हिन्दी की आधुनिकता

वाणी प्रकाशन ने तीन खंडों में इसी नाम से किताब छाप दिया है । अखिल भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला के तत्वावधान में हिन्दी की आधुनिकता पर दस दिनों तक लंबा मंथन चला था जिसे पुस्तक रूप दे दिया गया है । हिन्दी में दिलचस्पी रखने वालों को दो हज़ार रुपये की लागत वाली तीनों पुस्तकों को रखना चाहिए । इसमें ओम प्रकाश वाल्मीकि,आदित्य निगम,अभय कुमार दुबे, रविकांत, अपूर्वानंद,संजीव कुमार,सदन झा, शीबा, विनीत कुमार जैसे कई अकादमिक जनों ने हिन्दी की आधुनिकता पर काफी मारामारी की है । पुस्तक मेले में आज तीन बजे इसका विमोचन टाइप का कुछ होना है ।

वहाँ जाने से पहले मैं कुछ लेख तो ज़रूर पढ़ रहा था । तीन दिनों से । पढ़ते पढ़ते अपने सवालों की दुनिया में चला गया जिनके कुछ जवाब किताब में हैं और कुछ किताब से बन रही समझ से भी मिल जाते हैं । हिन्दी की आधुनिकता किसके बरक्स है । हिन्दी की पारंपरिकता और रूढ़िवादिता क्या रही होगी जिसे हिन्दी ने तोड़ कर अपने भीतर आधुनिकता पैदा की होगी । इसका जवाब मुझे नहीं मिला । दूसरा इसका भी नहीं मिला कि हिन्दी की आधुनिकता को अंग्रेज़ी या दूसरी प्रभावशाली भाषायें कैसे देखती हैं । यानी जब आप आधुनिक होते हैं तो कुछ नये तो होते ही होंगे तो यह नया कहाँ से आया और इस नये को कैसे देखा गया । 

जब मैं हिन्दी बोलता हूँ तो लोग कहते हैं कि आपकी भाषा देसी है, खाँटी है । तो क्या कोई शहरी और क़ुलीन हिन्दी भी है । जिसमें मिट्टी की ख़ुश्बू नहीं है । एक बार एच एम टी शब्द सुना था । सहेलियों के साथ विचरण करते हुए । किसी सहेली ने कहा कि वो एच एम टी टाइप है । मुझे लगा कि घड़ी की बात हो रही है जो टाइटन के मुक़ाबले अब कमज़ोर पड़ चुकी है । जवाब मिला कि हिन्दी मीडियम टाइप । तो मैंने पूछा कि और मैं ? नहीं तुम हिन्दी मीडियम टाइम नहीं लगते हो । तुम देखने से हिन्दी वाला नहीं लगते । मैं अक्सर सोचता हूँ मुझे जैसे हिन्दी भाषियों को अलग से और भदेसपन के साथ कैसे एक साथ देखा जाता है । क्या हिन्दी मीडियम टाइप कोई प्रोटो टाइप है रूढ़िवादिता की, किसी गए गुज़रे ज़माने का प्रोटोटाइप । 

हिन्दी में आधुनिकता का प्रवेश कैसे होता है । उसके आधुनिक प्रभाव क्या है । फ़्रेंच आधुनिकता से आई या स्पेनिश या अंग्रेज़ी की आधुनिकता से । अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ों से पहले भी हम ग्लोबल थे । दुनिया से कारोबार और सम्पर्क था । उन आधुनिकताओं का किया हुआ । हमारी आज की या उन्नीसवीं सदी की हिन्दी पूर्व आधुनिकता क्या थी । जब हमारी ज़मीन पर आलू और टमाटर बाहर से आ रहे थे, पजामे आ रहे थे सिले हुए कपड़े आ रहे थे तब हम किस तरह से आधुनिक हो रहे थे । आलू खाते वक्त आधुनिकता थे तो कफ़न में आलू कैसे क्रूरता का प्रतीक बन जाता है । जातिवादी बन जाता है । 

भाषा जब ज़ुबान से पहचान बनती है तो वह बोले जाने वाले समाज का अलग तरह से गोलबंदी करती है । क्या ये पहचान किसी उर्दू या बांग्ला के ख़िलाफ़ बनते हुए समाज का सांप्रदायिकरण करती है या आधुनिक बनाती है । हम तो हिन्दी में पश्चिम के प्रति जो तिरस्कारभाव रखते हैं उसके ख़िलाफ़ कोई स्वतंत्र या स्वायत्त आधुनिकता है हिन्दी की या उसी में से काँट छाँट कर । ओम प्रकाश वाल्मीकि की एक लाइन पर नज़र गड़ गई । लिखते हैं कि दलितों की बस्तियाँ नदी नालों के पार पश्चिम दिशा में रखी गईं । कहीं हिन्दी का एक हिस्सा इसी वजह से भी पश्चिम से तो नहीं चिढ़ता । पश्चिम में क़ाबा भी पर उस पर नहीं जाता अभी । हम पश्चिम और पश्चिम की आधुनिकता को घृणा की नज़र से क्यों देखते हैं । हिन्दी की आधुनिकता की दिशा क्या है । पूरब और पश्चिम की बाइनरी से अलग पूरब और पूर्वोत्तर तो नहीं । 

