मैं ख़्याल हूं किसी और का

मैं ख़्याल हूं किसी और का
मुझे सोचता कोई और है

जब भी इस ग़ज़ल को सुनता हूं एक ऐसे दौर में चला जाता हूं जहां आज का वक्त अभी अभी गुज़रता सा लगता है। उत्तर उत्तर आधुनिक होने के दौर से पहले की यह ग़ज़ल हमारी अभिव्यक्तियों के संबंधों और उनके बीच पैदा हुए ख़्यालों का ऐसा विखंडन करती है कि आप एक बार इसकी पंक्तियों की तस्वीरों में ख़ुद को पाने लगते हैं। हमने फिल्म समीक्षक तो पैदा किये हैं मगर गानों, ग़ज़लों के समीक्षक हुए ही नहीं जो इनके गाने और सुने जाने के दौर में इसके असर को समझा सके।

मुन्नी बेगम जब गा रही होती हैं तो लगता है सुराही में कोई हवा सरसराती हुई भीतर तक उतरती है और बाहर आ रही है। आज के संबंधों के दौर को याद कीजिए और हमारी अभिव्यक्तियों के रिश्तों के बारे में भी । हम अक्सर सोचते हैं किसी और से कहने के लिए ।  मन कितनी दुनिया पार कर लेता है। आपकी हर अभिव्यक्ति किसी ख़ास की जगह सरेआम साझा है । हम ख़ुद को उन रिश्तों में देखने लगते हैं जो हमारी बातों में ख़ुद को ढूंढने के लिए भटक रहे होते हैं । कोई विश्वासघात नहीं हो रहा है। नैतिक संकट नहीं है ।  कोई पुराना नहीं छूट रहा है। लेकिन हमारे संबंधों के तार उलझने लगे हैं। पता नहीं होता कि आप किस अनजान की बातों में खो गए, पता ही नहीं चलता कि कब आप अपनी दुनिया पार कर किसी की दुनिया में जाकर टहल आए हैं। यह ग़ज़ल चाहतों के बंटवारे की नहीं है।  उस हकीकत को बयां कर रही है जहां संबंध-अंतरसंबंध की कई परतें किसी गुप्त राह से होती हुईं कहीं और भटक रही होती हैं।

वही मुंसिफों की रवायतें,
कहीं फ़ैसलों की इबारतें,
मेरा जुर्म तो कोई और था,
पर मेरी सज़ा कोई और है

हमारे कई राज़दार हो गए हैं। हम अपने मन की बात अजनबियों के बीच ज़्यादा कहने लगे हैं जो चुपके से आकर लाइक कर जाते हैं और खुलकर गरिया जाते हैं। एक नई किस्म की पहचान बन रही है जो शायद उलझा रही है या फिर हम इसी तरह से उलझ कर सुलझे हुए महसूस करते हैं। इतनी बातें जो हम आभासी दुनिया में सरेआम करते हैं क्या हम सामने मौजूद रिश्तों से करते हैं। क्या वैसे और ठीक उसी अंदाज़ में करते हैं । शायद नहीं ।  पक्का हां ।  वहां की बातों में से ऐसा क्या बच जाता है , इतना क्या बच जाता है कि फिर भी साझा करने के लिए काफी होता है।

तू करीब आ तुझे देख लूं
तू वही है या कोई और है

हमारी पहचान हमीं से गुम हुई जा रही है। हर रिश्ते के कई उप-कोने(सब-कार्नर) हैं। अब सिर्फ हमारा सबसे करीब ही हमें नहीं जानता । वो भी जानने लगा है जो शायद कभी करीब ही न हो और क्या पता हो भी गया हो। यही कारण है कि सोशल मीडिया की अभिव्यक्तियां और अकेला कर रही हैं क्योंकि यह प्रक्रिया किसी एक जगह से चलकर दूसरी जगह पर जाकर नहीं रूकती । नहीं ठहरती है । वो वहां से कहीं के लिए और मुड़ जाती है।

अजब एतबार पे एतबारी
के दरम्यान है ज़िंदगी
मैं करीब हूं किसी और के,
मुझे जानता कोई और है

