दलितों के उत्थान के लिए इंग्लिश देवी अवतरित












आज २५ अक्तूबर २००९ है। नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में इंग्लिश देवी अवतरित हो गईं। चंद्रभान प्रसाद की चार साल पुरानी परिकल्पना एक मूर्ति के रूप में साकार हुई है। चंद्रभान चाहते हैं कि दलित का हर बच्चा अंग्रेजी में पारंगत हो। अंग्रेजी जानेगा तो वो विश्व की तमाम मुख्यधाराओं से संवाद कर सकेगा। हिंदी भाषी चंद्रभान इस मूर्ति के ज़रिये हिंदी इंग्लिश का फरियौता नहीं करना चाहते। उनका मकसद है कि कम से कम समय में दलित साक्षरता को हासिल किया जाए और अंग्रेजी माध्यम में उनकी निपुणता उनके लिए दुनिया के दरवाज़े खोल देगी। इस मौके पर कुछ ऐसे दलित भी बुलाये गए थे जो उद्योगपति बन चुके हैं। जिनका कारोबार पचास से पांच सौ करोड़ रुपये का है। सिर्फ एक भाषा की कमी से वो दुनिया के सामने हीरो नहीं हैं। अंग्रेज़ी के कारण।

इस मौके पर नरेंद्र जाधव,दिग्विजय सिंह,चंदन मित्रा,निवेदिता मेनन,आशीष नंदी,बिबेक देबरॉय,ब्रिटिश काउंसिल के प्रमुख केविन सहित कई दलित अफसर मौजूद थे। प्रसिद्ध इतिहासकार गेल ओमवेत ने लार्ड मैकाले के जन्मदिन पर केक काटा। ऊपर तीन तस्वीरों में से एक गेल ओमवेत की है जो केक काट रही हैं। पहले की दो तस्वीरें इंग्लिश देवी की है। एक हाथ में कलम,दूसरे में किताब,पांव के नीचे कंप्यूटर और सर पर हैट। सबने इस मौके में मैकाले को आधुनिक भारत का जन्मदाता बताया। जिसे लोग क्लर्क पैदा करने की फैक्ट्री कह कर खारिज करते रहे उस शख्स की तारीफ की गई। वरना गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था आज भी एक खास जाति के लोगों के लिए रह जाती। मैकाले ने आधुनिक स्कूल कालेज की कल्पना की और तालीम के दरवाज़े सबके लिए खुले।

दलित शिक्षा आंदोलन में इंग्लिश की ज़रूरत पर ज़ोर दिया जाता रहा है। अंबेडकर ने भी कहा था अंग्रेजी शेरनी का दूध है। दलित मध्यमवर्ग की अब अगली पहचान इंग्लिश से बनेगी। ऐसा दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद मानते हैं। इसीलिए वो कामयाब दलित उद्योगपतियों को पहली बार इंडिया इंटरनेशनल सेंटर बुलाते हैं। पांच सौ करोड़ के उद्योगपतियों को आईआईसी का पता भी नहीं मालूम था। इंग्लिश देवी पर बहस और विवेचना होती रहेगी। मंत्र यह है कि कोई दलित बच्चा पैदा हो तो उसके एक कान में एबीसीडी और दूसरे कान में वन टू थ्री बोला जाए। आमीन।

31 comments:

Krishna Kumar Mishra said...

लार्ड मैकाले और मै़क्समुलर ने इस देश को बहुत कुछ दिया अब मानना न मानना हमारी मर्जी और सोच पर ...............

Pramod Singh said...

वेरी टचिंग. आलमोस्‍ट गर्दनियायके पटकिंग.

Ratan Singh Shekhawat said...

चलो किसी ने तो मेकाले की कद्र की | इंग्लिश देवी आईडिया तो अच्छा है पर दलित मायादेवी की मूर्तियों से छुटकारा पाए तब ना !

Udan Tashtari said...

बहुत अच्छे...

अशोक कुमार पाण्डेय said...

पूरे दलित आंदोलन को व्यवस्था विरोध के किसी व्यापक आंदोलन से काटे रखने का यह प्रयास है।

देवियां और देव कभी मुक्तिदायी नहीं होते…

अनुनाद सिंह said...