मेरी मातृभाषा भोजपुरी है । हिन्दी मेरी पहली अंग्रेजी । हिन्दी बोलना कांवेंट होना था । गाँव घर में हिन्दी बोलने पर डाँट पड़ती थी कि ज़्यादा अंग्रेज़ी मत बोलो । मुझे रटाया गया है कि मेरी मातृभाषा हिन्दी है । बाद में सचेत हुआ तो पूछने लगा कि जो मेरी माँ बोलती है वो मातृभाषा नहीं है । क्यों । मेरी माँ भोजपुरी है । हिन्दी मेरे लिए अंग्रेज़ी की तरह कामकाज की एक और भाषा है । विकल्प है । हिन्दी के इतिहास को इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते पढ़ सकता हूँ मगर ओढ़ नहीं सकता क्योंकि मैं इसके इतिहास का आरंभिक सहयात्री नहीं रहा । अपनी पारिवारिक पीढ़ियों में विशुद्ध रूप से हिन्दी बोलने वाले हम पहली पीढ़ी हैं । तो क्या हम भोजपुरी बोलते हुए आधुनिक नहीं हैं । नहीं थे । भोजपुरी की आधुनिकता कहाँ से आई । 

मेरे लिए हिन्दी मरीन ड्राइव है । भोजपुरी की इतिहास चेतना भले न हो मगर वो मेरी भाषा है । जिसे जानने के लिए मैंने व्याकरण की किताब नहीं पढ़ी और मैट्रिक पास होने के लिए नंबर नहीं लाने पड़े । इस हिन्दी को अपने ही घर में डराते देखा है । बचपन में हिन्दी बोलने वाली संभ्रांत महिलाएँ चाचियां मेरी माँ को गँवार समझती थी । मेरी माँ उनसे वैसे ही टूटी फूटी हिन्दी बोलती थी जैसे मैं अंग्रेज़ी बोलता हूँ । उन चाचियों को अंग्रेज़ी नहीं आती थी । उनके लिए हिन्दी शहरी और अफ़सरी की भाषा थी जो गाँव से पटना आई मेरी भोजपुरी बोलने वाली माँ को हिक़ारत और अनपढ़ नज़र से देखती थी । इसलिए हिन्दी मेरे लिए औपनिवेशिक भाषा है जो अंग्रेज़ी की औपनिवेशिक सत्ता के बरक्स अपना वजूद बनाते हुए सत्ता की बोली बोलने लगती है । हम हिन्दी को हमेशा औपनिवेशिकता के ख़िलाफ़ देखते हैं, हिन्दी में औपनिवेशिकता को नहीं देखते । हिन्दी की आधुनिकता ज़रूर पढ़ियेगा ।

57 comments:

Manish Kumar said...

रवीश भाई, मुझे आज भी याद है, मेरे एक चाचा पटना से जब भी गाँव आते थे, मुझे शुद्ध हिंदी मे बोलने के लिए बोलते थे और गलती होने पे डाँटते थे, हम गाँव मे बज्जिका बोलते थे
और जैसा आपने कहा शुद्ध हिंदी, अंग्रेजी जैसा ही मुश्किल था, यहाँ तक कि स्कूल मे भी हम बज्जिका ही बोलते थे। सारे हिंदी व्याकरण रट लिए पर उससे केवल परीक्षा मे नंबर आ जाते थे, बाकि बातें ज्यो कि त्यो। उस समय तो ये भी समझ मे नहीं आता था कि क्या गलती है। मैट्रिक के बाद जब गाँव से पटना आया तो काफी दोस्त अक्सर मज़ाक बनाते थे।जब कॉलेज गया तब और दोस्तों ने बताया के तुम बिहारी लोग जिसे हिंदी बोलना कहते हो वो सही नहीं है, क्योकि उच्चारण गलत करते हो। इन सबसे ये हुआ, आजतक भाषा के कुंठा से उबार नहीं पाया, जब किसी को अच्छा हिंदी या अंग्रेजी बोलते देखता हूँ तो लगता है काश मैं भी ऐसा बोल पाता। खैर, इस विषय पे एक हमलोग हो जाता तो काफी अच्छा लगता।

bhavesh jha said...

Apne kaam main awaal huan sir, position bhi hai, lekin log conference room se nikalte hi bolte hain, bihari hain na,kaise bolta hai.Bhasha ka kya karain, Matrubhasha maithili thi, kahan se Hindi aur Angreji ki chadar odh lain.

Nitin Bhatia said...

मेरे हिसाब से भाषा का मूल संवाद हैं, लेकिन कई लोग इसे हमारी सामाजिक पहचान, सामाजिक उन्नति और ना जाने किन किन चीज़ो से जोड़ देते हैं. लेकिन बात वही ख़तम नही हो जाती, वो और भी संजीदा हो जाती हैं जब हम इस पर प्रतिक्रिया करने लगते हैं और सोचने लगते हैं की शायद हम कही उपर या नीचे हैं. विदेश मैं रहने वाले लोगो से पूछिए, हिन्दी अपनी सभी उपभाषाओ और अन्य बोलियो के साथ कैसे फल-फूल रही हैं. क्योंकि वहा कोई भी देसी बोली या भाषा आपको भारतीयो से जोड़ देती हैं.

प्रफुल्ल कोलख्यान said...

भाषा के कई स्तर होते हैं। किसी भी भाषा का मातृभाषिक रूप उस भाषा का बुनियादी और प्राथमिक स्तर होता है। मातृभाषा को आदमी उसी तरह सीख लेता है, जैसे चलना सीखता है। ज्ञान और संवेदना के उच्चतर स्तर को अभिव्यक्त करनेवाली भाषिक-संरचना किसी की मातृभाषा नहीं होती है, इसे वैसे ही सीखना पड़ता है जैसे नृत्य या पदसंचलन (पैरेड) को सीखना पड़ता है। मातृभाषा अनिवार्यतः वह नहीं होती है जिसे हम माँ की गोद में सीखते हैं, बल्कि वह प्राथमिक भाषा होती है जिसके माध्यम से हम अन्य भाषाओं को भी सीखते हैं और उस प्राथमिक भाषा के ज्ञान/संवेदनावाही उच्चतर स्तर को भी अर्जित करते हैं।
उर्दू ही नहीं, अन्य भाषाएँ भी आते-आते ही आती है। मैं रोज हिंदी सीखने की कोशिश करता हूँ --- अ-कर्मक और स-कर्मक भाषा। इस उम्मीद से लगा रहता हूँ कि एक दिन सीख जाऊँगा, सीखना बंद कर देने की कोई उम्र नहीं होती!

sudipti said...

