राष्ट्र के नाम मौत





















१२ अगस्त १८८४ का कोई वक्त रहा होगा। रॉयल इंजीनियर्स के जेनरल मेडले का इंग्लैंड जाते वक्त निधन हो गया। इस स्मारिका के अनुसार बीच समुद्र में उनका निधन हो गया। दूसरी स्मारिका में फिलिप टॉलबट का नाम लिखा है। ऑस्ट्रेलियन इम्पीरियल आर्मी के ग्यारहवें बटालियन से रहे होंगे। फ्रांस में युद्ध के दौरान मारे गए होंगे। ३० मई १९१६ को। तब फिलिप की उम्र ३० साल की थी। ये दोनों पट्टियां शिमला के मॉल पर बने क्राइस्ट चर्च में लगी हुई हैं।

इस तरह की हज़ारों पट्टियां हमने देश के कई हिस्सों में देखी है। मेरठ और झांसी के कब्रिस्तानों में लगी हुई हैं। अठारह सौ सत्तावन की क्रांति के डेढ़ सौ साल होने के मौके पर मैं झांसी गया था। आर्मी इलाके में मिसेज कैंटम से मुलाकात हुई। बहुत मेहनत से उन्होंने खंडहर हो चुके कब्रिस्तान को संवारा था। कब्रों के बीच से चलने लायक रास्ते बनाये थे। जिनपर उकेरी गईं अनगिनत टिप्पणियां कुछ कहना चाह रही थीं। कई नौजवान अंग्रेजो की मौत हिंदुस्तान में गर्मी और हैजा से हुई। सबकी उम्र सत्ताईस से लेकर तीस साल की थी। मेरठ में एक ब्रिटिश पिता ने अपनी आठ साल की बेटी की याद में बेहद खूबसूरत ग्रेव्स स्टोन बनाया था।

जब भी इनको देखता हूं,राष्ट्रवाद की सीमाओं को लेकर उलझ जाता हूं। अपने तब के मुल्क के लिए शहीद हुए ये नौजवान आज उस मुल्क में वीरान पड़े हैं जो अब उनका नहीं है। एक वक्त उन्होंने हिंदुस्तान की मिट्टी को अपना समझा होगा और यहां रहने वाले पराये लोगों से बचाने के लिए ब्रिटेन के किसी गांव शहर को छोड़ यहां आ गए और मारे गए। इतिहास ने इनका नाम अमर होने लायक भी नहीं समझा। ये वो सिपाही और अफसर हैं जो बरतानिया हुकूमत के एक इशारे पर मारते हुए मारे गए।

वक्त के साथ राष्ट्रवाद की दलीलें बदल जाती हैं। ये न तो शहीद हैं न गद्दार। कोई इनकी परवाह भी नहीं करता। खामोशी से सीने पर इबारतों को चस्पां किये सो रहे हैं। सफेद संगमरमर की कब्र अनंत काल तक के लिए बना दी गई है। खूब घने पेड़ और जंगल बन गए हैं। गेट पर रजिस्टर रखा होता है। आने-जाने वाला अपने पुरखों के दर्शन के बाद दर्ज करा जाता है। फलां तारीख को आपका परपोता अपने पूरे परिवार के साथ यहां आया था। ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दे।


मेरठ का कब्रिस्तान तो देखने लायक है। अपने मित्र श्याम परमार के साथ गया था। हमने वहां लगे अमरूद खाये। फिर कब्रों को देखने में मशगूल हो गए। उन पर लिखी इबारतों को पढ़ने लगे। पता चला कि आज भी इनके परनाती परपोते इन कब्रों को देखने आते हैं। सोचने लगा कि इन परपोतों और परनातियों के बीच कैसी बातें होती होंगी। कैसा रिश्ता है जो इन्हें यहां ले आता है। १८५७ की क्रांति के दौरान मारे गए ब्रिटिश अफसरों की कब्रों को देखने के लिए आज भी उनके रिश्तेदार यहां आते हैं। ब्रिटेन में इनका एक ग्रुप बना है। मिसेज कैंटम बताती भी हैं कि इस बार १८५७ फैमिली की टीम आ रही है। तुम आ जाओ इनसे मिलो।

