मद्रास कैफ़े देखियेगा

अच्छी फ़िल्म है । राजीव गांधी हत्याकांड की पृष्ठभूमि पर बनी है । इतनी खूबी से बनाई गई है कि फ़िल्म आख़िर तक विश्वसनीय लगती है । एक एक संवाद और दृश्यों का संपादन बेहतरीन है । एक किस्म की डार्क और ब्लू शेड लिये हुई । जाफना के लोकेशन और सेट को बेहतरीन तरीके से उभारा गया है ।  प्रभाकरण और लिट्टे से टकराने गई हमारी शांति सेना और खुफिया अफसरों की अपनी गुटबाज़ी सब कुछ उस राजनीति को बदल देती है जिसे राजीव गांधी शांति के नाम पर करना चाहते थे । अब इस सिलसिले में कुछ याद नहीं रहा लेकिन फिल्म की कहानी ऐसे बुनी गई है जैसे सीधे एस आई टी की रिपोर्ट से ली गई हो । राजीव गांधी की हत्या का प्लाट इंदिरा की हत्या से कहीं ज़्यादा जटिल था । फिर भी यह फ़िल्म उस प्लाट को काफी सरलता और सहजता से खोलती है ।  


फिल्म में युद््द के दृश्यों की फ़ोटोग्राफ़ी शानदार है । कैमरा काफी साफ़ सुथरा है । उम्दा लाइटिंग के कारण भी । जाॅन अब्राहम ने शानदार अभिनय किया है । वे अपने अभिनय की सघनता और तीव्रता पूरी फ़िल्म में बनाए रखते हैं । ख़ुफ़िया ब्यूरो की दुनिया के कँपा देने वाले किस्से इस तरीके से सामने आते हैं जिससे हम और आप अपनी काल्पनिक दुनिया में भी अनजान रहते हैं । किसी के लिए देश देश होता है तो किसी के लिए देश एक दुकान । हर सूचना एक राजनीति को जन्म देती है । इस फिल्म में अपने पूर्व संपादक दिबांग को देखकर हैरत भरी अनुभूति हुई । उन्हीं का बोला संवाद फिल्म के प्लाट को सत्यापित करता है । सबके अपने अपने सच है । डिपेंड करता है कि आप कहां खड़े हैं । नर्गिस ने भी टाइम्स टाइप की पत्रिका के पत्रकार का अच्छा अभिनय किया है ।  सबका अभिनय सधा हुआ और संक्षिप्त है । डाक्यूमेंट्री की तरह फ़िल्म शुरू होती है और अंत तक दर्शक का ध्यान बाँधे रखती है । शूजित सरकार का निर्देशक कहानी के हिसाब से बेहतरीन है । इस बात के लिए शुक्रिया कि फ़िल्म के प्लाट में आइटम सांग नहीं घुसाया है । एक ही गाना है वो भी आख़िर में । मौला कैटेगरी का । 

17 comments:

yogidwivedi said...

आदरणीय रवीश जी,

कई दिनों से आपको इधर उधर पछियाते-2 लगता है इधर मुलाकात हो ही जाएगी. ट्विट्टर में शब्दों की सीमा ने बाँध रखा था, फेसबुक भी अब आजकल फेंकुबुक हो चला है. प्लीज् इस फेंकू शब्द का यहाँ पर कोई राजनीतिक मतलब नहीं निकालियेगा. आपकी नदी सी सहज पत्रकारिता में अपने आदर भाव अर्पित करता हूँ. कल के प्रोग्राम में भारत के दो प्रमुख दलों ने देश के सिंहासन पर अपना दावा पेश किया, एक को लगता है की बढ़ी हुई मंहगाई, घटते हुए रुपये, सीमाओं पर सेना के हालात के बावजूद ( भ्रष्टाचार को इस सूची में शामिल नहीं किया क्योकि यह दल, एवं राज्य और केंद्र सब जगह एक समान है ) वो खाने का प्रबंध करके जीत जाएँगे, वही दुसरे दल को सत्ता पक्ष के खिलाफ देश में कांग्रेस के खिलाफ फैले अंडर करंट को ट्विटर और फेसबुक के ट्रांसफार्मर लगा कर चुनाव जीत जाने का भरोसा है इन दावो के बीच कही ऐसा न हो की कोई 'तीसरा' कटिया (लुग्गी) न फंसा ले. कई सारी ख्वाहिशों में एक ख्वाहिश आपसे मुलाकात की भी है, दूसरी पत्रकार बनने की, गर कभी इन नेताओं, प्रशासको के फुर्सत मिले तो हमें भी मिलने का मौका दीजियेगा
मेरी चिट्ठी तो आपको मिलती रहेगी अगर आप कुछ लिखे देंगे तो हौसला अफजाई होगी

आपका




nptHeer said...

