तुम्हारा जात क्या है वोटर !

इक्कीसवीं सदी के चौदह साल बाद इक्कीसवीं सदी के भारत के लिए हो रहे चुनाव नया लगते लगते पुराना लगने लगा है । यह चुनाव किसी नए भारत के लिए नहीं हो रहा है बल्कि इसमें वही जात-पात है वही खर-पतवार है । कांग्रेस बीजेपी ने जात-पात की राजनीति के ख़िलाफ़ एक ऐसा विकल्प पेश किया है जो कम विश्वसनीय लगता है । ये दोनों ही पार्टियाँ क्षेत्रीय दलों की आलोचना करती है मगर इन्हें उन्हीं जात पात वाले दलों से गठबंधन करने या विलय करने में कोई नैतिक संकट नहीं होता । ऐसे विलय महज़ चुनावी होते हैं । इनमें कोई स्पष्टता नहीं होती कि विलय कर रहे दलों ने जात पात की राजनीति का त्याग कर दिया है या क्यों राष्ट्रीय दलों ने इनके जात पात को अंगीकार किया है ।

अब नरेंद्र मोदी की जीत किसी नए भारत की वजह से नहीं होने जा रही है । शायद मोदी और बीजेपी भी समझ गए हैं कि रैलियों और सेमिनारों के स्लोगन से चुनाव नहीं जीते जाते । जातिगत आधार ख़ज़ाना पड़ेगा । तभी तीन तीन चुनाव जीत चुके मोदी ने कभी अपने पिछड़ा होने की बात नहीं की और न चाय बेचने वाली अतीत का राजनीतिक इस्तमाल किया । पार्टी के कई नेता जातिगत आधार सर्च करने में जुट गए हैं । तभी यूपी जाकर बीजेपी दलित मोर्चा के अध्यक्ष संजय पासवान कांशीराम को भारत रत्न देने का वादा कर बसपा के इस महान संस्थापक की विरासत पर अतिक्रमण करना चाहते हैं । इसे अंग्रेज़ी में 'अप्रोप्रिएट' करना कहते हैं यानी हड़पना । बसपा ने अनेक बार कांशीराम को भारत रत्न दिये जाने की बात की है । संजय पासवान दिल्ली बीजेपी मुख्यालय में बने अपने दफ़्तर में कांशीराम की तस्वीर भी लगाई हैं । उन्होंने जगजीवन राम पर भी किताब लिखी है जिसका नाम है राष्ट्रनिष्ठ बाबूजी ।इस किताब में दिलचस्प तरीके से जगजीवन क़ी राजनीति को हिन्दुत्व के फ़्रेम में फ़िट कर देते हैं । जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार कांग्रेस की सांसद हैं । मुझे नहीं मालूम की मीरा कुमार अपने पिता को हिंदुत्व के खांचे में देखती हैं या नहीं । वैसे उन्हें संजय पासवान की किताब का एक चैप्टर तो पढ़ना ही चाहिए जिसका शीर्षक है 'ख़ून में बसा था हिन्दुत्व ' । आज की राजनीति में वैचारिक बहसें नहीं होतीं इसलिए ऐसी किताबें लोगों तक पहुँच कर भी चर्चित नहीं होती । कम से कम भरमाने की राजनीति का ख़ुलासा तो हो ।




बहरहाल खबर आ रही है कि बीजेपी बिहार में कुशवाहा समाज के नेता उपेन्द्र कुशवाहा से गठबंधन करने जा रही है ताकि ओबीसी मतदाता पार्टी की तरफ़ आ सकें । तो सर्वाधिक लोकप्रिय नेता नरेंद्र मोदी की जीत बिना जातिवादी नेता उपेंद्र कुशवाहा के नहीं हो सकती क्या । उपेंद्र कुशवाहा की राजनीति में ऐसा कौन सा राष्ट्रवादी तत्व है जिसके लिए बीजेपी चुनाव के समय ही हाथ मिलाना चाहती है । बीजेपी में कुशवाहा नेता नहीं है क्या ? उसी तरह पार्टी यूपी में भी अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल के सम्पर्क में हैं और ख़बरों के अनुसार अपना दल को बीजेपी में विलय की तैयारी चल रही है । क्या ये बीजेपी कांग्रेस का जातिवाद नहीं है । कांग्रेस ने भी यूपी विधानसभा चुनावों से पहले कुर्मी समुदाय में पकड़ रखने वाले नेता बेनी प्रसाद वर्मा को समाजवादी पार्टी से अपनी पार्टी में लाकर केंद्र में मंत्री बनवा दिया । ये और बात है कि कोई चुनावी लाभ नहीं हुआ ।

