हॉट सिटी देखनी चाहिए..बीबीसी की बेहतरीन पेशकश

लेगस डूब रहा है। समुद्र उसके किनारों को कुरेद कर चढ़ा आ रहा है। पर्यावरण के कारण ख़राब हुई खेती ने लाखों लोगों को अफ्रीका के इस दूसरे बड़े शहर में ठेल दिया है। शनिवार की रात हॉट सिटी नाम की डाक्यूमेंट्री से नज़र हट ही नहीं पाई। एक-एक शाट और नेचुरल साउंड लाजवाब तरीके से लगाए गए थे। आबादी बढ़ रही है। नतीजा पानी में झुग्गियां बस रही है। लोग लकड़ी के ऊंचे घर बना कर रह रहे हैं। नाव से चलते हैं। नाव की दुकानें हैं। नावों के चलने की जगह कम होती जा रही है। इन्हीं सब के बीच आदमी जीना सीख रहा है। लेगस में ट्रैफिक जाम एक दर्दनाक दास्तां हैं। घंटों जाम के कारण मोटरबाइक टैक्सी शुरू हो गई हैं। बेरोज़गार लड़के बाइक को कारों के बीच जल्दी निकाल कर ठिकाने पर पहुंचा देते हैं। गाड़ियों की रफ्तार धीमी है तो दिल्ली की तरह वहां भी चौराहों पर दुकानें खुल गईं हैं। खिलौने से लेकर कैलकुलेटर तक बिक रहे हैं। बीबीसी ने तीन पात्रों को लेकर विनाश की इस कहानी को अद्भुत तरीके से दिखाया है। रॉकफेलर फाउंडेशन ने ये डॉक्यूमेंट्री बनाई है।

हिंदुस्तान में भी इस तरह की डॉक्यूमेंट्री बनी हैं। किसी न्यूज़ चैनल ने नहीं बनाई हैं। डाउन टू अर्थ के प्रदीप साहा ने डूबते सुंदरबन पर बेहतरीन टीवी डॉक्यूमेंट तैयार किया है। पर्यावरण ने हमारे जीवन को तबाह करना शुरू कर दिया है। हम पर्यावरण को लेकर कम सजग हैं। हमीं झोला लेकर निकलते थे अब पोलिथिन का थैला लेकर घर आते हैं। प्लास्टिक का कचरा पैदा कर रहे हैं।

खैर बात हॉट सिटी की ही करनी चाहिए। ये डॉक्यूमेंट्री एक बेहतर टीवी प्रोफेशनल और एक बेहतर दर्शक होने के लिए देखी जा सकती है। काइरो के बाद दूसरा बड़ा शहर है लेगस। पूरी कहानी गांव से शहर की ओर हो रहे पलायन को एक किरदार से समस्या को पकड़ती है। डर लगता है कि जब शहर की मेयर बताती है कि कैसे समुद्री कटाव को रोकने के लिए पत्थर के बोल्डर डाले गए लेकिन चार साल में समुद्र ने उन पर रेत डाल कर अपने लिए रास्ता बना लिया। लेकिन आबादी का दबाव इतना है कि लोग इस खतरे के बारे में नहीं सोच रहे। मेयर दिखाती है कि कैसे खूंखार समुद्र से सिर्फ दस मीटर की दूरी पर बिल्डर हसीने सपने बेच रहे हैं। उन्होंने मकान बना दिये हैं। मेयर कहती हैं इनके आंगन को बहा ले जाने के लिए सुनामी की ज़रूरत नहीं। मामूली ज्वार ही काफी है। फिर भी बिल्डर घर बना रहे हैं। उधर मछुआरों की बस्ती में पानी पर झुग्गियां बस रही हैं। सरकार पानी बिजली का इंतज़ाम नहीं कर पाती है। रिपोर्टर कहता है लेगस में हर आदमी अपने आप में स्थानीय निकाय है। वो पानी बिजली और चलने के रास्ते का इंतज़ाम खुद करता है। स्कूल नहीं है तो किसी कोने में दस बच्चे पढ़ाये जा रहे हैं। शहर जनरेटर के भरोसे चल रहा है। ये सब बातें दिल्ली आगरा मेरठ और मुंबई की भी लगती हैं। लेकिन इतने संवेदनशील तरीके से कोई डाक्यूमेंट्री नहीं देखी। क्या पता बनी होगी लेकिन कमअक्ली के कारण नहीं पता हो। इसे देखना चाहिए।

8 comments:

कुलवंत हैप्पी said...

लेगस का नहीं..हर देश का सत्य छुपा लगता है उसमें। सत्य को कोई जानना चाहता ही नहीं, जागते हुए भी सोने का बहाना हर कोई करने लगा है। चाहे मैं हुं चाहे कोई और।

अबयज़ ख़ान said...

Dardnak Dastan hai Legas ki... Lekin isse bhi Bura Hal Maldievs ka hai... Jo Rafta-Rafta Karke Maut ki taraf Badh raha hai.. Ham sarkaro ko koste hain.. Lekin Khud ke Girebaan me Nahi Jhankte.. Enviorment ki Barbadi ke liye to sabse zyada Zimmedar ham hi hain... Jago Janta Jago....

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

ये वो सच है जिसे हम देख कर नकार रहे हैं। जब तक स्वीकार करने की स्थिति बनेगी बहुत देर हो चुकी होगी।

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

मुझे लगता है ये जैसे कितनी जरूरी पोस्ट हो...आभार..

kase kahun?by kavita. said...

pata nahi apane futur ki itani planning karne vale log kaise itani badi samasya ko najarandaj kar dete hai .jab jab is bhyavah satya ke baare mein dekhati padati hoo apane bachchon ke vikat bhavishya ke baare mein soch kar dil kaanp jata hai.ek hi prashn apane aap se poochhati ho,kahi inhe is dunia mein la kar galat to nahi kiya?kya hum virasat mein inke liye sirf suraj ki tapan chhod kar jayenge?isi tarah global film festival mein ek film home dekhi thi .sarthak chitran ke liye badhaiyan.
kavita.

JC said...

'Anand' ka ek geet yaad agaya: "Jindagi kaisi yeh paheli haaye - kabhi ye rulaye, kabhi ye hansaye..."

Ek aur,"Jindagi ik safar hai suhana, yahan kal kya ho kisne jana..."

prabhat gopal said...

ham khud khatro se alag ho kar nahi rah rahe. waise post dekh kar log ek bar sochenge jaroor.

Nikhil Srivastava said...

Post padhte waqt ek baat baar baar man me aati rahi..'Chhah lo to kya mushkil hai, mushkil hai namumkin nahin..' Pahli baar aapke channel par kisi ko ye pankti bolte suna tha..Agar is documentary ka koi link ho to please de dejiye. I will be thankful..
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Nikhil
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