सही है। जबतक इस देश की भाषा-संस्कृति को लात मारे बिना 'आगे बढ़ना' सम्भव नहीं है। यह मैकाले की 'डिजाइन' है जो अब तथाकथित दलितों को सिखायी जा रही है। अभी तक इस मंत्र का उपयोग देश के 'परजीवी' काले अंग्रेज ही कर रहे थे। चन्द्रभान ने इसका काट यही निकाला है कि सबको काला अंग्रेज बना दो। न रहेगा बांस, न बाजेगी बांसुरी। भारत भी 'अफ्रीका' बन जायेगा।

Nikhil Srivastava said...

Samajh nai aata, Bharat ke log videshi cheezon, sabhyataon aur logon se itna impress kyu ho jate hain. Seekh na jane kyu yahan nai milti...

BAL SAJAG said...

धार्मिक देश... देवी देवताओं से मुक्त नहीं होता......
सामयिक विषय पर अच्छा लेख है.................
कभी वक्त मिले तो बच्चों के इस ब्लॉग पर पधारियेगा...

BAL SAJAG said...

http://balsjag.blogspot.com

निशाचर said...

मैकाले की चरणवंदना तो तथाकथित उच्चवर्ग ने ही ही प्रारंभ की थी और तब से लेकर आज तक मलाई चाट रहे हैं. दलित तो केवल "अनुचर" रहा है. आज वह स्वामियों के नक्शेकदम पर चल पड़ा है तो फिर ऐतराज क्यों? हाँ, चंद्रभान जी दलितों के उत्थान हेतु प्रयासरत हैं या फिर अन्य दलित नेताओं की तरह सत्ता में अपनी हिस्सेदारी को प्रयासरत हैं यह विमर्श का विषय हो सकता है. भारत और हिन्दू को वर्गों में बाँट कर सभी छल ही रहे हैं, ये उनसे अलग कैसे हो सकते हैं.

ab inconvenienti said...

भारतीयों को चाहिए की वे भारत में अंग्रेजी के अलावा बाकी सभी क्षेत्रिय भाषाओँ को आधिकारिक रूप से प्रतिबंधित कर दे. केवल एक भाषा रहेगी तो सभी कामों में आसानी रहेगी, और विश्व में भारतीयों का रुतबा भी बढेगा.

आयुर्वेद, योग, यूनानी जैसे अवैज्ञानिक और झोला छाप इलाजों पर भी प्रतिबन्ध लगाने के लिए आन्दोलन करना चाहिए, इनके कारण न जाने कितने लोग हर दिन बैमौत मारे जाते हैं.

रोटी, दाल, भात, साग, खिचड़ी, मिठाई जैसे पिछड़े और अन्हाईजीनिक और अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों को हटा कर मांस, चीज़, ब्रेड जैसे उन्नत भोजन भारतीय खाद्य श्रृंखला में शामिल किये जाएँ.

चीन, जापान, ताईवान और कोरिया अंग्रेजी के कारण ही इतना औद्योगिक विकास कर पाए हैं

Mahendra Singh said...

Nishachar sahib ke comment satik lage. yeh daliton ko bhatkane kee soch hai. Enhe apni dukan chalanee hai. Mayawati ji Lucknow se leker Noida tak park hi banwaye ja rahi hai. En parkon se daliton ka kya uthan hoga.Main to yeh manta hoon ki sabse bada dalit udharak non- dalit vyakti hee ho sakta hai jaise Mahatma Gandhi.

JC said...

Ramsetu banane wale 'vanar' kya Angreji ke karan patthar ko sagar jal mein tairane mein kamyab hue the? Aaj America aur anya paschimi deshon mein kewal angreji hi naheen boli jati aur phir bhi wahan 'dalit' naheen hain. Athva hain bhi to unko 'dalit' naheen kaha jata...Haan yeh kah sakte hain ki vartman mein Angreji ka bolbala hai; Korea, China adi mein bhi wo ab is bhasha mein jor de rahe hain 'globalisation' ke karan, jaise 'Nalli' ki sari pehle Tamil Nadu mein hi milti thi kintu aaj kam se kam Delhi mein bhi asani se mil jati hai, aur 'Panchhi' ka petha bhi, ityadi ityadi...

sushant jha said...