हिंदी की आधुनिकता तो कुछ खास समझ नहीं पाती मैं क्योंकि ऐसी कोई विशिष्ट विभाजक रेखा नहीं है कि कौन सी पारम्परिकता से आधुनिक हुई हिंदी
और हिंदी का सारा इतिहास ही आधुनिक काल का है शुक्ल जी जबरन पीछे ले गए
पर आपने सीधे सवाल उठाए हैं जैसे " हिन्दी मेरे लिए औपनिवेशिक भाषा है जो अंग्रेज़ी की औपनिवेशिक सत्ता के बरक्स अपना वजूद बनाते हुए सत्ता की बोली बोलने लगती है।" आपकी इस बात से इत्तफाक रखते हुए बावजूद इसके की हिंदी को हम बेहद प्यार करते हैं।

sudipti said...

हिंदी की आधुनिकता तो कुछ खास समझ नहीं पाती मैं क्योंकि ऐसी कोई विशिष्ट विभाजक रेखा नहीं है कि कौन सी पारम्परिकता से आधुनिक हुई हिंदी
और हिंदी का सारा इतिहास ही आधुनिक काल का है शुक्ल जी जबरन पीछे ले गए
पर आपने सीधे सवाल उठाए हैं जैसे " हिन्दी मेरे लिए औपनिवेशिक भाषा है जो अंग्रेज़ी की औपनिवेशिक सत्ता के बरक्स अपना वजूद बनाते हुए सत्ता की बोली बोलने लगती है।" आपकी इस बात से इत्तफाक रखते हुए बावजूद इसके की हिंदी को हम बेहद प्यार करते हैं।

nilu jignesh said...

Ravishji Samajshastra ke hisab se har samaj me dominant class hota hai Jiske bhasha , life style ko baki logo ke dwara apnakar samaj me apna haisiyat badane ki hod hoti hai.Dominant class jo hota hai wo apni visishta barkar rakhne ke liye chizo ko ur bhi complicated karta jata hai.Bhasha ke sath bhi aisa hai.

Khair hindi Ka to Jo hai so hiye hai par Bhojpuri ko bhi uska respect milna chahiye. Mera bahut man hota hai Bhojpuri ke liye aisa manch banane ka Jo bhojpuri ko uski garima dila sike

Pankaj Kumar said...

भाषा के नाम पे भेद भाव सब बाहरी दिखवा और रुतबा का खोखला प्रदर्शन है सर! मुख्य रूप से भाषा तो एक माध्यम है अपने भावों को बाहर लाने का। और इस माध्यम पे बहस वही करते हैं जो अपने को दूसरों से बड़ा और सभ्रांत श्रेष्ठ दिखाना चाहते है, जो कि बिल्कुल बेबुनिआद झमेला है ! मै अपनी कहूँ तो CCL के एक कॉलोनी (बोकारो) में पला बढ़ा हूँ। मेरी माँ मगही बोलती है, सामने की चाची आरा से है जो भोजपुरी बोलती हैं, एक और चाचीहैं बनारस से वो वहाँ वाली भोजपुरी बोलती हैं, ऐसे ही मुंगेर से भी एक चाची है अंगीका के साथ । अगर देखा जाये तो सभी की भाषा अलग अलग है लेकिन जब इनके बात सुनियेगा तब पता चलता है भाषा का स्थान क्या है। चरों अपनी अपनी ठेस भाषा में ही बोलेंगी और दूसरे को पूरी तरह समझेगीं भी। मुझे नहीं लगता कि उन्हें इसका खबर भी होगा कि वो अलग अलग भाषा में भी गप कर रही हैं ! सर, ये दुखद है कि बहुत लोग भाषा के नाम पे अपनी पहचान बनाने में जूट हैं और उस माध्यम पे ही छीर सागर तरने की तमन्ना पाले बैठे हैं !

Akhilesh Jain said...

जो अंतर आपने अंतिम पैरा में भोजपुरी और हिंदी में बताया वही शायद अब हिंदी और इंग्लिश में हो चला है. हिंदी के प्रति इस बेहतरीन लेख के लिए धन्यवाद।

sushant jha said...

बढ़िया पोस्ट। मैं जब पहली बार दिल्ली आया था तो आआईएमसी में ही मेरे एकाध वरिष्टों ने ज्ञान दे दिया था कि बिहारी टाइप मत बोलो। सहम गया था।

Pramod said...

'' हिंदी नई चाल में ढली। '' जी , ढालने वाले थे भारतेन्दु हरिश्चंद्र। आधुनिक हिंदी के प्रवर्त्तक। पता नहीं किताब में आधुनिकता की अवधारणा किस रूप में है , यह तो पढ़ के ही पता चलेगा !
आपकी भोजपुरी -हिंदी की चर्चा से याद आया जब हम स्कूल में हिंदी बोलने से लजाते थे ! प्राइमरी की अध्यापिका जी को जी 'धपका' कहते थे।
मिडिल -हाई स्कूल तक अटेंडेन्स में शिरीमान बोलते थे। और कभी प्रयोग के तौर पर यस सर या प्रेजेंट सर बोल देते थे तो पूरी क्लास ही नहीं , एक बारगी मास्टर साहब भी भौंचिकिया जाते थे ! अंग्रेजी भी भोजपुरी -हिंदी में पढते थे।

