अगर कुछ पोज़िटिव लिखना हो तो

आज़ादी के दिन भारत की किस तस्वीर को अपने सामने रखें ताकि हम उन कुर्बानियों के प्रति आभार व्यक्त कर सकें जिसने हमारे आज के लिए अपना कल दांव पर लगा दिया। क्या हम कल के भारत के लिए अपना आज दांव पर लगा रहे हैं। यही सिलसिला तो हमें और भारत को उस मुकाम पर ले जाएगा जो हर पंद्रह अगस्त के मौके पर पहले सेकुछ बड़ाकुछ दिलदारकुछ सहिष्णुकुछ मानवीय और कुछ सेकुलर नज़र आएगा। भारत की एक तस्वीर देखनी है तो आप न्यूज़ चैनलों पर देखिये। निराश थका हुआ
दिशाविहीनदोयम दर्जे के राजनीतिक मौके तलाशता हुआ ताकि तू तू मैं मैं का नैराश्य पेश किया जा सकेसंसद से निकलते चीखते सांसदों को सुनिये जिनके आरोपों प्रत्यारोपों से भारत के बेहतर होने के नारे कम अपना कसूर छिपाने का शोर ज्यादा होता है। हर दिन नेता बताते हैं कि भारत फलां देश से पीछे हैंभारत को फलां देश से आगे जाना है। कोई नहीं बताता कि भारत को कैसा भारत बनना है । सबके भाषणों में क्षेत्रवाद का गौरव फिर से बढ़ने लगा है। सांप्रदायिकता के टोन सुनाई देने लगे हैं। लेकिन क्या सचमुच हमारा भारत नाउम्मीदी का मुल्क है। यह आकांक्षाओं की होड़ है या सिस्टम के जड़ हो जाने की हताशा।

हमने धिक्कार को मंत्र समझ लिया है। जितना धिक्कारेंगे उतना सच लगेगा कि भारत में कुछ नहीं हुआ। भारत में बहुत कुछ पहले भी हुआ और बहुत कुछ आज भी हो रहा है। हमारे युवा वो युवा नहीं है जिनके लिए बालीवुड समझता है कि चेन्नई एक्सप्रैस जैसी फिल्म देख कर रोता गाता निकलेगा मगर टीवी पर उसके सौ करोड़ की कमाई के जश्न में खो जाएगा। अगर युवाओं के प्रति हमारी यही समझदारी है तो युवा जानता है कि अधूरी है। लाखों की संख्या में युवा सपनों से लबालब रोज़ घरों से निकल रहे हैं। शहर बदल रहे हैं, देश बदल रहे हैं, फिर महानगरों से लौट कर गांवों में भी जा रहे हैं। उनका आत्मविश्वास सिर्फ बाज़ार के लिए उत्पाद खपाने के लिए नहीं हैं। उनके आत्मविश्वास में एक ऐसा भारत है जो न तो टीवी देख पा रहा है न अखबार। वो भारत को लेकर नए नए नज़रिये से सोच रहा है। नज़रियों में टकराव भी हो रहा है। यही टकराव एकदिन दो राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की जड़ता से भारत को निकालेगा। दिक्कत यह है कि हमने भारत को सेंसेक्स समझ लिया है जो रोज़ चढ़ता है और उतरता है। डालर और निर्यात के आंकड़ों को दिखाकर टीवी डराने लगता है कि अब सब खत्म। उस भारत को भी तो देखिये जो सेंसेक्स के बग़ैर अपनी स्थिर गति से रोज़ एक ईंच आगे बढ़ रहा है। इसे देखने के लिए आपको सिर्फ मुंबई की रेल में नहीं चलने की ज़रूरत नहींदिल्ली की मेट्रो में धक्के खाने की ज़रूरत नहीं है। आपके आस पास भी दिख जाएगा । 


आज़ादी का बेहतर इस्तमाल आज की तारीख में हमारा युवा कर रहा है। वो अब अपनी पसंद के विषय पढ़ने के लिए घरों में जगह बना चुका है। मां बाप भी एक हद से ज्यादा उस पर दबाव नहीं डालते। वो अपनी पसंद का कैरियर हासिल करने के लिए कम उम्र में ही अपने कस्बे को छोड़ राजस्थान के कोटा की तरफ निकल पड़ता है। दिल्ली के बेर सरायजिया सराय और मुनिरका के छोटे छोटे कमरों में तमाम घरेलु सुविधाओं को त्याग कर रहने लगता है और वहां से फिर जर्मनी अमरीका । किसी को उनके विषयों के चुनाव में आई विविधता को देखनी चाहिए। उनके सपने अब कुल मिलाकर दो या चार नहीं हैं। हज़ार हैं। किसी युवा से मिलिये वो हमारी पीढ़ी से ज़्यादा तेज़ तर्रार और फैसले लेने वाला है। हमारी पीढ़ी के ज्यादातर बच्चे मां बाप के आदेश से चलते थे। आज का युवा मां बाप को आदेश देने वाला मास्टर नहीं समझता बल्कि पता भी नहीं चला वो कब उन्हें अपना दोस्त बना चुका है। मैं खुद कई लड़के लड़कियों को देखता हूं। वो अपना हर सही गलत मां बाप से साझा करते हैं। जब घर में संवाद बेहतर हो जाए तो बाहर उसका आत्मविश्वास कुछ और हो जाता है। वो संभावनाओं से खेलने लगता है। वो इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर लाइन बदल लेता है और ज़ीरो से शुरू कर कंपनी तक बना देता है। भारत तो यहां भी हैं जो नेताओं के भाषण में नहीं दिखता। उनका भारत या तो कांग्रेसी भारत है या भाजपाई भारत। राजनीतिक दलों के फेल हो जाने को हम भारत की नाकामी नहीं समझ सकते।


