बिहारियत वाया अंग्रेज़ीयत- दास्ताने सिंगल मैन

"The imposition of emergency had beckoned a new genre of books into the room, studies of Adolf hitler and nazism-William L Shirer's The rise and fall of the Third Reich, Albert sower's Inside the Third Reich, Joachim C Fest's biography of Hitler, the diaries of Joseph Goebbels, Men Kampf. Indira Gandhi was being studied as a symptom of fascism "

संकर्षण ठाकुर की क़लम इतिहास पर साहित्य की तरह चलती है । उनकी अंग्रेज़ी में कोई आक्सफोर्ड वाला बिहारी मानस की आहट सुनते हुए इस उलझन में पड़ सकता है कि क्या बिहार को भी अंग्रेज़ी में बयां किया जा सकता है । मैं ख़ुद मानता रहा हूँ कि बिहारियत अंग्रेज़ी में नहीं कहीं जा सकती । कुछ अल्फ़ाज़ ऐसे हैं जिनके बिना आप बात तो कह सकते हैं मगर बिहारी मानस की परतों को नहीं खोल सकते । संकर्षण की अंग्रेज़ीयत बिहारियत को दोनों विलियमों शेक्सपीयर और वर्डस्वर्थ के अंदाज़ में पेश करती है । वर्डस्वर्थ और शेक्यपीयर को 1985 और 1986 के साल में पढ़ा था । जब मैं नौवीं दसवीं में था । वो भी जब हमारी टीचर इंदिरा शांडील्य ने अंग्रेजी में पढ़ाने की ज़िद की तो हम हिन्दी मीडियम वाले गिड़गिड़ाने लगे कि कुछ्छो नहीं बुझाता है । के के पांडे भी तंग आ जाते थे अंग्रेज़ी को हिन्दी पढ़ाने में । मैंने शेक्सपीयर को हिन्दी में पढ़ा है । यहाँ यह बताना ज़रूरी था ताकि आप मेरे बारे में भ्रम न पाल लें कि मैं कहीं शेक्सपीयर और वर्डस्वर्थ की भाषा का ज्ञाता तो नहीं जो अंग्रेज़ी अख़बार द टेलिग्राफ़ के बंजारा संपादक ( रोविंग एडिटर) संकर्षण की बिहारियत वाया अंग्रेजीयत को बांच रहा हूँ ।

सिंगल मैन - द लाइफ़ एंड टाइम्स आफ़ नीतीश कुमार । जिस तरह से हार्पर कोलिन्स ने किताब के कवर पर सिंगल मैन को बड़ा छापा है उससे लगता है कि यह नीतीश कुमार की कोई जीवनी है । लेकिन यह किताब पूरी तरह से वो कहती है जिसे प्रकाशक ने छोटे हर्फो में छापा है । द लाइफ़ एंड टाइम्स आफ़ नीतीश कुमार ।

इस किताब में ख़ुद संकर्षण आपातकाल और जयप्रकाश आंदोलन के दौर को याद करते हुए बड़े हो रहे हैं । वो दौर लेखक के बचपन का था । उनके पिता जनार्दन ठाकुर सम्मानित और बारीक पत्रकार थे । नीतीश के बिहार को समझने को समझने के लिए बिहार को जानना ज़रूरी है । लेखक नीतीश के बिहार को लेकर शुरू के साठ पन्नों में कोई ख़ास उत्साहित नहीं हैं मगर वे 'बिहार ना सुधरी' से 'बदल गया बिहार' के बीच यहाँ के मानस की मनोवैज्ञानिक सहूलियतों को पकड़ रहे हैं । आँध्र प्रदेश में तीन सौ इंजीनियरिंग कालेज हैं मगर बिहार में दस । कुछ दंबगों के किस्से हैं जो बिहार के इस दौर में जीवाश्म में बदल रहे हैं । एक सज्जन कहते हैं कि हमारे ये गार्ड लालू के समय की निरंतरता हैं मगर अब कोई इनके साथ मुझे देखता है तो हैरान हो जाता है कि जब ज़रूरत नहीं तो क्यों रखे हैं ।