'टीवी पर युद्ध' वाली कविता मैं मैंने एक सवाल पूछा था(ravishji जवाब दो type पत्रकारिता न करें-जवाब तो दें atleast :) क्या?युद्ध किसी भी आयाम से शानदार कैसे हो जाता है?("शानदार फोटोग्राफी") :-0

हमारे नेता कश्मीरियों को तो अलग कर चुके--अब क्या तमीळ और अरुणाचलीओं की बारी है?फिर तेलुगू।

यही बात वहां के localites भी realise करते होंगे?या देश विरोधी विचारधारा से ग्रसित?

लोग मोवी देखे इस लिए स्टोरी नहीं लिखी :) लेकिन मुझे लगता है पहले चेन्नई exp देखना चाहिए फिर विषय वस्तु।

बाकी-देश की अखंडितता हमारे लिए सोशल मीडिया या फिर entertainment का subject बना दी गई--ऐसा नहिब न लगता? ("देश और दुकान" का अंतर हच्माचा न दें कहीं सोए मत्दारों को?)

Shikha simlply special said...

ravish sir don't u think for some comments force us to remind that dialogue from 3Idiots" Are bhai...Akhir kehna kya chahte ho" :)

प्रवीण पाण्डेय said...

देखने की इच्छा पहले से ही थी, आपकी संस्तुति मिल जाने से यह काम शीघ्र ही कर डालेंगे।

Kulwant Rai Sharma said...

संक्षेप फिल्‍म समीक्षा, स्‍टीक होगी।

Amit Jha said...

SIR JAA RAHA HU DEKHNE KE LIYE 10:00 PM KA SHOW HAI...HOPE AND SURE YOU LIKED IT THEREFORE IT WILL BE A GOOD MOVIE AND I WOULD ALSO LIKE.
THANKS TICKET LENE KE BAAD DAR RAHA THA KI KAHI PAISA TO NHI DOOB JAYEGA ES MEHNGAI ME BUT AB AAPKA POST PADH KE SURE HU KI MERA DECISION SAHI THA....

Arvind said...

sir , aap twitter par nahi hai naa, wo fake account hai , aapne Qsba me pehle hi likha hai . . . yogidwivedi ji ko bata to dijiye. . . madras cafe ke bare me pehle se hi ummid thi . . .pata nahi kyu satyagrah is baar halki lag rahi hai . . . prakash jha ne gangajal aur apaharan ke baad sari filme halki banayi hai jaise aarakshan , rajneeti sab . . .kal madras cafe dekhunga. . .

izaz ansari said...

आपका विवरण पडढ़कर लगता है जाना पढ़ेगा। :)

sachin said...

यहाँ तो लगी ही नहीं। पर चेन्नई एक्सप्रेस लगी हुई है तीन हफ़्तों से :(
शिप ऑफ़ थिसिअस भी नहीं देख पाया था। डीवीडी पर ही देखनी पड़ेगी।
वैसे ये मौला वाली बात अच्छी पकड़ी आपने। आजकल हर मूवी एल्बम में एक न एक गाने में मौला शब्द ज़रूर ठूस दिया जाता है। और अब मौला को तगड़ी प्रतिद्वंद्विता मिल रही है "रंगरेज" से.. रंगरेज़ धीरे धीरे अब नया मौला बनते जा रहा है।

Ashok Saluja said...

आप की समीक्षा ....ज़रूर देखेंगे !
शुक्रिया!

Ram Arya said...

Apko achi lagi! jaroor dekhenge :)

seema singh said...

Aap ki samicha ka intzar tha ab dekhengay

seema singh said...

Aap ki samicha ka intzar tha ab dekhengay

Mahendra Singh said...

Chennai Express main ek khas baat hai ki Hindi aur Tamil dono bhasa ke log yeh film dekh sakte hai. Madras kaife to aaj sham pakka hai.

Mahendra Singh said...

Sachinji kee baat mark karne walee hai.

Shagufta Perween said...

dear Ravish ji,
I am a great fan of yours. apko bade dino se follow kar rhi hun.
You are a favorite anchor and reporter of my house. everyday we used to stick in front of television for Prime time.

mudde ki baat ye thi ki really madras cafe ek bahut hi umda movie hai. aisa serious topic hone k bawajud last minute tak viewers ko khichti hain.

Ronny said...

vikramawa CHURCH me confess karta hai...jaise tum bhi kahin karte hoge...chutiya