दस रुपये का चार सिनेमा



सचमुच मन गदगद हो गया। ज़माने से आम लोगों के मनोरंजन के तौर-तरीके और अधिकार पर रिपोर्ट कर रहा हूं। मल्टीप्लेक्स ने ऐसा धकियाया कि आम आदमी पान के खोमचे में चल रहे सिनेमा को खड़ा हो कर आधा-अधूरा देख काम पर चला जाता है तो कई लोगों ने कई सालों से सिनेमा हॉल में फिल्म ही नहीं देखी। पिछले साल सिनेमा का सिकुड़ता संसार पर रवीश की रिपोर्ट बनाई थी। ये रिपोर्ट www.tubaah.com पर है। पीपली लाइव के सह-निर्देशक महमूद फ़ारूक़ी से बात चल रही थी। हम उम्मीद कर रहे थे कि कहीं न कहीं वीडियो हॉल तो होंगे इस दिल्ली में। उस रिपोर्ट के दौरान नहीं मिला। हां सीमापुरी और लोनी बॉर्डर से सटे एक गांव में एक मल्टीप्लेक्स ज़रूर मिला जहां का अधिकतम रेट ४० रुपये था। वैसे अब मेरे पड़ोस के मल्टीप्लेक्स में गुरुवार को पचास रुपये का टिकट मिल रहा है। मल्टीप्लेक्स वाले औकात पर आ रहे हैं।

ख़ैर भूमिका में समय क्यों बर्बाद कर रहा हूं। पहले नज़र पड़ी दिल्ली के एक पुनर्वास कालोनी में लगे इन चार फिल्मी पोस्टरों पर। अजीब से नाम। लोग निहार रहे थे। कैनन के कैमरे से क्लिक करने नज़दीक गया तो ढिशूम ढिशूम की आवाज़ आ रही थी। पर्दा हटाया तो सिनेमा हॉल निकला। कैमरा घुसेड़ दिया। तभी ग़रीब सा मालिक दौड़ा आया कि ये मत कीजिए। दिखा देंगे तो प्रशासन वाले हटा देंगे। सोचिये कि ये ग़रीब लोग कहां जाएगा। जब काम पर नहीं जाता है तो यहीं अपना मनोरंजन करता है। मैंने उसकी बात मान ली और कहा कि मनोरंजन के अधिकार के तहत मेरी नज़र में यह ग़ैरक़ानूनी नहीं है। मैं जगह नहीं बताऊंगा कि कहां देखा। स्टिल लेने दीजिए।

भीतर झांक कर देखा तो कोई सौ के क़रीब लोग ज़मीन पर बैठकर सिनेमा देख रहे थे। ठूंसा-ठेला कर। पूरी शांति और शिद्दत के साथ। लंबा सा हॉल। दूर एक टीवी नज़र आ रहा है। हॉल में स्पीकर की व्यवस्था थी। मालिक ने बताया कि हमारा रेट ग़रीब लोगों के हिसाब से है साहब। दस रुपये में चार सिनेमा या फिर पांच रुपये में दो सिनेमा। जो पांच रुपये देता है उसको दो सिनेमा के बाद बाहर निकाल देते हैं। ये कहां जाएंगे। यहां से शहर इतनी दूर है कि मटरगस्ती के लिए भी नहीं जा सकते। कोई पार्क नहीं है। घर इतना छोटा है कि छुट्टी के दिन कैसे बैठे। बस यहीं चले आते हैं मनोरंजन के लिए। सिनेमा को इसी रेट पर उपलब्ध कराने का मालिक ने जो क्रांतिकारी कार्य किया है वो उनको जवाब है जो चंद लोगों के मुनाफ़े के लिए एंटी पाइरेसी का अभियान चलाते हैं और सरकार से रियायती ज़मीन लेकर मल्टीप्लेक्स बनाते हैं। इस तरह से ठूंसा कर तो मैंने बहुत दिनों से कोई फिल्म ही नहीं देखी है। पीपली लाइव और दबंग में भीड़ देखी थी। आज ही नो वन किल्ड जेसिका नाम की एक ख़राब डॉक्यूमेंट्री देखने गया था। दस लोग थे। आम आदमी को बाज़ार से निकाल कर बाज़ार बनाने वालों को समझ आनी चाहिए कि उनका सिनेमा मल्टीप्लेक्स से बेआबरू होकर उतरता है तो इन्हीं गलियों में मेहनत की कड़ी कमाई के दम पर सराहा जाता है। सरकार को कम लागत वाले ऐसे सिनेमा घरों को पुनर्वास कालोनियों में नियमित कर देना चाहिए। टैक्स फ्री।

पिछले एक महीने से दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में घूम रहा हूं। अजीब-अजीब चीज़ें मिल रही हैं। बिना नाम वाले इस सिनेमा हॉल को देखने के बाद रहा नहीं गया। आज इस सवाल का साक्षात जवाब मिल ही गया कि चाइनीज़ डीवीडी क्रांति के बाद भी वो बड़ी आबादी अपना मनोरंजन कैसे कर रही है जो न तो सेकेंड हैंड टीवी खरीदने की हालत में है न ही चाइना डीवीडी। दस रुपये में चार सिनेमा का रेट। वाह।

22 comments:

रंजन said...

