टीवी दिखाता नहीं डराता है

टीवी हांफ रहा है । दमा है या टीबी ये तो ख़ून या बलगम की जाँच से पता चलेगा । टीवी अब साथी कम पार्टी ज़्यादा लगने लगा है । किसी गाँव या शहर में जाइये टीवी को लेकर लोग सवाल करने लगे हैं । टीवी के दो पर्यायवाची शब्द आम फ़हम हो चले हैं । चैनल और सर्वे । मैं जिन लोगों से मिला वो अब पत्रकार को एजेंट के रूप में देखने लगे हैं । सफ़ाई देते देते थक गया कि प्लीज़ ऐसा मत कहिये । जवाब यही कि हम आपको व्यक्तिगत रूप से नहीं कह रहे हैं । उन्हें लगता है कोई गुड्डा हाथ में कैमरा और माइक लिये आ गया है जिसकी डोर किसी और के हाथ में है । मीडिया इतना क्यों दिखा रहा है और एक ही का क्यों दिखा रहा है । "पहले टीवी बताता था, दिखाता था अब टीवी डराता है ।" एक गाँव का बुज़ुर्ग किसी चौमस्की की तरह आराम से कह गया । 

शहर,क़स्बा और गाँव । चाय वाला से लेकर टीचर । कई लोग मिले जिन्हें लगता है कि जो वो कह रहे हैं वो दिखेगा नहीं । इसलिए जो पहले से दिख रहा हैं वही कह रहे हैं । विकास और नेतृत्व जैसे सवालों पर वैसे ही बोल देते हैं जैसे टीवी बोलता है । जैसे टीवी सुनना चाहता है । कैमरा बंद होने के बाद ऐसी कई आवाज़ें सुनने को मिलीं जो अपने ही कहे का उल्टा थीं । लोग भी टीवी से खेल रहे हैं । झट से कोई कार्यकर्ता आम आदमी बन जाता है । बाद में पता चलता है कि वो किसी पार्टी का है । सारे कार्यकर्ताओं को पता है कि चुनाव के टाइम में पत्रकार आ सकता है । गाँव के किसी कोने में शूट कर रहे हैं अचानक पार्टी के लोग चले आते हैं । प्रभुत्व पार्टी के लोग । पीछे से ज़ोर ज़ोर से नारे की शक्ल में बात करने लगते हैं । अचानक भीड़ भी वही बोलने लगती है । टीवी के पैदा विमर्श ने ज़मीन पर ऐसे लोगों का दबदबा बढ़ा दिया है । ऐसे लोगों के आने के बाद लोग चुप हो जाते हैं । उसे ही बोलने देते हैं । जिसे मैं कई बार भरमाना कहता हूँ । जो ऊँचा बोलता है समाज उसे बोलने देता है । लेकिन इसका असर हो रहा है । कई लोग वैसा ही बोलने लगते हैं जैसा बोलने की छूट टीवी पर दिखती है । हम सब एक मीडिया समाज में रहते हैं । यह टीवी का 'बेंग काल' है जहाँ टीवी और उसका दर्शक टर्र टर्र करने लगते हैं । अविश्वसनीय होकर भी टीवी विश्वसनीय माध्यम हो गया है । टीवी इस चुनाव का सबसे सशक्त राजनीतिक कार्यकर्ता है । टीवी के असर को कम मत आँकिये ।

गाँवों में लोग विज्ञापन को लेकर सवाल करते हैं । उन्हें शक है कि जो पत्रकार सामने हैं वो स्वतंत्र है भी या नहीं । "आप अच्छे हैं लेकिन आप जिस सिस्टम में काम करते हैं उस पर आपका कितना बस चलता है ।" यह बात तमाचे की तरह लगी । " कल पुर्ज़ा से कारख़ाना बनता है पर पुर्ज़ा कारख़ाना नहीं होता साहब" ये पंक्ति एक बेरोज़गार युवक की है जिसने सोशल मीडिया पर टीवी की हो रही आलोचना की ज़ुबान को पढ़ा भी नहीं होगा । 

किसी भी दर्शक को ऐसे ही होना चाहिए । इन सब बातों पर तिलमिलाया तो नहीं पर मुस्कुराया ज़रूर । दाँत चियारने के अलावा चारा भी क्या था । कहीं कहीं तो टीवी को लेकर ग़ुस्सा इतना भयानक था कि पूछिये मत । हर आदमी घेरकर यही पूछ रहा था । नाप रहा था कि आप किसकी तरफ़ से बिके हैं । आपका मीडिया बिका हुआ है । बार बार सुनाई दिया । कई लोग मिले जो कहते नज़र आए कि अब तो साहब टीवी बंद कर दिया है । क्या देखना है । वही बातें बार बार । ख़बर तो होती नहीं है । 

'टीवी कम देखिये' मैं रोज़ रात को ट्वीट करता था लेकिन लगता है उन लोगों ने पढ़ लिया जो ट्वीटर पर नहीं टीवी पर हैं । वे टीवी कम देखने लगे हैं । हालाँकि यह भी आँकड़ा आने ही वाला होगा कि चुनाव में टीवी के दर्शकों की संख्या बढ़ गई है । ऐसा होता भी है । टीवी को लेकर सवाल करने वाले ऐसे कितने लोग हैं । पर ऐसे लोगों की तादाद बढ़ने लगी है । 

टीवी उस नेता की तरह है जिसके बारे में सब जानते हैं कि यह किसका एजेंट है, इसके धंधे क्या है, किस चीज़ का माफ़िया है, जात क्या  है, यह कभी हमारा काम नहीं करेगा लेकिन वोट तो लोग उसी नेता को देते हैं । यह अविश्वास से पैदा हुआ प्रेम है !  जैसे राजनीति का विकल्प नहीं वैसे अख़बार टीवी का भी तो नहीं है । सोशल मीडिया ? सोशल मीडिया लोगों का कितना रहा । वहाँ भी वही अख़बार टीवी चल रहा है । हम अख़बार टीवी के बग़ैर नहीं रह सकते । काश के लोग ऐसी नाराज़गी पर केबल कटवा दें और अख़बार बंद कर दें । 

मैं अक्सर कहता हूँ कि किसी वोटर को किसी नेता का फ़ैन नहीं होना चाहिए वैसे ही किसी दर्शक को किसी एंकर या रिपोर्टर का फ़ैन नहीं होना चाहिए । फ़ैन्स बनते ही आप चतुर निगाहों से देखना बंद कर देते हैं । किसी के प्रति लगाव स्वाभाविक है मगर ऐसा भी न हो जो विश्वसनीयता आपके बीच कोई बना रहा है उसका इस्तमाल कोई और कर ले । डेढ़ महीने से अख़बार नहीं पढ़ा हूँ । टीवी नहीं देखा हूँ । अपवादों के चंद मिनटों और पन्नों को छोड़कर मैं भी उन दर्शकों की तरह हो गया हूँ जो टीवी को लेकर सवाल करते हैं । हम सब कृत्रिम रूप से पैदा एक महान विमर्श का पीछा करने वाले लोग हैं । यह बहुत अच्छा है । मीडिया पर अविश्वास लोकतंत्र को समृद्ध करता है । ये वो लोग हैं जो टीवी के बनाए भ्रमजाल से निकल आए हैं और इन लोगों के पास वैकल्पिक विमर्श पैदा करने की ताक़त नहीं है । जैसे नेता वोटर की मजबूरी जानता है वैसे ही टीवी दर्शकों की । बाक़ी तो जो है सो हइये है ।


58 comments:

Narinder Singh said...

