जिया की मौत का अपराधिकरण न करे मीडिया


फ़िल्म अभिनेत्री जिया ख़ान ने ख़ुदकुशी कर ली जिया ने तनाव के किन आख़िरी और नाक़ाबिले बर्दाश्त की घड़ी में जीवन समाप्त करने का फ़ैसला किया इसकी मुकम्मल जानकारी किसी को नहीं इस दुखद ख़बर को जिस तरह से हिन्दी न्यूज़ चैनलों ने ज़िंदादिल बनाकर दिखाया वो हम सबके दर्शक होने की संवेदनशीलता की ख़ुदकुशी की भी आत्मकथा है हम क्यों देख रहे थे एक ज़िंदगी के इस तरह ख़त्म हो जाने पर उसके सेक्सी से लगने वाले वीडियो, हमें क्यों बताया जा रहा था कि उसके किससे क्या संबंध थे, उसकी ख़्वाहिशें और नाकामियों क्या थीं दर्शक और चैनल एकदूसरे के अनुपूरक होते जा रहे हैं मौत पर मातम मनाया जाता है ये कब से होने लगा कि किसी के मरने पर   उसकी वीडियो और फ़िल्मी गानों को बार बार चलाया जाए

जिया की ख़ुदकुशी पर जिस तरह से बहस हुई है उस पर बात होनी चाहिए अचानक से जिया की मौत के बहाने टीवी के दैनिक विशेषज्ञ ज्ञान देने लगे हैं कि जिया की मौत अकेलेपन की नहीं बल्कि आज के युवाओं की उन चाहतों की वजह से भी है जिसे पाने की अंधी दौड़ में वे भागे जा रहे हैं क्या जिया से मरने के पहले का युवा आत्मत्याग और अपरिग्रह की ज़िंदगी जी रहा था क्या बीस साल पहले के युवाओं पर ये बात लागू नहीं होती गुरुदत्त ने कई दशक पहले आत्महत्या की थी क्या सिर्फ महान बनने या जल्दी कामयाबी पाने की तड़प में उन्होंने ऐसा किया ज़ाहिर है इस तरह के फ़ैसले के क्षण नितांत व्यक्तिगत होते हैं, ज़रूर ये क्षण उस समाज में बनते हैं जो आपसे कुछ उम्मीद करता है लेकिन हम किसी अभिनेत्री की आत्महत्या के बाद ही क्यों महत्वकांक्षा की लानत- मलामत करने लगते हैं

ग्लैमर की दुनिया की आत्महत्या ग्लैमर पैदा करती है हम ग्लैमर की दुनिया को किसी प्रेतात्मा की तरह कोसने लगते हैं इसमें क्या शक कि इस दुनिया शर्ते क्रूर हैं जिया की मौत के बाद कई जानकार माॅडल से लेकर स्टार की आत्महत्या की गिनती करने लगे तो ये संख्या बीस भी पार नहीं कर पाई जबकि बालीवुड और माडलिंग की दुनिया में हज़ारों लोग नाम और काम के लिए संघर्ष कर रहे हैं इनकी तुलना में देश में लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं क्या उनके कारणों पर मीडिया इस तरह से बहस करता है क्या उनके भी वही कारण थे जो जिया के थे क्या ये किसान भी महत्वकांक्षा के मारे थे क्या  हम यह मानते हैं कि सारे युवा जिया जैसे बनना चाहते हैं या जिया सारे युवाओं की तरह थी जो उसकी मौत के बाद हम उनकी हर बात की धुलाई करने लगते हैं अकेलापन और अवसाद के अलग अलग कारण होते हैं जिन हालात में जिया को जीना पड़ा वैसे हालात में करोड़ों लोग रोज़ तिरस्कृत होते हैं मगर वे तो अपनी ज़िंदगी समाप्त नहीं करते हम रोज़ाना विज्ञापनों के माध्यम से युवाओं में चाहत पैदा करते हैं कि वो कैसे दिखें हमने ही उन्हें उपभोक्ता बनाया है हमने उन्हें  ये नहीं बताया कि कितना खाना है और कितना नहीं खाना है

