लघु प्रेम कथा ( लप्रेक )

सुनो तुम फ़ेसबुक में सारी बातें क्यों लिख देते हो ? क्यों ? वहां कही गई आधी बातें मेरे लिए थीं और मुझसे कही भी नहीं गईं । जब भी तुम्हारे पास होती हूँ तुम ख़ाली होते हो । अरे नहीं । देखो न आज की ये शाम, ये मौसम और हाँ अख़बार में छपी ये तस्वीर । आइसक्रीम आर्डर करूँ ? कितना कुछ है बात करने को । मैं उन बातों की बात नहीं कर रही । तुम्हारे सारे अहसास मुझ तक पहुँचने से पहले बंट चुके होते हैं । तुम्हारी कल्पनाएँ कहीं और उतर चुकी होती हैं । जिनमें मैं भी होती हूँ और कई बार कोई और । तुम ऐसा क्यों सोचती हो । ख़ाली तो तुम भी हो । दरअसल हमदोनों हैं । नहीं तुम हो । शायद कुछ मैं भी । पहले हम चुप रह कर घंटों बातें किया करते थे और अब घंटों बातें कर चुप्पी सी लगती है । 
(२)
मैंने एक रेखाचित्र खींची है । तुम्हारे साथ इस शहर में चलते हुए । हाँ देख रही हूँ । हर रास्ता दूसरे से लिपटा हुआ लगता है । हाँ हर रास्ता उलझा हुआ भी । जब भी मैं इस शहर से निकलना चाहता हूँ कोई न कोई रास्ता लौटा लाता है । मैं तुम्हें हर लैंप पोस्ट पर खड़ा देखती हूँ । हर बस की पहली सीट पर तुम्हीं बैठे लगते हो । अब हम कम चलते हैं न ? मिलने के लिए चलते ही नहीं । बस पहुँचते हैं । हाँ जब से हमने घर बसाया है, हम शहर छोड़ आये हैं । रास्ते, लैंप पोस्ट, बस की पहली सीट, पापकार्न का कार्नर । कितना कुछ छूट गया हमारे मिलने में न ? तुम चुप क्यों हो ? रेखाचित्र देख रही हूँ । 
(३) 
बहुत दिनों से सोचा था तुम्हें एक ख़त लिखूँगी । तुम्हारे बिना लिखना ही अच्छा लगता है । अल्फ़ाज़ तुम तक पहुँचने के क़दमों के निशान लगते हैं । डर लगता है कोई पीछे पीछे न आ जाये । कितनी पास है मंज़िल पर हमने रास्ते को लंबा कर लिया है । हम मुल्कों में बंट गए हैं । तुम वहाँ मैं यहाँ । मैं बस यही लिखना चाहती हूँ कि कम से कम पढ़ना तो रोना मेरे लिए । मैं भी रोना चाहती हूँ । अपने सर्टिफ़िकेट पर खड़े अरमानों की इमारत की छत पर जाकर । ये ख़त तुम तक पहुँचने से पहले डाकिया पढ़ लेगा । ज़ालिम है वो । पर तुम तो नहीं हो न । तुम तो मेरे अल्फ़ाज़ों को समझ लोगे न । मैं किससे कहूं । तुम्हारी बातें भी ख़ुद से कहती हूं । थक गई हूं । आमीन !

7 comments:

shyam lal said...

Likhate raho ravishbhai ...bahut acha .. thanks.

suchak said...

Ab kaha woh hota hai ? सुनो तुम फ़ेसबुक में सारी बातें क्यों लिख देते हो ? :(

Puneet Manav said...

बहुत खूब ये पंक्ति तो दिल को छू कर निकल गई कि "तुम्हारे सारे अहसास मुझ तक पहुँचने से पहले बंट चुके होते हैं"

Unknown said...

aapki lekhni aur kya kar rahi hai nahi janta, lekin mujhko paipakq bana de rahi hain . . .

प्रवीण पाण्डेय said...

जब सुनना हो, कहें कहाँ से।

विनीत कुमार said...

अपने सर्टिफ़िकेट पर खड़े अरमानों की इमारत की छत पर जाकर

Manjeet Taram said...
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