नदी और नाव

नदियाँ नहीं होंगी तब भी नाव बची रहेगी । किसी माॅल के बाहर । ये मेरे घर के पास के एक माॅल में बिछा है । कंधे पर लाद कर कोई नदी और नाव दर दर भटक रहा है । आजकल के 'किड्स' रिवर में वोटिंग कर रहे हैं । यू नो, नाइस न ! 

6 comments:

AMIT KUMAR CHAUDHARY said...

Very nice but its dangerousalso

Gopal Girdhani said...

बदलेगा जमाना - बदलेगी तस्वीरें !

Vicky Rajput said...

Chandrama manushya charan se chur hota jaa raha hai, duniya ka har kona kam dur hota jaa raha hai, kya batala sakta hai aaj ka vigyanik yug aadami aadami se kyun dur hota jaa raha hai.....

प्रवीण पाण्डेय said...

सच है, इसी बहाने पुरानी यादों को ऐसे ही जियेंगे।

विनीत कुमार said...

बस ये है कि इस नदी में कोई पिन न चुभो दे.:)

Hypocritically Yours said...

ज़माने के हाथों से चारा नहीं है ...
ज़माना हमारा तुम्हारा नहीं है . . .

हर गुज़रती हुई नस्ल इतरा के कहती है की ये आने वाली नस्ल क्या ख़ाक जी पाएगी
हम प्रकृति के जीतने करीब थे ये कहाँ हो पाएँगे| पर हर पीढ़ी अपनी इबारत लिखती है और क्या खूब लिखती है|