आज भी याद है जब हमारे अर्थशात्र के विद्वान मास्साहब ने क्लास में किसी प्रसंग में कहा कि मैंने तीन साल की बच्ची को शुद्ध हिंदी बोलते हुए देखा है। तो पूरी क्लास श्रद्धानत थी।
किसी आश्चर्य लोक की गाथा जैसी लगती थी। आज मेरी बेटी उसी 'आश्चर्य की भाषा' को बोल लेती है।
गाँव में हिंदी बोलने का मतलब अंगरेजी छांटना रहा। हमें लगता है कि आधुनिकता की भी एक पक्षीय व्याख्या होती रही हैं। जैसे खाने पीने के क्षेत्र में हम बात करें तो पिज्जा , बर्गर और उल्टा -पुल्टा खाने वाले आधुनिक माने गए हैं कि नहीं ? आज तो देख ही रहे हैं कि खान -पान की विविधताएं अचानक मटर -पनीर में तब्दील हो गयी हैं।
और सानी -पानी की तरह सोहनकर दाल -भात , मकुनी -चोखा , माछ -भात खाने वाला भुच्चड़ ! जबकि कोई भी आधुनिक , उत्तर आधुनिक यह नहीं कह सकता कि हमारा स्वाद तत्व उत्तम है ! vigyan ke anusar .
आधुनिकता विचार के धरातल पर अपडेट होती रहती है। अंगेरजी साम्राज्यवाद में न जाने कितनी भाषाएं खत्म हो गयीं। मर गयीं। आधुनिकता की मार है न ! अशोक वाजपेयी के शब्दों में '' आज जातीय स्मृति के सबसे बड़े संग्रहालय भाषा का विलोपन हो रहा है। '' हम ज्ञान -विज्ञान के उपनिवेश भर बनाते जा रहे हैं ! अपनी आधुनिकता भी द्वितीयक है जी ! नव उपनिवेशन को भूमंडलीकरण के नख -दन्त द्वारा ढंका जा रहा है।
खैर , पढ़ कर देखेंगे suggested 'हिंदी की आधुनिकता' को !

Pramod said...

विनोद कुमार शुक्ल की कव्य पंक्तियां हैं --जितने सभ्य होते हैं / उतने अस्वाभाविक / आदिवासी जो स्वाभाविक हैं / उन्हें हमारी तरह सभ्य होना है / हमारी तरह अस्वाभाविक/
जंगल का चन्द्रमा / असभ्य चन्द्रमा है ....

CA MANOJ JAIN said...

Sir, H.M.T. Type hona hi jyada achha hai....

CA MANOJ JAIN said...

SIR PRIME TIME AAPKA WAIT KAR RAHA HAI.....

Pramod said...


आधुनिकता की परंपरा …
'' मैं दोनों हाथ उठा -उठा कर कहता हूं , लेकिन मेरी कोई नहीं सुनता कि धर्म के रास्ते पर चलकर अर्थ और काम की प्राप्ति क्यों नहीं की जाती। '' --महाभारतकार व्यासजी
'' भला हुआ मोरी गगरी फूटी , मैं पनियां भरन से छूटी ''---कबीर
'' किसी से न डरना , गुरु से भी नहीं , लोक से भी नहीं .... मन्त्र से भी नहीं। ''---बाणभट्ट की आत्मकथा , आचार्य हजारी प्रसाद जी
'' क्या पूर्व पक्ष के वे ऋषि कुछ कम पूज्य हैं , जिनका खंडन उत्तर पक्ष में किया गया है ? ''---दूसरी परंपरा की खोज , नामवर सिंह
'' महाभारतकार ने कहा कि बिना दूसरों को सताये , बिना दुष्टों के दरबार में हाजिरी दिए और बिना सज्जनों की राह से हटे यदि थोडा भी मिलता है तो उसी को बहुत मानना
चाहिए। '' ---विद्यानिवास मिश्र की पुस्तक से।

Vidya said...

Being just metric pass in Hindi, apologies for NOT expressing my thoughts in Hindi.
Language is just a medium to express ones thoughts and ideas.
People who judge others as H M T are shallow in their thinking.
People who think of themselves as H M T - stop playing the victim card. Its time to assert yourselves.

प्रवीण पाण्डेय said...

समझ, अभिव्यक्ति और भाषाओं की राह से होकर चल रहा हूँ, पता नहीं आधुनिकता कितना घेर चुकी है।

Rashmi R said...

Maine 8th class tak Hindi me padai ki hai.. Par phir bhi meri Hindi bahut kharab hai kyonki uske bad kabhi Hindi use karne ka mauka nahi mila.

It is more tough for people with regional mother tongue to continue with Hindi.

I had a roommate from Patna. She had two different dialects for Hindi.
One for talking on phone with parents where she used to refer herself as "Hum" and one for rest of rest so that people do not make fun of her.

Mahendra Singh said...

Vimochan type, HMT aur Marine drive ka bada hee sundar proyog kiya hai. Pahlee baar pardesh ke roop me Bombai jana hua. Babuji ko vahi se retire hona tha(Subedar). Meree badi bahan Hindi na bol pane kee wajah se mujhe saath nahi le jati thee.Bahoot bolne par Avadhi aur Hindi ka mixture Manchurian jaisa ho jata tha. Ek baar baat karne me "Bardha"(Bail)shabd ka use kar diya. Oose samjhane me mera sabkuch ho gaya. Kuch puchiye mat cheenke aa gayee.....

Shipra K said...

sir maine miss kr diya.mujhe pahle pata hi nhi chal paya k aap aaj aane wale the.abhi ye padha to jana.mai bht dukhi ho gai sach me :(

Shipra K said...

bhojpuri k samne hindi ek upniveshik bhasha kahi ja sakti

vinay kumar said...

