फिर याद आई है...दीवाली आई है

दूर गहरे नीले आकाश में
ढूंढने की एक कोशिश
बीच शहर के शोर शराबे में
सुनने की एक कोशिश
सजे धजे लोगों की भीड़ में
मिलने की एक कोशिश
अधूरी मुलाकात की तड़प में
पूरी होने की एक कोशिश
वक्त बेवक्त आ जाने की ज़िद में
ग़ायब होने की एक कोशिश
पुकार कर तरंगों के बीच में
धड़कनें बन जाने की एक कोशिश
सुने जाने के लिए,ढूंढे जाने के लिए
पिता को पाने की फिर एक कोशिश
यादों के बस्ते से निकल कर उनकी
फिर से याद आई है
दीवाली आई है....

5 comments:

Ankur said...

tyoyhaar hume yaad dilate hain bahut kuch...hum bhul chuke hain wo bachpan ke diye bachpan ke rang gulaabi thanadk jo ab nahi milti.........
wo ravan j hum jalaaya karte the ab sab formality lagta hai

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुंदर कविता! शहर बहुत कुछ छीन लेता है।

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

पिताजी की मुझे भी याद आ रही है, इस दीवाली में घर नहीं जा पाया..

अच्छी कविता..

SACHIN KUMAR said...

SACHIN
पिता को पाने की फिर एक कोशिश
यादों के बस्ते से निकल कर उनकी
फिर से याद आई है
दीवाली आई है....
एक वो दीवाली थी जब नाना-नानी से पटाखा खरीद देने की जिद करता...
ना अब नाना-नानी रहें और ना ही अब जिद करता हूं...

Uzma said...

SHEHAR MEIN TO HAR DIN EID... HAR RAAT DIWALI HOTI HAI..
MERE GAON KI PAGDANDI HAR LAMHA SOONI REHTI HAI.. KACHHE GHAR BETHI MAA BHI AANHEN BHARTI REHTI HAI.... HAPPY DIWALI...