बोर्ड के नतीजे आते हैं तो मीडिया सिर्फ नब्बे प्रतिशत वालों को पहले पन्ने पर छापता है टीवी भी इन्हें नायकों की तरह दिखाता है क्या तब हम यह माहौल पैदा करते हैं कि इस सफलता को सामान्य तरीके से लिया जाना चाहिए ज़िंदगी का मकसद नब्बे प्रतिशत लाना नहीं है हम सब सफलता के किस्सों को ऐसी ऐसी  किंवदंतियों में बदलते हैं जिसमें नाकामी और अकेलापन की कोई जगह नहीं होती हमारा युवा इन चुनौतियों से रोज़ लड़ता है हारता है और जीतता भी है

ऐसे में यह कहना कि जिया की मौत हमारे युवाओं की महत्वाकांक्षाओं की देन हैं परिवार टूट रहे हैं और अकेलापन बढ़ रहा है सोशल मीडिया उस अकेलेपन को बढ़ा रहा है ये सब कारण आत्महत्या की परिस्थितियों को रचते होंगे लेकिन यही कारण नहीं होते कृपया कर जीया की चाहतों का अपराधीकरण करें सपने देखना अपराध नहीं है जयपुर में ही रविवार को एक युवक ने एड्स की बीमारी से तंग आकर ख़ुदकुशी कर ली डाक्टरों ने पोस्टमार्टम करने से इंकार कर दिया और मोहल्ले वालों ने कंधा देने से हम एक निष्ठूर दौर में रह रहे हैं इसके बाद भी जीने के तमाम कारण हैं जीना ही चाहिए खुद के काम सके तो दूसरे के जाइये

पुलिस ने अभी तक जितनी जाँच की है उससे यही पता चलता है कि जिया को तीन फ़िल्में मिली थीं सूरज और उसके बीच के संबंध मामूली खींचतान के साथ सामान्य ही थे जिया ने पहले भी कलाई की नस काटने का प्रयास किया था दोनों के बीच अविश्वास से लेकर जो कुछ भी हुआ वो एक ग़ैर महत्वकांक्षीय रिश्तों में भी होता है अवसाद या निराशा की स्थिति किसी भी रिश्ते में पैदा हो सकती है जिया की महत्वकांक्षा को क़सूरवार नहीं बनाया जाना चाहिए दीपिका भी अपनी नई फ़िल्म को लेकर तनाव में थी मंदिर मस्जिद के चक्कर लगा रही थीं आप जब सबकी नज़रों में होते है तो वहाँ से गिरने पर सँभलना भी आना चाहिए इस डर से तो कोई मुख्यमंत्री ही बने कि सत्ता जाने पर कोई पूछेगा ही नहीं


युवाओं को अपनी महत्वाकांक्षाओं को समझने की ज़रूरत है आज के ही नहीं कल जो युवा थे उनके लिए भी यह सबक़ है अवसाद एक बीमारी है आज के शहरी जीवन और आर्थिक तंगी के दौर में बड़ी संख्या में लोग किसी किसी रूप में मनोरोग यानी अवसाद के शिकार हैं इस बीमारी को समझने और कहने की ज़रूरत है उससे भी ज़्यादा सुनने की क्या हम दूसरे की तकलीफ़ को ध्यान से सुनते हैं या अपना ही फ़ैसला सुनने के पहले सुना देते हैं
 (यह लेख आज के राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है)

5 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

उसे शान्ति से रहने दें, उसे इस जगत से अधिक अपेक्षा ही नहीं रही।

Awadhesh k. Jha said...