एक अटपटी बात- हिन्दी या तो २०वीं सदी के पहले आधुनिक थी या २०वीं सदी के अंत से आधुनिक हुई. गोबरपट्टी के प्रकांड विद्वानों ने २०वीं सदी के पूर्वार्ध में इसका कबाड़ा किया. देवनागरी लिपि और सांप्रदायिक राजनीति ने इस भाषा को अनजाना बना दिया था जो न सिर्फ अपने अतीत से कटी हुई थी बल्कि अपनी संवृद्ध लोकभाषाओं से भी कटी हुई थी.एक कृत्रिम. आज भी हमारे यहाँ कैथी लिपि में लिखी बही हमने संजो कर रखा है. बहुत बातें है बताने को. खैर फिर किसी सन्दर्भ में. रेनू और रही मस्सों रजा को पढ़ते हुए हिंदी से कोफ़्त नहीं हुई. बाकी हिंदी वाले बेहतर ढंग से बता पायेंगें.

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस प्रस्तुति को आज की छत्रपति शिवाजी महाराज की ३८४ वीं जयंती और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Shipra K said...

hum bhojpuri bolte hue bhi aadhunik hain.mujhe lagta hai k hindi ki aadhunikta lokbhashaon k sath uska prayog kiye jane me hai.

Navin Kumar said...

रवीश जी राउर ई लेख अगर भोजपुरी मे रहित त बहुत बरिआर जबाब रहित ओह लोगन खाति जे रउरा माई के एह से हिकारत भरल नजर से देखत रहे काहे कि ऊ नीमन से हिन्दी आ अंग्रेजी ना बोलि पावत रहली । खैर..

nandan sharma said...

Sir,
We are waiting for you to come on prime time again.

Rajat Jaggi said...

Bahot acha

Prabhat Kumar said...

Ravish Sir, are we free to choose language at the present scenario? I, too, came to Patna in 1999 from a small kasba, Birpur, a place one & half km. away from Nepal. Here, I was forced to learn English and just in the manner the British forced the Indians to obey before the Independence. Linguistically, we are still colonised and for this our present education system and a few handful of so called elite people hold accountability.

bablu sharma said...

बहुत नीक बाटे आपन भोजपुरी, भलही लोग के फटकार मिलें बाकी हमार त जुबान हवें भोजपुरी,इ उ ह जेहके सबसे पहीलें बाबु माई चाचा चाची इनके सहयोग से बोललें रही,उपहास होता अच्छो चिज के कभो कभो, बाकी उपहास से बराबर मुकाबला करत आ रहल बा आपन भोजपुरी, हमही ना आज भोजपुरी बोलेवालन के संख्या गणना के अधार पर बहुते आगे बाटें...

Chandra Kishore said...

Ravish babu bahut badhiya lagal tahar blog..ek cheej ta manee ke padi bhai jab to rajniti chood ke kaunooo dusar subject pe likhela ta bhaiya sachmuch kamal likhela...agar wartaman me dekhal jai ta thodakahi kahi biased lagela waise tahar lekhni ke jor naikhe...aise hii uperwale ke kripa se aage badaht raha..

ankit mohan singh said...

m toh aaj tak m or hm me hi phasa hua hu . Ab toh lagta h english kaa hi Istemaal hi behtar h . aaj bhi gao jaane pr apni bhaasa nahi bolne kaa malal hota h .

शैलेश पटेल ( बनारसी ) सूरत ,गुजरात said...

आपका लिखा गया """ मेरी मातृभाषा भोजपुरी है । हिन्दी मेरी पहली अंग्रेजी । हिन्दी बोलना कांवेंट होना था । गाँव घर में हिन्दी बोलने पर डाँट पड़ती थी कि ज़्यादा अंग्रेज़ी मत बोलो । मुझे रटाया गया है कि मेरी मातृभाषा हिन्दी है । बाद में सचेत हुआ तो पूछने लगा कि जो मेरी माँ बोलती है वो मातृभाषा नहीं है । क्यों । मेरी माँ भोजपुरी है । हिन्दी मेरे लिए अंग्रेज़ी की तरह कामकाज की एक और भाषा है । विकल्प है । हिन्दी के इतिहास को इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते पढ़ सकता हूँ मगर ओढ़ नहीं सकता क्योंकि मैं इसके इतिहास का आरंभिक सहयात्री नहीं रहा । अपनी पारिवारिक पीढ़ियों में विशुद्ध रूप से हिन्दी बोलने वाले हम पहली पीढ़ी हैं । तो क्या हम भोजपुरी बोलते हुए आधुनिक नहीं हैं । नहीं थे । भोजपुरी की आधुनिकता कहाँ से आई ।

मेरे लिए हिन्दी मरीन ड्राइव है । भोजपुरी की इतिहास चेतना भले न हो मगर वो मेरी भाषा है । जिसे जानने के लिए मैंने व्याकरण की किताब नहीं पढ़ी और मैट्रिक पास होने के लिए नंबर नहीं लाने पड़े । इस हिन्दी को अपने ही घर में डराते देखा है । बचपन में हिन्दी बोलने वाली संभ्रांत महिलाएँ चाचियां मेरी माँ को गँवार समझती थी । मेरी माँ उनसे वैसे ही टूटी फूटी हिन्दी बोलती थी जैसे मैं अंग्रेज़ी बोलता हूँ । उन चाचियों को अंग्रेज़ी नहीं आती थी । उनके लिए हिन्दी शहरी और अफ़सरी की भाषा थी जो गाँव से पटना आई मेरी भोजपुरी बोलने वाली माँ को हिक़ारत और अनपढ़ नज़र से देखती थी । इसलिए हिन्दी मेरे लिए औपनिवेशिक भाषा है जो अंग्रेज़ी की औपनिवेशिक सत्ता के बरक्स अपना वजूद बनाते हुए सत्ता की बोली बोलने लगती है । हम हिन्दी को हमेशा औपनिवेशिकता के ख़िलाफ़ देखते हैं, हिन्दी में औपनिवेशिकता को नहीं देखते । हिन्दी की आधुनिकता ज़रूर पढ़ियेगा । """""
दिल को छु गया, तोहरे जइसन मरदवा लिखेक:हिमत कर सकेला.

