आशंकित मनों से दूर जयपुर


साहित्य से भी शहर को पहचान मिलती है। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल शहरीकरण से बोझ से दब रहे और पसर रहे जयपुर को नई पहचान दे रहा है। दिल्ली को यह पहचान विश्व पुस्तक मेला से नहीं मिल सकी। जबकि दिल्ली के मेले का इलाका बड़ा होता है। भीड़ ज्यादा होती है। असंख्य किताबें होती हैं। इसके बावजूद साहित्यिक पहचान का पक्ष कभी दिल्ली के साथ नहीं जुड़ सका। साठ हज़ार लोगों ने जयपुर लिटरेचल फेस्टिवल में आने के लिए रजिस्ट्रेशन कराया। इसके अलावा बड़ी संख्या में शहर के पाठक इस मेले में आते-जाते रहे। दरअसल यह है पाठकों का मेला जिसमें उनके प्रिय लेखकों का भी जमावड़ा होता है। एक सिख पिता अपने दस साल के बेटे को लेकर आए थे ताकि उसमें कुछ कुछ उनके लेखक जैसा बनने की प्रेरणा विकसित हो।


संख्या के हिसाब से अति-कुलीन लोगों का बहुमत रहा। मगर कई बार यह अतिकुलीनता सेल में खरीदकर पहने गए कपड़ों के आधार पर भी तय कर ली जाती है। ऐसा होता तो जब अमितावा कुमार और अभिजीत घोष भोजपुरी सिनेमा पर चर्चा कर रहे थे तब हॉल खचा-खच भरा रहा। अमितावा खांटी अंग्रेजी दां हैं मगर भोजपुरी सिनेमा पर बोलते हुए भोजपुरी टोन को उभारते हैं। ऐसी हिन्दी कैसी हिन्दी पर चर्चा चल रही थी तब डिग्गी पैलेस के फ्रंट लॉन में उतनी ही भीड़ थी जितनी नोबल पुरस्कार ओरहान पामुक को सुनने लोग जमा थे। फिर से ये वही तथाकथीत अंग्रेजी दां लोग थे जो मृणाल पांडे से यह सुनकर गदगद हो रहे थे कि उनके कुमाऊं में गंध के बारह शब्द हैं। हम अपने शब्दों को भूल रहे हैं। सुधीश पचौरी बोल रहे हैं कि हिन्दी के प्रकाशक कमाई का तीन-तीन बहीखाता रखते हैं इसलिए हिन्दी की कमाई की असली ताकत का अंदाज़ा नहीं मिलता। अगर मेले में आए लोग सिर्फ हा हू हाई बाई करने के लिए ही आए तो वो हिन्दी और भोजपुरी को क्यों सुन रहे थे। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम एक खास तरह से दिखने वाले वर्ग को लेकर काफी असहज हो जाते हैं।


यह मेला सचमुच अलग है। मदनगोपाल सिंह और अली सेठी के साथ सूफी संगीत के बारे में सुनना एक अलग अनुभव रहा। कश्मीर के घायल अनभुवों पर राहुल पंडिता का किस्सा कि कैसे उनका एक भाई आतंकवादियों के हाथों मारा जाता है और कैसे उसके बचपन का दोस्त लतिफ लोन भी आतंकवाद के रास्ते पर चल पड़ता है और सुरक्षा एजेंसियों के साथ एनकांउटर में मारा जाता है। कश्मीर पर बातचीत चल रही है और सभा स्थल में पांव रखने की जगह नहीं है। मेरी एक मित्र अनुभा भोंसले छु्ट्टी लेकर मेले में आई थी, अपने एक लेखक को सुनने। आंधे घंटे के भाषण के लिए दिल्ली से आई थी। मुझे यकीन नहीं हुआ कि न्यूज़ टेलीविज़न में काम करने वाली अनुभा के भीतर किताब और लेखकों के लिए इतना वक्त है। बार-बार पूछता ही रहा कि कवर करने आई हो। शायद हम उस धारणा और भ्रम के शिकार हैं कि कोई लेखकों के लिए वक्त ही नहीं निकालेगा।


इस फेस्टिवल में वो नौजवान तबका ऑटोग्राफ बुक लिये घूम रहा था जिसे अक्सर हम खारिज करते रहते हैं। कई स्कूलों के बच्चे भी यहां लाए गए जिन्हें इन गंभीर विषयों से दो-चार होने का मौका मिला। अच्छा भी लगा कि इनके जीवन में सिर्फ सलमान खान या रिकी मार्टिन ही हीरो नहीं बल्कि ओरहान पामुक या गुलज़ार भी हैं। जयपुर के पहले गर्ल्स स्कूल की अंग्रेजी की टीचर अपनी छात्राओं को लेकर हिन्दी के लेखकों से मिला रही थीं। वो चाहती थी कि उनके बच्चों में हिन्दी के प्रति संस्कार और बेहतर हों। वो पूछ रही थीं कि क्या-क्या किया जा सकता है। कम से कम उन्हें यह मेला मौका तो दे ही रहा था। एक और बात खास है। जयपुर लिटरेचल फेस्टिवल में किताबें को बेचने के लिए भीड़ नहीं बुलाई गई है। भीड़ आई है लेखकों से मिलने। किताबों के बिजनेस से ज्यादा विषय पर चर्चा है। एक लड़की 1857 पर पाठ कर रहे महमूद फ़ारूक़ी और मृणाल पांडे से जोश में पूछती है कि क्या हम इस क्रांति में शर्मिंदा है? हम क्यों नहीं इस पर गर्व करते हैं। महमूद जवाब देते हैं कि मैं भी यही चाहता हूं कि हम गर्व करें।

