प्राइम टाइमीय रातों के डरावनें ख़्वाब

कई बार मन बेवजह उचाट हो जाता है । सोचता हूँ प्राइम टाइप की एंकरबाज़ी करने वाले लोग कैसे रमे  नज़र आते हैं । उन्हें कौन सी चीज़ प्रेरित करती होगी जिससे वो आज के प्राइम टाइम फार्मेट से चिपके रहते हैं । कभी इन लोगों को बेचैन होते नहीं देखा । होते भी होंगे तो मुझे कैसे पता चलेगा । यह भी नहीं मालूम कि उन्हें प्राइम टाइम की रोज़ाना रातों में प्रेरणा टिकाये रहती है या असुरक्षा या सचमुच ही कोई विकल्पहीनता । खुद को लेकर जवाब ढूँढते ढूँढते ऐसी ही किसी रात को उचाट हो जाता हूँ । 

दूसरी तरफ लोगों की प्रतिक्रियाएँ जितनी सतर्क नहीं करती उससे ज़्यादा बोर करने लगी है । आम आदमी की शक्ल में ये लोग अपनी अपनी पार्टी का एंगल ठेले रहते हैं । इनकी निष्पक्षता इतनी होती है कि जिस पार्टी के झोलावाहक हैं उसकी आलोचना न हो । इसे साबित करने के लिए ये किसी और मामले का ज़िक्र करने लगते हैं और फिर भविष्य की चेतावनी देते हैं कि देखेंगे तब आप क्या करेंगे । सोशल मीडिया पर टीवी के लिए सारी पार्टी के नेता अपना अपना स्टाल लगा रहे हैं । राजनीतिक दलीलों का मुहावरा इतना घिसा पिटा है कि सुन कर ही हिचकी आने लगती है । दलीलें जीवाश्म की तरह पत्थर से चिपक गई हैं । राजनीति एक अटकी हुई प्रक्रिया है और नेता लटका हुआ तत्व । 

लिहाज़ा मन खिन्न तो हो ही जाता है । कभी एक पार्टी के तो कभी दूसरी के लोग आरोप मढ़ देते हैं । हर दलील और सवाल को पार्टी के हिसाब से नापने वाले आम दर्शक की शक्ल में नेता कार्यकर्ता । ज़रूर हमें इस लिहाज़ से भी परखा जाना चाहिए, बेमुरव्वत, लेकिन ये एक रात को कांग्रेस का और अगली रात को बीजेपी का प्रवक्ता बता बता कर कुछ लोगों ने चाट लिया है । चिरकुटों को लगता है कि भारत का उद्धार इन्हीं दो दलों के अंदरखाने हो रहा है । ये कांग्रेस बीजेपी का गढ़ा हुआ खेल है । बीएसपी,जेडीयू, तृणमूल का भी कोई समर्थक होगा डीएमके का भी होगा वो तो कभी आकर गाली नहीं देता कि मेरी पार्टी को लेकर तटस्थ नहीं है । कभी नहीं कहेगा कि आप इन दोनों के ही मुद्दे में क्यों फँसे रहते हैं । हर बहस में कांग्रेस बीजेपी का स्टूल डिफ़ॉल्ट तरीके से लग जाता है । 

लेकिन अब यही भाषा बहस मे हारने वाले नेता बोलने लगे हैं जैसे उनके पास सबसे मारक तीर यही है कि लगता है कि आज कल आप इस उस पार्टी से ज़्यादा प्रेरित हो गए हैं । हम तो आपको तटस्थ समझते थे ।  जैसे खुद नेता जी जो बोल रहे हैं अपने दल की निष्ठा से ऊपर उठकर देशहित में ही बोल रहे हैं । इनसे उम्मीद भी नहीं की जाती । पर दलों की निष्ठा में ये नेता इस कदर डूबे हैं कि कई बार बात जानते हुए भी नहीं बोलते । कभी अपनी जानकारी साझा नहीं करते जिससे दर्शक भी कुछ और सोचे । पता नहीं कब और कैसे उन्हें यक़ीन हो गया है कि वे जो बोल रहे हैं लोग उसे ही सत्य मान रहे हैं और इससे पार्टी का प्रचार हो रहा है । यही कारण है कि एंकरों के साथ साथ अब कुछ नेता भी रूटीन लगने लगे हैं । नेता अपने ज्ञान का कम पार्टी लाइन का ज़्यादा प्रदर्शन करने पर मजबूर किये जा रहे हैं । 