संकर्षण ने नीतीश को एक अणे मार्ग में रहने वाले नीतीश में नहीं ढूँढा है । बल्कि ख़ुद के साथ उन गाँवों क़स्बों और ज़िलों में देखा है जहाँ कई तरह के बिहार हैं जिन्हें आप सिर्फ बदलाव और यथास्थिति के खाँचे में बाँट कर नहीं देख सकते । नया बिहार या बिहारी पहचान में राजनीतिक गर्व का भाव भरने वाले नीतीश की उम्मीदों को आशंका की नज़र से देखते हुए संकर्षण शायद उन परकोटों को ढूँढ रहे हैं जहाँ से कोई कूद कर इस बिहारी पहचान को फिर से अलग अलग जाति की पहचान से बाँट सकता है । अपर कास्ट नीतीश के अगेंस्ट चला गया है , मैं जब भी पटना फ़ोन करता हूँ ये लाइन सुनाई देती है ।संकर्षण कहते हैं कि यह बँटवारा तो नीतीश ने भी किया । पसमांदा मुसलमान, अति पिछड़ा और अति दलित । इस सवाल के जवाब में नीतीश कहते हैं कि विकास और पहचान की राजनीति में कोई अंतर्विरोध नहीं होता है । 

इस किताब का पहला चैप्टर मेरा प्रिय है । जब संकर्षण लोहिया और जेपी के बारे में किसी सिनेमा के इंट्रोडक्शन की तरह लिखते हैं । सत्तर का दशक जाने बिना तो आप बिहार का प्राचीन इतिहास भी नहीं जान सकते । पटना जाता हूँ तो मुझे ये बात बेहद हैरान और रोमांचित करती है । बिहार में सत्तर के आंदेलन का अवशेष लिये कई लोग मिल जाते हैं मगर आज़ादी की लड़ाई का इतना शानदार इतिहास होते हुए भी कोई बात नहीं करता । जो सत्तर नहीं समझेगा वो उसके बाद का बिहार नहीं समझ सकता । सत्तर का दशक बिहार के इतिहास में पर्दे पर किसी सलीम जावेद की कहानी की तरह बच्चन जैसे महानायकों के उभरने का दशक है । फ्लाप हिट होते होते कभी लालू चल जाते हैं तो कभी नीतीश ।

ख़ूबसूरत वर्णन है पटना के काफी हाउस का । रेणु, दिनकर,बाबा नागार्जुन इन सबसे उनकी बिहारियत के साथ मुलाक़ात होती है । पढ़ते पढ़ते लगा कि मैंने भी दिनकर को देख चिल्ला दिया हो- सिंहासन खाली करो कि जनता आती है । बाबा नागार्जुन का रात में अंडा लेकर आना और संकर्षण के साथ मिलकर कड़ुआ तेल में पकाना । अच्छी अंग्रेजी में बिहार मिल जाए तो समझिये कि आक्सफोर्ड में दो बिहारी मिल गए । कहीं कहीं रूपक नुमा शब्द यह भी बता रहे हैं कि नेसफिल्ड और रेन एंड मार्टिन पढ़ कर सीखें हैं तो ऐतना तो बनता है । संस्कार हिन्दी का और अभिव्यक्ति अंग्रेज़ी की । इसीलिए इस लिहाज़ से भी किताब को पढ़ना दिलचस्प अनुभव है । 

बहरहाल आज का बिहार फासीवाद की वो समझ नहीं रखता जो सत्तर के दशक के बिहार में बना रहा था । उन किताबों और बहसों के ज़रिये फासीवाद को समझ रहा था । किताबें ख़रीद रहा था । किताबें पढ़ रहा था । वो लड़ाई कमज़ोर हो चुकी है । सलीम जावेद की फ़िल्म का ये वो सीन है जहाँ एक नायक घायल पड़ा है । मंदिर की घंटियाँ बज रही हैं । बेतहाशा शोर में भगवान के चेहरे पर ग़ज़ब की ख़ामोशी पसरी है । नायक बिल्कुल सिंगल मैन की तरह आख़िरी लड़ाई लड़ रहा है । क्या होगा पता नहीं । क्लाइमैक्स का सीन है । सीन में कोई और नहीं । सिर्फ एक सिंगल मैन है ।