कई लोग हैं जो बिना किसी ख्याति की चाह लिये भारत के अलग अलग इलाकों में बहुत कुछ कर रहे हैं। राजस्थान में ही गुजरात से आए एक युवा ने कुछ इलाकों में पानी की कहानी बदल दी। लोगों को जमा किया और पारंपरिक कुओं को फिर से जीवित कर दिया। उत्तराखंड में तबाही आई तो दिल्ली में कुछ युवाओं ने फेसबुक पर ही उम्मीद उत्तराखंड नाम से एक अभियान बना लिया। उनके इस अभियान में देश भर से कई युवा शामिल हो गए। आपस में और लोगों से पैसे जुटा कर दिन रात काम पर लग गए। पहाड़ों से मीडिया लौट आया है लेकिन बूंद के सदस्य लगातार जा रहे हैं। वो बहुत कुछ बदल नहीं पा रहे हैं लेकिन अपनी आंखों से हर बार देश की एक हकीकत से सामना कर रहे हैं। ये लोग सिस्टम से टकरा रहे हैं। झुंझला रहे हैं। बदलने की ख्वाहिश पाल रहे हैं। इनके पास वो नारे नहीं हैं और कृत्रिम रूप से पैदा हुए वो नेता नहीं हैं जिनके बयान लगातार टीवी पर आते हों मगर ये कहीं से भी निकल आते हैं। कहीं चले जाते हैं। जितना हो सकता है अपने हिस्से का भारत बना जाते हैं। हाल ही में हावर्ड से आए दो लड़कों से मिला। वो अपनी ऊंची कमाई छोड़ कर राजनीति को बदलने आ गए हैं। उनका प्रयास है कि शोशेबाज़ी की राजनीति में कुछ असली मुद्दों को कैसे ठेला जाए ताकि राजनीति बदले। उन्हें नेताओं से शिकायत तो है मगर निराशा नहीं। वो इन्हीं नेताओं को बदलना चाहते हैं जिन्हें हम नकारा समझते है। क्या ये भारत की उम्मीद नहीं हैं।


भारत कैसा हो इसकी कल्पना हर दौर में की गई। इन कल्पनाओं का भारत कहीं न कहीं किसी न किसी मात्रा में साकार भी हुआ है। शायद इन्हीं तमाम प्रयासों से आज भारत पहले से कहीं ज्यादा लोकतांत्रिक नज़र आता है। आज का युवा दस मुद्दों पर घर से नहीं निकलता तो पांच मुद्दों पर ज़रूर निकलता है। भले ही हमारी राजनीति और मीडिया के संपादक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की खुमारी में खोए हों मगर उन्हें देखना चाहिए कि हमारा युवा बिना जेपी के ही बहुत कुछ कर दे रहा है। हो सकता है कि इसमें जेपी के ही जगाए आत्मविश्वास का योगदान हो। उसने दिसंबर और जनवरी के महीने में दिल्ली के उस गढ़ को घेर लिया जिसे सत्ता अपना ड्राइंग रूम समझती थी। रायसीना हिल्स अब सबकी है। वो इसी तरह धीरे धीरे अपनी हदों को बढ़ा रहा है। शायद हमारी यही रफ्तार है। हम जल्दी में नहीं होते। भारत को पता है कि वह पांच हज़ार साल की सभ्यता के सफर का इतिहास है न कि एक दिन के सेंसेक्स का। इसीलिए भारत को देखना हो तो उस आटो चालक से पूछिये जो अपना घर गांव छोड़ कर महानगरों में दिन रात आटो चलाता हैअपने बच्चों को पढ़ाता है और करप्शन पर राय राय देता है। हमारा भारत हमारे भीतर है। हमारी आजादी हमारे भीतर है। वो शायद बेतरतीब सड़कों,परिवहन व्यवस्था और तंग गलियों को देखकर ठिठकती ज़रूर है मगर जल्दी ही खुले मैदान में आ जाती है । पंद्रह अगस्त हमारे भीतर का वो खुला मैदान हैं जहां हम अंगड़ाई नहीं लेतेअपनी बांहें फैलाते हैं।
(यह लेख राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है)

16 comments:

suchak patel said...

