रेलगाड़ी और सिनेमा

सिमरन आज भी भागना चाहती है मगर भगा कर ले जाने वाले राज के पाँव काँपते हैं । बाउजी के थप्पड़ों से राज के क्लिन शेव वाले गाल लाल हो उठते हैं । फ़िल्म आख़िर में पहुँचते पहुँचते बी ग्रेड होकर यादगार हो जाती है । राज किसी का दिल जीतने आया था किसी का दिल तोड़ने नहीं आया था । हम नहीं जानते थे या शायद जानते थे कि इस फ़िल्म से एक सुपर स्टार पैदा हो रहा है । समीक्षक ही बता सकेंगे कि इश्क़ मोहब्बत की वही फ़िल्म स्टार क्यों पैदा करती है जो बने हुए सिस्टम से बहुत ज़्यादा छेड़छाड़ नहीं करती है । कुछ ले दे के एडजस्ट कर जाती है । सिमरन जैसी लड़कियाँ हतप्रभ रह जाती हैं । राज जैसे प्रेमी माफी माँगने लगते हैं । वो उसी खाप का एक नरम विस्तार बन जाते हैं जो माँ बाप या समाज से अलग रास्ते पर चलकर प्यार के परवान चढ़ाने से डराते हैं और डर जाते हैं । जाते जाते राज सबसे माफी माँगते चलता है । प्रीति से । संगीत ही है कि लाज बचा लेती है । सिनेमा के घिसे पिटे यथार्थ से निकाल लो जाती है । राज हाल्ट पर पहुँचता है । एक प्लाट के तहत कि बाउजी खुद लेकर आएँगे । बस बस बस बस । अनुपम खेर चौधरी साहब को क्या रोकते हैं बस बस गूँजने लगता है । राज लात खाता है । गिर जाता है । फिर पलटता है । बंदूक के साथ । चीखते हुए । लाठियों को हटाने के सिनेमा के स्थायी और कालजयी दृश्य में प्रवेश करते हुए । एंग्री यंग मैन का खुदरा खुदरा चेहरे पर तैरता है । उधर हवेली में माँ दरवाज़ा खोलती है । चल सिमरन मेरे साथ । भारतीय रेल का यह छोटा सा हाल्ट एक साधारण सिनेमा के क्लाइमेक्स का मेट्रो स्टेशन बन जाता है । फाइट सीन । ढिशूम ढिशूम । टेबल फ़ैन की हवा से राज के गहरे काले बाल उड़ रहे हैं । ट्रेन आने वाली है । आ रही है । प्लेटफार्म पर लग रही है । वक्त कम है । बाप बेटे कोच में चढ़ने लगते हैं । नाॅन एसी कोच । नब्बे का मध्यमवर्ग आख़िरी बार देखता है । एसी थ्री में शिफ़्ट होने से पहले । बाप ऊपर और बेटा नीचे । फिर से वही संगीत का मायावी यथार्थ । बाउजी सिमरन की कलाई पर अपनी आख़िरी ताक़त आज़माते हैं । ट्रेन चल देती है । कलाई छूट जाती है । राज कोच के दरवाज़े पर है । जा सिमरन जा । इस लड़के से ज़्यादा प्यार तुझे कोई और नहीं कर सकता । जा जी ले अपनी ज़िंदगी । अमरीश पुरी खलनायक से एक उदार पिता बन जाते हैं । सिमरन दौड़ पड़ती है । दौड़ रही है । ट्रेन कमबख्त चल रही है । सब कुछ स्लो मोशन में है । सिमरन का लहंगा । राज का लेदर जैकेट । वायलीन या बैंजो का ट्यून ।  राज की बाहों में सिमरन । भारतीय रेल । नब्बे के दशक के एक सुपर स्टार को लेकर चलने लगती है । दुल्हनियाँ ऐसे बुज़दिलों को दिलवाले कब तक समझेगी । मसखरी आशिक़ी नहीं है । तमन्ना बेताब है । अब चैनल बदल चुका हूँ । इसी फार्मेट से पहले पैदा हो चुका सुपर स्टार गा रहा है । रे मीत न मिला रे मन का । गाने के बाद कहता है सैड सांग था । विरह गीत । सिगरेट के धुएँ से छल्ले बनाता है । अभिमान उस शोहरत के तमाशे का तमाशा है जिसका हीरो सुधीर कुमार एक लाख का ब्लैक मनी रखता है । शोहरत के साथ बंगला खरीदता बेचता है । हिन्दी फ़िल्म की कहानियाँ चलती रहती हैं । रेलगाड़ी की तरह । प्लेटफार्म पर खड़े लोग इस रेलगाड़ी में चढ़ते रहते हैं और गाड़ी से नीचे उतरता रहता है । दोपहर बर्फ़ी देख रहा था । बर्फ़ी की पहली महबूबा दौड़ती है भागती रेल को पकड़ने के लिए । पतली दुबली लड़की साड़ी में लिपटी अंधेरी लाइट के शेड्स में दौड़ रही है । कुछ दिन पहले रांझणा जैसी एक बेकार फ़िल्म देखी थी । बनारस में इसका हीरो भी प्लेटफार्म पर साइकिल से भाग रहा है । सोनम अलीगढ़ जा रही है । वही सेकेंड क्लास का डिब्बा । ऐसे सीन के लिए सेकेंड क्लास का डिब्बा ही काम आता है । सिनेमा की रेलगाड़ी में एसी कोच अभी तक क्यों नहीं आया । रांझणा का हीरो साइकिल लिये पटका जाता है । ज़ोया की गाड़ी अलीगढ़ । रेल का सीन भी फिक्स है भाई । टीटी को ले दे कर । 

