हिंदुस्तान में आशुतोष उपाध्याय का लेख

दैनिक हिंदुस्तान में आज पर्यावरण पर अच्छा लेख है। आशुतोष उपाध्याय का। इसी लेख के ज़रिये मेरा इनसे पाठकीय परिचय हुआ है। पहली बार। इस बार अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार एलनॉर ओस्ट्रॉम को मिला है। आशुतोष ने इनके विषय और काम को विस्तार से बताया है। बिना एक लाइन संस्मरण और विवेक पर खर्च किये। मतलब यह लेख अपनी हर पंक्तियों में जानकारी के साथ आगे बढ़ता है। लगता है कि मेहनत से लिखा गया है। न कि संस्मरणीय प्रतिभा से। जिसके रोग ने हिंदी पत्रकारिता को तबाह किया है।

हिंदी पत्रकारिता में वाक्यों से तथा और द्वारा को खदेड़ने वाले साहित्याचार्यों और व्याकरणाचार्यों ने भाषा साधक की ही परंपरा विकसित की है। तथ्यों और नई जानकारियों तक पहुंचने की बजाय अपने संस्मरणों को लेकर साहित्यिक प्रतिभाशालियों ने पत्रकारिता के एक बड़े हिस्से को लघु साहित्यिक पत्रिका में बदल दिया। आज हिंदी का पत्रकार तब तक गर्व नहीं महसूस करता जब तक उसकी कोई साहित्यिक पृष्ठभूमि नहीं बन जाती। हालांकि कवि होना किसी पत्रकार के लिए बुराई नहीं है। शायद वो बेहतर कलमकार हो जाए लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कुछ लोगों तक ही सीमित रहा। ज़्यादातर लोग अपनी पहचान किसी श्रमजीवी पत्रकार की बजाय किसी साहित्यकार की महफिल में आने जाने से ही जोड़ते रहे हैं।

इसका असर हिंदी के तमाम अखबारों में संपादकीय पन्नों पर छपने वाले लेखों में मिलता है। नई जानकारियों की जगह भाषण होता है। लोहिया और समाजवाद के नैतिक ढिंढोरावादियों का ही शोर रहता है। हर लेखक कोशिश(अटेम्पट)करता है कि वो युग विचारक बन जाए। यह भी एक कारण रहा कि जागरूकता फैलाने निकली हिंदी पत्रकारिता बेहतर पाठकीय मानस नहीं रच पाई। हमेशा पत्रकारिता और साहित्य के फ्यूज़न को लेकर कंफ्यूज रही। साहित्य पूरक होने की बजाय बाधक बन गया। मैं कविता कहानी के सम्मान के खिलाफ नहीं बोल रहा। आप कवि होकर क्रिकेटर नहीं हो सकते। उसके लिए चौक छक्के के नए छंद रचने होंगे।

इसीलिए आशुतोष उपाध्याय के लेख को पढ़ना चाहिए। हिमालय की नोबल परंपरा का सम्मान। मैं नहीं कहता कि इस विषय पर लिखा यह कोई सर्वश्रेष्ठ लेख है। पर किसी भी स्तर से बेहतर तो है ही। हिंदी पत्रकारिकता के इस फटीचर काल में मेहनत से लिखे लेख ही नया रास्ता बनायेंगे। तभी हम प्रोफेशनल हो पायेंगे। हिंदी में पेशेवर होने की मानसिकता अभी तक नहीं बनी। लोग दफ्तरी शिकायतों के कारण काम को भी खराब कर देते हैं। हर पल समीकरणों के सहारे दूसरे के मुकाबले खुद को बेहतर बताते हैं। सबको लगता है कि उसे सेट कर देने की साज़िश हो रही है। किसी की तारीफ कर दीजिए तो उसका चरित्र हनन चालीसा लिख डालते हैं। एक दूसरे के बारे में अगर सबकी राय लेकर काव्य रचे तो उसमें हम सब की शक्लें किसी आततायी की बन जायेंगी। इससे हम सबने पत्रकारिता को मौज के साथ जीने का मौका गंवा दिया है। अपने पेशे को कमतर समझने लगते हैं।

हमें यह समझना होगा कि कवि होने के लिए कोई और जगह है। पत्रकार होने के लिए कोई और। पत्रकार संवेदनाओं की खोज करने वाला नहीं बल्कि संवेदनाओं के साथ नई नई जानकारियों को खोजने वाला प्राणी है। अलग-अलग जगहों पर चंद लोग अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन वो नज़ीर नहीं बन पाते। अगर हिंदी के बेहतरीन लोगों को पेशेवर रूप में सामने लाया गया होता तो कई लोग हिंदी वालों की तरह भी बनना चाहते। बात साफ है टीवी से लेकर अखबार तक नई परंपरा बनानी होगी। फटीचर काल के बीत जाने के इंतज़ार से कुछ नहीं होगा। छोटी छोटी शुरूआत करनी होगी। हिंदी पत्रकारिता में कभी स्वर्ण युग था इस मिथकीय मोह को भी त्याग देना चाहिए। कभी था ही नहीं।

10 comments:

सागर said...

आपका यह लेख भी कम उम्दा नहीं है,
खासकर हमारे लिए कुछ ज्यादा ही उम्दा है ...

Abhishek Kumar Srivastava said...

आपने तो दुखती रग पर हाथ रख दिया !!
सच कहते हैं की आजकल हिंदी के लेखक तो लगता है की वो आज के नहीं बल्कि न जाने कितनी पुरानी बातों को आज की घटना से संबधित करने की कोशिश करते से नज़र आते हैं !!

