लप्रेक

इस शहर में घबराहट बहुत होती है । ये कुछ ज़्यादा बड़ा नहीं है । क्या सिर्फ मैं ही ऐसा सोचती हूँ या तुम भी । हाँ ये शहर बड़ा तो है । ओर है न छोर । तुम्हारे जाने के बाद मुझे भी घबराहट होती है । हर कोई किसी न किसी ऊँचाई पर दिखता है । मैं चलते चलते ऊँचा महसूस करने लगता हूँ । तुम सही कहती हो । यह शहर सबके माथे पर बैठ गया है । ऊँचाई की ओर सब दौड़े चले जा रहे हैं । मैं दूसरी तरफ़ से लुढ़कता चला आ रहा हूँ । नीचे की ओर । घबराहट होती तो है । क्या तुम दिल्ली छोड़ नहीं सकते । मैं छोड़ सकती हूँ । मतलब सोचती हूँ कि छोड़ दूँ । तुम चाहती हो और चाहने से दिल्ली नहीं छूटती है । ये दिल्ली जकड़ लेती है । इतना निचोड़ लेती है कि हम किसी आधे सूखे तौलिये की तरह सूखे होने का अहसास भर रह जाते हैं । इसलिए अब जाने से क्या फ़ायदा । तुम कहाँ कहाँ जाओगी । हर शहर दिल्ली की नक़ल है । मैं भी किसी की नक़ल हूँ । ये इश्क़ तो और अजनबी बना देता है सबको । 

11 comments:

suchak patel said...

Ahmedabad ;)

S. M. Rana said...

Dilli chode muddat hui. Ab kuch kuch jaana pehchana zyada ajnabi lagta hai. Jagmahat thaka deti hai. Suna hai apne aap ko khojne zyada door jaane ki zaroorat nahin.

Sanjay Kumar Dubey said...

dilli bahar walo ke liye premika ki zakaran hai jiske liye man lalach jata hai aur dilli walo ke liye panti ki shikayat hai zisse dil oob jata hai.

Chunilal jangir said...

Good story

mayank sachan said...

ravish ji ye duniya ek dili hai har us aadmi ke liye jo kabhi apne sapne poore karne ke liye apne liye pinjre bana leta hai .. ham jahan rahte hai darte rahte hai pata nahin kahan jaana hai , kyon jaana hai, aage rah gaye ya peechhe chal rahe hai ..?? jee rahe hai par saath men kuch marta bhi jaata hai pariwarik zimmedariyan bhi aur samaajik bhi kitna santulan banaayen.. ?? ab to dar lagta hai ki thode dinon men khud ko pahchan payenge ya dilli ke rang men range bheed ka hissa ban kar fanaa ho jayenge .. apne gaon ki hawa ki khusboo bhi naseeb nahin hogi aakhiri saanson men ... shayad thoda jyada depressing ho gaya lekin aapne subject hi aisa chheda hai .. ye ghabrahat ham sab ki zindgi ka hissa hai ..

sachin said...

(चाइना मेड डुप्लीकेट लाप्रेक)
ख़त लिखने का भी मौसम होता है क्या ? अगर होता है तो बता दो मुझे । इन बादलों से अरज लगा दूँ ज़रा । शायद मान लें । आजकल एक रिश्ता-सा जो बन गया है इनसे । मेरी ही तरह घूमते रहते हैं यहाँ-वहाँ । शहर भर में । किसी बारिश की तलाश में । ये अभी ज्यादा जानते नहीं हैं मुझे। हमें तो बिलकुल नहीं । शायद मेरी बात मान लें । मेरे ख़त पढ़ती हो, ये तो पता है मुझे। याद करती हो या नहीं, पता नहीं। बहुत दिनों से गले में कुछ सरका भी नहीं । अगर जवाब लिखती हो तो मेरे किसी दोस्त के हाथों मत भिजवा देना। इस बार की ईद अच्छे से निकल जाए । किसी और का नहीं, तो इस शहर का हाल तो तुम जानती ही होगी । पिछली बार मेरे जन्मदिन पर जो डायरी में रखकर कलम दी थी तुमने। उसकी सिहाई अब कुछ सूखने लगी है । अब लफ्ज़ पहले के जैसे बहते नहीं । फंसे रहते हैं, कलम में कहीं। कुछ निब के बीच वाली दरार में से भाग निकलते हैं । अब किस किस को रोकूँ ? किस किस को बचाऊं ? बस एक बात और बता दो । ये चिट्टी के नीचे, "तुम्हारा" के बाद क्या लिखा करूँ? तुम जो मुझे प्यार से पुकारा करती थी, वो नाम लिखूँ ? नाम के लिए ही सही। या जो गुस्से में नाक सिकोड़ कर बुलाया करती थी, वो? कभी इतना खामोश रही नहीं। इसलिए इस ख़ामोशी को क्या नाम दिया है तुमने, पता नहीं ।
तुम्हारा
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seema singh said...

Ishq to aur bhi ajnabi bana dayta hai bauth khob

seema singh said...

Ishq to aur bhi ajnabi bana dayta hai bauth khob

brijmohan dhundhara said...

bahut achha likha h ...sir apne progtam mein Pushpesh pant ji ko bulao debet k liye...

brijmohan dhundhara said...

bahut achha likha h ...sir apne progtam mein Pushpesh pant ji ko bulao debet k liye...

shruti said...

aapki batein itni unchi hai ki bas padh hi sakte he comment karne ki hamari hesiyat nahi.. man maan hi nahi sakta ki ab bhi koi itna gahera sochta bhi hai......