क्या इन दलों पर अवसरवादी जातिवादी राजनीति का आरोप नहीं लगना चाहिए । ये पार्टियाँ राजनीत स्तर पर जात पात ख़त्म करने का जोखिम क्यों नहीं उठातीं । फिर इनके जात पात और दूसरे के जात पात में क्या अंतर है । अंग्रेज़ी अख़बार  इंडियन एक्सप्रेस से इंटरव्यू में बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी कहते हैं कि बिहार में पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग काफी बड़ा है । इस बहुसंख्यक समाज के बारे में बात करना ग़लत नहीं है । हम इनसे मोदी के पिछड़े होने और चाय बेचने की कहानी से राब्ता क़ायम करना चाहते हैं । सुशील मोदी कहते हैं एक सौ तीस जातियाँ हैं अति पिछड़ा समूह में । हम मतदाताओं की छतरी बनाना चाहते हैं जाति और धर्म से आगे । लेकिन उनके बयान से यह साफ़ नहीं होता है कि यह छतरी किस तरह से बिना जातिवाद के बन रही है । वे यह भी नहीं बताते कि मोदी की पहचान के अलावा कौन से वे मुद्दे हैं जिनसे वो पिछड़ावाद की राजनीति को ख़त्म करना चाहते हैं । 

बीजेपी और कांग्रेस को कहना चाहिए कि वे पिछड़ावाद ी राजनीति को ख़त्म करना चाहते हैं । यह साफ़ हो ताकि पिछड़े और अति पिछड़े मतदाता भी फ़ैसला करें कि वे अपने राजनीतिक वर्चस्व की दावेदारी को छोड़ने के लिए तैयार है । बीजेपी में मोदी का उभार शायद एक और प्रक्रिया का उभार है जिसकी तरफ़ सुशील मोदी मतदाताओं की छतरी की बात से इशारा करते हैं । यही कि अब पिछड़ा नेतृत्व राष्ट्रवादी बीजेपी में भी उभर सकता है । बल्कि उभर चुका है । तभी दलित मोर्चा के अध्यक्ष संजय पासवान कहते हैं कि वे आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात कहने वाले कांग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी की बात से सहमत हैं । जाति आधारित आरक्षित की समीक्षा होनी चाहिए । तो क्या आरक्षण का अधिकार गँवा कर देश का बहुसंख्य मतदाता पिछड़ा अति पिछड़ा और दलित बीजेपी के राष्ट्रवादी ढाँचे में विलीन होना चाहेगा । क्या बीजेपी सचमुच जात पात के ख़िलाफ़ लड़ रही है या कथित रूप से उसी जात पात के अंडे को अपने बाड़े में लाकर सेंकना चाहती हैं । आख़िर जब मोदी की लहर है तब अनुप्रिया पटेल या उपेंद्र कुशवाहा की ज़रूरत क्यों है । क्या बीजेपी को लगने लगा है कि स्वर्ण मतदाताओं की मुखरता लहर तो पैदा करती है मगर असर नहीं । इसीलिए मैं कहता हूँ कि  यह चुनाव हो तो रहा है जात पात पर ही । बाकी त जो है सो हइये है ।

30 comments:

Atul Kumar said...


waffa-e-habib pe shart hain aaj ki fitrat
jaffa-e-rakib na ban jaye kal ki seerat
masla –e- mayyat dekha ,aur inka daard

khakshar ka kya, dekha Ilm al adad

(Art of Counting -Ilm al adad
inka matlab Siyasatdano ka )

read more at http://atulavach.blogspot.in/

ANITA SINGH said...

aaj tak ke sare chunav jatpat par hi huye hai. 21vi sadi se kya lena dena hamare netao ko.aaj bhi nam ke bad cast log puchte hi hai.

प्रवीण पाण्डेय said...

समाज में व्याप्त सोच से कैसे उठ सकती है राजनीति, धारे धीरे जायेगी यह।

Vidya said...

Parties are just a reflection of the attitudes of the people in the society we live in.

When educated journalists who interviewed Rakhi Bidlan in cosmopolitan Delhi were more interested in her caste comparing her to Mayawati (even while she vehemently protested) than what her goals for development was, why is it surprising when politicians try to exploit this mentality of the people?

Pramod said...