10 comments:

Sushil Kumar Tomar said...

Hahaha..twitter se Gaye to yahan dhund liya..chaliye abhi touch mein rahenge

sachin said...

सिमरन का हाथ पहले बाउजी पकड़े रहते हैं। २ पल नहीं होते उसकी कलाई को आज़ाद हुए कि राज जकड़ लेता है। शहर और गाँव की देहलीज़ पर खड़े - रेलवे प्लेटफार्म - की दोनों तरफ़ सिमरन को सहारा चाहिए। स्क्रिप्ट लिखने वाले ने उसे बस इतनी आजादी दी है, कि वो अपने घर के पिछवाड़े, मोहल्ले वालों की नज़र से बचकर, थिएटर की पब्लिक के लिए बारिश में छोटी सफ़ेद स्कर्ट पहनकर नाच सकती है। पर बिरादरी के सामने उसकी मर्ज़ी, बाउजी के ह्रदयपरिवर्तन पर टिकी है। और इस सदी के रोमांटिक हीरो की भी यही मान्यता है. ठीक भी है। तभी फिल्म हिट होगी। लोगों को पसंद आएगी। सुपरस्टार जनम लेगा। जो इसके विपरीत जायेगा, वो केवल अख़बार की "लोकल न्यूज़" में एक स्टोरी बन जाता है। जिसपर सुपरहिट फिल्म नहीं, केवल एक डाक्यूमेंट्री ही बन सकती है।

S. M. Rana said...

Pehle Hollywood, phir Bollywood, ab Anchorwood...

प्रवीण पाण्डेय said...

छुक छुक, दौड़ती रेल की तरह...

R N Thakur said...

सेट मैक्स पर आ रही थी डीडीएलजी और देखते ही बहुत दिनो बाद दिल फिर से धड़कने लगा सिनेमा देखते-2 सोच रहा था उस दौड़ मे इस सिनेमा के बारे में किसने क्या लिखा था या कहा था, इंटरनेट पर दुंढने लगा। वैसे इसका आज तक डीवीडी नही खरीदा एक बार एक दोस्त दे भी रहा था मैने मना कर दिया। 1995 में एक ही दिन मे 2 शो लगातार देखा था और उसके बाद लगभग 25 बार सिनेमाहॉल में देख चूका था, यह सिनेमा हमेशा से मेरी कमजोरी रही है और आज भी किसी से बात करने में बहुत कंट्रोल करना पड़ता है। जब इसके डॉयलोग से महाराष्ट्र की सरकार गिर सकती है तो मेरे जैसे निम्न मध्यमवर्गीय लोग तो सिर्फ आहे ही भर सकते है।

Sudhanshu said...

sir ji ranjhana itni bejar kyun lagi?dialouge zabardast hain. nari ke devi roop ko todne ki koshish hai . ek normal se dikhne wale ladke ne hindi cinema mein pyar karne ki kosish ki hai ....

Yogesh said...

Hmmm.. Agree to nhi karta is lekh se, bt sir jo aapke likhne ka tareeka h usse padhme me bohot bohot maza aata h.

SHABAHAT KHAN said...

kuch alag hi nazariya hai aapaka...maza aata hai padhne me

dipi said...

sahi h .....par aj bi 2 din phle maratha mandir me saalon se chal rahi iss film ko phir se dekha.....meri generation k liye kuch naya xperinc.....vo film dobra bade parde pe dekhna jise hum shyd har hafte tv ki choti screen pe dekh hi lte h...
aur sach me iss bar bi itni buri nahi lagi.....dil khol k njy kia....aur mere liye....
filmen manoranjan k liye hoti h.....debate k liye nahi......

योगेश कुमार 'शीतल' said...

समीक्षक ही बता सकेंगे कि इश्क़ मोहब्बत की वही फ़िल्म स्टार क्यों पैदा करती है जो बने हुए सिस्टम से बहुत ज़्यादा छेड़छाड़ नहीं करती है । :)))))) क्या महीन नजरिया है.. वाह.