मैंने विनोद कुमार शुक्ल को देखा

मैं दृश्य में सोचता हूं। जब भाषा नहीं बनी होगी तब इंसान कैसे सोचता होगा। मेरे ख़्याल में दृश्य में सोचता होगा। मैं अपनी चुप्पी को बचाने के लिए लिखना चाहता हूं। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में नौकर की कमीज़ के लेखक विनोद कुमार शुक्ल अपनी कहानी का पाठ करने के बाद तमाम तरह के वर्गों से आए पाठकों के सवालों का जवाब दे रहे थे। एक पाठक ने सवाल किया क्या आपके लेखन में मार्ख़ेज़ की रचनाओं का असर दिखता है आपके विवरण में। विनोद कुमार शुक्ल ने कहा कि मैं कम पढ़ा लिखा हूं। मार्खेज़ को पढ़ा है वैसे पर उतना नहीं। रही बात विवरण के असर की तो महाभारत और रामायण जैसी विवरणमयी रचना आपको पूरे यूरोप में कहीं नहीं मिलेगी।

हिन्दी के अखबारों,पत्रिकाओं और साहित्यिक पत्रिकाओं के कवर पर लेखकों की तस्वीरें नहीं छपती हैं। वो लेखन से याद किये जाते हैं। विनोद कुमार शुक्ल यहां न पहचाने जाने से प्रसन्न ही होंगे। वे इतनी भीड़ में भी अपने लिए एकान्त तलाश रहे थे। चुप रहने के लिए या शायद बाद में चुप्पी तोड़ने के लिए। हर सभाओं में वक्ताओं को ध्यान से सुनते हुए विनोद कुमार शुक्ल को देखना अच्छा लगा।












13 comments:

सागर said...

अभी हाल ही मैंने उनकी नौकर की कमीज और दीवार में एक खिड़की रहती थी, पढ़ी है.... "दीवार में एक...." में तो कई जगह चमत्कार सा दीखता है. और सबसे मजेदार यह की इस उम्र में उनके लेखन में निरंतर प्रयोग दिखता है, शिल्प भी अनोखा है और कहन भी...

संतोष कुमार said...

halaki ki maine abhi tak Vinod Kumar Shukla ko nahi padha hai. Par apki is rochak report ke baad unki rachnaoo ki padhe ki ekcha jaag gayi hai.

Aur ek sikayat hai aapse , aap bahut antraal ke baad blog me aaye.Ab aapki blog ke bina lagta hai ki kuch miss kar raha hu.

Aur bahut bahut dhanyavaad "Support My Schoo"l mission ke liye.

प्रवीण पाण्डेय said...

साहित्य और कहानी के प्रति यह प्रेम देखकर बहुत अच्छा लग रहा है।

सतीश पंचम said...

संतोष कुमार जी,

नौकर की कमीज का अंश यहां पढ़ा जा सकता है। इस अंश को पढ़ते हुए महसूस किया जा सकता है कि विनोद कुमार शुक्ल की लेखनी कितनी पैनी है।

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मेरा वेतन एक कटघरा था, जिसे तोड़ना मेरे बस में नहीं था. यह कटघरा मुझमें कमीज की तरह फ़िट था. और मैं अपनी पूरी ताकत से कमजोर होने की हद तक अपना वेतन पा रहा था. इस कटघरे में सुराख कर मैं सिनेमा देखता था, या स्वप्न. हफ़्ते-भर बाद ही मेरी फ़िल्म देखने की इच्छा हो जाती थी. फ़िल्में और लोगों की तरह मुझमें भी जीने का विश्वास बढ़ाती थीं. यह जीना यथास्थिति में जीने का था. रिक्शेवाले से एक करोड़पति की लड़की की शादी हो सकती थी तो रिक्शावाला इसी संतोष से रिक्शा चलाता रहेगा. अमीर लड़की से गरीब लड़के के प्रेम को देखकर गरीबों को कुछ वैसा ही सुख मिलता था जो अपनी चारपाई या जमीन पर सोने से ज्यादा, बढ़िया गद्देदार पलंग के नीचे झाडू लगाने में नौकर को मिलता होगा. खाना बनानेवाला नौकर ज्यादा खाना बनाएगा ताकि खाना बचे. परंतु विज्ञान से गरीबों को खास लाभ नहीं मिला था. मालकिन बचा हुआ खाना रेफ्रीजरेटर में रख देगी. नौकर को कभी-न-कभी कुछ जरूर मिलेगा क्योंकि रेफ्रीजरेटर में रखे-रखे बहुत दिनों का सामान खराब हो जाता है. ज्यादातर आदमी का स्वाद मिठाई के ढेर से थोड़ी मिठाई चुराकर चख लेने का स्वाद था. आदमी के विचार तेजी से बदल रहे थे. लेकिन उतनी ही तेजी से रद्दीपन इकट्ठा हो रहा था. रदीपन देर तक ताजा रहेगा. अच्छाई तुरंत सड़ जाती थी.

