाज से बढियां है

nptHeer said...

Ek rishtedar ke ghar jana hua tha-vahan chokidar phon pe conform kar raha tha relatives se-tab tak uske screen par dekha to cc tv ke saath vah regional movi bhi dekh raha tha +kuvhh dirty pics+mobile pe guppe...tab achank mujhe social media click ho gaya-jub hum SM ke maidan main ghoom rahe hote hai apni enthropological :-) soch aur aukat ke saath tab kitne cctv ya kah lo time lines:) ki najron main unka ad,shikar,product ya timepass ban jaate honge?to kya muh main moong bhar len?har burai se najren churate firen?apne aap se larhte rahen?koi vicharon ko bech deta hai ya bechne ke liye hamare vichar istemal kar ke ek ghatiya by product ya market product deta hai to gussa to aata hai lekin taalab main rahenge aur kichchad se soog?:)
aap ka moun aur antahdrishti dono baat sahi hai ravishji lekin aap ko ek baat bata dun?vidurji ki neeti sab se soumya aur saral maanviya maani jaati hai..mahabharat ke yudh main sirf tin logon ne shashtron ko nahin chhooa tha shri vidurji unmain se ek hai-sanjay aur krishna ne to yudh ko dekha to tha!inhone hajar rahna bhi jaruri nahin samjha tha:)kyun ki unki neeti anusar jahan bolna chahiye vahan chup rahna aur jahan chup rahna chahiye vahan bolna dono ghaatak-paatak aur vyarth hai.
Aap apni nai tarkib jald hee dhoondhlo samvad karne ki:)
All the best :)

Mahendra Singh said...

Hamare yahan chabootare ko Nagara kahte hain(Amethi UP)Theek ghar ke dyorhi ke idhar aur udhar. Aapke baton ne gaon ghuma diya.

Pankaj Kumar said...

सरसरऊआ, झाड़ा फिरने, बतंगड़ी, लसारे रहो जैसे गाँव की बोली से जुड़े शब्दों का प्रयोग बेजोड़ है.

suchak said...

सोच परिवर्तन एक सीमित दायरे में हो रहा है kese sir ? the scope of thinking became larger..people start to think on larger perpective after this

PRANAW JHA said...

सर क्यों परेशान हो रहे हैं,बुतरू सब सरसरौआ ढलान का मजा ले रहे हैं

anuj sharma said...

"आलोचना या जागरूकता भी उसी तमाशे का हिस्सा लगने लगती है" । जो बाजार में नहीं भटका कतार में भटक गया है कोलाहल में जड़ता की शांति है। चिन्तन कम ही दीख पड़ता है लेकिन जहाँ है वहां से भी रीडर को कुरेदता है। रवीश कुमार का लेखन साहित्य को सरल एवं सार्थक चेतना से जोड़ता है।।

anuj sharma said...
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anuj sharma said...
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