पार्टी ने भी इस प्राइम टाइम को ड्यूटी में बदल दिया है । सुबह सुबह पार्टी दफ्तर में टापिक दीजिये या मुख्य प्रवक्ता से किसी वक्ता के बारे में इजाज़त लीजिये तब भी वे अपनी ही पसंद का वक़्ता देते हैं । सब कुछ व्यवस्थित होता जा रहा है ताकि जवाब नियंत्रित हो सके । यहाँ तक कि प्रादेशिक नेता भी कहने लगे हैं कि मेरा नाम पैनल में नहीं है दिल्ली से पूछ लीजिये । उन्हें कौन समझाये कि कांग्रेस बीजेपी के कुछ सक्रिय भी और कुछ नव उत्साही फ़ालतू कार्यकर्ताओं के अलावा बड़ी संख्या में दर्शक मुद्दे को समझने के लिए, उसके राजनीतिक एंगल को समझने के लिए टीवी देख रहे होते हैं न कि रोज़ रोज़ की डिबेट में कांग्रेस बीजेपी को सजा या पटखनी देने के लिए । यह भी सही है कि इसमें मीडिया की भी ग़लती है । 

एक नई प्रवृत्ति यह है कि अगर कोई मुद्दा किसी पार्टी के ख़िलाफ़ है तो उसके बड़े प्रवक्ता नहीं आते । नए और पार्टी की लाइन से जोड़ कर नहीं देखे जाने वाले आते हैं । जिनका दूध भात माना जाता है । वैसे अब इन्हीं ' दूध भात' प्रवक्ताओं से बहस की रातें रौशन हो रही हैं । जैसे बीजेपी ने आसाराम के मसले पर किसी को भेजा ही नहीं । पार्टी क़ानून सबके लिए बराबर है इससे आगे की लाइन नहीं बोलना चाहती है । लेकिन यह भी नहीं चाहती कि कहीं ज़्यादा विरोध करने से धर्म विरोधी संदेश न चला जाए । कल रात एक के बाद एक प्रवक्ताओं ने मना किया ।  एक नवोदित तैयार भी हुए तो आखिर क्षण में कैंसिल कर दिया । ग़नीमत है कि राजस्थान के सासंद मिल गए और उन्होंने अपनी पार्टी लाइन और कांग्रेस के सासंद से अच्छा बोला । ठीक इसी तरह कांग्रेस के नेता करते हैं । बड़े नेता ग़ायब हो जायेंगे । अनेक उदाहरण दे सकता हूँ । एस पी और बीएसपी के नेता तो ग़ायब ही हो जाते हैं ।  तो कुल मिलाकर बहस का तहस नहस हो जाता है । 


कई नेता इस जल्दी में रहते हैं िक पहचान बनते ही हैसियत का प्रदर्शन करें । प्राइम टाइम टीवी ने नेताओं को कई श्रेणी में बाँट दिया है । कुछ नेता स्टुडियो आते हैं । जबकि सबको आना चाहिए इससे सुनने और तुरंत कहने में आसानी होती है और बहस अच्छी होती है । कुछ नेता सिर्फ ओबी वैन पर ही आते हैं । अपनी हैसियत का अहसास इस बात से प्राप्त करते है कि मैं स्टुडियो नहीं जाता । इनमें से कुछ की वाजिब समस्या भी होती है कि एक दिन में तीन स्टुडियो कैसे जायें तो घर ओबी वैन मँगा कर निपटा लो । मगर ऐसे अपवादों को छोड़ वे ओबी वैन पर ही रहते हैं । कुछ नेता सिर्फ वन टू वन और वो भी देश के तीन एंकरों को इंटरव्यू देते हैं और वो भी साल में पचीस बार एक्सक्लूसिव । वन टू वन में सिर्फ एंकर और वक़्ता होता है । इसमें भी कई श्रेणी है । कुछ लोग लाइव डिबेट में वन टू वन नहीं करते । कुछ तो सिर्फ रिकार्डेड इंटरव्यू देते हैं । कुछ नेता ऐसे भी हैं जो दूसरी पार्टी के नेताओं की हैसियत पता करते हैं । कुछ नेता सिर्फ इंग्लिश चैनल में ही जाते हैं । कुछ अच्छे नेता भी हैं जो सुबह गेस्ट कार्डिनेटर को एस एम एस कर देते हैं कि आज मोदी या राहुल पर बहस हो तो मैं आ सकता हूँ । निश्चित रूप से कुछ नेता तैयारी के साथ भी आते हैं । हाँ दो चार नेताओं ने खुद को विचारक कैटेगरी में डाल दिया है ।हौल आफ़ फ़ेम में । ये साल में एक बार अंग्रेजी के किसी बड़े प्रिंट पत्रकार को या टीवी के अंग्रेजी एंकर को इंटरव्यू देते हैं । गौरवशाली और महान हिंदी पत्रकारिता ऐसे इंटर्रव्यू से टिप्पणियां चुन कर विश्लेषण करती है । सभी दलों ने निर्वाचित प्रतिनिधियों के अलावा ऐसे लोगों को प्रवक्ता रखा है जो उनकी सोशल सर्किल में पार्टी के लिए जीताऊ आइडिया लेकर घूमते रहते हैं । जिससे जवाबदेही भी नहीं रहती और काम भी हो जाता है । एक बात और, इतने चैनलों पर मग़ज़मारी यानी  बहसबाज़ी हो रही है कि पार्टियाँ कहाँ से प्रवक्ता पैदा करें । 