ये कब्र आज भी ब्रिटेन के महत्व के हैं। इसी तीस अक्तूबर को बीबीसी की टीम झांसी आ रही है। अठारह सौ सत्तावन की फैमिली नेटवर्क के लोगों के कुछ चंदे से मिसेज कैंटम ने अब कब्रिस्तान को बैठने और घूमने लायक बना दिया है। इनकी इबारतों पर लिखे सेना के ब्रिगेड का नाम पढ़ना चाहिए। सेना के ये रेजिमेंट आज भी भारतीय सेना का हिस्सा हैं। लेकिन ये लोग नहीं हैं। भारतीय रेजिमेंट अपनी विरासत को ब्रिटिश रेजिमेंट से जोड़ते हैं लेकिन इन कब्रों से नहीं। क्यों जोड़े। क्या गोरखा रेजिमेंट का कमांडेंट अपने रेजिमेंट के इन पूर्वजों की कब्र पर फूल चढ़ा सकता है? नहीं। राष्ट्रवाद की सीमायें और परिभाषायें उसे उलझा देंगी। फिर मिसेज कैंटम किस श्रद्धा से उनकी देखभाल कर रही हैं। शायद इसीलिए कि कोई आए तो पता चले कि देखो राष्ट्रों के नाम पर बहे इन खूनों को पहचानों। इंसानों को व्यवस्थायें गुलाम बनाती हैं। इन व्यवस्थाओं को चलाने के लिए हमने राष्ट्र बनायें हैं। अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों और कमज़ोरियों को किसी को समर्पित करने के लिए।

12 comments:

JC said...

Hindu manyata ke anusar satya wo hi hai jo anant hai - jaise kewal naam, Ram ke naam main sabka naam...Haridwar adi ghaton mein bhi pande khata rakhte hain jahan par aap padh sakte hain kaun-2, kab-2, shraddha adi karya hetu wahan pahuncha...

सागर said...

बात अच्छी है ... पर जैसा की राष्ट्रवाद हावी है तो आपने वजेह भी बता दी है... तभी तो प्रिन्स चार्ल्स जलिया वाला बाग़ दौरा करते हैं तो अभी भी मारे गए लोगों को शहीद नहीं मानते और तब बवाल होता है...

एक बात से असहमति है

अपने लोगों से ही लगाव था ... वो यहाँ इस देश की सेवा करने नहीं आये थे.... यह बात भी उतनी ही सच है... अब अगर किसी बीमारी में मारे गए तो यह मतलब नहीं की इस वतन के लिए मारे गए...

मैं इतना ही समझा... आपने जितना ज्ञान तो नहीं... अगर गलत हो तो कृपया नादान समझना आप...

परमजीत बाली said...

अच्छी पोस्ट है।सागर जी की बात भी विचारणीय है।

कुलवंत हैप्पी said...

जब भी उठा हिंसा का तूफान
बस मिटा है मिटा है इंसान
गई है किसी न किसी की जान.. मैं आपको हमेशा संवेदनशील और गंभीर लेखन के लिए याद करता हूं। जब कभी आप कुछ फालतू की खबरें घढ़ते हैं तो आपके चेहरे पर हंसी रुके नहीं रुकती। शायद तब रवीश कुमार सोच रहा होता है कि आज क्या कर रहा हुआ क्या कोई हास्य शो पेश कर रहा हूं। तब उसके मन में क्या आ रहा होता है पता नहीं, लेकिन होठों पर शब्द और आंखों में हंसी झलकी है। आप अति गंभीर मुद्दों को बहुत संवेदनशीलता से उठाते हो..ये खासियत है रवीश कुमार की।

prabhat gopal said...

rastrawad, maut ek behad samvedanshil masla hai. waise lekhan kuch bhawuk kar jata hai. kafi dino bad ek behad achi aur dil ko chune wali post. apko iske lie badhai

शरद कोकास said...