मैं इस पुस्तक को पढ़ रहा हूँ । पढ़ते हुए देखना सबसे अच्छा तरीक़ा है पढ़ने का । लेखक और उसके पात्र की जीवनी बन पड़ी है । और दोनों के बीच का समय  इतिहास । पढ़ियेगा । पाँच सौ निन्यानबे दाम है । बाटा कंपनी का यह निन्यानबे छाप गया नहीं । जाएगा भी नहीं । खुदरा लेकर जाइयेगा । 

19 comments:

Atul Kumar said...

प्रवासी के लिए तो रवीश , संकर्षण ठाकुर ,एस के सिंह ,मनोंरजन भारती आदि टीवी पर आने वालेचेहरे एक धुमिल जरिया सा बन जाते बस ... seem to have lost more than the gains in pursuance of " career "

शहर wali रिश्तो की अहमियत टूटती और छूटती जा रही है।

आग्रह , पढ़ने का। टिप्पणी का विशेसग्राह।
छूटता बंधन -3 ; छूटता बंधन -4 at atulavach.blogspot.in

Bhavesh Kumar said...

I like the way you have partially reviewed the book (though I have not read it). It's interesting to know the past of Bihar since the JP Movement. Many layers of unknown Bihar are revealed when you speak up about it. Your word formation and vocabulary always give me newness. Hope English can represent Bihar's peculiarities.

time@blogging said...

Ek yuva patrkar ko aap apna blog padhne ke alaawa aur kya padhne ki salah denge sir....junoon bas hai sir ki aapke barabar me baithkar kisi 'Sensitive political' mudde par bahas karu par knowledge pane ke liye aane wale do saal me kuchh esi Hindi books ke bare me bra dijiye jisse mera bhala ho jaye...

Anshuman Srivastava said...

बिहार और बिहारियत पर गर्व करने का जमाना आ गया हैं मुझे गर्व हैं अपने बिहारी होने पर और हमेशा रहेगा आपको धन्यवाद

Jitendra sharma said...

Adarniya ravish sir sadar pranam is trah se blog likhte rahiye aur hum sabka marg darshan karte rahe.

प्रवीण पाण्डेय said...

बिहार में २ वर्ष में बिहारियत को बहुत पास से देखा है। कठिनता में जीवटता से न रहा जाये तो समाज निगल जायेगा।

Vidya said...

Ideal situation would be that local writers portray local culture and issues. I started reading articles in hindi, when my north indian friends advised me to read hindi newspapers and articles to get a clear picture of hindi belt politics, caste, reservations and social issues. But what about those who do not follow hindi and still want to read about this region?
Sometimes an outsider view is good as it generally brings unbiased perspective.
Terms like kashmiriyat, bihariyat thrives on a false sense of pride. It camouflages the real issues to convey a rosy picture in terms of history and culture. (Often keep wondering, if electricity has reached your village or whether it is still on its way!!).

vijay said...

purane dino ko dekhna sachcmuch romanchak lagat h chahe wo hum khud dekhe ya kisi aur jariye se dekhe

Kaushal Lal said...

बिहारियत एक शास्वत रूमानीपन है जो समय के हर मोड़ पर उसी अंदाज में खड़ा है ,जहाँ कुछ राजनितिक काल अवधियों में नहीं विवेचित क्या जा सकता है.....

Anant Varshney said...

Sir ye dekha kya??????? http://m.youtube.com/watch?v=yRGNTXDO7dI

Ranjit Kumar said...

आपकी टिप्पणी ने उत्सुकता जगा दी है...लगता है रोचक है और उस दौर की डायरी जैसी है...

CA MANOJ JAIN said...

बाटा कंपनी का यह निन्यानबे छाप गया नहीं । जाएगा भी नहीं । खुदरा लेकर जाइयेगा ।



ha ha ha ha ha ha

Vijay Vikram Singh said...