ऐसे में आप मेरी इस चिरकुट हताशा को छोड़िये उस गेस्ट कार्डिनेटर के तनाव को समझिये । जो इतनी सारी प्राथमिकताओं में संतुलन बिठाता है । वो भी रोज़ रोज़ । तब जाकर अच्छा या बुरा पैनल बनता है । विकल्प इतने सीमित है कि वह कांग्रेस बीजेपी के बनाए पैनल के बाहर भी नहीं जा सकता ।  ऊपर से हम लोग कई बार आख़िर क्षण में मुद्दा बदल देते हैं । तब इस गेस्ट कार्डिनेटर की साँस अटक जाती है । जैसे ही बोलता है कि सर आज का टापिक कैंसल है तो उधर से नाराज़ प्रवक्ता झुँझलाता है कि अरे यार तुमको फ़लाँ चैनल को मना कर टाइम दिया था । सचमुच इनका तनाव देखकर लगता है कि चल यार जो फिक्स किया है उसी पर कर ले । क्या जाता है । कुछ गेस्ट कार्डिनेटर इस बात में भी उस्ताद होते हैं कि आपने पहले किसी को तय किया है मगर वो झूठ साँच बोलकर अपने चैनल के पाले मे वक़्ता को ले जाते हैं । कई बार बड़े एंकर ( मैं कभी ये काम नहीं करता और न किया है) आपके तय गेस्ट को कैंसिल करा देते हैं । एक तरह से आपके साथ राहजनी की घटना हो जाती है और आप कुछ कर भी नहीं सकते । क्या पता किसके पास नौकरी माँगने की नौबत आ जाये या कई अन्य  कारणों से । इस साँठ गाँठ में वक़्ता भी तो शामिल होता है । सब चैनल और पैनल देखकर फ़िक्सिंग करते रहते हैं । 


एक नई बात और हो रही है । एकाध ईमेल आया कि हम लोगों ने फ़लाँ नाम की पार्टी बनाई है हिंदुस्तान को बदलने के लिए । कृपया आप मुझे भी पैनल में बुलायें क्योंकि आप जैसे पत्रकारों से ही उम्मीद है । एक मेल ऐसा भी आया कि हम फलाने डाक्टर हैं और अमुक अमुक मसलों पर बोलने की क़ाबिलियत रखते हैं । एक जनाब तो मेरे पीछे पड़ गए कि मैंने देश में सारे अर्थशास्त्रियों को पछाड़ दिया है इसलिए आप मुझे लेकर किसी से बहस करायेंगे । झुंझला कर कह दिया कि मैं इसी पर नहीं करूँगा लेकिन फिर अगले दिन फ़ोन कि विमल जालान को भी हरा दूँगा । एक पीछे पड़े हैं िक उन्होंने बिना मुद्रा की अर्थव्यवस्था का माडल निकाल लिया है प्राइम टाइम में जगह दीजिये । धीरज देखिये दो साल से हर तीसरे दिन फ़ोन कर रहे हैं । कुछ फ़ोन इस पर भी आए कि यार अपना बंदा है इसे भी कभी कभी । कुछ तो टीवी पर आने के लिए टापिक और अपना एंगल भी एस एम एस कर देते हैं । सुबह सुबह ट्विट कर देते हैं ताकि लाइन देखकर किसी चैनल से फोन आ जाए । 


अब आप दर्शक उम्मीद करते हैं कि बहस भी अच्छी हो, एंकर अतिरिक्त नौटंकी भी न करे वग़ैरह वग़ैरह । टीवी की अपनी सीमा है । वो सीमा टीवी की ही बनाई हुई है । दर्शक की कोई ग़लती नहीं । बस उसे देखना चाहिए कि वो किसी कार्यक्रम को किसी पार्टी की निष्ठा से देख रहा है या कई पक्षों को जानने के लिए । दर्शक को बरगलाना आसान नहीं है मगर फिर भी । निश्चित रूप से कई बार शो ख़राब से लेकर औसत हुए घटिया भी होते हैं । पर इसका जवाब पार्टी के सोशल मीडिया विंग से प्रसारित दलीलों में नहीं है । हमेशा तो नहीं ही । इसलिए अब इन आलोचनाओं से फ़र्क नहीं पड़ता । वैसे अन्य किसी को भी पड़ता नहीं है । बस मैं यह अपने भीतर बदलाव देख रहा हूँ और स्वीकार कर रहा हूँ । हां अहंकारी नहीं हूं । पर कभी कभी मूड ज़रा । इसके बाद भी जब शो ख़राब होता है और काम की बातें नहीं होती तो रात भर ठीक से नींद नहीं आती । बेचैन हो जाता हूँ । लेकिन इस दो दलीय दलाली के दैनिक आरोपों का क्या करूँ । घंटा फ़र्क नहीं पड़ता । पहले भी लिखा है और आज भी लिख रहा हूँ ।