बात सिर्फ चाहत या पाने की नहीं है। बात है बातों को कहने की। उनके सुने जाने और उनके कहे जाने के तलब की। हम अभिव्यक्तियों को लिये भटक रहे हैं। लिखे हुए हर्फ़ों से चिपक रहे हैं उनसे लिपट रहे हैं और मचल रहे हैं ।  बातों की दावेदारी है । हर बात जो मेरी है वो मेरी ही है या किसी और की भी है। ये तलाश सिर्फ किसी उत्तर उत्तर आधुनिक दौर की नहीं है। ये तलाश हर दौर की है जिसके कारण इंसान पूरी धरती नाप गया। चलता रहा। बसता रहा। उजड़ता रहा। वो इतना फैला कि सबसे दूर हुआ । उसे ढूंढना ही था खुद को । तार लेकर आया,फोन लेकर आया, ख़त लेकर आया। इंटरनेट लेकर आया। हम होते हैं किसी और के लिए मगर कोई और भी हमारे लिए होता है । 

मैं नसीब हूं किसी और का
मुझे मांगता कोई और है

हम जिन संबंधों में हैं, वहां के अलावा भी हैं । किसी और के ख़्यालों में, किसी और की चाहतों में । दिलचस्प दौर है। संबंधों के इन खांचों को आप संबंधों की उस परिभाषा से मत देखिये जहां कोई अपना दरवाज़ा बंद कर किसी और की खिड़की से दूसरे के कमरे में जा रहा है। हमारे भीतर बन रही अभिव्यक्तियों को साझा करने की भूख किसी एक से नहीं मिट सकती। बहुत बहुत चाहिए। पांच हज़ार दोस्त और पांच लाख अनुचर या फोलोओर। कमाल है। मुन्नी बेगम ने इस ग़ज़ल को सबसे अच्छा गाया है। सुनकर मस्त हो जाइये।

12 comments:

Ram Arya said...

नमस्कार सर जी! पढ़कर अच्छा लगा !!!

Awadhesh k. Jha said...

ji Ravish bhai, Yahi to ada hai lekhan ki. Bat kahne ki. Sahara to hai munni begam ke gajal ki, lekin bat kisi or se ho rahi hai. bahut khub. Sir, asha or umeed par hi duniya tiki hai. Kabhi Kabhi apki baton me nirasavadi soch jhalkne lagti hai. Eisa hona nahi chahiye. Mujhe lagta hai apki lekhni me wah dam hai, jo padhne wale ko kahin na kahin aapki hi abhivyaktiyon ke ird gird ghumne ko majboor kar deti hai. aapne sach kaha kabhi kabhi main bhi sochta hu abhivyakti aapki, soch aapki, vichar aapke phir ham jase commentbaj ko yeh kasa adhikar ki aapko gariya den ya phir aapki alochna karen. Lekin yeh sach hai ki jab ham public domain apni bat ko sajha karne lagte hain to kahin na kahin yeh umeed to rahti hi hai ki jara dekhen samne wale ne kya socha, kya samjha or kya sajha kiya...acha laga sir yeh bhi...

Hypocritically Yours said...
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Rakesh Dixit said...

gazal ka aisa vistar ! sadhuvad bhaiji

बाबुषा said...
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बाबुषा said...

मैं ख्याल हूँ किसी और का कि मैं ख़याल हूँ किसी और का ?

मीटर बिगड़ रहा है, रिदम टूट रही है सो पहले ही टोक दिया.

अब आगे का पढ़ते हैं.

बाबुषा said...

अजब भीड़ है कि यहाँ सब अकेले हैं.

shyam lal said...

Good

shyam lal said...

Good

Mahendra Singh said...

likha kisne hai

Hypocritically Yours said...

बढ़िया लिखा है रविश भाई ... एक शेर हमे भी याद आया है, हालाँकि इस ग़ज़ल से कोई राफ़्ता नहीं है| मुज़फ़्फ़र वारिस का कलाम है ...

'चेहरे पे मल रहा हूँ सियाही नसीब की
आईना हाथ में है सिकंदर नहीं हूँ मैं . . .'

Vicky Rajput said...

Bahut badiya sir jii....