शैलेश पटेल ( बनारसी ) सूरत ,गुजरात said...

आपका लिखा गया """ मेरी मातृभाषा भोजपुरी है । हिन्दी मेरी पहली अंग्रेजी । हिन्दी बोलना कांवेंट होना था । गाँव घर में हिन्दी बोलने पर डाँट पड़ती थी कि ज़्यादा अंग्रेज़ी मत बोलो । मुझे रटाया गया है कि मेरी मातृभाषा हिन्दी है । बाद में सचेत हुआ तो पूछने लगा कि जो मेरी माँ बोलती है वो मातृभाषा नहीं है । क्यों । मेरी माँ भोजपुरी है । हिन्दी मेरे लिए अंग्रेज़ी की तरह कामकाज की एक और भाषा है । विकल्प है । हिन्दी के इतिहास को इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते पढ़ सकता हूँ मगर ओढ़ नहीं सकता क्योंकि मैं इसके इतिहास का आरंभिक सहयात्री नहीं रहा । अपनी पारिवारिक पीढ़ियों में विशुद्ध रूप से हिन्दी बोलने वाले हम पहली पीढ़ी हैं । तो क्या हम भोजपुरी बोलते हुए आधुनिक नहीं हैं । नहीं थे । भोजपुरी की आधुनिकता कहाँ से आई ।

मेरे लिए हिन्दी मरीन ड्राइव है । भोजपुरी की इतिहास चेतना भले न हो मगर वो मेरी भाषा है । जिसे जानने के लिए मैंने व्याकरण की किताब नहीं पढ़ी और मैट्रिक पास होने के लिए नंबर नहीं लाने पड़े । इस हिन्दी को अपने ही घर में डराते देखा है । बचपन में हिन्दी बोलने वाली संभ्रांत महिलाएँ चाचियां मेरी माँ को गँवार समझती थी । मेरी माँ उनसे वैसे ही टूटी फूटी हिन्दी बोलती थी जैसे मैं अंग्रेज़ी बोलता हूँ । उन चाचियों को अंग्रेज़ी नहीं आती थी । उनके लिए हिन्दी शहरी और अफ़सरी की भाषा थी जो गाँव से पटना आई मेरी भोजपुरी बोलने वाली माँ को हिक़ारत और अनपढ़ नज़र से देखती थी । इसलिए हिन्दी मेरे लिए औपनिवेशिक भाषा है जो अंग्रेज़ी की औपनिवेशिक सत्ता के बरक्स अपना वजूद बनाते हुए सत्ता की बोली बोलने लगती है । हम हिन्दी को हमेशा औपनिवेशिकता के ख़िलाफ़ देखते हैं, हिन्दी में औपनिवेशिकता को नहीं देखते । हिन्दी की आधुनिकता ज़रूर पढ़ियेगा । """""
दिल को छु गया, तोहरे जइसन मरदवा लिखेक:हिमत कर सकेला.

Anita Jha said...

कुछ दिनों से आपका ब्लॉग पढ़ रही हुँ | लिखना भी चाहती थी पर अंगरेजी में हिंदी लिखना ठीक नहीं लग रहा था | हिंदी फॉन्ट लैपटॉप पर डाउनलोड भी किये पर मात्राओ में गलती रह ही जाती थी | भले ही हम यू पी या बिहार मे हो अग्रेजी से काम चल जाता है | किस्मत से सुबह एक लिंक मिला जिसमे आप रोमन में लिखे और वो देवनागरी हो जाती है | सोचा इसी का फायदा उढ़ा लिया जाये |

भाषा तो अभिवक्ति है कुछ बुद्धिजिव लोगो ने इसे व्याकरण का ओढना ओढां दिया है| आज जो आधुनिक है कल रूढ़िवादी था | परिवर्तन का शायद दूसरा नाम आधुनिकीकरण है| सदियो से ऐसा ही होता आया है | भाषा को कही न कही हम दुसरो के कहने पर अपनी कमी मान लेते है | और मानना पड़ता है टीचर यही कहते है | अधिकतर लोग अपने कमेंट मे गाव को कारण बता रहे है | पर इसका उल्टा भी हो सकता है |

मै अपनी बात कहु तो हम ऐसे परिवार से है जहाँ हम मैथिली सुनते और अग्रेजी और हिंदी बोलते बड़े हुई है | जैसा के मिथिली या शायद बिहार के परिवार मे होता है बड़ा बच्चा नानी-नाना के पास रह जाता है ऐसा ही हमारे परिवार मै हुआ..दीदी नानी के घर रह गई थी | जब मेरे स्कूल जाने का समय आया तो दीदी को लाना पड़ा | पर दीदी सिर्फ मैथिली के आलावा कुछ नहीं बोलती थी | दीदी को अग्रेजी और हिंदी सिखाने के लिए डैडी ने अंग्रेजी और माँ ने हिंदी मै बोलना सुरु किया और वही घर के परम्परा बन गई | मैथिली कही पीछे झूट गई | और डिफेन्स के माहौल मे कहीं इसकी कमी भी नहीं खली | पर कई बार जब मैथिल लोगो के बीच रहते और गाव जाते तो बहुत ही अजीब लगता था | हर कोई एक ही सवाल करता था - मैथिली क्यों नहीं बोलते हो और न चाहते हुए भी मैथली सभा मै जाना अच्छा नहीं लगता था | कई बार नानी और माँ कि वार्ता भी सुनी | तुमने बच्चो को मैथिली क्यों नहीं सिखाया और माँ पलट कर कहती थी तुम ही जिम्मेदार हो बड़की को क्यों अपने पास रक्खा |