हिंदी दिवस पाखंड , रेलवे स्टेशनों और बैंकों में हिंदी प्रयोग की नसीहतें देखते-देखते पक चुका हूं। लगता है कि कोई बेवकूफ बना रहा है जो खुद तो अंग्रेजी पढ़कर तरक्की कर रहा है और हमें जहालत में धकेलने के लिए तमाम भावनात्मक और न जाने कौन-कौन सी राष्ट्रवादी किस्म की बाते समझा रहा है। ऐसा ही लालू-मुलायम भी करते हैं लेकिन बड़ी चालाकी से अपने बच्चों को डीपीएस के बाद आस्ट्रेलिया भेज देते हैं।

अब अगर आजादी के बाद हिंदी पर आमराय नहीं बन पाई तो इसमें हमारी पीढ़ी का क्या कसूर है। हम क्यों उस भाषा में पढ़ते रहे जिसमें एक भी नौकरी नहीं है। अब सब के सब तो गुलजार-जाबेद अख्तर-दीपक चौरसिया नहीं हो जाएंगे कि मीडिया से लेकर फिल्मों तक हिंदी के बल झंडा गाड़ लें। इस देश में भाषा के नाम पर जो भेदभाव हो रहा है उसको खिलाफ कोई सरकार या पार्टी क्यो नहीं आवाज उठाती है मुझे ये आश्चर्य लगता है। ठीक कहते हैं चंद्रभान प्रसाद कि अगर एक दलित अंग्रेजी बोलने लगे तो तमाम हिंदी वाले पंडित उसके सामने दलित नजर आने लगेंगे।

जब एक बार तय हो चुका है कि इस देश का कारोबार, प्रशासन, रिसर्च और उच्च शिक्षा अंग्रेजी में ही होगी तो फिर गरीबों को क्यों हिंदी का झुनझुना पकड़ा दिया जाता है। हिंदी पट्टी के ये लाखो बच्चे हिंदी माध्यम में पढ़कर कौन सी नौकरी पा लेंगे कोई मुझे बताए। कुछ हजार कहीं खप जाएंगे...बाकी का क्या होगा। हकीकत यहीं है कि हिंदी का फैलाव बोलने के स्तर पर भले ही हो रहा हो..यह सिर्फ आडियो विजुअल मीडियम में मजबूत है। प्रिन्ट में ये प्रभावकारी नहीं है। अगर हम हिंदी अखबारों का सर्कुलेशन देखकर इस भ्रम में जी रहे हैं कि हिंदी फल-फूल रही है तो वो छलाबा ही है-दरअसल ऐसा इसलिए हो रहा है कि देश में अभी तक पूरी साक्षरता नहीं आई है और हिंदी वहीं पढ़ रहे है जो पहली पीढ़ी के साक्षर हैं।

रुस, चीन, कोरिया का उदाहरण भारत में नहीं चल सकता, हालात में जमीन आसमान का अंतर है। न तो हिंदी, मंदारिन की तरह 90 फीसदी जनता की भाषा है और न ही पंडित नेहरु उसे पूरे देश पर थोप सकते थे। ऐसे में अगर एका का काम अंग्रेजी ने किया तो हमें उसे स्वीकार कर लेनी चाहिए।

राकेश said...

ठीक ही कह रहे हैं भाई चंद्रभान प्रसाद. गुरुकुलिए तो इतने चालू निकले कि जब अंग्रेजी वाली गाड़ी पर सवार होने की बारी आयी तो सबसे पहले लपके, और कहने लगे कि आप लोग न पड़ो इसके पीछे इससे तो केवल कलर्क निकलेंगे. मंत्रालयों से लेकर जिला न्‍यायालयों तक में ऐसे काबिज हुए कि बाकियों को कलर्की करने का मौक़ा भी न मिल पाया.
विश्‍वविद्यालयों में भी ऐसे कुछ घाघ बैठे हैं कि खुद तो जाने कहां-कहां जाकर अंग्रेजी सीख आए और विद्यार्थियों को प्रवचन देते हैं कि चिंता न करो, नहीं आती है अंग्रेजी तो कोई बात नहीं.
सेमिनारों में हम इसी उधेरबून में रह जाते हैं कि हिंदी में कुछ बोलना ठीक होगा या नहीं. तब तक अंग्रेजी में उल-जुलूल टाइप का इंटरवेंशन करके कोई मसले को और उलझा देता/ती है. पर यहां मेरे कहने का मतलब ये नहीं कि मुझे अंग्रेजी आती तो मैं भी सेमिनारों में सिंग फंसाता.