Seedhi saadhi bhasha mein likha ek rochak blog. Jis sachaai ko aap dhoondhkar logon ko dikhana chahtey hain woh kewal chuppe cameray se mumkin hai par usey kripaya STING ka naam mat dena, barna iss-se Jo abishbaas paida hoga, usey paatna mushkil ho jayega, log deewaaron se bhi apna sach chupayenge

Parimal Dhawalekar said...

सर ...कल की बात है ; एक बाईट के लिए युवकोसे बात कर रहा था ... उसमेसे एक ने बोला ये बाइट यदी prime time पर चलाओगे तो दूंगा . आजकल आपका भरोसा नही । कभी congress या bjp ....add पर चलता है । इतना बुरा लगा फोरन निकला वहीसे ।रात भर वो दिमाग से गया नही....एक मन कहता था यही वास्तव है तो दुसरा नकार रहा था ।शायद यही चुनाव है । same feeling sir....कभी बोलता हु इसपर आपको .एक ब़ात कया p2c देते हो य़ार । कभी सोचता हु आपके साथ काम करु ...anyway best luck.

शैलेश पटेल ( बनारसी ) सूरत ,गुजरात said...

मेरा मानना है कि इसका जिमेदार खुद मीडिया ही है ,याद है जब ७.३०. और ८.३० के समाचार सुनने का महतव कितना था और तब समाचार ही था और अब पता नही कया कया बता रहे या कया कया बेच रहे है ( समाचार के अलावा और बहुत कुछ जिसकी उपयोगिता या कहे प्रमाणिकता है भी या नही,हम सब हो सकता है मीडिया के परिवार मे बाऊजी ,माताजी भी झुझलाते जरुर होते है,
और रविशजी Thanks

Manish Kumar said...

रवीश भाई, मीडिया की साख़ तो जरूर कम हुई है, बिके होने/न-होने के वार्ता को थोड़ी देर के लिए छोड़ भी दे, तो एक मुख्य कारण और है, आजकल मीडिया समाचार से ज्यादा फैसला सुनाती है, रिपोर्टिंग बहुत ही कम हो गयी है, अभी चुनाव है तो काफी रिपोर्टर आम लोगो से रु-ब-रु हो रहे है वर्ना सब कुछ स्टूडियो मे ही होता है। हमें चैनल चलाने के आर्थिक समस्याओं को समझते है, फिर भी पत्रकारिता जैसे नोबल प्रोफेशन में गिरती मूल्यों से आँखें नहीं मूंद सकते।

कल के प्राइम टाइम से जुड़ा एक बात और, काफी समय मीडिया(न्यूज़ चैनल या सत्यमेव जयते जैसे कार्यक्रम) देश से जुडी समस्याओ को ऐसे आश्चर्य से दिखाते है, जैसे अमेरिका के लोग ये प्रोग्राम देख रहे हो, मेरा मतलब देश के ज्यादातर नागरिक, खासकर जिन्होंने गाँव-कस्बो की ज़िन्दगी देखी है वो भलीभांति जानते है की बहुत सारी रूढ़िवादी परम्पराओं का दंश अभी भी देश झेल रहा है। और मैं मानता हूँ की ज्यादातर हिंदी चैनेल के दर्शक ऐसे जगहों से ही आते होंगे।

Shashank dalela said...

Ravish Ji, bina naaga aapka prime time dekh rh hu chunavi mausam mai. bht accha laga ki aap studio mai bina furniture bane wahan se nikal kar phr ek baar zameen par haqiqat talashne chal die. Punjab, UP sari reports dekhin aapki. SP,BSP,BJP sab ka vote bank dekha.. mujhe khud bh vishwas nh ho paa rh hai ki NDTV kis base par apne opinion polls dikha rh hai?? Pranoy Roy Sir ki bht respect hai dil mai..but is baar........... jyada kya kahein bus 16 may ka intezaar hai.. aakhir asli naatezein to usi din aayenge .. baki aap ki Imaandari par koi hindustaani 1% bh shaq nh kar sakta.. Lage raho Ravish Bhai.. hum aap k Sath hain..

Himanshu Tyagi said...

Ravish, there is an anecdotal explanation which applies to small local channels, if not to big national channels. My father has a small business and recently he was approached by a newly registered local news channel to invest in their business. They were predicting huge advertising profits in the 2014 Lok Sabha election and were promising great return on his investment. These guys had no real experience in media or business. For instance, they decided to name their news company focusing on local Hindi news Zeus. I believe many small channels are operating on this model where they want to make money from political and Nirmal baba advertisements. They don't even bother to hire qualified reports and have no sense of social responsibility. It's just a business, something like the banquet halls of NCR. (By the way, to end the story I started, the channel which came to us for investment was run by crooks with no business sense whatsoever. They are going bankrupt as we speak.)

saurav said...

जब वोटरों में हावी होता है जन-संपर्क उद्योग का प्रचार-अभियान तो ठोस तथ्यों और तर्कों से होने वाले जांच-परख की एक तरह से विदाई हो जाता है.

Sushil Sudan said...

रविश भाई, आपके इस ब्लॉग में मुझे एक बात दिल को लग गयी कि "काश के लोग ऐसी नाराज़गी पर केबल कटवा दें और अख़बार बंद कर दें" लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है की 125 करोड़ की आबादी वाले देश में, जहाँ के ज़्यादातर
लोग ग़रीब, बेरोज़गार और अनपड़ हैं वहाँ पर एक ही तरह का जनमानस तेयार करना कुछ कठिन है! और इसी कमज़ोरी का फ़ायदा हमारे नेता उठा रहे हैं और शायद मीडीया भी!

shri said...

कल का प्राइम टाइम देखा ज़मीन से रूबरू होना अच्छा लगता है.सोमवार को बड़ा फ़ैसला देख कर समझ मे नही आया किस पेर विश्वास करू ज़मीनी तस्वीर मे या टीवी के बड़े फ़ैसले पर ,जिस क्यूब लॉ से ये परिणाम निकाले जाते है वह 2 पार्टी सिस्टम मे कम अच्छा करता है लेकिन जब 2 से अधिक पार्टी होंगी वॅन्हा यह सटीक परिणाम नही देता है.क्यूब लॉ के बारे मे थोड़ी जानकारी दे रहा हू .
The cube rule or cube law is an empirical observation regarding democratic elections under the first-past-the-post system. The rule suggests that the party getting the most votes is over-represented (and conversely, the party getting the least votes is under-represented). It was first formulated in a report on British elections in 1909, then extended to elections in other countries. Both in theory and in practice, the cube rule is only applicable in a two-party system. In a multi-party democracy operating under the first-past-the-post system, the cube law invariably fails, often leading to capricious results.