स्कूल मै नैंसी ड्रियू और फेमस फाइव और कॉलेज मै मिल्स एंड बून्स पढ़ कर बड़े हुए | यही माहौल था डिफेन्स का जो हमें मिला था | हिंदी से भी धीरे धीरे नाता छूट ही गया था सिर्फ बोल चाल की भाषा ही रह गई | लिटरेचर के नाम पर कोई किताब गिफ्ट मे आता तो पढ़ लेते थे | कभी कोशिश नहीं कि भाषा जानने कि और सच कहु तो जरुरत ही नहीं पड़ी |

पर शादी ऐसे घर मै हुआ जहॉ मैथिली बोलना जरुरी था | सास-ससुर के सख्त हिदायत बहार कुछ भी बोलो पर घर मै हमारे साथ मैथिली ही बोलना पड़ेगा | शादी के सुरु के वो दिन बहुत ही अजीब थे | लगता मै अपनी बात सही ढंग से नहीं रख पा रही हुँ | कई बार मन मे एक अजीब uneasiness की फीलिंग होती थी |जैसा की हमेशा होता आया है गुस्सा पति पर निकलती ये क्या तरीका है | वो कहते समझती तो हो न ? क्यों नहीं समझूंगी - मम्मी डैडी हमेशा आपस मै मैथिली ही तो बोलते थे | कई शब्द जो मुझे आते थे वो शायद अच्छे अच्छे मैथिली बोलने वालो को भी नहीं पता थे | पर बोलना मुश्किल लगता था | कई बार अपनी मैथिली की कारण हास्य का विषय भी बनी | पर सास- ससुर जीत गए और मै जल्दी ही मैथिली सीख गई |

जब आपको ट्विटर पर देखा तो एक पूरा ग्रुप दिखा जो हिंदी मै लिखना पसंद करता है और लिखता ही नहीं गर्व महसूस करता है | कई आपके रंग मे रंगने की कोशिश कर रहे है जिसमे मै भी हुँ | मतलब आपकी भाषा मे |अच्छा लगता है एसे लोगो को देख कर | जब तक आप जैसे और मेरे सास-ससुर जैसे लोग है भाषा निखरती रहेगी आप उसको जो भी नाम दे | कभी प्यार के कारण या कभी समझौता के कारण लोग आपसे जुड़ते है | और जुड़ते ही नहीं अपनी विद्वता दिखाने के लिए उसमे निखार भी लाते है | शायद आधुनिकीकर ! आज मैथली सभा मे बड़े गर्व से जाती हुँ | मैथिली मे भाषण भी देती हुँ | अच्छा लगता है जब मेरी बहने कहती है तुम अच्छी मैथली बोल लेती हो | वो अभी तक नहीं बोल पाती है | उन्हे मेरा माहौल नहीं मिला |

वैसे आपका प्रेम पत्र भी पढ़ा | पर जितना लिखाकर पढ़ा उतना और उलझ गई | क्या प्यार महबूबा और ये क्या महबूबाओं वाला ही हो सकता है | सच कहु तो अच्छा नहीं लगा पढ़ कर | पर शायद ये मेरी भाषा की अज्ञानता के कारण - कही मैने मेहबूबा को शोले का गाना तो नहीं समझ लिया | भाषा और प्यार जो न कराय !! जो भी हो जिंदगी ही उलझन है और शायद प्यार उसका ही एक रूप | और हा मेरे व्यकरण पर मत जाइयेगा | लिखते रहिये अच्छा लगता है आपको पढ़कर |

Punit prakhar said...

रवीश जी ! हिन्दी को एक अलग भाषा मानना जिसकी भोजपुरी या मैथिली या अवध , बज्र जैसी उपभासाओं से कोई समानता नही है बिल्कुल ग़लत है. जिसे आप आधुनिक हिन्दी या मानक हिन्दी कहते है वो भी बृहत हिन्दी परिवार जिसके अंदर भोजपुरी या मैथिली या अवध , बज्र इत्यादि है की एक उपभाषा है. इसका आँचलिक नाम "खरी बोली" है, जोकि पश्चिमी हिन्दी परिवार के अंतर्गत आती है. दिल्ली और उसके देहाती इलाक़े मे ये भाषा प्रचलित है. इसी भाषा का एक रूप उर्दू है. बृहत हिन्दी परिवार के अंतर्गत काफ़ी सारी भाषाएँ है और इनमे काफ़ी साहित्य भी लिखा गया है. लेकिन हिन्दी को व्यापक रूप देने के लिए इसका मानकी कारण और व्याकरण बनाना काफ़ी ज़रूरी था. और इसके लिए जो जिस उपभाषा को सबसे मान्य समझा गया वो "खरी बोली" थी. इसके बाद मानकीकरण की व्यापक परिक्रिया( जिसमे भारतेंदु हरिशचंद्रा, महावीर प्रसाद द्वेदी इत्यादि का काफ़ी योगदान था ) के बाद आधुनिक हिन्दी का वर्तमान स्वरूप सामने आया.

Manish Kumar Shukla said...

गाँव घर में हिन्दी बोलने पर डाँट पड़ती थी कि ज़्यादा अंग्रेज़ी मत बोलो ।

Pratibha Pal said...

Hello sir
I like your thoughts
Pratibha

Pratibha Pal said...

Hello sir
I like your thoughts
Pratibha

Pratibha Pal said...

Hello sir
I like your thoughts
Pratibha

Pratibha Pal said...

रवीश जी
विचार पढ़ कर अच्छा लगा|
प्रतिभा

SHAHIL said...

KRANTI LAA DOO GEE GURUJII AAP EK DIN...PAR TWITTER SEE GYAAB MAT HUA KARO....ISS qasba MEIN Hume ghar lagta hai apna...MAIN BHI IIMC jana chata tha par umar nikal gai...BUT aak ke words se lagta hai IIMC mein huu ,bahut bharitya saa feel hota hai aap kaa LEKH par kar...