Sir ji
Ashutosh, Ashish Ketan AAP mein shamil ho gaye.. Zee News per Rajdip Sardesai, Punya ji (unka paap samne aa chuka hai) aur Ravish ji AAP ka (mera matlab aapka) naam bhi liya jaa raha hai AAP ke founding member dwara. Welcome to AAP. AAP to aise na the. Bade chale the INDEPEDENT journalist banane. Band karo ye PRIMETIME ka dhakosala aur jaaker party join kar lo.

Manoj Uniyal Rishikesh said...

@ Vijay Vikram. Me Ravis. Kumar ko 2006 se dekh raha hu. Ravish Kumar is the honest journalist.

paintings by artist kawal mehta said...

Sir, Kindly give and article of CBSE Physics Paper leak issue which was held on 05/03/2014 and leaked ONLINE , on 04/03/2014 question papers were available on websites and social media....
http://daily.bhaskar.com/article/DEL-delhi-news-shall-cbse-conduct-an-all-india-examination-of-leaked-physics-paper-o-4544895-PHO.html

Chandra Kishore said...

Ravish babu tu kab jaaa rahal bara kejri jee ke passs.bahut khusi hoi chal jaaa.Baki tohar Ndtv dekhal band kard dene jaa tohar blog padhee nii kabhi kabhi per ab comment kare ke bhi mann naa karela...tohar jadu kejri aisanh gail utar rahal baa

Mahendra Singh said...

Kitab thodi mahngee jaroor hai. 10% ka rebate to mil hee jayega. Bihariyat mujhe bhi achee lag rahee hai.

Rashmi Ranjan said...

रवीश जी क्या संभव है कि रमाकांत यादव विद्रोही पर कोई प्रोग्राम हो सके आप के चैनल पर. रवीश कि रिपोर्ट टाइप . माटी से जुड़े एक और नागार्जुन बाबा सरीखे जन कवि के बारे में. http://www.youtube.com/watch?v=64iHDSW4AK8

R N Thakur said...

रविश जी, इस पोस्ट के माध्यम से आपने कई राग एक साथ छेड़ दिये है। मसलन, अंग्रेजी वर्सेज बिहारियत, जेपी-लोहिया आंदोलन के आखिरी मसीहा और दीवार सनिमा का आखिरी सीन, बिहार के दुर्भाग्य की कड़ी। सबसे समसायिक बात कि, नीतीश से फॉरवार्ड नाराज हो गये है यह अंतिम सत्य है । वैसे बिहार में फॉरवार्ड का नीतीश से जुड़ना और नीतीश का बीजेपी से जुड़ना लगभग एक साथ हुआ था, और चूँकि 'बीजेपी' नीतीश के गोद मे बैठी थी इसिलिए फॉरवार्ड नीतीश को सपोर्ट किया था क्योकि उसके पास कोई चारा भी नही था । 'लालू' से त्रस्त और बीजेपी के भरोसे एक उम्मीद भी जगी थी । वो उम्मीद अब धूमिल हो चुकी है। सन 2000 से मै बिहार से बाहर हू लेकिन कभी-2 मुझे भी यही जानकारी मिल रही है बीजेपी के जरिये 'नीतीश' 'फॉरवार्ड' को कुछ सीट आरक्षित कर रखा था जो मजबूरी अब खत्म हो चुकी है । और सवर्ण आयोग का फार्मूला भी फेल हो चूका है । वैसे पॉलीटिकली आप कह सकते है Nitish's second tenure is as fail as UPA-2. और अंत मे एक बात, अभी पिछले रविवार को जयपुर मे एक दोस्त (जो कि राजस्थान का रहने वाला है और पीसीआरए मे ज्वांइट डायरेक्टर है)के घर डिनर पर निमंत्रित था उसने कहा कि यार कुछ भी हो, एक बात तो है अगर 'रविश' जैसा एंकर अगर ना हो तो मै कभी हिन्दी न्यूज चैनल नही देखुँ ।