Suppose we have two parties which receive A and B percent of the vote. According to the cube rule, the ratio of A seats-won to B seats-won should be proportional to A3/B3. So if A wins 60% and B wins 40%, the ratio of votes A/B = 60/40 = 1.5, but the ratio of seats is 603:403 = 3.375:1. That works out to a ratio of seats of 77:23. In a close election where the popular vote is A=52 and B=48, the seats break 56:44. In other words, the winner gets many extra seats. If there are three parties the ratio of seats will also be proportional to the cube of their votes. Mathematically the cube law works because it is an approximation to the law of large numbers.

The approximation can work well; it matched the 2002 U.S. House elections to within one seat.

In New Zealand, the rule predicted the distribution of seats between the two largest parties for most elections prior to election reform. From the 1940s onwards until 1993, after which the rule was irrelevant because of the introduction of mixed member proportional representation, many elections were predicted either exactly or within one seat, with most fluctuations from this in elections where there was a strong third-party showing.

However, in the UK, the cube law has operated erratically. Between 1950 and 1970, elections broadly followed the cube rule, but since 1974 the relationship has broken down, almost entirely to the benefit of the British Labour Party.

Reasons for the recent failure of the cube law in the UK include differential turnout, the rise of the Liberal Democrats mostly at the expense of the Conservatives, tactical voting and inefficiencies in the Boundary Commission.

In elections for the United States House of Representatives in 1942, 1996, and 2012, the party that won a plurality of the votes actually won fewer seats in the House of Representatives.

gulaal said...

Ravish, your cynicism is really refreshing. As an example of public disappointment with media, i want to call out NDTV (english as well as hindi) for the runs and re-runs on their survey results .. do din pehle survey dikhate vaqt ek panelist ne in numbers ko kapol kalpit kaha.. the words are a bit harsh, but its the reaction that surprised me.. the anchors could have been more humble when they present these surveys.. public bewaqoof nahin hai.. humane yeh movie pehle dekhi hai. these opinion poll results need to be caveated appropriately and explicitly and extensively. ye nahin dikha, ab agar janta kuchh sochti hai to uska reason hoga.
Baaki i hope that in the near future, the country has hope for an independent content oriented news channel along the lines of caravan magazine in print, uska shaayad market banega.
By the way nice touch in the end.. jo hai so haiye hai :)

nilu jignesh said...

Ravishji mujhe aapse ek gambhir shikayat hi .Aapke pure reporting se mahilayen gayab hi. Plz jabab dijiyega.

SHIVANI SRIVASTAVA said...

SIR JI it is very difficult to put forward the faults of a system ,which one is part of.
Congrats

Faizan. said...

T.V. star pracharak ho gya hai sir,
zyadatar log khabar dekhte t.v. par hi hain,Asaan aur sasta hai na,aur sbka I.Q. level itna nhi hota k chatur nigah se sari chizon ko dekhen,To T.V. bahot asardar campaigning kr raha hai.
is bar T.V. ek bahot bada factor hai.

Jitendra sharma said...

Sir aap ek imandar news channel bana lijiye. Nahi to jo reporting kar rahe hai chalu rakhiye sabhi aapke saath hai. Hum garib jaroor hai Lekin aapko aur aapki patrakarita ko apne dil se izzat karte hai.bolne dijiye jo aapke bare mein galat bolta hai.hum aapke sath hai.

prince pritam said...

आपका चैनल आजकल सबसे ज्यादा डराता है. आपके चैनल के सर्वेस रात को सपने में आने लगे हैं. pls अपने चैनल को बोले की आम जनता को डराना बंद करें. आपको छोड़ के अब और किसी पे विश्वास न रहा. आशा करता हूँ आप हमेशा ऐसे हे रहेंगे. धन्यवाद

pragati sinha said...

Bahut baar toh logon ko pata hota hai ke TV par jo dikha rahe hain ya chala rahe hain wo galat hai. Koi news channel siddha siddha khabar nahi dikhata, uspe apna opinion batata hai. maine kai news anchor ko dekha hai jo netaon se sawaal nahi puchte balki unpe aarop lagate hain aur unse safai mangate hain. awaal toh ye debates hafte me bas ek din hone chahiye. TV ko hum communicator bana sakte hain,aur jab communication hona hi ai toh wo one way nahi hona chahiye jaha neta bolte rahe aur hum sunte rahen.

pragati sinha said...
This comment has been removed by the author.
Gyan said...

Loved your coverage of BSP rally in MujaffarNagar and coverage from Etawa in the Road Show. Continue doing such good programs.
Many in the audience understand the game that TV is playing. Good that at least some one from inside is accepting that.

Shreerup Rudra said...

Brilliant..

Aanchal said...

बात फैन बनने की नहीं, पर एक बात ज़रूर कहनी है- कल के एपिसोड में आपने जितनी मासूमियत और आसानी से फूलपुर गाँव के दलित और ब्राहमण के बीच का भेद दिखा/समझा दिया.. वो इस चुनावी मौसम में किसी और प्रोग्राम में शायद ही दिखे ।

Nitin Shrivastava said...

Aap ke sahkarmi Barkha Dutt/Pankaj Pachori, Vinod Dua jab aap se milte honge toh kya charcha hoti hogi??Kabhi Bikane wale topic par hoti hai kya?Aap bhee swayam ko imandaar declare kar rahe hain like self declared imandaar Kajri babu?
Kabhi jaati ke dukan k alava samaj ko jodne kaa bhee kam kar lo Ravish Babu

Nishant Yadav said...

जो ज्यादा दिखता वो ज्यादा बिकता है के इस दौर में गुणवत्ता की गारंटी कैसी | मीडिया हाउस की तो मजवूरी है बिकेंगे नहीं तो १ करोड़ का पैकेज और बी. एम. डब्लू . कैसे दे पाएंगे अपने कर्मचारी को ! बड़ी तल्ख़ बात है पर सच्ची है अब मार्केटिंग का दौर है साहव ! देखिये न जहा देखो वहां कोई " मन से मुलायम है" तो "कही संस्कार है" तो "कही अच्छे दिन आने बाले है" सब ज्यादा से ज्यादा दिखने की होड़ में लगे है तो फिर कोई और क्यों चुप रहे ! बड़ी हसी आती है और सवाल भी उठता है पढ़ कर की बार फलां अख़बार सबसे अधिक पाठक होने का ख़िताब जीता तो किसी चैनल ने सबसे अधिक देखे जाने का ख़िताब जीता ! आप है जो कभी मन लेते हो की हा कही मीडिया भी गलत हो सकता है बरना अगर किसी और पत्रकार से कह दो तो ऐसा लगता है कोई गुनाह कर दिया ! में भी बिकना चाहता हूँ पर में सबसे अधिक दिखता नहीं हूँ इस लिए बिकता नहीं हूँ !

gg said...