भारत में जाति ही वर्ग है , बिहार और यू पी में खासकर! बीएचयू के एक पूर्व छात्र नेता और अब पूर्ण समाजवादी नेता अस्सी के चाय चौपाल (मोदी जी वाला नहीं.... सनातन !) में
कहते रहे हैं कि जाति लोकतंत्र का प्राण है। लोकतंत्र की संजीविनी है जाति। नहीं तो जाति चेतना नहीं रही होती तो लोकतंत्र खत्म हो गया होता ! मुलायम , लालू , बहनजी , विकास बाबू नीतीश आदि -आदि के भोटर ऐसे ही सारा काम -धाम छोड़ -छाड़कर भोट देने नहीं जाते ! अस्मिता बोध है जी ! सोचिये जाति के बिना लोकतंत्र कितना उदासीन हो जायेगा !
अपने नीतीश जी , लालू जी , मुलायमजी , बहन जी …… और तमाम जी इसीलिए न परेशान हैं कि मोदी ने अपना 'जात ' और 'वर्ग ' याद कर ही लिया आखिर !
बिहार और यूपी में इसके बिना काम नहीं चल सकता जी !
और हम क्यों यह भूल रहे हैं कि भारत में ही जातिवादी और जनवादी दोनों एक साथ होने -जीने का सुख भोगा जा सकता है !

भारतीय लोकतंत्र में जाति है वर्ग है। क्षत्रप जी लोग जाति का सुख भोगते हुए 'राष्ट्रीय ' पार्टियों को क्षेत्रीय बना दें तो फिर कांग्रेस और बीजेपी पर तो बड़ी जिम्मेदारी है न !
जात पर न पात पर या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद तो कहने के लिए है न !

दीपक बाबा said...

अगर कुछ प्रकाश आम आदमी पार्टी के कैंडिडेट पर डालते तो आपकी ये शोधपरक पोस्ट और भी बढ़िया हो सकती थी.

हरिनगर और तिलक नगर विधानसभा क्षेत्र में सिख बहुलता को देखते हुए दोनों जगह सिख उम्मीदवार खड़े किये.
अब लोक सभा चुनावों पश्चिमी दिल्ली में सिख उम्मीदवार को खड़ा किया है.
पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के पास दिल्ली के सभी विधानसभा क्षेत्र के मोलवियों के फोन नम्बर हैं - जो कार्यकर्ताओं द्वारा इक्कठा किये गए हैं.

दीपक बाबा said...

बाकि रही संजय पासवान की पुस्तक... तो वो तो जातपात तोड़ने का ही कार्य कर रही है. बसपा की मायावती को भूल जाएँ तो कांशीराम जैसे नायक भी कभी कभी ही जन्म लेते हैं.

Chandan Singh said...

ha ho rha hai ravish jee kyo AAP party ne bhi "ASHUTOSH" jee ko chandani Chauk se Ticket diya hai...Kyoki chandani chauk "Baniya Favourite" Diya Hai.

Chandan Singh said...

ha ho rha hai ravish jee kyo AAP party ne bhi "ASHUTOSH" jee ko chandani Chauk se Ticket diya hai...Kyoki chandani chauk "Baniya Favourite" Hai.

Chandan Singh said...

AUR ravish Jee ap bhi to Rakhi Birala ka interview lete wakt(Ham log me) unki jati ko rakh kar hi bate karte hai....

Ramanuj Mishra said...

Sahi kaha ravish jii par kya bina jaat pat ke Modi 272+ ka mission pura kar payenge. jahan har party me jaat pat ki rajneeti hoti hai agar wahan ye na kaha jaye too sayad hi 272+ mission pura hopaye. iss liye Modi ne yee sigufa apnaya hai, akhir wo bhi jante hain ki wo kya kar rahen hain. humko to sirf Modi chahiye as a PM fir wo jo bhi kahen koi fark nahi padta. akhir jeet ke baad kam to hoga our hum sabka iss me yukti hai our labh bhi.

Ramanuj Mishra
Bangalore

Ambrish Shukla said...

Rajneeti JAATI ke adhaar par hi ho sakti hai...

Jo kisi jaatpaat ko maane bina rajneeti kar rahe hain...vo bhi ek nai jaat ko janm de rahe hain...

Example- Kejriwal ne pehli baar AAM ADMI ko jaati ke roop me use kiya hai..

Mahka Rajasthan said...

Ravish ji,
Ye Jaativaad ka zahar hai, jo har rajnitik dal ko achchha lagta hai, peene ke baad pachhtate bhi hai.
Ab to aadat si ho gayi hai, bina JAAT PAAT ke aapko aur hume bhi to ye rajniti achchhi nahi lagti.

Mahendra Singh said...

Gadha kisi bhi khandan ka ho, yad aane ya kahen mauka milne par laat chala hee deta hai. Yeh sab DNA ka problem hai.

Pilot ki kahaniyan....... said...

I am missing you on prime time,have you left NDTV.

