दिल चाहता है

लोकसभा टीवी पर दिल चाहता है देख रहा हूँ । कालेज के दिन ख़त्म होते ही बिना जाने बिना समझे बिना परवाह किये दोस्ती के दिन भी चले जाते हैं । उन दिनों में हम सपने देखा करते थे, बाद के दिनों में उन सपनों के लिए दाँव पेंच चलाने लगते हैं । इस नई ज़रूरत में कई समीकरण बनते हैं जिसे हम कुछ दिनों और कुछ दूर तक दोस्ती समझने लगते हैं । पुराने चले जाते हैं और नया दोस्त मिलता नहीं । मिलता है तो दोस्त होने और जीने के लिए बंदिशें हावी हो जाती हैं । 

दोस्त बनाने की तलाश चलती रहती है । ग़लत समझे जाने की गुज़ाइशों के साथ । सिद, आकाश और समीर । हमारी ज़िंदगी के दोस्त लगते हैं । जिन्हें हम ज़्यादा समझने के चक्कर में खो दिया करते थे तो कम समझने के कारण धोखा खा जाते थे । इस रिश्ते को हम भरोसा गँवा कर बनाया करते थे । अरे वो ठीक नहीं है, उसके कुछ ज़्यादा ही क़रीब हो । कितनी खींचतान होती थी । शायद इसीलिए कोई पुराना दोस्त मिलता है तो लिपट जाने का दिल करता है लेकिन वक्त इतना गुज़र चुका होता है कि दिल नहीं धड़कता । 

दोस्त अब भी मिलते हैं । अच्छे भी मिलते हैं । लेकिन आकाश जिस तरह से प्रिया को झूठ बोलता है कि समीर यहाँ नहीं आया । प्रिया झगड़ा करती है कि समीर तुम झूठे हो । दरवाज़ा बंद कर देती है । समीर को भी आकाश का फ़ैसला मंज़ूर होता है ।  दोस्त कहानी बनाया करते थे । और समीर का क्रिस्टीन से मिलना । हा हा । मिस तारा की मौजूदगी । उफ्फ ! अब तो सब तय सा होता है । अचानक नहीं । 

सिद अचानक मिस तारा से मिलता है । सामान उठाता है । तारा और सिद की दिलचस्पियां भी मिलती हैं । तारा सिद्धार्थ के उस कोने में पहुँच जाती है जहाँ उसकी तस्वीरें रखी हैं । ये वो कोना है जिसे उसके दोस्त नहीं देख नहीं पाते । तारा झाँक कर देख लेती हैं और कहती हैं कि तुम्हारे अंदर की जो दुनिया है उसे तुम किसी से बाँटते नहीं । मुझे तो लगता है तुम्हें जो जानते हैं वे भी नहीं जानते । तारा यानी डिम्पल कपाडिया की लाइन समीर के भीतर एक समीर की दुनिया खोल देती है । 

दोस्त ऐसे ही होते हैं जो आपके भीतर आपके किसी और को ढूँढ लेते हैं । सिर्फ अधिकार ही दोस्त नहीं बनाता । ये वो हक है जिसे हम देते हैं । जितना देते हैं उतना लेते हैं । हमें दोस्तों के भीतर के दोस्त को ढूँढते रहना चाहिए । हज़ारों दोस्त बना लेने के इस दौर में हमने संबंधों को खोजना बंद कर दिया है । इसीलिए स्टेटस दोस्ती का प्रमाण नहीं है । फोलोअर दोस्त नहीं है । दोस्त वो होता है जो आपके हर कमज़ोर पलों और मज़बूत उड़ानों को दूर से भांप लेता है । जब भी कोई ऐसा दोस्त मिले उसे जानिये । उसे सुनिये । कुछ तो बात दबी होगी उसमें , पहचान लीजिये वो इतने भर से खिल जायेगा । दिल कुछ और नहीं बस यही चाहता है । 

अच्छी फ़िल्म थी । मुझे अपने दोस्तों पर नाज़ है । वे चले तो गए अपनी रौं में बहुत दूर पर यादों में अब भी वैसे ही बसते हैं । बहुत कुछ सीखा गए । बहुतों से मिला गए । तब उन्हें लगा ही नहीं कि कुछ दोस्त कमज़ोर भी होते हैं । वो गुटों में चल नहीं पाते,वो रातों को जाग नहीं पाते, वो कह नहीं पाते, उनका कोई इंतज़ार नहीं करता वो दोस्तों की टोलियों में पीछे पीछे चलते रह जाते हैं । एक दिन वो कमज़ोर पलट जाता है दूसरी तरफ़ जहाँ कोई और इंतज़ार कर रहा होता है उसे सुनने के लिए । कहने देने के लिए खूब सारा वक्त होता है जिसके पास । चुपके चुपके उसे अपने राज़ सौंपने लगता हूं । पर अब भी वो बिंदास मज़बूत से दोस्त याद आते हैं । किसी कसक की तरह । नए दोस्त मिलते हैं तो दिल उसी तरह खिलता है जैसे वे पलट कर आ गए हो । आज भी जो बहुत से दोस्त बना लेते हैं उनसे रश्क होता है । ये बाज़ी आजतक हारता रहा हूँ । इसलिए जब भी कोई घर आता है मेरे दरवाज़े बंद होने लगते हैं । धीरे धीरे या अचानक खुलने की आदत से आने वाला चौंक जाता है । दोस्त चला जाता है । 

दिल चाहता है । 

10 comments:

सागर said...

kitne baaten aapke dimaag mein chalti rehti hain ?

itni baaten kahan se laate hain jo 'kehne ka man karta hai' ?