कहीं ऐसा तो नहीं कि हम किताबों के प्रति उनकी गंभीरता को इसलिए नकार रहे हैं कि वे अंग्रेजी में बोलते हैं या अंग्रेजी दां हैं। उनकी एक आर्थिक हैसियत है। एक किस्म का वर्ग-भय भी है। साहित्य तो सबका होता है। इसमें कोई भी लेखक ऐसा नहीं था जो अंग्रेजी और पैसे के दम पर कमज़ोरों को कुचल देने की वकालत कर रहा था। बल्कि बता रहा था कि कैसे उन्होंने अपने कमज़ोर हालात के क्षणों में साहित्य को ज़िन्दा रखा। बेहतर होगा कि हिन्दी के लोग भी बड़ी संख्या में पहुंच कर उन्हें अल्पमत में कर दें। वैसे हिन्दी के लोग भी खूब आए। यह फेस्टिवल अच्छा है और सबका है। ऐसे फेस्टिवल हिन्दी के लोग भोपाल में कर सकते हैं। जहां किताबें न बिकें बल्कि लेखक मिलें। जहां विनोद कुमार शुक्ल भटकते हुए दिख जाएं, कुछ समय के लिए अशोक वाजपेयी हॉल में बैठकर युवाओं को सुनते दिख जाएं। जैसा जयपुर में दिखा,वैसा भोपाल में भी दिख सकता है।

12 comments:

मनोज पटेल said...

सचमुच काश ऐसा आयोजन भोपाल या लखनऊ में होता. आपने ठीक रेखांकित किया, जयपुर को वाकई ऐसे आयोजन से नई पहचान मिली है.

Dr. J Banerjee said...

Ravish ji
Aap ke is topic se hatkar kuch kehna chahti hun. Bahut dino se man mein yeh baat chal rahi hain ki aakihir hum kis samaj mein reh rahe hain- Kahin khule aam logo ko zinda jala diya jata hain, kahin mehangai ke mare dum nikla ja raha hain lekin hum sab kya itne moti chamdi ke ho gaye hain ki kuch farak hi nahin padh raha hain... mujhe yaad hain hum jab skool jate the to kai baar lautte huye logo ka julus dekha karte the ... ek spadan ka ehsas hota the... par is zindagi mein saab bhage chale ja rahe... par manviya spandan nahin hain.... kya iska kuch kiya ja sakta hain... LPG world mein hum saab chalte firte murde ban gaye hain.. haan par yeh murde self centered hain.. sirf apne bare main sochte hain...

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

आपकी पैनी नज़र और अनूठा अन्दाज़े-बयां!

Rohit Sharma said...

Ravish ji,
hamare samaaj me ab english ko adhik manyta dete hain kyonki hindi ek low level ke roop pe dekhi or kahi jati hai...mene jab ek bacche se sawal kiya ki woh kyon english me baat cheet karte hain to usne kaha hindi me sheila ki jawani sunna or gana pasand hai lakin english me yeh bahut low level ho jata hai.jis desh me hum angrezi ko itni tawazzo dete hain ki mcdonald or KFC me ja ke ghanto ke ghanto angrezi me batityate rehte hain or mere jaisa ek hindi premi ko tucch nazron se yeh keh diya jata hai "why dont you shut up your hindi everytime dude" wahan next generation ko kitabon or sahitye se kya lagav. chahe woh munshi prem chand ho ya orahan pamuk aaj har koi munni ke badnami or sheila ki jawani me hi khoya hua hai.or jab tak is tarah ke gaane jisse hindi badnam hoti hai band hone chiye.is tarah ke gaane hindi ko uncha kabhi nahi utha sakte. subse pehele hindi ko prime language ghoshit or compulsery karna hoga har taraf har jagah.meri matrabasha hindi hai lekin kya koi or meri matrabasha ki samman dega.nahi sirf english bol kar apna varchasf dikhana kahan ki shalinta hai.

Sanjeet Tripathi said...

kash aisa hi koi aayojan Raipur me bhi ho....

वंदना शुक्ला said...

बहुत ही उत्साहवर्धक और अनेक पूर्वाग्रहों को खारिज करती रिपोर्ट ! ,पुस्तकों के साथ यदि पसंदीदा लेखक भी उपलब्ध हों ,तो सोने में सुहागा ...और संभवतः इस आयोजन की सफलता में इस पक्ष की अहम् भूमिका रही ...फिलहाल ,बहुत शुभ संकेत ...जयपुर के लिए भी ...और हिन्दी के लिए भी !...धन्यवाद

संतोष कुमार said...

एक और दिलचस्प रिपोर्ट. मुझे लगता है कि यह साहित्य में लोगों की दिलचस्पी बढ़ रही है. केवल हर जगह में इस प्रकार के आयोजन की जरूरत है.

अब हिंदी वैश्विक है और यह सच है ....

rashmi ravija said...

ऐसे आयोजन अक्सर और जगह जगह हों तो निश्चय ही साहित्य को...हिंदी को एक बूस्ट मिलेगा...नई पीढ़ी जो पढने-लिखने से विमुख हो रही है...किताबो की तरफ लौटेगी.

Parul said...

is fest ka jo mahaul tha,vakai aisa kahin hi dekhne ko milta hai!

प्रवीण पाण्डेय said...

पुस्तकों व साहित्य के प्रति लोगों का प्रेम बना रहे।

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

यक़ीनन ऐसे आयोजन युवा पीढ़ी को पुस्तकों की और मोड़ने में सहायक सिद्ध होंगें .....

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

*ओर