Unknown said...

khud Rakhi Birla(muh khole to Sawant)ki jaati pooch pooch kar, use dalit dalit bol bol kar hairaan kar rahe the...vo to achcha hua usne jhaad diya tumhe achche se...warna jatiwadi to tumme bhari hai koot koot kar..

Ankur Jain said...

Please friends subscribe to youtube channel -Video Volunteers
http://www.youtube.com/user/VideoVolunteers?feature=watch

It is the least you can do to contribute towards society development

Afzal Sharif said...

I am anxiously waiting your debate from last around 10 days in ndtv. Are you fine or are your health is okay?

THANKS
AFZAL SHARIF
HOUSTON, TX

Afzal Sharif said...

I am anxiously waiting your debate from last around 10 days in ndtv. Are you fine or are your health is okay?

THANKS
AFZAL SHARIF
HOUSTON, TX

Rashmi R said...

Caste system is disguising truth of India and Hinduism.

Ravish- Can you please write a blog or cover a story on starving cows on the streets of India. Wife of american consulate said very correctly that Indian are so hypocrites about cows.
One side, we say that we should save our cows and other side, we leave them on busy city roads starving to death, injured and thirsty.

Where are those Hindus who talks about saving cows? Is it just symbolic?

SandeepChakraborty said...

Dear Ravish Ji,

Cast based politics it’s the inevitable bitter truth of Indian Politics.
See, I unintentionally started with a submission. That is one thing I keep advocating against. But what is the reason.

Let’s say we belong to a small tribe oblivious of the outer world and have to work hard to fulfill the basic needs of living. Then 2 entities come to us and claim that if we choose one of them they will help to uplift our tribe. One entity puts an outer world candidate who indeed has the right intent but we cannot relate to him as we look at him as an “out sider”, and the other one picks a person from our tribe who is powerful in our tribe but not with one of the best intent.
What do you think –
1. Will we be able to come out of our humane tendency to choosing someone from our “Own Community” and choose a stranger?
2. What do you think the out sider, how has the right intent, have to do to really make a mark among our tribe. Will we trust him even after that? Will we not ask the question that he has done it just to get elected?
3. Now think that you are the leader of one of those entities. Which type of candidate will you select?

The answer to what I stated might sound obvious but will that make it correct. The reason we are debating is that it is indeed not correct!

So what to has to be done?
Or should I ask can anything be done before 2014 election?
Now, the fundamental of my second question itself is not correct but is that not one of the base parameters on which political parties are thinking?

So rather, let’s ask oneself what we me and you should think. Let’s hope we will not think in submission.

Ambrish Shukla said...

चुनाव अब जो पास आया है
राहुल: हमने RTI लाया है
मोदी: मैंने भी कभी चाय बनाया है।
नितिश: मुझे किसी पर भरोसा नहीं है।
माया: किसी को पिछडों का ख्याल नहीं है।
सुषमा: कांग्रेस का अब सम्मान नहीं है।
मुलायम: मुजफ़्फ़र नगर की बात ना करो
शीला: लड़कियों अकेले ना बाज़ार जाया करो।
राजागोपालन: तेलंगाना तेलंगाना।
विश्वास: भंवर कोई अमेठी पर जो जा बैठा तो हंगामा।
मोदी: मैं राजनेता गद्दावर।
राहुल: व्हाट अबाउट वीमेन एमपावर?
शिंदे:ये संसद कोई फुटपाथ नहीं है।
अरविन्द: मैं आम आदमी हूँ जी मेरी कोई औकात नहीं है।

Gopal Girdhani said...

वोटर तो 'निरीह' जाति का है रवीश सर !

Indra said...

Ravishji aapne sab kuchh likh diya aur jaat paant ki raajneeti ki pol bhi khol di lekin mujhe laga ki ek baat rah gayi hai .. woh ye hai ki Jab BJP ka koi neta bolta hai ki aarakshan jaati ke aadhar par na hokar income ke aadhar pe hona chahiye to fir Modi jo South mein jake ye kyun bolte hain ki AARAKSHAN TO BABA SAHEB NE DIYA THA AUR ISE WOH HI KHATAM KAR SAKTE HAIN? Kya isse ye saaf taur pe prateet nahi hota hai ki Modi ki jaat paant se uper uthkar vikash ki baatein sab khokhli hain?