Arc man said...

sahi kaha, dil chahta hai

anuj sharma said...

lagta hai ham kahin kucch ansh apni aatma ke cchod ate hain jo hamare jiwan ke shuruaati kho gaye palon ke bich tairta hai or khinchta hai jahan ja nahi sakte. jindgi bas ek kasak hai khoye palon ki.

kundan shahi said...

Likhte rahiye...hume to intezar rahta hain aapke lekho ko..chahe ho 140 character ka ho ya jitne ka.

Hypocritically Yours said...

रविश जी ये लेख पढ़के एक गज़ल याद आ गयी...पता नहीं किसने लिखा है ... दूरदर्शन पर किसी सीरियल के शुरुआत में ये आता था...जगजीत सिंह ने अपनी आवाज़ दी थी...

'ज़िंदगी में हर किसी का अपना अपना आसमाँ ...
.. हर कोई कह रहा अपने जुनूँ की दास्ताँ'

हम किसी परिस्थिति में होकर उस परिस्थिति का मूल्यांकन करते हैं और उस परिस्थिति से गुज़रने या उस परिस्थिति के कट जाने के बाद फिर से उन परिस्थितियों का जब मूल्यांकन करते हैं ... चाहे वो बिताए हुए दीनो में दोस्त, दोस्ती और दोस्तों की खट्टी मीठी या कचॉटने वाली बात हो या वैसा ही कुछ और तो हमारा निष्कर्ष मूल्यत्ः दो प्रकार के ही निकलते हैं..पहला ये की अगर हम आज किसी अच्छे मुकाम को हासिल करने में सक्षम हुए हैं और हमें ये जताना हो की हम अब काफ़ी आगे निकल चुके हैं तो हम modesty की आड़ में खड़े हो कर ये जता देते हैं की कमी हम में ही थी ... वो जो हमारे साथ थे और जिनको देख के हम रश्क खाया करते थे वो बल्लम लोग थे...और बाज़ी मार ले जाती हैं हमारा आज का कद और modesty....दूसरा मूल्यांकन उनका होता है जो घाघ नहीं बन पाए और सीधा कोस ही डालते हैं अपने माज़ी को...उनकी ईर्ष्या उनके बड़बोलेपन में अब भी झलक जाती है|

Vicky Rajput said...

Wah Sir . Bahut Achchha Laga... Bahut Khub

Kaushal Lal said...

बहुत सुन्दर

BlogMaster said...

wah!... aap aur logon ke liye prerna hain... Hindi ka pryog jitne log karen utna achchaa. Yunhi preret karte rahen.

Awadhesh k. Jha said...

HAN JI RAVISH BHAI, aapke dost abhi hain ya nahin, yah to nahi pata lekin aapke abhi ke follower ke numbers ko dekh kar eisa nahi lagta. aapko pata nahi aapke kuch follower to eise bhi honge, jo yeh soch kar hi sote or jagte honge ki kal pata nahi ravish bhai ke kin kin baton ko sunna parega or pata nahin unki kin kin baton ka kase or kaisa jawab dena hoga.
Meri niji roy hai ki Dost kaha nahi ki ummeeden jagin or apekshayen badhi. Or badhti umeedon ke sath dosti ka matlab dhire dhire kam hota gaya. yeh niyam hai hamari aapki prakriti ka. Tab hai ki insan ki jo pramukh kamjoriyan hain, unme se ek uska emotional sense bhi hai, jo use kahin kahin na ultimately ek insan se hi jurne par majboor kar deta hai. Isliye is se koi bhi INSAAN achuta nahi rah sakta. kahne ko to bahut kuch JI CHAHTA HAI, par aapke aage ke blogs par bhi to kuch likhna hai sir...isliye...

Awadhesh k. Jha said...

HAN JI RAVISH BHAI, aapke dost abhi hain ya nahin, yah to nahi pata lekin aapke abhi ke follower ke numbers ko dekh kar eisa nahi lagta. aapko pata nahi aapke kuch follower to eise bhi honge, jo yeh soch kar hi sote or jagte honge ki kal pata nahi ravish bhai ke kin kin baton ko sunna parega or pata nahin unki kin kin baton ka kase or kaisa jawab dena hoga.
Meri niji roy hai ki Dost kaha nahi ki ummeeden jagin or apekshayen badhi. Or badhti umeedon ke sath dosti ka matlab dhire dhire kam hota gaya. yeh niyam hai hamari aapki prakriti ka. Tab hai ki insan ki jo pramukh kamjoriyan hain, unme se ek uska emotional sense bhi hai, jo use kahin kahin na ultimately ek insan se hi jurne par majboor kar deta hai. Isliye is se koi bhi INSAAN achuta nahi rah sakta. kahne ko to bahut kuch JI CHAHTA HAI, par aapke aage ke blogs par bhi to kuch likhna hai sir...isliye...