15th ko yeh likha tha...aur tile bhi aap hi ka set kiya tha : भारत जितना बदला है उतना बदलना बाकी है ( बिहार जितना बदला है उतना बदलना बाकी है : ravish ki report )

Shyari ke trough likha hai :
http://suchak-indian.blogspot.in/2013/08/blog-post_14.html

प्रवीण पाण्डेय said...

हम परमहंसीय चेतना में पूरा दिन निकाल देते हैं। अच्छा कुछ दिखता नहीं, बुरा सोचना मना है उस दिन।

Pankaj Kumar said...

बहुत प्रभावशाली और सकारात्मक उर्जा युक्त

डॉ. मोनिका शर्मा said...

जो भी हो ये हमारा घर है ..... इसकी संभाल सबको करनी है, ये सब सकारात्मक सोच से ही संभव होगा ......

Vivek Garg said...

jabardast likha hai...

teamboond said...

बेहद सटीक लिखा है आपने। इस सुन्‍दर लेख के लिये बधाई। टीम बूंद के प्रयासों को सराहने के लिये विशेष आभार।

Niraj Sharma said...

Important;; Ravji kuchh 4-5 week pahle aapne prime time par ek book ka jkra kiya tha aur kaha tha ye padhne layak hai. Kaun si hai vo book.mai bhi padhna chahuga.

izaz ansari said...

हालहिं मे आपका ब्लाग पढ़ना शुरू किया है, जिस पक्रार कि टिप्पणी आप करते है, पढ़ कर अच्छा लगता है। सोचने पर मजबूर करता है।

dr chauhan said...

जिंदगी जीने के सिर्फ दो हि तरिक्के है, एक चुपचाप सहेंन करो जो हो रहा है, या जिम्मेदारी उठाओ उसे बदलने की.

Anuj Goswami said...

फर्क यहीं दिखाई देता है। धिक्‍का ही मंत्र बना रहे या फिर बूंद की तरह सब कुछ धिक्‍कार कर अपना रास्‍ता बना लें। तस्‍वीर तो तभी बदलेगी। सुंदर प्रयास, ऊम्‍दा लेख। आप सबको बधाई।

Dr.Vimala said...

प्रिय रवीश ,

आज आप जैसे हिन्दुस्तानियों की ही ज़रुरत है वर्ना तो जिसे देखिये स्यापा करने की होड़ लगाये हुए है |आशा है आगे भी आप ये लौ जलाये रखेंगे ...

manish rohera said...

hum aap se kabhi mukhatib hona chahenge humne zindagi ke jo ache bure modh he unhe is samvedhna ke saath vyakt karne ki khubhi sirf aap me aur punya prasun bajpayee ji me dekhi he

nptHeer said...

अभी अभी एक विज्ञापन के बारे में सुना। उसमें एक indication है--और लिखा है--यह ऊँगली सवाल उठाती है। आप भी सवाल पूछो-अपनी ऊँगली उठाओ। फिर जवाब के लिए उसको अपनी तरफ घुमाओ:)
फिर उसमें एक example दिया होगा--"आज़ादी के बाद देश ने कितनी तरक्की की?और कितना भष्टाचार हुआ?"अब सवाल की ऊँगली अपनी और घुमाइए-आपने आज़ादी के बाद तरक्की की है क्या?कितनी?आपने आज़ादी के बाद भ्रष्टाचार

किया है क्या?कितना?
फिर लिखा है
"if you have a question then answer is YOU"
कितनी सचोट बात कह दी हैना? आप की तरह?:)

anita said...

Well written article.Yes some things have changed for better but some things have gotten worse.When we were in school,Corruption was considered bad but now it has become a way of life.But there is lot which can be improved hundred fold.People like us who don't live in India but Love it and keep hoping that one day it will truly shine for all of its citizen irrespective of their caste and creed.The Kind of Bihar ,I have seen in my childhood that is just a dream.A young person can't believe how glorious Patna was in late sixty and early seventy. Bihar may have gone down the hill but Bihari people are making Bihar proud. We can always hope for a miracle even in Bihar.

ritesh kumar said...

EK MAHATVAPURN LINK APSE BANT RAHA HUN. ADBHUT HAIN , MAIN BHI CHHATTISGARH SE HUN LEKIN PEHLE NAAM NAHI SUNA THA AAJ PATA CHALA JAB INKA DEHANT HO GAYA .


http://www.kavitakosh.org/kk/%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9F_%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A5%87_%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82_%E0%A4%AB%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A5%87_%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%97_/_%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%9C%E0%A4%97%E0%A4%A6%E0%A4%B2%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%80#.UhCnBsj0RJE

seema singh said...

Bhaut dino kay bad kuch sakratmak pdha is lakh kay liy aap ko badhai d