प्राइम टाइमीय रात कोई ख़ूबसूरत रात नहीं होती । काँटों भरी रात होती है । रात भर तकिये के नीचे टीवी बजता रहता है । मेरी शाम पर प्राइम टाइम की नज़र लग गई है । हर दिन उत्साह का एक समान स्तर बनाए रखना किसी औसत महत्वकांक्षीय भूख के बिना नहीं नहीं हो सकता । दर्शक रोज़ इम्तिहान लेते हैं । सोचिये रोज़ फ़ेल होकर कैसा लगता होगा । पास भी होते हैं । समस्या तो यही है न कि थेथर नहीं है । दुआ है कि जल्दी थेथर हो जाए वर्ना व्याधियाँ आतुर हैं शरीर में समाने को । जब शो अच्छा होता है तब ज़रूर अच्छी नींद आती है । 


42 comments:

USB said...

Ravish, ye sahi baat hai ki aapke panel me jo log aate hai bhashan bazi karte hai. kisi me bhi originality nhi hoti hai, log shayad aapko sunane ke liye prime time dekhate honge. ek to aap topic bhi hamesha political le kar aate hai , jo ek dam monotonous ho gaya hai. Khooshi hua ki aap is baat ko khood hi kaboole. Thoda economical, social, science & technology, rural issues, education , Youth problems aadi aadi subject bhi daaliye. by the way last time 'rupaiye ki doorgati' ka discussion achha tha.

Sushil Kumar Tomar said...

USB ki baat se ek dam sehmat hun! kabhi kabhi india positive pe bhi bhes kare! ya fir khabar bura hi banti hai ka siddant aap par bhi lagu hai?

nptHeer said...

औसत महत्वाकांक्षाएं पालने मैं वह भी उम्दा हेतु प्रेरित स्वरोजगार के नितिमय वहां के लिए?
आगे का अन्धकार ही तो मिटना है!?चाहे कोई प्रतिस्पर्धी के रूप मैं हो या चाहे धारा-धोरण को उच्च रखनेकी hardship? :)


और एक बात बताऊँ रविशजी?दर्शक भी रोज एंकर से उम्मीद नहीं रख सकते एक अच्छी grand बहस की--reason है-बहस एक से नहीं/एक इन्सान के तर्कों से नहीं/एक इन्सान के सवालों की गुणवत्ता से नहीं---ग्रैंड/रिजल्ट given/qualitative बन जाती----जैसे ताली सिर्फ एक हाथ से नहीं बजा करती !!?? :)

अब बात social media stalls की---अखबार से शुरू करें?
जब रेडियो आया तो अखबार और टीवी आया तब रेडियो और अब जब govt के उपयोग और authorities internet है तो लोग टीवी पर ही मत व्यक्त करेंगे

अगर सभी सामान दुकानों से आता रविशजी तो लोग घर मैं kitchen नहीं cricket pitch रखते थे :)

गुजराती मैं एक कहावत है "ऊँट करे ढेका तो माणस करे टेका" :)

गुजराती समझना मुश्किल नहीं है ( गुजरातिओं को भी) :)
फिर भी
इसका मतलब होता है "ऊँट अगर अपनी पीठ टेढ़ी-मेढ़ी करता है तो इन्सान उसके हिसाब से 'टेका' (ऊँट पर रखी जानेवाली बैठक को टेका कहते है गुजराती मैं) बिठा ही लेता है"

ऊँट चाहे सतयुग का हो कलियुग का---या काले माथे का मानवी:)
वैसे ही राज्यकर्ता और प्रजा ?:) क्या?:) राज्य गठन-व्यवस्था-वहीवट घर की मंडी चलाने थोड़ी ना होता है?:)

वैसे ही मछली का exelance उड़ने मैं या पंछी का दोड़ने मैं:)ठीक वैसे आप का एचोनोमिकल/विज्ञानं/etc मैं :)

gn:)aap ka blog raat ko parhna jaagne ke khatre se khaali nahin hai dekh lo ek hr se reply coent type ki !!

प्रवीण पाण्डेय said...

एक चित्रपट, रंग सैकड़ों,
रंगना गड्डमगड्ड हो गया,
जो सोचा था, जो था चाहा,
रंगकर्म में कहीं खो गया।

मुझे सच में आपसे संवेदना है, हम पक जाते हैं तो टीवी बंद कर गाने सुनते हैं या पार्क में जा घास की हरीतिमा अनुभव करते हैं। आपको सब सठ झेलने पड़ते हैं।

Kaushal Lal said...