जहां तक अंग्रेजी देवी की मूर्ति की बात है तो सिर्फ एक ही बात कहना चाहूंगा कि अब आइआइसी या आइएचसी में ही टहलती न रह जाएं ये देवी माई. दावे के साथ कह सकता हूं कि मेरे गांव में एक भी दलित आज तक कास्‍ट सर्टिफिकेट का लाभ नहीं ले पाया है, लाभ तो दूर की बात उन्‍हें ये ही पता नहीं है कि ऐसी कोई सर्टिफिकेट भी होती है. यहां अंग्रेजी देवी किस तरह मदद करेंगी, उस पर भी मंथन होना चाहिए.

निशाचर said...

@ सुशांत जी, क्षमा चाहूँगा लेकिन हिंदी को किसी पर थोपने की आवश्यकता नहीं थी केवल अहिन्दी भाषियों का यह भ्रम दूर करने की आवश्यकता थी कि हिंदी क्षेत्रीय भाषाओँ को पीछे धकेल देगी और हिंदी भाषियों का बोलबाला हो जायेगा परन्तु क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों और नेहरु की स्वयं की अनिच्छा के चलते हिंदी दुर्गति को प्राप्त हुई. इसके लिए नेहरु और कुछ तत्कालीन द्रविड़ राजनेता जिम्मेदार रहे और नौकरशाही तो चाहती ही यही थी कि अंगरेजी ही सर पर बैठे.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

angreji devi ki jay .

दस्तक said...

रवीश जी हमनी किहा एगो कहावत बिया की 'बड़-बड़ दहयिल जास और गदहा पूछे कतना पानी' कहे के मतलब बा की जब दलितन खातिर भीम राव आंबेडकर, कांशीराम औरी मायावती कुछो न कई पवली त इ विदेशी चिरई का कर पायीं.

sushant jha said...

निशाचरजी, मेरे कहने का मतलब यहीं है कि अगल उस समय की परिस्थितियों में किसी भी कारणवश दक्षिण के कुछ हिस्सों में हिदी के पक्ष में माहौल नहीं था और नेहरुजी उस भ्रम को दूर करने में असफल रहे थे तो दोष सिर्फ नेहरुजी का नहीं था। कहीं न कहीं इसके लिए कई कारण जिम्मेवार थे। हिंदी विरोधी आन्दोलन के तार ब्राह्मण विरोधी आन्दोलन से भी जुड़ गए थे क्योंकि कुछ जानकारों के मुताबिक ब्राह्मणों का एक बड़ा हिस्सा हिंदी को अपनाने पक्ष में था जो उसके 'आर्यवादी' अहं को तुष्टि प्रदान करते थे। ऐसे में तमिलनाडू की एक बड़ी आबादी का इस भय में आना स्वाभाविक था कि हिंदी की वजह से एक बार फिर ब्राह्मणीय सत्ता उस प्रदेश में आरोपित कर दी जाएगी जिसके खिलाफ वे इतने दिनों से संघर्ष कर रहे थे। ऐसे में अगर 'पंडित' नेहरु इस भ्रम को दूर करने का प्रयास करते कि हिंदी से उन्हे कोई अहित नही होगा..तो फिर विचार कीजिए की वो भ्रमनिवारण नही होता बल्कि हिंदी आरोपण ही माना जाता। ऐसे हालात में नेहरु ने वहीं किया जो एक परिपक्व राजनेता को करना था- उन्होने बड़ी उदारता से सभी राज्यों को अपनी भाषा चुनने की आजादी दे दी और देश को एक बड़े संकट से टाल लिया। दूसरी बात, बात यहां सिर्फ द्रविड़ नेताओं की ही नहीं है। देश के कई हिस्सों में हिंदी को लेकर बहुत स्वीकार्यता नहीं थी-भले ही विरोध का स्तर तमिलनाडू जैसा न हो। ये बीते दशकों की बात है कि सिनेमा, जनसंचार के माध्यमों और शहरी विकास और आबादी के विस्थापन ने हिंदी को एक कामन भाषा बना दिया। लेकिन फिर भी यह कामचलाऊ भाषा से आगे रोजगारपरक भाषा नहीं बन पाई। यह लैब की भाषा,रिसर्च की भाषा और कारपोरेट-और सत्ता तंत्र की भाषा नहीं बन पाई। इसका अगर कोई ठोस उपाय हो तो बिल्कुल स्वागतयोग्य है।