इस अंश को मिहिर पंडया जी के ब्लॉग 'आवारा हूँ' से साभार लिखा हूँ।

यह रहा लिंक -

http://mihirpandya.com/2009/04/naukar-ki-kameez/

सतीश पंचम said...

- जारी....

घर का खर्च कम नहीं होता था. फालतू खर्च क्या है, जिसमें कटौती की जाए, यह बहुत दिनों तक समझ में नहीं आया. बाद में भिखमंगे को रोटी देना एक फालतू खर्च समझ में आया. तब यह रोटी घर में उपयोग होने लगी. -खर्च पूरा न बैठने के कारण दया और उदारता कम हो जाती है, यह बात समझ में जल्दी आती थी. उदारता और दया का सीधा-सीधा संबंध रुपए से है. सिर पर हाथ फिरा देना न तो उदारता होती है, न दया. बस सिर पर हाथ फिराना होता है.

बड़े-बड़े बँगलों के सामने रास्ता चलती गायों के पानी पीने के लिए एक-एक टाँका बना था. गर्मियों मे सेठ मारवाड़ियों के लड़के प्याऊ खोलकर बैठ जाते थे. रेलवे स्टेशन में यात्रियों को ठंडा पानी पिलाने के लिए रेलगाड़ी के समय लड़के मोटरकार में बैठकर आते. यात्रियों को पानी पिलाकर पसीना पोंछते हुए घर लौट जाते थे. दोनों हाथ हिलाते चलते थे, एक हाथ से बईमानी और दूसरे हाथ से धर्म, सामाजिक और राजनैतिक कार्य इत्यादि.

गरीब एक स्तर के होते हुए भी एक जैसे इकट्ठे नहीं होते जैसे पचास आदमी को काटकर पचास आदमी बना देना. यदि पचास हैं तो इसका मतलब सिर्फ़ पचास, एक और फिर गिनती गिनो इक्यावन.

“मैं अपनी कमीज नौकर को कभी देना नहीं चाहूँगा. जो मैं पहनता हूँ उसे नौकर पहने, यह मुझे पसन्द नहीं है. मैं घर का बचा-कुचा खाना भी नौकरों को देने का हिमायती नहीं हूँ. जो स्वाद हमें मालूम है, उनको कभी नहीं मालूम होना चाहिए. अगर यह हुआ तो उनमें असंतोष फैलेगा. बाद में हम लोगों की तकलीफ़ें बढ़ जाएँगी. खाना उनको वैसा ही दो, जैसा वे खाते हैं. जैसा हम खाते हैं, वैसा बचा हुआ भी मत दो. ये पेट भरते हैं, चाहे आधा या चौथाई. स्वाद से इनको कोई मतलब नहीं. सड़क के किनारे चाट खाने वाले, चाट खाकर जो फैंकते हैं, यह मुझे गुस्सा दिलाता है. इसी के कारण आवारा गरीब लड़के पत्ते चाटकर जादुई स्वाद का पता लगा लेते हैं, जिससे चोरी, गुंडागर्दी और हक माँगनेवाली झंझटें बढ़ी हैं. स्वाद हम लोगों को संतोष नहीं दे सका तो इनको क्या देगा? अगर ये स्वाद के चक्कर में पड़ गए तो अपनी जान बचानी मुश्किल होगी.”

मैं अधिक देर तक नौकर की कमीज पहने हुए नहीं रह सकता था. इससे छुटकारा पाना चाहता था. कमीज से मुझे पेन्ट की गंध आ रही थी. साहब के बंगले की खिड़की-दरवाजों में अभी हाल में पेन्ट किया गया था. मैंने अपने हाथों को सूँघकर देखा, उससे भी नए पेन्ट की गंध आ रही थी. क्या मुझे भी पेन्ट किया गया है?

ManPreet Kaur said...

nice blog..
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संतोष कुमार said...

शुक्रिया सतीश जी, दिल को छू गयी शुक्ल जी की "कमीज" की कहानी. अब मैं विनोद शुक्ल जी की सभी कहानियों को पढ़ने की कोशिश करेंगे.

दिल से मिहिर पंड्या जी के लिए भी धन्यवाद.

नीरज गोस्वामी said...

जिवंत चित्र...आभार आपका...

नीरज

नीरज गोस्वामी said...

विनोद जी की "दीवार में एक खिड़की रहती थी" का मैं घनघोर प्रशंशक हूँ...काश वो अगले साल भी आयें तो मैं उनसे मिल पाऊं...दुआ करें...
नीरज

कुमार राधारमण said...

शांत मन किसी गहरे समुद्र सा होता है।

ramkumar singh said...

उम्‍दा।

Mahendra Singh said...

"Naukar kee kameej" ka ansh bahut hee acha laga. Is saal Lucknow pustak mele main unko jaroor khojunga

Sanjeet Tripathi said...

shukl ji ko apne ekant aur apne maun se prem hai..... antarmukhi aur sankochi swabhav hi unhe auro se alag banaa deta hai....lekin unhe sun na ek aur alag hi anubhav de jata hai....