सब चैनल और पैनल देखकर फ़िक्सिंग करते रहते हैं । ----उम्दा

sunbaba said...

bahash chahe jaisa bhi ho, ravish ko sunna achha lagta hai. kisi housewife ki tarah jo " soap opera " dekhne ke liye sab kuch chor kar tv ke liye baith jati hai, thik vaise hi intjar rahta hai aapke "prime time" ka...bat sahi hai, neta bhi jawab dena (talna)sikh gaye hai. but kabhi politics se hatkar alag mudde par bhi charcha kare ....ek chij aur ..apni "ravish ki report" ki tarah ki kuch jhalkiya bich bich me neta ke answer ke jawab me live jhalkiya dala kare...(jab koi neta/prvakta us bat ko ignore kare ya bachna chahe )...aapki sahjta aur chutkiya bhi prime time ko attractive banati hai....

Amit Jha said...

GREAT SIR!!
MAI SAMAJH SAKTA HU AAPKI PROBLEM AUR SACH ME RAAT KA PRIME TIME JAGDAMBIKA PAL AUR RAKESH SINHA NE KHARAB KAR DIYA....SAMAJH SAkta hu ki aap bhi aam aadmi ke tarah majboor ho jaate ho kayi baar...

Amit Jha said...

bahut hi besabri se intejaar rehta hai aapke prime time ka shayad g/f se bhi jyada... jis din aap nhi karte ho prime time us din aisa lagta hai jaise g/f promise karke bhool gyi ho....hum log to humesha umda quality ka hota hai but sahi kaha aapne ye bjp aur congress milke prime time ko boreing kar dete hai... enko apni jimmedari ka ehsaas to hai nhi lekin aapki jimmedari ko bhi nhi samajhte hai... aapke mentally torch er ko samajh sakta hu... koi baat nhi sab thik ho jayega hum en natao ki natak ko samajhte hia ki jab toppic enke saath ho tabhi ye utsaah dikhate hia aur khud anchor ban jaate hai thoda sa ulta rahe to enki aankh me mirchi lag jaati hai....

Kavita Saxena said...

mai bhi kuchh dino se aisa hi kuchh mahsoos ker rahi thi jaisa aap soch rahe hai.ab prime time aapki duty mahsoos ho rahi hai.

Mahendra Singh said...

No comment,kyunki TV se door ho gaya hoon.

Shikha simlply special said...

Happy Krishna Janmashtmi Sir, This is fact that we watch prime time only coz of u, we expect healthy discussion on social n political issues, your sensitivity toward our society insure that u r also one of us, actually problem is with u n us, we know wts wrong around us, but unable to make them right. I have no doubt that this fall of rs. is also conspiracy of that disgusting people who rape our Economy, I have no doubt that Asaram keep kanoon in his pocket(open terrorism),honest police officers r in jail coz they encounter history sheeter and so on issues r there, where we need justice but we have to satisfy only by discussion and debates......, chain ki neend soiye sir, coz oro ko jagane k liye, dimag ko rest dena zaruri he...

अजय कुमार झा said...

चलिए अच्छा है , कम से कम आपकी लेखनी और आपके पोस्ट को पढने के बाद ये तो पता ही चल ही गया कि आप प्रस्तुतकर्ताओं को किन परिस्थितियों और किस मनोदशा से गुजरना पडता है । मीडिया की लालागिरी और उससे पडता प्रभाव भी दिखा । लेकिन एक टाईप की ड्यूटी बजाते बजाते खुद के बजने जैसा महसूस नहीं होने लगता है क्या हो ।
आप लोग अब उस मुकाम पर हैं जहां चैनल के अनुसार आप नहीं आप लोगों के तेवर के अनुसार चैनल को चलना चाहिए ।

ले लोट्टा , देखिए अब जब ये टिप्पणी लिख रहे हैं तो आप अवतरित हैं धर्म कर्मकांड का बैंड बजाते हुए , दाभोलकर हत्याकांड , नए कानून को आडे हाथों लेते हुए , अब चले वही देखने

Mukesh Pandey said...

औरों का नहीं कह सकता मगर मैं आपको एक निष्पक्ष पत्रकार मानता हूँ और आपकी शैली से बहुत प्रभावित भी रहा हूँ। पत्रकारिता का स्टूडेंट रहा हूँ तो आपसे बहुत सीख मिलती है इसलिए आपकी हर बात पर अम्ल करने की कभी सफल तो कभी असफल कोशिश करता रहता हूँ। आप जिस तरह निष्पक्ष और खुले तौर पर अपनी बात रखते हैं मुझे आपमें सआदत हसन मंटो की झलक नजर आती है। सर आप ऐसे ही लिखते रहें और बोलते रहें अब आपकी आदत सी पढ़ गयी है।
आपका प्रिय पाठक,
मुकेश चन्द्र पाण्डेय

shet masih said...

"Ghantaa farak nahi padtaa."
sir bihaar ke kaun distict se hai aap??

shet masih said...