रवीश भाई बढ़िया आदमी हैं. रवीश भाई साठा चौरासी जाते है और पूरी कोशिश से ये दिखाते हैं कि राजपूत वोट सिर्फ राजपूत कैंडिडेट को ही मिलने वाला है, वहीँ मैनपुरी जाकर वो यादव वोटो को यादवों को ही मिलने के बारे में परसेप्शन बनाते हैं. बीच में सवर्ण बनाम पिछडो कि बहस को भी हवा देते हैं तो कहीं देवबंद वाले इलाके में मुसलमानों और जाटों के बीच में लकीर खींचते नज़र आते हैं. चंडीगढ़ गए थे तो ये बताने से पीछे नहीं रहे कि कैसे मॉडल सिटी की परिकल्पना कोरी हवाबाजी है और इस तरह बाहरी मजदूरों को इस सिटी ब्यूटीफुल के हार्ट में सीधे जगह नहीं मिल पाती. इंडिया अगेंस्ट करप्शन के दिनों मैं उनसे मिला था. बढ़िया इंसान हैं और बड़ी सरलता से उन्होंने कहा था कि जो मैं टीवी पर बोलता हूँ जरूरी नहीं वो मेरे मूल विचार हों और कई बार जो हम सोचते हैं और जो बोलते हैं उसमे बड़ा अंतर आ जाता है. यंग जेनरेशन को चाहिए वो ख़बरों के पीछे की खबर समझे.
फुर्सत में आम आदमी पार्टी के फाउंडर अश्विनी उपाध्याय के खुलासा वाले वीडियो देखिये.. अन्ना आन्दोलन में रामलीला ग्राउंड के पीछे एक वीआईपी टेंट में आशुतोष/पुण्य प्रसून वाजपयी/रविश वगैरह मीडिया वाले innovative आईडिया देते थे,जैसे--सबको अन्ना टोपी पहनाओ/केजरीवाल जी मफ़लर लपेटिये/सैंडल पहनिए... इससे आम आदमी की छवि बनेगी और क्रांतिकारी माहौल भी बनेगा.. फिर यही लोग टीवी पर केजरीवाल के पक्ष में हवा भी बांधते थे.. मतलब पूरी की पूरी नौटंकी पहले से ही सेट थी.. यहाँ तक कि अन्ना आन्दोलन के शुरुवात में ही तय हो गया था कि चुनावी पार्टी बनेगी.. लेकिन क्या है कि लालच/स्वार्थ बे-लगाम होते हैं.. पहले बिन्नी,फिर अश्विनी उपाध्याय जैसे ढेरों लोगों ने पोल-पट्टी खोलनी शुरू कर दी.. कुमार विश्वास भी जल्दी ही फुदक-फुदक के उड़ेगा..
वैसे ndtv के ही पंकज पचौरी प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हैं..तो नमक-हलाली तो हर 'कीमत' पर करेंगे ही .
तार्किक/खोजबीन करने की प्रवृति बिलकुल होनी चाहिए.. जितनी जल्दी लोग मीडियाकर्मियों से काउंटर-क्वेश्चन करेंगे,लड़ाई और सरल होती जाएगी.. एक उत्सुकता और साझा करता हूँ.. मैंने कईयों से पुछा कि, उप्र और बिहार जीते बगैर दिल्ली में सरकार बनाना असंभव है.तो सुषमा स्वराज जैसी अग्रिम पंक्ति की नेता ने उप्र की सीट क्यों नहीं चुनी? ऐसे cozy होकर कांग्रेस को कैसे उखाड़ा जाएगा? और मीडियावालों ने कभी भाजपा के चुनावी-नीतियों पर सार्थक-सार-गर्भित प्रश्न नहीं पूछें हैं.जो भी पूछें हैं वो सब के सब नरेन्द्रमोदी के विरोध में ही हवा ख़राब करने में .. नंदन नीलकेनी दस साल तक कैबिनेट-मिनिस्टर की सुविधा लेते रहे,लेकिन किसी मीडियावालों ने उनसे कांग्रेस के भ्रष्टाचार पर कोई प्रश्न नहीं पूछे.जो भी बाइट्स बनाये हैं वो नंदन नीलकेनी के 'पक्ष' में ही?
बाकी जो है वो हैय्ये ही है.

Vineet Srivastava said...

bachpan mein DD National ki subah aur raat vali news ke sahare hi duniya ka gyan le liya karte the, par aajkal itne saare news channel hone ke baad bhi gyan nahi milta.
is desh mein ek din ke andar anekon hi khabare paida hoti hai jinko saare news channel mil ke bhi ek din mein dikha nahi sakte, par phir bhi vo anjan khabare anjan hi reh jati aur dekhne ko milta hai toh vahi ghisi piti Rahulji aur Modiji ki bata kahi.

Sach hi kehte hai Marketing Circle mein ki jo bikta hai vo hi dikhta hai!!

Bas aapke jaise kuch patrakar ke prayason se abhi bhi feel good ho jata hai.

gg said...