Dear ravish bhai, Yeh sach hai ki jiya ki mot ka media apradhikaran kar raha hai. Lekin muje lagta hai ki iska lasurwar sirf koi ek media sanstha nahi hai. kya aap kal se isi mudde par bat nahi kar rahe. Agar han to kyon, Agar sirf sympathy darsane ke liye, to iske liye 1-2 shabd kafi hote hain. Pure 2-4 page bharne ki awasyakta kya hai. Dusri bat samaj ki ankhe bhi badal gayi hain. Agar sarak par chalta hua koi insaan bhajan gungunata hai to wah bewkoof hai bajay iske ki koi insaan hath me ek katar lekar achanak se pragat ho jata hai, logon ke kotuhal ka vishay bhajan nahi, katar ho jata. hamari, aapki, samaj ki ruchi ab kuch naya, kuch vichitra or kuch anhoni jaisa dekhne ya sunne me adhik hai. Ho sakta hai aaj iske sambandh me positive likhne ya padhne wale hamare, aapke ant par bhi log isi tarah TRP ki talash me hamare aapke un lekhon ki hi bakhiya ugherene lage jo aaj ke liye mannoranjak or kisi ko sukh dene wala ho.

jahan tak kisano ki atmhatya se is ghatana ko co-relate karne ka prasn hai to mai kahta hu ki in sabhi muddon se bhi upar kai ese mudde hain, jis par na to ham aap bat karte hain, na hi media. isliye acha to yeh ho ki aap ek prime time ko isi mudde par lekar aayen. Kal prime time par jab aapko ek seat paye laloo ji par pura 1 ghanta barbad karte dekha to aaj ke aapke is article par do shabd kahne ko majboor hua. mafi chahta hu par muje lagta hai samaj ko nayi disha dene ke liye vishay or bhi hain, jis par vichar kiya ja sakta hai....sorry ravish bhai.

Awadhesh k. Jha said...

Dear ravish bhai, Yeh sach hai ki jiya ki mot ka media apradhikaran kar raha hai. Lekin muje lagta hai ki iska lasurwar sirf koi ek media sanstha nahi hai. kya aap kal se isi mudde par bat nahi kar rahe. Agar han to kyon, Agar sirf sympathy darsane ke liye, to iske liye 1-2 shabd kafi hote hain. Pure 2-4 page bharne ki awasyakta kya hai. Dusri bat samaj ki ankhe bhi badal gayi hain. Agar sarak par chalta hua koi insaan bhajan gungunata hai to wah bewkoof hai bajay iske ki koi insaan hath me ek katar lekar achanak se pragat ho jata hai, logon ke kotuhal ka vishay bhajan nahi, katar ho jata. hamari, aapki, samaj ki ruchi ab kuch naya, kuch vichitra or kuch anhoni jaisa dekhne ya sunne me adhik hai. Ho sakta hai aaj iske sambandh me positive likhne ya padhne wale hamare, aapke ant par bhi log isi tarah TRP ki talash me hamare aapke un lekhon ki hi bakhiya ugherene lage jo aaj ke liye mannoranjak or kisi ko sukh dene wala ho.

jahan tak kisano ki atmhatya se is ghatana ko co-relate karne ka prasn hai to mai kahta hu ki in sabhi muddon se bhi upar kai ese mudde hain, jis par na to ham aap bat karte hain, na hi media. isliye acha to yeh ho ki aap ek prime time ko isi mudde par lekar aayen. Kal prime time par jab aapko ek seat paye laloo ji par pura 1 ghanta barbad karte dekha to aaj ke aapke is article par do shabd kahne ko majboor hua. mafi chahta hu par muje lagta hai samaj ko nayi disha dene ke liye vishay or bhi hain, jis par vichar kiya ja sakta hai....sorry ravish bhai.

Rakesh Dixit said...

is tarah k lekh seprerna leni chhahiye ki zindgi k sangharson se ladne wala hi vijeta hota hai

noopuram said...

apka vishleshan vichar karne yogy aur sundar hai.