Kitne afsos ki baat hai ki aaj bhi Cong BJP apne rajnaitik fayde kiye jaat paant aur dharm ko bhunaane se peechhe nahi hat rahe hain.. Ek or jahan modi ji apne aap ko vikash purush batate hain wahin dusari or jati ke aadhar pe apni pehchan bata ke vote maangte hain.. Inhi sab kaarnon se badlav jaroori hai aur aisi party ka ubhar jo jati se uper uthkar vote maange.. Mujeh lagta hai ki is baar shayad AAP woh karishma kar sake (agar 40-50 LS seats bhi jeet le to karishma hi kahlayega. Rajneeti ka sudhar tabhi sambhav hai jab log jaatiya sameekarnaon se bahar nikal kelogo ke bhale ke ware mein soche..aur Corruption se bahar nikale.

Vikram Pratap Singh Sachan said...
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Vikram Pratap Singh Sachan said...

रवीश जी, जाति-पाती की रेखायें बहुत गहरी और अमिट हो गयी है। आज की खोखली राजनीति के रहते कोई सुधार आने कि उम्मीद भी नहीं है। अफसोसजनक स्थिति है!

vinay kumar said...

रविश जी, बीजेपी जानती है कि उत्तर प्रदेश और बिहार के बिना कुछ भी संभव नहीं है. इसके लिए बीजेपी कुछ भी कर सकती है. इसके लिए चाहे साम्प्रदायिक गोलबंदी करनी पड़े या जातीय. सब जायज़ है. संघ और बीजेपी के पैरोकार इमरती की तरह घुमा-घुमा कर जस्टिफाई भी कर देगें.मुझे अपने तरफ की एक कहावत याद आ रही है - "सात राज्पुते एक संतोख गदहा खैला में कौनो ना दोष". जब रात के अँधेरे में कुछ लडको ने गधे को मार कर खा लिया तो गाँव के पंडित जी ने कोहराम मचा दिया और इसे महापाप करार दिया. लेकिन जब पता चल की उसमे उनका पुत्र संतोष भी शामिल था तो ऊपर वाला मुहावरा गढ़ दिया. जहाँ तक संजय पासवान का सवाल है तो पटना विश्वविद्यालय में मैंने बहुत ही करीब से देखा और समझा है.अधिक बात करना शायद उन व्यक्तिगत संबंधों की मर्यादा का उलंघन होगा. बस इतना ही कि आज दलित चिंतन एक स्वायत रुख ले लिया है. Caste हिन्दू में इसका विलय फिलहाल तो संभव नहीं.

Mohammad Hasnain Ali said...
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Mohammad Hasnain Ali said...

एक कहावत हमारे समाज में बहोत ही मशहूर है कि
" जाति जो कभी नहीं जाती।
यद्यपि वो तो मौत के बाद भी नहीं जाती "
मोदी जी भी इसमें पीछे नहीं हट रहे और आज भी काफी हद तक जाती के संख्या के आधार पर ही टिकट का बंटवारा होता है, यदि कोई क्षेत्र ब्राह्मण बाहुल्य है तो उस क्षेत्र में ब्राह्मण प्रत्याशी ही होगा चाहे वो सपा, बसपा , कांग्रेस या भाजपा से हो। मैं दिल्ली क्षेत्र कि नहीं अन्य उत्तर भारत कि बात कर रहा हूँ।
रही बात मोदी जी कि तो ये चुनौती बड़े ही शिद्दत और कश्मकश से मोदी जी को मिली है जिसे वो गँवाना नहीं चाह्ते हैं। किसी तरह का भी तंत्र जो उनके काम आजाये वो छोरने वाले नहीं है क्यूंकि उन्हें पता है कि इससे अच्छा मौका फिर दोबारा मिलने वाला नहीं है इसलिए कोई कसर न रहे उसका पूरा इंतेज़ाम करने में जुटे हुए हैं क्यूंकि ये मौका गया तो मोदी जी के भी अरमान अडवाणी जी कि तरह ही बन कर रह जायेंगे। सारी परिस्थितियां उनके लिए ही अनुकूल बनी हुयी है कहीं ये मौका यदि अगले पञ्च वर्ष के लिए टला तो समझ लीजिये अरमानों पर पानी ही फिर जायेगा। कांग्रेस तो पहले ही दौड़ से बहार है और अभी तक आम आदमी पार्टी ने भी बहोत हद तक अपनी सीमाओ को अन्य राज्यों तक नहीं बढ़ाया है जो मोदी जी को इस बार थोरा साँस लेने पे मज़बूर कर रहा है किन्तु आने वाले पञ्च वर्षो में तस्वीर बहोत हद तक बदलने वाली है।

Chandan Sharma said...

Dear Ravish Ji,
I am pursuing my PhD from IIT Delhi. I along with my friends watches prime time (Only when u are there)
Very effective and the way you organize the debate is just superb.
Your preparation, presentation, content everything is great. Hats off to you.
Chandan Sharma