रवीश भाई बढ़िया आदमी हैं. रवीश भाई साठा चौरासी जाते है और पूरी कोशिश से ये दिखाते हैं कि राजपूत वोट सिर्फ राजपूत कैंडिडेट को ही मिलने वाला है, वहीँ मैनपुरी जाकर वो यादव वोटो को यादवों को ही मिलने के बारे में परसेप्शन बनाते हैं. बीच में सवर्ण बनाम पिछडो कि बहस को भी हवा देते हैं तो कहीं देवबंद वाले इलाके में मुसलमानों और जाटों के बीच में लकीर खींचते नज़र आते हैं. चंडीगढ़ गए थे तो ये बताने से पीछे नहीं रहे कि कैसे मॉडल सिटी की परिकल्पना कोरी हवाबाजी है और इस तरह बाहरी मजदूरों को इस सिटी ब्यूटीफुल के हार्ट में सीधे जगह नहीं मिल पाती. इंडिया अगेंस्ट करप्शन के दिनों मैं उनसे मिला था. बढ़िया इंसान हैं और बड़ी सरलता से उन्होंने कहा था कि जो मैं टीवी पर बोलता हूँ जरूरी नहीं वो मेरे मूल विचार हों और कई बार जो हम सोचते हैं और जो बोलते हैं उसमे बड़ा अंतर आ जाता है. यंग जेनरेशन को चाहिए वो ख़बरों के पीछे की खबर समझे.
फुर्सत में आम आदमी पार्टी के फाउंडर अश्विनी उपाध्याय के खुलासा वाले वीडियो देखिये.. अन्ना आन्दोलन में रामलीला ग्राउंड के पीछे एक वीआईपी टेंट में आशुतोष/पुण्य प्रसून वाजपयी/रविश वगैरह मीडिया वाले innovative आईडिया देते थे,जैसे--सबको अन्ना टोपी पहनाओ/केजरीवाल जी मफ़लर लपेटिये/सैंडल पहनिए... इससे आम आदमी की छवि बनेगी और क्रांतिकारी माहौल भी बनेगा.. फिर यही लोग टीवी पर केजरीवाल के पक्ष में हवा भी बांधते थे.. मतलब पूरी की पूरी नौटंकी पहले से ही सेट थी.. यहाँ तक कि अन्ना आन्दोलन के शुरुवात में ही तय हो गया था कि चुनावी पार्टी बनेगी.. लेकिन क्या है कि लालच/स्वार्थ बे-लगाम होते हैं.. पहले बिन्नी,फिर अश्विनी उपाध्याय जैसे ढेरों लोगों ने पोल-पट्टी खोलनी शुरू कर दी.. कुमार विश्वास भी जल्दी ही फुदक-फुदक के उड़ेगा..
वैसे ndtv के ही पंकज पचौरी प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हैं..तो नमक-हलाली तो हर 'कीमत' पर करेंगे ही .
तार्किक/खोजबीन करने की प्रवृति बिलकुल होनी चाहिए.. जितनी जल्दी लोग मीडियाकर्मियों से काउंटर-क्वेश्चन करेंगे,लड़ाई और सरल होती जाएगी.. एक उत्सुकता और साझा करता हूँ.. मैंने कईयों से पुछा कि, उप्र और बिहार जीते बगैर दिल्ली में सरकार बनाना असंभव है.तो सुषमा स्वराज जैसी अग्रिम पंक्ति की नेता ने उप्र की सीट क्यों नहीं चुनी? ऐसे cozy होकर कांग्रेस को कैसे उखाड़ा जाएगा? और मीडियावालों ने कभी भाजपा के चुनावी-नीतियों पर सार्थक-सार-गर्भित प्रश्न नहीं पूछें हैं.जो भी पूछें हैं वो सब के सब नरेन्द्रमोदी के विरोध में ही हवा ख़राब करने में .. नंदन नीलकेनी दस साल तक कैबिनेट-मिनिस्टर की सुविधा लेते रहे,लेकिन किसी मीडियावालों ने उनसे कांग्रेस के भ्रष्टाचार पर कोई प्रश्न नहीं पूछे.जो भी बाइट्स बनाये हैं वो नंदन नीलकेनी के 'पक्ष' में ही?
बाकी जो है वो हैय्ये ही है.

gg said...

रवीश भाई बढ़िया आदमी हैं. रवीश भाई साठा चौरासी जाते है और पूरी कोशिश से ये दिखाते हैं कि राजपूत वोट सिर्फ राजपूत कैंडिडेट को ही मिलने वाला है, वहीँ मैनपुरी जाकर वो यादव वोटो को यादवों को ही मिलने के बारे में परसेप्शन बनाते हैं. बीच में सवर्ण बनाम पिछडो कि बहस को भी हवा देते हैं तो कहीं देवबंद वाले इलाके में मुसलमानों और जाटों के बीच में लकीर खींचते नज़र आते हैं. चंडीगढ़ गए थे तो ये बताने से पीछे नहीं रहे कि कैसे मॉडल सिटी की परिकल्पना कोरी हवाबाजी है और इस तरह बाहरी मजदूरों को इस सिटी ब्यूटीफुल के हार्ट में सीधे जगह नहीं मिल पाती. इंडिया अगेंस्ट करप्शन के दिनों मैं उनसे मिला था. बढ़िया इंसान हैं और बड़ी सरलता से उन्होंने कहा था कि जो मैं टीवी पर बोलता हूँ जरूरी नहीं वो मेरे मूल विचार हों और कई बार जो हम सोचते हैं और जो बोलते हैं उसमे बड़ा अंतर आ जाता है. यंग जेनरेशन को चाहिए वो ख़बरों के पीछे की खबर समझे.
फुर्सत में आम आदमी पार्टी के फाउंडर अश्विनी उपाध्याय के खुलासा वाले वीडियो देखिये.. अन्ना आन्दोलन में रामलीला ग्राउंड के पीछे एक वीआईपी टेंट में आशुतोष/पुण्य प्रसून वाजपयी/रविश वगैरह मीडिया वाले innovative आईडिया देते थे,जैसे--सबको अन्ना टोपी पहनाओ/केजरीवाल जी मफ़लर लपेटिये/सैंडल पहनिए... इससे आम आदमी की छवि बनेगी और क्रांतिकारी माहौल भी बनेगा.. फिर यही लोग टीवी पर केजरीवाल के पक्ष में हवा भी बांधते थे.. मतलब पूरी की पूरी नौटंकी पहले से ही सेट थी.. यहाँ तक कि अन्ना आन्दोलन के शुरुवात में ही तय हो गया था कि चुनावी पार्टी बनेगी.. लेकिन क्या है कि लालच/स्वार्थ बे-लगाम होते हैं.. पहले बिन्नी,फिर अश्विनी उपाध्याय जैसे ढेरों लोगों ने पोल-पट्टी खोलनी शुरू कर दी.. कुमार विश्वास भी जल्दी ही फुदक-फुदक के उड़ेगा..
वैसे ndtv के ही पंकज पचौरी प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हैं..तो नमक-हलाली तो हर 'कीमत' पर करेंगे ही .
तार्किक/खोजबीन करने की प्रवृति बिलकुल होनी चाहिए.. जितनी जल्दी लोग मीडियाकर्मियों से काउंटर-क्वेश्चन करेंगे,लड़ाई और सरल होती जाएगी.. एक उत्सुकता और साझा करता हूँ.. मैंने कईयों से पुछा कि, उप्र और बिहार जीते बगैर दिल्ली में सरकार बनाना असंभव है.तो सुषमा स्वराज जैसी अग्रिम पंक्ति की नेता ने उप्र की सीट क्यों नहीं चुनी? ऐसे cozy होकर कांग्रेस को कैसे उखाड़ा जाएगा? और मीडियावालों ने कभी भाजपा के चुनावी-नीतियों पर सार्थक-सार-गर्भित प्रश्न नहीं पूछें हैं.जो भी पूछें हैं वो सब के सब नरेन्द्रमोदी के विरोध में ही हवा ख़राब करने में .. नंदन नीलकेनी दस साल तक कैबिनेट-मिनिस्टर की सुविधा लेते रहे,लेकिन किसी मीडियावालों ने उनसे कांग्रेस के भ्रष्टाचार पर कोई प्रश्न नहीं पूछे.जो भी बाइट्स बनाये हैं वो नंदन नीलकेनी के 'पक्ष' में ही?
बाकी जो है वो हैय्ये ही है.

common man said...