JC said...

Pehle kaha jata tha 'Uski marji ke bina patta bhi nahin hil sakta', kintu jaise jaise ham 'ghor kaliyug' ki gahrai ki ore agrasar ho rahe hain, jo ki 'samutra-manthan' ki arambik dasha darshata hai, adharm badh raha prateet hona apekshit hi hai, kyunki kaal satyug se ghor kaliyug ki ore badhta dikhai deta hai. Aisa maan-na hai gyaniyon ka...Satya ki (prakash ki) utpatti asatya (andhkar) se arambh hui, aur yadi ham kewal bhasha ko hi prathamikta dete deekh rahe hain na ki hamare uddeshya prapti ko - jo mana gaya kewal 'parem satya' ki khoj ko - to avashya iska dosh kaal ko jata hai na ki aadmi ko, yani 'Nehru/ Gandhi' adi kath-putliyon ko...

Mahendra Singh said...

Sushant ji gusse main lag rahe hai. Aapko development karna hai to apni bhasa apni technology to viksit karnee hee hogi. Kab tak aap copy aur paste karte rahenge. English yadi hame rojgar de rahi hai to isme koi pareshani nahi hai. Hame english ko badhawa dena chahiye lekin itne hindi padhane wale aayenge kaha se.Aur yeh BPO kab tak hamen rojgar dega. Aaj kal ke bachche 100 main 100 number pate hai phirbhi Airforce walon ko piolet nahi mil rahe. Prof Yashpal kahte hai IIT se passout hone wala koi bhi vidyarthi Vaigyanik kee yogytaa nahi rakhta. Sibbal sahib kahte hai IIT ke intrance main 80% wale hee yogya mane jayenge. Pahle to gaon ke primary school se pass hokar log kahan kahan pahunch jate the. Yeh dosh apke system ka hai. Yeh bimaree har jagah hai.Hame bimari ka sahee upchar karna chahiye.

sushant jha said...

