आओ खेती-खेती खेलें

इनदिनों कई मित्र खेती-खेती खेल रहे हैं। फेसबुक पर फार्म विले नाम का एक खेल लोकप्रिय हो गया है। किसानी का कंप्यूटरीकरण किया गया है। आप वर्चुअल वर्ल्ड में हल जोत सकते हैं। गेहूं से लेकर स्ट्राबेरी तक रोप सकते हैं। एसी चलाइये और क्लिक कीजिए। माउस आपको हल तक ले जायेगा और क्लिक से ही खेत जोता जायेगा। उसके बाद धान या गेहूं रोप दीजिए। अनाज तैयार हो कर बिकेगा। आपके अकाउंट में पैसा जमा होगा।

सब कुछ नकली है। हम किसानी जगत को अब कम जानते हैं। भारत किसानों का देश है या एक ग्राम प्रधान देश है से शुरू होने वाली किताबें अब खत्म हो गईं हैं। इससे पहले कि बच्चे यह समझ लें कि दूध मदर डेयरी देती है और केला रिलायंस फ्रेश के स्टॉल पर ही उग जाता है,खेती-खेती खेल कर आप किसानी जगत की वर्चुअल रियालिटी से अवगत हो सकते हैं। दफ्तर में सुना कि प्लीज़ मुझे फ्री गिफ्ट भेजो ताकि उससे मैं खेती-खेती खेल सकूं।

इस वर्चुअल खेती-खेती गेम में न तो प्रेमचंद की ज़रूरत है तो हरिया होरी की। टाई लगा कर हर बड़ा एक्झीक्यूटिव इ खेल खेल रहा है। कोई विदर्भ टाइप जगहे नहीं हैं इहां। कोई किसान कर्ज़ में नहीं मर रहा है। न ही केंद्र सरकार मुआवज़े का एलान करती है। खेती-खेती खेल में आराम है। धूप नहीं लगती। पसीना नहीं बहता। किसान का कोरपोरेट कल्चर विकसित हो रहा है। लाखों लोग दुनिया में फार्म विले खेल रहे हैं। दिन में स्ट्राबेरी लगाते हैं और रात में धान काट लेते हैं। हद है भाई।

किसानी गेम हो गया है दोस्तों। फार्म विले को लेकर मार मची है। सब धान बाईस पसेरी। न मौसम का तकाजा न महाजन का। ले बिना लोन के किये जा फार्मिंग। गाय-गोरू सब है फार्म में। घोड़ों बंधले है सब। अस्तबल भी है। मुझे कभी नहीं लगा कि खेती-खेती गेम हो सकता है। बड़ा अच्छा है। बाबूजी एक बार कनवे उमेठ दिये थे। खुरपी सही नहीं लगा था। बोले कि ठीक से लगाओ खुरपी। फार्म विले में इ सब झंझट नहीं है। क्लिक करने पर सब सहिये हो जाता है। गैर किसानों के बीच किसान का एक नया मानस बन रहा है। खेती-खेती खेल मुबारक।

9 comments:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

बडेखिलाडी, निराले खेल।
दीपपर्व की अशेष शुभकामनाएँ।
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पर्यावरण और ब्लॉगिंग को भी सुरक्षित बनाएं।

Mahendra Singh said...

Ravishji computer ka jamana hai.Hamare yahan ek kahawat hai unke liye jo pahli baar gaon jate hai"gaon to jana zaroor lekin chane ke ped par mat chadhna".

1977 main hamare amethi main ek chunavi sabha main Sanjai Gandhi ne kaha tha "Gud bo o ganna ugao"

ओम आर्य said...

बढ़ा दो अपनी लौ
कि पकड़ लूँ उसे मैं अपनी लौ से,

इससे पहले कि फकफका कर
बुझ जाए ये रिश्ता
आओ मिल के फ़िर से मना लें दिवाली !
दीपावली की हार्दिक शुभकामना के साथ
ओम आर्य

निखिल आनन्द गिरि said...

फेसबुक के किसान सुसाइड करें तो बताइएगा....मैं मुआवजा बाटूंगा....इसमें प्रधानमंत्री बनने की ज़रूरत थोड़े है...आज ही घोषणआ करता हूं...सबको अपने गांव की एक कट्ठा ज़मीन दे दूंगा....वहां इंटरनेट कैफे खोल लेंगे फेसबुक किसान के परिजन..गांव वाले जब ई-फार्मिंग खेलेंगे तो कंप्यूटर लहलहा उठेगा....

Mukesh hissariya said...

जय माता दी,
दिवाली के मौके पर फिर से आपने हमारी सोच से उपर की स्टोरी लिखकर हिला दिया है .लिक से हटकर हमलोगों का ध्यान आकर्षित करने वाले लोगों के ब्लॉग में जो दो नाम सबसें उपर हैं उसमे आप और पुण्य प्रसून बाजपेयी जी का कोई सानी नही हैं संयोग से दोनों ही बिहार के हैं .

शशांक शुक्ला said...

क्या करें रविश जी ये खेल उन लोगों के लिये जो खेती तो कर नहीं सकते क्योंकि खेत तो बचे ही नहीं है औऱ इस काम में इज्जत औऱ पैसा तो बचा ही नहीं है, तो वे लोग चोरी छिपे इन जैसे खोलों का मज़ा ले रहे है औऱ दिल की इच्छा वर्चुअली जी रहे है

मनीष राज मासूम said...

चले हल ना चले कुदाली, बैठल भोजन देवेन मुरारी
दफ़्तर मे बैठे करें टाइम पास,कर लें खेती,बो लें तरकारी!
किसान के लिए भी बना दो एक खेल...
जिसमे वो भी खेले केबिन से,मारे फावरा टेबल पे........

मनीष राज मासूम said...

चले हल ना, चले कुदाली, बैठल भोजन देवे मुरारी
दफ़्तर मे बैठे करें टाइम पास,कर लें खेती,बो लें तरकारी!
किसान के लिए भी बना दो एक खेल...
जिसमे वो भी खेले केबिन से,मारे फावरा टेबल पे......

pragya said...

Thats quite interesting.You always let us know new and unique things.

happy Diwali!

Regards,
Pragya