"Ghantaa farak nahi padtaa."
sir bihaar ke kaun distict se hai aap??

Randhir Kumar said...

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Ashok Prasad said...

There is no Hindi alphabet in my mobile,so excuse me I am writing in Roman script,though I am hindibhashi & hail from Bihar.
I eagerly wait primetime hosted by you ,I thank God that at this time there is no Sas-baby serial liked by my wife.I am very impressed with your presentation ,your knowledge of topic ,your way of non acceptance of views of speakers .
Keep it up.
Ashok Prasad
Singrauli
(MP)

Jitesh Kumar said...

bahut achha likha apne

डा. गायत्री गुप्ता 'गुंजन' said...

सर, इस ब्लॉग को सब्सक्राइब करने का कोई ऑप्शन ही मौजूद नहीं है...

Rajneesh Dhakray said...

मेरे मामा का लड़का किसी कस्बाई अखबार का रिपोर्टर है और अपने आपको पत्रकार कहता है उसकी जानकारी और attitude के हिसाब से मैंने अनुमान लगाया है कि बाकी के खबरिया दैत्य अपने आपको संप्रभु क्योंकर मानने लगे है खैर ये बाद की बात है।
खबरिया चेनल्स का काम खबरों को ज्यों के त्यों रूप में दर्शकों को पहुंचाना हो तो ज्यादा अच्छा है दर्शक ही निर्णय करें कि उन्हे अपनी राय कैसे बनानी है, लेकिन अब न्यूज़ चैनल चला रहे हैं हल्ला बोल खर्चा किया है (license, inventory, staff से लेकर खबरें बनाने वाले तत्वों तक) तो कमाई के लिए मिर्च मसाला मिला कर दर्शक और प्रायोजक बटोरने का हक़ तो बनता ही है और इसीलिए हर खबर में anchor अपनी व्यक्तिगत या प्रायोजित (किसी व्यक्ति, दल, corporate घराने द्वारा)राय का बहुत ही दहाड़ाना तरीके से घालमेल कर ही देता है या ऐसी उसकी मजबूरी बन जाती है; यहीं दर्शक की समझ का इम्तिहान होता है कि क्या वह उस anchor या उस program में कही गयी बातों को ही अंतिम सत्य मान रहा है । अब जो रवीश जी का blog पढ़ रहा है और उस पर आए हुये comments भी पढ़ रहा है उसे इतनी समझ तो होगी ही ।
prime time देखता रहता हूँ, गाँव वाले घर में DTH की वजह से एनडीटीवी तो आ गया है लेकिन राज्य सरकारों की मेहरबानी से बिजली अभी तक नियमित नहीं हो पायी है अभी के मुखिया ने सीधे सीधे यहांतक कह दिया है कि आगामी लोकसभा के चुनाव में अगर इस सीट से उनका candidate चुनाव नहीं जीता तो आप लोग बिजली के लिए तरस जाओगे (ये मौजूं बात नहीं थी लेकिन रोना इस लिए रो दिया क्योंकि लगता है आप मुझसे तो ज्यादा शक्तिशाली है और अपने से लगते हैं शायद मेरे दुख को समझें) हाँ तो inverter बचा के रखते हैं prime time देखने के लिए भले ही गर्मी में सड़ते रहें; वैसे तो भूलता नहीं लेकिन अगर ध्यान न रहे तो माँ yaad दिला देती हैं कि रवीश जी आ रहे होंगे देख लो।

