गंदगी का धंधा है ये मेरा शहर

हर तरफ से गंदा है ये मेरा शहर,
गंदगी का धंधा है ये मेरा शहर,
बाज़ार में धूल मुफ्त के उड़ रहे हैं,
वजन से उनके समोसे भारी हो रहे हैं,
जलेबियों के पीछे कौन काटे चक्कर,
मुफ्तखोर मदहोश मक्खियों से पूछो
गंदगी का धंधा है ये मेरा शहर
थूक-थूक के सबने सींचा है सड़कों को,
पेशाब न करने की धमकियों से भरा है मेरा शहर
ऐसे गलीज़ शब्दों का गलीचा देखा न किसी शहर में,
पेशाब करने वाले को गधे का बाप कहता है ये मेरा शहर
जहां बोर्ड लगे हैं उसी के सामने मूतता है ये मेरा शहर
कौन सिखाये ग़ालिब इन्हें शहर में रहने की तमीज़
बदतमीज़ बदमिज़ाज होके ही ज़िंदा है ये मेरा शहर
गंदगी का धंधा है ये मेरा शहर
भिनभिनाते हैं साइनबोर्ड मक्खियों के झुंड से
दुकानों के नाम से भर गया है मेरा शहर
किन किन आदतों पर यहां फाइन नहीं है
फाइन दे दे के धुंआ छोड़ता है ये मेरा शहर
गंदगी का धंधा है ये मेरा शहर
( आज शाम गाज़ियाबाद के वैशाली प्रांत के सेक्टर चार के मार्किट गया। वहां धूलों के अंबार और गंदगी के विस्तार के सामने मैं नतमस्तक हो गया। चंद पंक्तियां अंगड़ाइयां लेती हुई सर से बाहर आ गईं। आप सबको समर्पित हैं। गंदगी के इस साफ विवरण से अगर मन खिन्न हो जाए तो मैं अपनी सफाई के लिए माफी चाहूंगा)

13 comments:

सागर said...

आपने तो मन हल्का कर लिया हमारा क्या रविश जी, ? पढ़ते-पढ़ते मन गन्दा हो गया... यही हाल दिल्ली से बाहर निकलते ही चंडीगढ़ रूट पर भी मिलता है... घिनौना... बीमार जैसा महसूस करने लगा अपने को... फिर भी ध्यान दिलाना बड़ी बात है सरजी ...

शशांक शुक्ला said...

सही कहा है रविश जी, मन गंदा हो गया है, जहां आप रहते है उसका नामकरण कर दिया है मैने , विशाल (वैशाली) ज़िला गंदगी आबाद(ग़ाज़ियाबाद)

शरद कोकास said...

देश के अनेक शहरों के यही हाल हैं , हमारे यहाँ तो आये दिन अखबारों मे सचित्र वर्णन छपता है । कहिये कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है।

चंदन कुमार झा said...

यथार्थ चित्रण, कैसे खत्म होगा यह सब ?

Ratan Singh Shekhawat said...

यथार्थ का चित्रण किया है आपने | देश में जहाँ देखो वही गंदगी व कचरे के ढेर दिखाई देते है | दिल्ली में कूड़े के पहाड़ खड़े हो गए है |

राहुल said...

वैशाली सेक्टर चार तो अपने शहर की सबसे साफ मार्केट है, ज़रा साहिबाबाद के शहीद नगर, पूजा कालोनी, पसौंदा या फिर लोनी आकर देखिए, अपना शहर की जगह इन्हे गंदगी का शहर कहने लगेंगे....

Mukesh hissariya said...

पहली बार आपको ब्लॉग साईट पर देखकर अच्छा लगा.भैया ,क्या आपको नही लगता है की इस गंदगी के लिए हमलोग ही जिम्मेदार हैं.हम चाहें तो अपने सहर को साफ रख सकते हैं लेकिन प्रक्टिकाल्ली ये संभव नही हैं.Thanks for nise comments.

bat pate ki said...

सही है रवीशजी, पर क्या करे गंदा है पर धंधा है...धूल से जलेबी वोले को भी फायदा है तो समोसे वाली की भी मौज..वजन जो बढ़ रहा है

seetu said...

ap to bihar ke hai...patna kya pure bihar ka bhi yahi halchal hai...bihar ki gandagi dekhkar likhne ka man kyo nai kiya....kya bihar ki gandagi se koi mah mamta jaisa kuch hai kya...

pragya said...

The moment people's mind become clean,surroundings will become clean automatically.It reflects their personality.

Uzma said...

MERA BHARAT ... GANDGI... MEIN BHAARI BAHUMAT SE ....BEHAAL HAI..

ravishndtv said...

इसकी वजह है कि हमारा समाज पुरुष प्रधान है। शहर भी पुरुष प्रधानता के साथ बने हैं। घरों की साफ सफाई में उनका कोई योगदान नहीं होता। वो बस कमाना जानते हैं। इसी के अहंकार में शहर से लेकर घर तक गंदा रखते हैं। दुकान के बाहर की गंदगी भी साफ न की जाती है।

सही है कि ये तस्वीर पूरे भारत की है। बड़ी शर्मनाक है और सनातन भी।

pragya said...

To an extent,its true.Men are lazy to the extent of being inactive even in crisis,I remember someone saying who was a man himself that he looks upon women as the only hope.Women bring order in disorder,but Unfortunately some women are also not good enough to being called women when they inflict pain on other women.Anyway,Ravishji,I just admire your sheer honesty to say things even if it involves men.

Regards,
Pragya