RAVISH JI NAMASKAAR...YUN MAIDAAN CHHORHNA THEEK NAHI LAGA....SHAYAD AAP STUDIO CHHORH KE SABATICAL PE CHALEY GAYEY HO.YA PARYATAN KAR KE MOOD THEK KAR RAHEY HO....MODI KA BARHTA PRABHAAV SEHEN NAHI HOTA YA....STUDIO ME SAAMNA NAHI KAR SAKTEY...APNEY EK KUNTHA GRASIT MODI VIRODH ME EK UMRA BITA DI..APKE NITISH JI TO KUCCHH NAHI KAR PAYE..APKO BAHUT HOPE THEE UNSEY..BHAAGO MAT..STUDIO ME VAAPIS A JAO..AUR MODI KO PM BANTA DEKHNE KI HIMMAT JUTEAO.... SAME ADVICE TO ABHIGYAAAN PRAKASH....UR CHANNEL BROTHER..NAMASKAAR

vinay kumar said...

रविश जी, आपने बहुत सारे आयाम को छू लिया है. हम जैसे नाकारा लोग तो बोलते रहे हैं लेकिन आप जैसे लोग जब लिखते या बोलते हैं तो विश्वशनीयता काफी बढ़ जाती है.तहे दिल से आपको बधाई. मास मीडिया द्वारा इस सहमती उत्पादन का पोलिटिकल इकॉनमी लोगों को धीरे -धीरे समझ में आने लगा है.

vinay kumar said...

रविश जी, आपने बहुत सारे आयाम को छू लिया है. हम जैसे नाकारा लोग तो बोलते रहे हैं लेकिन आप जैसे लोग जब लिखते या बोलते हैं तो विश्वशनीयता काफी बढ़ जाती है.तहे दिल से आपको बधाई. मास मीडिया द्वारा इस सहमती उत्पादन का पोलिटिकल इकॉनमी लोगों को धीरे -धीरे समझ में आने लगा है.

Persephony said...

रविश जी, ये ज़रूर पढ़ें: http://www.newsyaps.com/lessons-from-ravish-kumars-election-roadshow/105397/

satya prakash said...

मैं जानता हूं कि एनडीटीवी में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. मैं समझ सकता हूं कि सर्वेक्षण पेश करते समय एंकरिंग न करके आपने अपना खामोश प्रतिवाद दर्ज कराया है. ऐसी स्थितियों में एक पत्रकार की असहाय स्थिति की पीड़ा मैं समझ सकता हैं. आप मुङो इकलौते एंकर लगते हैं जो सचमुच हिंदी पट्टी का लगता है.

Nitin Shrivastava said...

Ravish Ji ka jor chale toh poore bharat main jaativaad ka prasar kar apni patrakarita ke dukan chamkatain rahain.Puraskar toh aap ko bhee bahut mile hain uska kya raaj hai?Pata nahi kya hoga 17 may ko left aligned so called pragatisheel/ liberal/bikau/ lashkar E Sikular and jaish E Media chaap reporters ka.

Unknown said...

sawaal eek ye bhi toh hai ki media ki jawabdehi kaise tai ki jaye .... kaun hai jo ye kahe ki falan iska raag alap rahe hai aur falan iska, ab billi ke gale mein ghanti bandhe kaun.... agar aap media pe tanz kaste hain to palatwar aap par hi ho jata hai, aise mein kaun kaye media se puchne.

aur phir sawal ye bhi toh hai ki media ko jawabdeh banane ke liye kahi ye tantra kisi mantri ke paas girwi na ho jaye ....

ji haan ye loktantra hai aur kehne bolne ka adhikar sabko hai ... magar jo jyada cheekhega wahi suni bhi dega

ho sakta hai is chunao ke baad kuch badal jaye aur agar nahi badla toh….. baaki jo hai so haiye hai.

Pramod said...

जाति,दलित अस्मिता,किसान,मजदूर,मुस्लिम , प्रतिबद्ध कार्यकर्ता, ब्राह्मण-दलित , ठाकुर , कामरेड .... तमाम मुद्दों पर आपकी पत्रकारिता समय में एक हस्तक्षेप है। सार्थक या निरर्थक ---यह छोड़ दीजिये ! आप अपना कार्य कर रहे
हैं,आपका चैनल करने का निर्बाध मौका दे रहा है यह शुभसूचक है। नहीं तो मुर्खता का विकल्प बन गया है टीभी। अखबार फिर भी ठीक-ठाक है।
समाज बदल रहा है , देश बदल रहा है , आदमी बदल रहा है यानी सब कुछ बदल रहा है तो ई जो टीभी है , अखबार है वह भी तो इसी ग्रह kaa है ना !
मनुष्यता की विश्वसनीयता गिर रही है तो टीभी -टाभा क्या चीज है ? मालिकों की नौकरी करनी है, जो चैनल और अखबार की पॉलिसी है उसके मुताबिक ढलना है। बाकी ईमानदारी,सरोकार , एकदेशीयता, मनुष्यता के लिए कोई चाहे तो स्पेस निकाल सकता है।
नहीं तो चैनलों पर प्रियंका बनाम वरुण पर परिचर्चा ,मोदी बनाम सब की नॉन सेन्स बहस सुनने या फिर टीभी बंद करने के अलावे क्या विकल्प बचता है ?
मीडिया के एजेंडे में क्या है ? भूख, गरीबी , महंगाई , बीमारी , अशिक्षा , असुरक्षा.... ? नहीं , मीडिया के एजेंडे में हैं मोदी , राहुल , केजरीवाल … प्रियंका , वरुण आदि ।
पिछले दो महीने के पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों का विश्लेषण कर लीजिये ! आपको लगेगा कि इनके परस्पर आरोप-प्रत्यारोप, भाषणबाजी ही सबसे बड़ा मुद्दा है। हाँ , कुछ अपवाद की तरह सामाजिक सरोकार के मुद्दे भी मीडिया में जब -तब उठ जाते हैं ! शिक्षा को ही ले लीजिये। सरकारी विद्यालयों की क्या स्थिति है ? दोपहर के भोजन के सहारे , मुफ्त किताब-कॉपी के सहारे शिक्षा को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है ! दोपहर के विषाक्त भोजन के कारण जब -तब जो मर्मान्तक घटनाएं घटती हैं। असमय बच्चे काल -कवलित हो जाते हैं ! हमारे राजनीतिक मौत पर भी राजनीति खेलने लगते हैं ! क्यों नहीं सरकारी विद्यालयों की दशा -दिशा सुधारी जाती है ? किसी भी राजनीतिक दल के एजेंडे में , घोषणा पत्र में क्रांतिकारी सुधार की घोषणा है ? दिल्ली -नोएडा जैसे चमकीले जगह पर 20 -30 हजार कमाकर भी आप अपने बच्चे को , वह भी एलकेजी -यूकेजी में अच्छे स्कूल में दाखिल नहीं करा सकते ! डोनेशन, फी आसमानी है। सरकारी स्कूल में इन नेताओं के बच्चे पढ़ते हैं क्या ? कितनी ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव है इस पर ?
अगर आपके पास पैसा नहीं है तो आपका बच्चा अच्छी शिक्षा नहीं पा सकता ! ऐसा जान -बूझकर किया गया है ! कान्वेंट स्कूल , शिक्षा के बाजारीकरण को फ़ैलाने , बढ़ावा देने में सरकारों का , नीतियों का बहुत बड़ा योगदान है।
यदि आपके पास paisa नहीं है तो पर्याप्त इलाज नहीं मिल सकता। सरकारी अस्पताल बदहाली के शिकार हैं। भ्रष्टाचार के रोग के कारण दवाईयां बेच दी जाती हैं। मीडिया को मोदी , राहुल , केजरीवाल …को लाइव दिखाने के बजाय मूलभूत समस्याओं को लगातार दिखाना चाहिए। मीडिया का काम है ये जो घूम -घूम कर भोट मांग रहे हैं नेता गण , राजनीतिक दल उन्हें उन अंधेरे को दिखाए। बिजली , पानी , सड़क से अछूते इलाकों को दिखाएं। विकास वह नहीं जो मॉल , बाजार और अट्टालिकाओं में दिखता है। अभी रोटी , कपड़ा , मकान बड़ी आबादी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। सुन रहे हैं मीडिया जी … प्लीज़ .. प्लीज़।