आजकल हर पार्टी अपने नेताओं और प्रवक्ताओं को media handling की training दे रही है इस बात की सख़्त हिदायत के साथ की पार्टी लाइन से अलग कुछ नहीं बोलना है और जब कभी कोई नेता कुछ बोल भी देता है जो उसका अपना व्यक्तिगत हो (अच्छा या बुरा, उसकी अपनी समझ है उसी के हिसाब से ही बोलेगा) अगर वो पार्टी हित में है तो पार्टी वाले उस पर चुप्पी साध लेते हैं और अगर कुछ ऐसा हो जो पार्टीलाइन से अलग है तो अव्वल वही नेता अपनी बात से पलट जाता है दोष मीडिया या सामने सुनने वाले इंसान पर लगा देता है कि उसकी बात को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया या सामने वाले ने ठीक से समझा नहीं आई और
अगर ऐसा नहीं होता तो पार्टी ही खुद को उस बयान से अलग कर लेती है कि यह अमुक व्यक्ति की अपनी सोच है पार्टी का इससे कोई सरोकार नहीं है अजीब स्थिति है, हमारे नेता या राजनैतिक पार्टियां इस क़दर स्तरहीन हो गए हैं कि अपनी कही बातों को ही acknowledge करने का साहस नहीं रहा इनमें, गाँव में एक कहावत है (शहरों में भी होगी) "मर्द की एक बात" (इस बात को स्त्रीविरोधी न लें) चलो ऐसे कह लो "एक बाप की औलाद हो तो अपनी बात से पलटना मत" खैर उनकी भी अपनी मज़बूरी होगी बॉस और कंपनी की बात मानने की ।
लेकिन अचरज तब होता है जब ये कार्यकर्ता प्रतिनिधि (माफ करें जनप्रतिनिधि नहीं हैं ये)अपना ही राग अलापते हैं और दावा करते हैं कि जो भी ये कह रहे हैं वही जनता की आवाज और अंतिम सत्य है हर पार्टी के नेता का अपना अंतिम सत्य है और वह उनके लिए वैसे ही सत्य है जैसे हर धर्म का भगवान उस धर्म के अनुयायियों के लिए अंतिम सत्य है इस तरह हजारों अंतिम सत्य हैं अब कौन सा अंतिम सत्य वास्तव में अंतिम सत्य है सब इसी की लफ़्फ़ाज़ी में अपना धंधा चला रहे हैं राजनीति के धंधाखोर भी और धर्म के धन्धाखोर भी ।
सावधान रहें सचेत रहें रवीश जी को सुना भी करें और पढ़ा भी करें वैसे ये भी अंतिम सत्य नहीं है आपका भी कोई अंतिम सत्य होगा बस उसी पर भरोसा और अमल करें कम से कम तसल्ली तो होगी कि मुझे किसी और ने बरबाद नही किया ।
(इस उम्मीद के साथ इस लंबे comment को paste कर रहा हूँ कि आप वक़्त निकाल कर इसे पढ़ेंगे, अब पढ़ा या नहीं इसका जवाब मुझे कैसे मिले! )

sanjaya said...

ravishji aapki pareshani samajh me ati hai, lekin agar ek anchar bahas se pare rah kar sirf bahas ko arganise karne ka hi kaam kare to galiya khane se bach sakta hai. per jara vijai vidrohi, sumera, anjana kashyasp aur deepak churashia ko dekhiye, ye to panelist ki tarah vayahar karne lagte hai

sanjaya said...

ravishji aapki pareshani samajh me ati hai, lekin agar ek anchar bahas se pare rah kar sirf bahas ko arganise karne ka hi kaam kare to galiya khane se bach sakta hai. per jara vijai vidrohi, sumera, anjana kashyasp aur deepak churashia ko dekhiye, ye to panelist ki tarah vayahar karne lagte hai

Manoj Vaishnav said...

main apki baat se sehmat hun politician political frame se upar uth kar ni sochte hain aasaram ki debate me rakesh sinha aur jagdambika pal bhi ek hi line me chal pade the. par apki debate me isi bahane political view dekhne ko milta h parties ka halaki parties debate ko bhi marketing plateform samajhti h unka maksad mudde pe baat karna ni balki dusri party ko nicha dikhana h theek h unki apni majburi ho sakti h par janta bhi bewakoof toh h nahi haan majboor ho sakti h. primetime anchor ki problems k bare me kabhi socha ni tha is pressure me kaam karna padta h ek gambhir chehre k piche itni samasyaein hoti h aaj pehli baar samjh me aaya. kafi mushkil kaam h.

sudeep vyas said...

rajniti ek latki hui prakriya hai or neta latka hua tatava yeh ise pad kar aapki manodasha ko samaj sakte hai hum bhi kabhi kabhi sochte hai ki 545 mai sirf 2

sudeep vyas said...

satya kabhi parst nahi ho sakta

shruti said...

me primetime show aur aapki fan hu. din bhar sochti hu aaj na jane kis topic par ravishji apna prakash dalenge. aap apne aap me perfect ho aur rahi bat expectation ki to sab ko ek sath khush karna asambhav hai.kyoki har banav ko dekhne ka sabka najriya alag hai. hum jab apna pura ji jan laga kar sachai se kam karte hai to chen se so jaiye. baki ishwar par chhodiye. logo ka kya he vo to har hal me bolenge.

Akhil Raj said...

कोई कुछ भी कहे लेकिन प्राईम टाइम पे बहस सुरु होने से घरों में बैठा आम आदमी राष्ट्रिय मुद्दों को समझने की कोसिस तो करने लगा है ..और मैं इससे आगे बढ़ के ये कहूँगा की जब से आपने ये बहस का प्रोग्राम शुरू किया है देश के ज्यादातर न्यूज चैनल सांप सपेरों से आगे बढे हैं अब उनका वो भी अब बहस को तवज्जो देने लगे हैं ..उनके बोलने का ढंग भले न बदला हो पर न्यूज का स्वरुप बदल गया है ... १०० बातों को सुनने के बाद दर्शक कम से कम २-४ बातों पे तो अपनी राय बनाता ही होगा ..और यही प्राईम टाइम बहस की उपलब्धि है ...

चलते चलिए ...!!

Amit Sharma said...