सही तो यह है कि उनके देश की भी उन्हे सुध नही है अगर होती तो अब तक राज्नेतिक स्तर पर यह विचार किया जाता । क्या मृतकों का सम्मान करना किसी देश की विदेश नीति मे शामिल है ?

pragya said...

Ravishji,

Its true these people were as innocent as Indians who only worked at command of British Empire and were humanely weak to say anything against the empire so as to survive their daily bread and butter.Many refused to leave India and still live here,but they are only few to be counted on fingers.Its unfortunate human race has such various shades of extreme cruelty and extreme innocence.

Regards,
Pragya

Mahendra Singh said...

sagar ji ki baat to sahi hai hee woh yahan raaj karne aaye the woh bhi lambe samay ke liye iseeliye unhone pure desh ke infrastrcture development ka kaam kiya.unhone pure desh ko road aur rail se joda. Apko har railway station ke platefore MSL likha mil jayega. Aaj tak unhe verify karne ka dum hamare pass nahi hai. Hamare yahan koi bhi road banti hai to Bench mark use hi banaya jata hai. Main peshe se Highway Engineer hoon. Is karan mera yeh kahna hai agar woh na aye hote to hum bailgadee aur dhibri jala rahe hote. Unka banaya kanoon, education policy aadi hum aaj tak dho rahe hai. Police kanoon 1861 main indians par raaj karne ke liye banaya tha, aaj hum wahi kanoon apno par istemal kar rahen hai. Railway ke signalling system se hum aaj tak token system nahe khatam kar paye.Duniya kuck bhi kahe, lekin mera yeh manta hoon Unhone hamse bahut kuch liya hoga par diya bhi bahut kuch.

JC said...

Jo aaj 'Bharat' hai wo kabhi 'Jambudweep tha...America barf ke neche daba tha kabhi...adi-adi...

Sochne wali baat hai ki har jeev paida/ marta kahan par hai?

Is liye, wo kiske liye yahan - is mrityulok main - aata-jaata rahta hai? Agar aapke naak mein makkhi baith jaye to kya nak uski ho gayi?...

Fakeer said...

@सागर: हाँ, सही बात है| वो यहाँ मरे, उनकी कब्र है और उसकी देखभाल भी की जाती है| वो यहाँ मारने आये थे और मारे गए बस | मान लो अगर नादिरशाह और तैमूर की कब्र यही होती तो क्या हम उन पर भी फूल मालाएं चढाते और देख भाल करते | जिस प्रकार से राष्ट्रवाद की सीमा होती है ठीक उसी तरह से मनुष्यता की भी एक सीमा होनी चाहिए| ५७ के अँगरेज़ भी आक्रमणकारी और दमनकारी थे , यहाँ मरे जिनती इज्जत मिल रही है काफी है|

जहाँ तक विकास और सड़क रेल की बात है तो आज भी मौका है बन जाईये अमेरिका का गुलाम या फिर चीन का ही मजे रहेंगे| तिब्बत को तो देखा ही है कितना चमकाया है उन्होंने|

अगर देश में इस्लामी शासन (जिसे की भारत के इतिहास का डार्क आगे कह सकते हैं ) नहीं हुआ होता तो हम ढिबरी नहीं जला रहे होते | उनका इद्द्येश्य था बस - राज करना और अपना धर्म स्थापित करना |

ek Ajanabi said...

इंसानों को व्यवस्थायें गुलाम बनाती हैं। इन व्यवस्थाओं को चलाने के लिए हमने राष्ट्र बनायें हैं। अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों और कमज़ोरियों को किसी को समर्पित करने के लिए।

मेरे पास शब्द नहीं हैं, कितना सुंदर लिखते हैं आप रवीश जी.

ek Ajanabi said...

मेरे पास शब्द नहीं हैं....कितना सुंदर लिखते हैं आप रवीश जी.