Mahendra Singh said...

Ankitaji Hindi me likhne wala link batayeega. Aapke vichar padhkar bahoot accha laga.Puneetji ne bhi bahoot achchee jankari di hai.

Bhanu Fuloria said...

Google par "google translate" search kariega mahendra ji. Software bh downlod kar saqte hain .

InsomaniacK said...

aapne ndtv chor diya hai kya ??
p sainath k baare me padha abhi, aapko kya lagta hai ?
sahi platform nahi hai par kya sochte hai

InsomaniacK said...
This comment has been removed by the author.
Pulkit Gupta said...

Kya joota gila kar ke mara hai, hindi ki opniveshikta ko le kar. HMT ne to dil khol ke hasa diya. Me bhi ghadi hi samajhta tha

manish rawat said...

aap lekh padke kaafi accha laga ki sirf me hi nahin aur bhi hamari desh ki bhasha/boliyoun ke baare me sochte hain......mere pass hindi font nahin hai ...me uska intejaam bhi karoonga...per abhi me apne vichaar rakhna chahta hoon ki jis tarah se hamari eductation system chal raha hai ...har koi english janna chahta hai ...apne bacho ko english hi padana chahta hai ..usse ek din hum english bolna to sikh jayenge per ...hum apni matr bhasha/boli bhool jayeenge ...aur wo hamare liye bahut hi dhokhad din hoga ....mughe nahin pata ki me kaise yogdaan do ..me apni 3 saal ki bachhi ko hindi medium ya kissi bhi desi bahasha me padana chahta hoon per baap ka deemag kahata hai ki kyoun bacche ke jeevan se khiwadd karoon ....hum kab is dhovidha se bahar aayenge jab hum apne bache ko haq denege ki wo kya karna chata hai aur kya nahi ....kya bahasa padna/bolna chahta hai ...naa ki baazar tay kare in cheezo ko ...me yahan pe apne ko bahut hi asamrth mashoosh kar raha hoon ......me is bandhan ko todna chahata hoon per samagh nahi aa rha ahai ki wo takat aur himmat kahan se jootaao ki jab me apne bache ko boloon ki jaa aur padai apni pasand ki basha me kar .....me ummed karta hoon ki me jab apni agli pidi ko aage ki baag dor soopon to unke mann me dhovidha naa ho ....jaise ki mere mann me hai ......shayad isliye hum abhi tak mansik roop se gulam hai ...angrezo ke nahin to anrejiyat ke .....lekin hame hi isse bahar nikala hoga .....kahte hain naa .."jo apni madat savayam karta hai uski madad Ishwar bhi karte hain" .....bus yahin sochta hoon ...ki is bandhan ko todna hai .....

Anita Jha said...

महेंद्र जी लिंक यह है
http://www.easyhindityping.com/

और लेख अच्छा लगा इस्केलिय धन्वाद |

Anita Jha said...
This comment has been removed by the author.
Anita Jha said...
This comment has been removed by the author.
Anita Jha said...

गलती से एक ही कमेंट बार बार चला गया था इसलेय डिलीट किया | बोलग पर नई हु कुछ दिन में सिख जाउंगी |

ravishndtv said...

अनिता,शैलेश, मनोज, महेंद्र, चंद्रा मैं आप सबकी टिप्पणियाँ पढ़ते रहता हूँ । यहाँ बार बार जवाब देना मुश्किल हो जाता है मगर पढ़ता ज़रूर हूँ । अनिता हिन्दी अंग्रेज़ी की चिन्ता मत कीजिये । जिसमें सबसे अच्छा बोल सकती हैं लिख दीजिये । वैसे आपने हिन्दी में लिखने के लिए इतना जतन किया उसके लिए तहेदिल से शुक्रिया । प्रमोद आपका भी ।

ravishndtv said...

प्रवीण पांडे आपका जवाब तो ज़रूर पढ़ता हूँ । कमेंट देने में आप देरी नहीं करते ।

Tatvaantar -Bharat said...

आधुनिक हिंदी बोलनी है तो तो थोडा शब्दों को गलत बोलना पड़ेगा जैसे "बहुत" शब्द को ही लें आधुनिक लोग इसे "बहोत" बलते हैं। इसके अलावा बोलते वक्त अपने जबड़े को थोडा कम खोले और इसका ध्यान रखे कि आप के लिप्स एक कैची है जो शब्दों की फुनगी को ऊपर से थोड़ा छाट रही है। और बहुत कुछ है कहाँ तक लिखूं
अगर कॉर्पोरेट लोगो को पता चल गया तो इसकी भी दुकानदारी साउथ एक्स से लेकर नोएडा तक खड़िया देंगे। खैर रवीश जी आप का लेख पढ़ कर आनंद आया।

Anita Jha said...

Thanks a lot...............

manjeet singh said...

Mujhe apke is bog ka pata hindustan news paper se mila, mai apko pata nahi sakta kitna achchha laga. mai apke blog ko apne facebook pe bhi post kar raha hu taki . Apka ye lekh mere sare purvi mitro tak puhuche.
Manjeet kumar singh

kamini singh said...

Wakai sir, aapko sunte wakt jitna accha lafta hai utna he aapko padkar lagta hai.Hum Bharat vasi aapk atyant aabhari hain jinki wajah se Hindi ko hm aj bhi utni he shaalinta k saath pad or sun paate hain. Hmari bhasha bhojpuri to nahi hai parantu brij bhasha avashya hai, jise hm bhi badi khushi se bolte hain. English bol bol kar Ravivar ko jb ghar jakr braj bhasha main baat krk aanand prapt hota hai. Dhanyavad
aapki priy darshak, srota, paathak ..... Kamini