Indra said...

Ravish ji ne ek article likha tha jisme kahin ye line bhi thi ki "Agar ek din bhi apne mann jaisa kaam karne ko mil jata hai to dil khush ho jata hai aur apne aap pe garv mehsoos hota hai"... aisi halat ke baad bhi ravish ji different reporting karte hain aur kam se kam hawa banaane wali news nahi karte hain...

GG saab ko mein ye kehna chahunga ki agar day -1 se ye decided hota ki party banaani hai to Anna and co. kabhi ye bayaan na dete ki humen politics mein nahi aana hai... uske baad jab andolan peak pe tha .. tab rajneeti mein aana chahiye tha.. us samay kyun rajneeti jab sab log andolan ko peechhe chhod diye aur kejriwal almost akela rah gaya.. Bhai janta itni ullu nahi hai ... Uske baad jo aap bol rahe ho ki Ravish, Ashutosh, aur Bajpeyi ji Kejriwal ke salahkar hain.. to ek baat bata deta hoon ..kejriwal ke purane photo bhi dekh lo..woh shuru se isi tarah rehta hai ..woh aadmi footpath pe bhi so sakta hai aur zameen pe baith ke kisi ke bhi saath khana kha sakta hai.... Sach ye hai..sach who nahi jo aap kah rahe ho..

GG saab, ek sach ye bhi hai ki agar Kejriwal and Co itne kahrab hain to Vindo binny and Ashwani upadhyay itne din tak kejriwal ke saath kya kar rahe the? Agar tum dekho to dono ne party tab chhodi jab unko laga ki unki importance kam ho gayi hai.... Binny ko cabinet me shamil nahi kiya tab first objection tha aur jab lok sabha ka ticket nahi diya tab dura aur aakhiri.... Ashwini bhai ko bhi lok sabha ka ticket na deke ashutosh ji ko de diya to unki sulag gayi aur jo man kiya aarop laga diye... Agar kejriwal mein itni kamiyan thi to simple si baat hai na ki ashwini ko itne din AAP mein nahi rehna chhaiye tha na...

Aur haan saralta kisi pe thopi nahi ja sakti..aadmi acting ek hadd tak hi kar sakta hai uske aage nahi..kejriwal apni actin mein consistent hain ..so uski acting hi uski asliyat hai..uspe sawal uthana sahi nahi hai..agar usne sandal ravish ki wajah se pahni hoti to unhe kabhi na kabhi utar ke fenk deta aur woodland ke joote pahan leta ..lekin kya kare..bechara neeche se uper tak ek jaisa ho dikhta hai..simplicity usko pasand hai ..isiliye aise hi rehta hai..

Anyway.. iljam to BJP wale bhi laga rahe hain ..par kya fark padta hai ..sach sab jante hain..BJP ka bhi aur AAP ka bhi.

Indra said...

NDTV ki bhavishyawadi ke baad ek blog NDTV pe likha gaya jo inke opinion poll ko analyse kar raha hai - log sahi disha aur sahi jankari ke liye use pad sakte hain aur usse maloom lag jayega ki BJP kitni pani mein hai..

aur ek kadwa sach.. aaj tak ke jitne opinion polls huye hain BJP ki seats hamesha jyada batai jati hai..yakeen nahi hai to google karke check kar lijiye... lekin BJP hamesha kam seats lati hai.. BSP aur SP ko har bar finish kar diya jata hai lekin woh dono apna astitva banaye huye hain ..

Is baar AAP ko 3% votes de rahe hain... pichhle bar delhi ke liye 6 seats di thi.. who bhi exit polls mein..tab 28 aayi.. iska matlab kam se kam 12% votes AAP ko milenge .. aur seats bhi theek thak aa hi jayegi... NCR mein to BJP ko dhool chata hi degi..lets wait for 16th May 2014.

Gopal Girdhani said...

अब मैं क्या कहूँ ?

SHIVANI SRIVASTAVA said...

SIR JI kahene ko to Allahabadi ho par Allahabad ka ye rang kabhi nahi dekha tha ,jo aapne dekha diya.
Shayad ye meri saza hai ,Allahabad se dur rehne ki.
THANK YOU

SHIVANI SRIVASTAVA said...

SIR JI show ke end tak wait nahi kar pa rahi thi.

bliss of solitude said...

shukriya!shukriya!!shukriya!!!
Munnavar Rana ko 'rooh-b-rooh'karne ke liye.
chunav ke is daur me aise param anand ki umeed na thi.
Kash!Muhabbat hi rajneeti ka vaikalp ho jaye!

bliss of solitude said...

Jane kis tapish se aaram aa gaya!
Apki umar lokgeet jitni lambi ho!
Aur apki zndagi me sabh achhe rang shamil hon!

bliss of solitude said...
This comment has been removed by the author.
Mayank Gautam said...
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Mayank Gautam said...

Just a advice that you should tell your viewers how you select village/city for your program.

Ashrafi Shahbaz said...

Ravish Sir,

Aap ka ye blog TV dikhata nahi darata hai... Isme me ek baat to samne aayi hai k wo din qareeb hain k Log sirf netaon K against ya yun kahlen ki Goverment polices k againest sirf andolan nahi karengen balke Media wo chahe electronic ho ya print media k against bi Andolan hoga is desh me... Media apne social responsibility ko chod kr corporatesation ka bada mayajaal ban chuka hai jahan har din ek sales ka banda khabren ki zimawari puri karta hai aur apna target pura kr incentive mangta hai... ye bahut hi ghatak hai es desh k democracy k liy.. meida is fouth pillar of this country aur abhi ye desh ki economy sudharne ki zimmedari uthhana chahta hai khabren bech kr.