महेंद्रजी,बात गुस्से की नहीं है। अगर आईआईटी में सिब्बलजी को 80 फीसदी वाला चाहिए तो इसमें हिंदी का प्रश्न नहीं है, यहां फिर मैं हिंदी इलाके के टीचरों और शिक्षा व्यवस्था में बैठे मर्मज्ञों को दोषी मानता हूं जिनके हाथ 60 फीसदी से ज्यादा नंबर देते हीं कांपने लगते है। वो एक अलग बहस है, मैं सिब्बल से सहमत भी नहीं। यशपालजी को भी अगर आईआईटी में नौकरी-लायक बच्चे नजर नहीं आते तो इसका भी मतलब नहीं कि हिंदी में पढ़कर सारे नौकरी लायक हो ही जाते। इस बात से सहमत हूं कि अपनी भाषा में सोचने और पढ़ने से बातें ज्यादा अच्छी तरह समझ में आती है लेकिन इसका क्या करुं कि अपनी भाषा में मौके नहीं हैं। या अनंतकाल तक इसका इंतजार करता रहूं कि हिंदी में तकनीक आएगा, रिसर्च होगा और नौकरियां आएंगी तब हासिल कर लूंगा। ये कहांतक उचित है कि एक वर्ग तो अंग्रेजी पढ़कर संसाधन के तमाम बड़े हिस्सों पर कब्जा करता रहे लेकिन एक बड़ा वर्ग अपनी भाषा को बचाने के लिए प्रेम की वलिवेदी पर कुर्बान होता रहे। आखिर क्यों नहीं सरकार की ये जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वो उस बड़े वर्ग को भी उसी भाषा में पढ़ाए जो रोजगार की भाषा है, पैसे की भाषा है। भाषाई प्रेम और भाषाई भेदभाव-चालवाजी का ये खेल कबतक चलता रहेगा? या तो आप पूरे देश में हिंदी लागू कर सभी स्ट्रीम की पढ़ाई और रिसर्च की व्यवस्था हिंदी में करवाईये-जो आप कर नहीं सकते- या फिर आप सभी वर्ग के लिए अंग्रेजी के दरबाजे खोलिए। हिम्मत और जिजीविषा से ही काम चलता तो हम अब तक हिंदी को हिब्रू की तरह अनिवार्य कर चुके होते-लेकिन आप भी जानते हैं कि ऐसा करना नामुमकिन है।
मौलिक रुप से ये काम सरकार का है जो जिंदगी भर गरीबों को बचपन से हिंदी पढ़ाकर एकबारगी ही उच्चशिक्षा के लिए अंग्रेजी के युनिवर्सिटियों में धकेल देती है। आप कल्पना किजीए कि उन बच्चों के दिलों पर क्या गुजरती होगी जब वे सबकुछ जानते हुए भी सिर्फ अंग्रेजी की वजह से खुद को गूंगे महसूस करते हैं।
रही बात पहले के लोगों का गांव से निकलकर बड़ा बनने की तो ये एक अलग विमर्श है जिसका आज के हालात में अंग्रेजी-हिंदी विमर्श से कोई तालमेल नहीं। पहले साक्षरता कम थी, आजादी के बाद नए माहौल में सरकारी मौके ज्यादा थे-सब खप गए। मेरे चाचा जो दसवीं पास भी नहीं थे, सन 1955 में तीन नौकरी का आफर ठुकरा चुके थे। मैं ये दुस्साहस सन 2009 में हिंदुस्तान के बेहतरीन संस्थान से पीजी करने के बाद भी नहीं कर सकता। बताईये मैं क्या करुं....। मेरी बातों को अन्यथा न लें...मैंने महज व्यवहारिकता की बात की है...भावनात्मक रुप से हिंदी से मेरा उतना ही जुड़ाव है।

rakesh said...

दलित शिक्षा आंदोलन में इंग्लिश की ज़रूरत पर ज़ोर दिया जाता रहा है। अंबेडकर ने भी कहा था अंग्रेजी शेरनी का दूध है। दलित मध्यमवर्ग की अब अगली पहचान इंग्लिश से बनेगी। ऐसा दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद मानते हैं। इसीलिए वो कामयाब दलित उद्योगपतियों को पहली बार इंडिया इंटरनेशनल सेंटर बुलाते हैं। पांच सौ करोड़ के उद्योगपतियों को आईआईसी का पता भी नहीं मालूम था। इंग्लिश देवी पर बहस और विवेचना होती रहेगी। मंत्र यह है कि कोई दलित बच्चा पैदा हो तो उसके एक कान में एबीसीडी और दूसरे कान में वन टू थ्री बोला जाए। आमीन।

vaha re इंग्लिश देवी is मंत्र ke sath agar om jodh kar fonka jaye to humari ijjat bhi bach jaygi. baba bhim rao ambedkar ne sayi kaha hai english sherni ka dogdhh hai. pine vala kab aadamkhor ban jaye pata nahi.



rakesh

Mahendra Singh said...

Sushantji aapki baat se main etifaaq rakhta hoon. Meri company main bhee log english bolkar Lakhon kama rahe hai par aata jata kuch nahi.Kahawat hai "Adhadhundh darbar main Gadhe panjeeree kha rahe hain"

Aadarsh Rathore said...

अच्छी संकल्पना है।

Pankaj Parashar said...