आज के चेतन भगत जैसे लेखको के बीच आशुतोष का लेख कितना पसंद किया जायेगा
ये तो नहीं कहा जा सकता लेकिन आज हिंदी में जरूर किसी क्रन्तिकारी परिवर्तन की आवश्यकता है !!

रवीश जी धन्यवाद की आप जैसे लोग जब तक हैं हिंदी लोग पढ़ते रहेंगे. और एक बार सोचने को कम से कम विवश होंगे.

sushant jha said...

आप जब फटीचर शब्द का इस्तेमाल करते हैं तो बहुत अच्छा लगता है!

ravishndtv said...

सुशांत
मुझे खुशी है कि मैं इस फटीचर काल का सक्रिय सदस्य हूं। बस इसका लाइव टेलिकास्ट करने में जो सुख मिलता है वो हम आपको बता नहीं सकते. हिंदी टीवी का फिर से स्वर्ण युग फटीचार काल में हमारे योगदानों की बुनियादों पर ही आएगा। हम उस गर्त को खोद रहे हैं जहां बुनियाद रखी जानी है। मज़ा आता है पतन का साझीदार होकर। ये बहुत ज़रूरी है कि हम पुरानी इमारतों को तोड़ दें तभी नई और नए ज़माने के लिए उपयोगी इमारतें बन सकेंगी।

आशुतोष जी का लेख ज़रूर पढ़ियेगा।

सुबोध said...

अंग्रेजी के जूठन पर हिंदी पत्रकारिता का स्वाद लिया जा रहा है..जानकारियां और कुछ नया खोज लाने की इच्छा खत्म हुई लगती है...प्लान्ड रिसर्च के सहारे समाज की नब्ज टटोली जा रही है...सबकुछ छिछला और फूहड़ सा लगता है

शरद कोकास said...

मुझे लगता है कि कवि होने के लिये भी सम्वेदना के साथ साथ सूचनाओ और नई जानकारी का होना ज़रूरी है क्योंकि तथ्यात्मक जानकारी के अभाव मे कविता अविश्वसनीय हो जायेगी । पत्रकारो के अलावा कवियों के लिये भी यह अनिवार्य है कि वे पढ़ें अन्यथा वे अपना बेहतर नहीं दे सकेंगे । बार बार उन्ही बातो को नये शिल्प में प्रस्तुत करते रहना कविता के भविष्य के लिये भी घातक है । लेख हो या कविता अपने पूरी तरह से पकने के पूर्व यदि प्रकाशित हो जाये तो उसमे कच्चापन तो रहेगा ही । अफसोस कि आजकल यही हो रहा है ।

JC said...

Mansarovar/ Gomukh se jab Ganga nadi 'pavitra jal' le kar chalti hai to chhoti aur akeli hoti hai...sagar ke khaare jal mein samane se pehle wo anya vibhinna nadiyon ke jal ko bhi le kar chalti hai...prakriti ka niyam aisa hi hai jo manav ke karya mein bhi jhalkta hai...

jayram " viplav " said...

रवीश जी , आपका कहना वाजिब मानता हुं कि आज हिन्दी पत्रकारिता में मेहनत से बचते हुए संस्मरणीय प्रतिभा के आलोक में आलेख लिखे जा रहे हैं । वर्तमान में घटित आस-पास के अनुभावों की जगह बीते दिनों की याद के सहारे लिखा गया आलेख हर किसी अखबार के संपादकीय पेज पर देख कर उबाउ लगने लगता है । लेकिन परिश्रम से सन्कलित जानकारियों के साथ एक अच्छी भाषा का समन्वय जरुरी होता है । "फटीचर "जैसे शब्द का प्रयोग कम से कम आप जैसे लोगों को जिन्हें अक्सर नये आने वाले पत्रकार आदर्श समझने की भूल करते हैं ।
केवल तथ्यात्मक और पेशेवर होने की आड में भाषा के निम्न्तम स्तर से मुन्ह नही मोड सकते । हिन्दी पत्रकारिता में अगर स्वर्ण युग नही था तो अभी जो हालात बडे मीडिया समुहों ने बना रखा है उससे भी कोइ स्वर्ण तो जाने दिजीये चान्दी युग भी नही आने वाला है । सबसे पहले मीडिया को अपने साध्य की पवित्रता पर काम करना होगा फ़िर साधन के बारे में सोचे !
बाकी आप खुद समझदार है । एनडी टीवी मे क्या -क्या होता है ,सबको पता है ।

Mahendra Singh said...

Ravish Ji, Aashutosh ji ka lekh padha.Bahut rochak laga.Lekh main tathyaon ka khazna tha.Prakriti ke sath judav ke baat ka main 100% samarthak hoon. Prakriti manav dwara kiye har atyachar ko balance ka detee hai. Manushya chahe kitnee bhi taiyarri kar le.

Hindi patrakaron Rajendra Mathur aur SP singh ka baad us level ka patrikarita jagat main aaj tak koi nahin hai.TV patrakar Vinod Dua ko main aaj bhi pasand karta hoon.Lucknow ke kamal khan ko main best TV reporter manta hoon.English news channel main Times Now bhi dekhta hoon.Hindi channels main aaj kal 2012 kee tabahee ka manzar bataya ja raha hai. Ishwar unhe sadbudhi de.

अजित वडनेरकर said...

बढ़िया। सहमत हूं।