Ashrafi Shahbaz said...

Ravish Sir,

Aap ka ye blog TV dikhata nahi darata hai... Isme me ek baat to samne aayi hai k wo din qareeb hain k Log sirf netaon K against ya yun kahlen ki Goverment polices k againest sirf andolan nahi karengen balke Media wo chahe electronic ho ya print media k against bi Andolan hoga is desh me... Media apne social responsibility ko chod kr corporatesation ka bada mayajaal ban chuka hai jahan har din ek sales ka banda khabren ki zimawari puri karta hai aur apna target pura kr incentive mangta hai... ye bahut hi ghatak hai es desh k democracy k liy.. meida is fouth pillar of this country aur abhi ye desh ki economy sudharne ki zimmedari uthhana chahta hai khabren bech kr.

Nirala said...

रविश भाई , प्राइम टाइम की सभी कड़ियाँ लाजवाब थी। अब आप इतने लाजवाब होते जा रहे है की डर लगने लगा है। आपके इन कड़िओ को देख कर जातिवाद को एक नया नजरिया मिला। ऐसा भी लगा जातिवाद की जड़ ब्राह्मण मानसिकता से हो कर गुजर रही है, या यु कह ले इनकी जड़ में ये लोग है। यकीन नहीं करेंगे मेरे एक मित्र (ब्राह्मण) के तर्क भी यही है जैसा अपने ब्राह्मणो वाले एपिसोड में दिखाया। राष्ट्रभक्ति, हिंदुत्वा , राष्ट्रनिर्माण , इत्यादि , बस ये भूल गए पिछले ६० साल जब कांग्रेस के साथ मलाई खा रहे थे, तब ये राष्ट्रभक्ति कहा गयी थी। बड़ा आसान दिखा , जब एक दलित अपनी अस्मिता की लड़ाई के लिए जब बसपा को चुनता है तो कैसे उसे हसी का पात्र बना दिया जाता है, जबकि खुद ओे इसी की खेती करते रहे है।
आपके प्रोग्राम को देख कर ऐसा लगा दलित तो आर्थिक दुर्बलता के कारण दलित हो गया , पर ब्राह्मण तो सदीओ से मानसिक दलित है और विडम्बना देखिये आज भी श्रेषठता का दम भरने से नहीं चूक रहे। बेकार में लालू, मायावती को को दोष देते है, सच माना जाये तो इन्हे सामाजिक न्याय का देवदूत कहा जाना चाहिए।

Rajat Jaggi said...

खबरी चैनल्स के इलावा भी टीवी पर एक दुनिया पायी जाती है जिसमे Discovery, Gyan Darshan, BBC World, Al Jazeera, History 18 etc आते है |

मुझे लगता है की इन् चैनल्स से आप इतना कुछ सीख सकते है को कोई और चैनल, रेडियो, सोशल मीडिया, पूरी ज़िन्दगी में नहीं सीखा सकता नहीं सीखा सकता :)

Shweta Deshpande said...

वैसे आज का Prime Time कुछ और खास था जब आपने कहा 'जरा धीरज से सुनियेगा..' हमीदिया गर्ल्स डिग्री कॉलेज की लड़कियों से बातचीत में| और कुछ कहना बाकी नही.. आपने काफी आलोचना की है media की जिससे हम सहमत है|

Shweta Deshpande said...

आज गाडी का टायर पंक्चर निकालाने के बहाने शाम को पंक्चर निकालाने वाले लडकेसे बात हो रही थी|
कुछ १७ - १८ साल का होगा.. लेकीन जब पुछा तो उसने बताया "दिदी मै १४ साल का हू|" मुसलमान था लेकीन नाम राज बता रहा था| शायद हमारे राज साब को खुश रखना चाहता हो! कहता है 'दिदी आप तो कमल वाली होगी लेकीन एक बात है.. मै MP से हू.. अम्मी घर वापिस नही आने देती क्यूं की चुनाव का वक़्त है|.. मिलने के लिये भी नही... डरती है के कुछ हो जायेगा...." "TV news देखता हू और गाली देकर वापिस आ जाता हू| "

१४ साल की उम्र के हिसाब से और बहोत कुछ कह गया| ज्यादा कहेंगे नही यहा.. कोई सुन लेगा तो बेचारेकी रोटी न बंद हो जाये|

Awanish Singh said...

apni feeling ko aap sabdo main aisa pirote hain ki cheege feel hone lagti hain.Par sir aap gis taraf aage badh rahen hain udhar zindgi me samanya taur par ya zindgi ke kuch khas modo par pareshaniya aayenge.jo aap ko rokna chahte hain wo sayad utni badi badha na paida kar paye zitna ki suddh dil se aap ke hito ko chahne wale log

Awanish Singh said...

apni feeling ko aap sabdo main aisa pirote hain ki cheege feel hone lagti hain.Par sir aap gis taraf aage badh rahen hain udhar zindgi me samanya taur par ya zindgi ke kuch khas modo par pareshaniya aayenge.jo aap ko rokna chahte hain wo sayad utni badi badha na paida kar paye zitna ki suddh dil se aap ke hito ko chahne wale log

santosh verma said...

Ravish kumarji has not suppressed his journo insticts for pleasing the BigBoss....gud sign

santosh verma said...

Ravish kumarji has not suppressed his journo insticts for pleasing the BigBoss....gud sign

santosh verma said...

Ravish kumarji has not suppressed his journo insticts for pleasing the BigBoss....gud sign

Abhishek Raj Singh said...

Ravish ji, aapki baaton me aksar ek jamini sachhai hoti hai, jiski tafteesh karna tv patrakaro ke dayre se bahar hota hai q ki aap tv pe aaye ho. Humne tv news ko falte fulte dekha hai, unki natik mahatvakanchon ko trp ke liye girte bhi dekha hai. Par ek sawaal jo khaye jata hai ki hume jo dikhaya jata hai hum wo dekhte hain ya fir hum jo dekhte hai wahi dikhaya jata hai, dono hi surato me or aapke tamam jamini vishleshno ke baat yahi samajh me aati hai ki, abhi tv news me sambhavnaye bahot hai, yuhi nahi ek tabka naraj hota hai ki aap wo nahi dete jo unhe chahiye. Ya fir ek tabka is baat se khush hota hai ki hum desh bana rahe hai. Aaj kal ki economical bhasa me kahe to supply kam hai or demand jyada. Aapka bajar to har kimat pe garam hai or bhawisya ujjawal. Hehehe..

Vineet said...

सीधी बात नो बकवास रवीश जी आप भी कमाल करते हो

amit kumar said...

thank you sir, hakikat ko samaj ke samne lane ke liye aur vaise aap aajkal prime time me jo dikha rahe hai achcha aur ye prayas sarahniya hai.......thank you and best of luck