रवीश भाई, आपका लेख बहुत अच्छा है और प्रमोद भाई के शब्दों में कहूं तो आलमोस्ट टचिंग हैं. टीचिंग का गुरुघंटालीपन बिल्कुल नहीं है. इस लेख पर आई प्रतिक्रियाओं ने इस बहस को और मजेदार बना दिया है.
मैंने जिस शिक्षा-व्यवस्था में प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की वहां आज भी शिक्षकों को अंग्रेजी नहीं आती. बच्चा जब छठी कक्षा में जाता है तब उसका पाला एबीसीडी नामक अल्फाबेट से पड़ता है और उसी कक्षा से अंग्रेजी की एक किताब ही शुरू हो जाती है. यहीं से बच्चा हदसने(हताश होना)लगता है. मैं तो अक्सर अंग्रेजी की कक्षा में पांच मिनट के बहाने बाहर जाता और पचास मिनट के बाद आता. आज भी हमारे यहां के अधिकांश बच्चों की हालत यह है कि महज अंग्रेजी के डर के कारण वे आगे नहीं पढ़ सके. इसलिए बिला-शक इस भाषा को पहली कक्षा से पूरे देश में अनिवार्य बना देना चाहिए.
दूसरी बात, वही भाषा फलती-फूलती है और हर वर्ग में स्वीकार्य होती है जिससे अधिक से अधिक आर्थिक संबंध जुड़े होते हैं. यह दर्जा मध्यकाल से क्रमशः फारसी, उर्दू और अंग्रेजी को हासिल रही. हिंदी कभी इस स्थान पर रही ही नहीं. आज राजभाषा भले हो हिंदी पर सही मायने में सरकार में, निजी क्षेत्रों में सिक्का अंग्रेजी का ही चलता है. ...तो भई सिक्का जिसका चलेगा वही तो असली ताकतवर हुआ न.

JC said...

हिंदी, या सही मायने में संस्कृत, द्योतक है भाषा की 'भारत' (जो आरंभ में जम्बूद्वीप कहलाता था) में प्रगति/ उत्पत्ति का, शायद सबसे सरल भाषा, अंग्रेजी से आरंभ कर, कलियुग से सत्य युग तक पहुचते...

किन्तु काल का विपरीत दिशा में चलते दिखाई देने के कारण, आज 'कलियुग' में, हम मजबूर प्रतीत होते हैं समझने/ समझाने में कि क्यूँ मानव जाति का उत्थान की जगह पतन सा दिखाई पड़ता है...:(

JC said...

बचपन में जब मैं अपने पुश्तैनी मकान में, जो अल्मोडा में है, कभी कभी जाता था तो क्यूंकि उन दिनों बिजली नहीं पहुंची थी तो लड़के भूत की काफी बातें बताते थे - वहां हर पेड़ में किसी न किसी भूत का डेरा बताया जाता था, और यह भी कि भूत कि पहचान उसके पैरों से होती है: उनकी एडी आगे और पंजा पीछे बताया जाता था! अब सोचता हूँ कि शायद यह कथन काल के शिव, भूतनाथ, के अपने भूत को देखते रहने की मान्यता का द्योतक है...

नवीन कुमार 'रणवीर' said...

अंग्रेजी देवी की आराधना कर दलित चिंतक चंद्रभान जी ने वही कर दिया जिसके वो हमेशा खिलाफ रहे। बाबा साहब के सिद्धांतों में कभी भी मूर्ति पूजा की हिमायत नहीं की गई है। पता नहीं ये कौन सा अंबेडकरवादी सिद्धांत लागू करना चाहते हैं? दलितों को अपनें ज्ञान का विस्तार करनें के लिए तथा अपनें को इस शिक्षित समाज की मुख्यधारा से जोड़नें के लिए अंग्रेजी जानना जरूरी है। परंतु क्या हर काम के लिए मूर्तियों का हवाला देना जरूरी है?
क्या आज के हमारे दलित चिंतक समाज के दलित वर्ग को वह मूर्तिवादी सोच को बढ़ावा नहीं दे रहे, जिसके खिलाफ ये लड़ाई लड़ी थी बाबा साहब नें?
मायावती की राह पर क्या चंद्रभान प्रसाद भी चल पड़े।

जय कौशल said...

बढ़िया..

जय कौशल said...

बेहतर...