आदरणीय रवीश जी ,
मुझे ज्यादा समझ नहीं बस की कुछ पत्रकारों की भाषा शैली बड़ी रोचक होती है और आप उनसे एक है इसमें किसी को दो-राय हो मुझे नहीं लगता । वोटर हो या पत्रकार दोनों को पार्टी विशेष से लगाव न हो तो बहुत अच्छा है । आप तो निश्पक्ष लगते है , परन्तु मैं इसके लिए अपराधी हूँ । मुझे खबरिया चैनलों से बड़ी खीज होती है परन्तु आप के प्रोग्राम के लिए मैं अपनी मम्मी के सास - बहु वाले नाटकों को भी निकलवा देता हूँ । और रही बात फ़ैल होने की तो मैंने कहीं सुना था " आज़ादी का सही अर्थ ही असफल होने की आज़ादी से है । " रही बात हमारे नेताओं की तो वो तभी बदलेंगे जब हम बदलेंगे । हम तो शायद बदलने लग गए हैं देखते है इनका नंबर कब लगता है ।

Rajeev Sharma said...

मन की बात करदी आप ने , ये समय परिवर्तन का है सब को सुधरना पड़ेगा।

Vivek Khanna said...

प्राइम टाइम अपनी धार खो रही है उसपे ध्यान दे। . आप का बार बार प्राइम टाइम से गायब होना भी शायद एक वजह हो !!!

Ranjit Kumar said...

टीवी की भी अपनी व्यथा है...इतने चैनल्स हैं कि गिनना मुश्किल है...उन्नीस बीस हो जाना स्वाभाविक है ।

MANISH UNIYAL said...

sir plz ravish ki report he kariye.. aapke liye prime time kbi kbi he thik hai

b.k. Sharma said...

Pahle narbhasaye they.Ab thethar ho gaye hai.Magar ye thetharayee votwa ke din tak rahe tab na.

b.k. Sharma said...

Pahle narbhasaye they.Ab thethar ho gaye hai.Magar ye thetharayee votwa ke din tak rahe tab na.

ललित मिश्र said...

हम भारतवासियों की ये यक्ष परेशानी है श्रीमान। कोई थेथर बनने के बाद शिकायत करता है कि अब भयंकर सपने आते हैं।कुछ कि समस्या ये है कि वो लाख जतन करने के बाद भी थेथर नहीं बन पता है।अब कौन उनको समझाये कि अरे अप जिस दिन इस धरा पर अवतरित हुये उसी दिन अल्प मात्र में ही सही लेकिन लथेर हो गए हैं। आप श्रीमान कम से कम नसीब(कोई वाला भी) वाले हैं कि आप को नींद तो आती है सपने देखने के लिये, भले ही उनकी प्रकृति कैसी हो।

ARUN SATHI said...

बस बोस यही सही हे की आप थेथर नहीं हुए, इसी से तो दुनिया आपका दीवाना है.

USB said...

Ravish ek aur baat, aap bolte hai BJP aur congress ki thethrology se aap bhi pareshan hai, dusri taraf Arvind Kejrival , yaa unke jaise kafi log jo kafi talented hai politics me thoda creative idea le kar aaye hai, unko aap panel me bulate nhi. Jab unke jaise logo ko koi platform, unki idea ko significance nhi milega to, logo ko wahi roj daal bhaat khilayenge to bore hoyenge hi. samajhdhaar darshak to kam se kam bore zaroor ho jayenge BJP vs Congress sun sun kar jo har jawab me party ka punch line hi marte rahte hai. janta ka thoda alag dikhaye shayad competition ho aur congress ke arrogance , aur BJP ke ram rajya ke sapne se bahar bhi kuch logo ki rai bane. Media bahut powerful hota hai aur aaplog jaise nek niyat wale ye bharosa dete hai, soorat abhi bhi badal sakti hai.

CopyMasteR © said...

sir ..:)

CopyMasteR © said...

sir ..:)

Jayprakash Mishra said...

ठीक है गुरु

Ravi Rolan said...

Sir... M apke sense of hum'r ka fan hun... Ki c bde panelist par aapke cmnt debate ko refresh krne ka kam krte hn..

mayank sachan said...

ravish ji aapko kya lagta hai ki aapke blog par log itne comment kyon dete ???? ham likhen to do bhi nahin milenge ye insaani fitarat hai ...aur log bahas sirf dekhne ke liye dekhte hai baaki aap jo bolte ho usko zindgi men kaun utaar raha hai .. ye aapka TV madari ka khel hai .. sirf 30% sahi kaam ki news baaki din bhar dugdugi bajti hai kisi men karuna kisi men veer ras to kisi men haasya ras ... aaj kal karun ras chal raha hai .. muzaffar nagar ke dange.. dare hue log .. naakam vyawastha .. ye sab dekhenge lekin kal jab musalmaan milega ya hindu milega to andar se wahi lizliza pan .. hindustani janta farzi hai andar kuch aur baahar kuch aur ..