बात उस समय की होगी जम हम लोगों ने मैट्रिक किया था ! "बारात" में नाचने वाली की जगह "विडियो" ले लिया था ! पटना से गाँव जाने के लिये "विडियो कोच" में जाने लगा ! मिस्टर इंडिया , कर्मा जैसी अनगिनत सिनेमा मैंने "विडियो" में ही देखा था - भीड़ में सबसे आगे - पालथी मार के ! कोई भेद भाव नहीं !

सतीश पंचम said...

इस तरह के विडियो पार्लर आपको अमूमन उन इलाकों में दिख जाएंगे जहां कि कबाड़ी का कारोबार, लकड़ी या कि ट्रक ड्राईवरों के जमा होने अड्डा हो। इस तरह के कई इलाके यहां मुंबई में भी दिख जाएंगे। शिवड़ी के ट्रक वालों के पास चले जाइये या फिर कुर्ला के कल्पना थिय़ेटर से कुछ दूर वहां पर तीन चार विडियो पार्लर दिख जाएंगे।

औऱ हां, आप ने जो ये पोस्टर देखे जरूरी नहीं कि अंदर वही फिल्म चल रही हो। वहां पर कोने अतरे ध्यान देंगे तो एकाध एडल्ट फिल्मों का भी सैपल वगैरह रखा मिलेगा। संभवत: वह मालिक इसी के चलते भी दौड कर आपके पास आया हो।

बाकी प्रशासन और पुलिस वाले जानते तो सभी हैं कि फलां जगह क्या चल रहा है, हफ्ता उन तक भी पहुंचता है।

भला ऐसा हो सकता है कि उनकी नाक के नीचे कोई फ्री फंड में पोस्टर लगा कर सालों से धंधा कर ले ।

वैसे भी मेरी नज़र में भ्रष्टाचार प्याज की तरह है । ज्यादातर लोगों का इसके बिना काम नहीं चलता। सरकारी वालों का तो और। जो प्राइवेट में हैं तो उनमें भी राडियॉटिक एलीमेंट्स होते हैं :)

वैसे प्याज और लहसुन कई लोग नहीं भी छूते ठीक वैसे ही जैसे कि अत्यल्प लोग भ्रष्टाचार नहीं करते :)

बढ़िया पोस्ट है।

Rahul Singh said...

कौन कहता है महंगाई डायन.

Rama Sinha said...

Bahut hi ummada....dil ko chhu gaya

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

आपकी हर पोस्ट में असली भारत दिख जाता है... यकीन नहीं होता आज भी ऐसे सिनेमा चलते हैं.....

संतोष कुमार said...

Ravish Jee aap india dekha dete hai. aise video hall aur bhi jagaho me bhi chal rahe hai. Gurgoan me bhi. Aap ki rai ekdum sahi hai. aaj bharat me kitne log original software use karte hai , kafi kam. Tu in pirated dvd aur movies se kiya dusmani. Garib ku bhi haq hai , india me.

प्रवीण पाण्डेय said...

यह भी है भारत।

अजित वडनेरकर said...

हिन्दुस्तान के औसत अर्धशहरी माहौल का ज़रूरी हिस्सा बन गए थे ये वीडियो थिएटर करीब ढाई दशक पहले। वहाँ से इश्क की पेंगें भी शुरू होती थी। मेरे कस्बे में भी यही हाल था। क़रीब पच्चीस साल से भी पहले एक व्यंग्य लेख लिखा था इस मज़मून पर। इन्दौर के नई दुनिया में छपा था, संपादकीय पेज पर।

मज़ा आ गया आपको पढ़ कर। पुरानी यादें ताज़ा हुईं।

Dr Parveen said...

आम आदमी को बाज़ार से निकाल कर बाज़ार बनाने वालों को समझ आनी चाहिए कि उनका सिनेमा मल्टीप्लेक्स से बेआबरू होकर उतरता है तो इन्हीं गलियों में मेहनत की कड़ी कमाई के दम पर सराहा जाता है।.....
बहुत सही लिखा है। फिल्म रोटी का गीत याद आ गया....यह जो पब्लिक है... यह चाहे तो सर पे बिठा ले, चाहे फैंक दे नीचे !

rahul mishra said...

AGAR AAP SIR UP K CHOTE CHOTE QASBO ME JAYENGE TO AAP VAHA RS. 2 PE AK MOVIE DEKH SAKTE HAI YE HAI MERA DESH HAI MERA BHARAT MAHAN

krishnamoorthi said...

Kajal Agarwal

mrityunjay kumar rai said...

majaa aa gaya padhkar

शोभना चौरे said...

जो हम लोग ढाई दशक पहले छोड़ आये वहा आज ये लोग है जब ये लोग कुछ कमाकर टी..vi .kahrid lege tab tak dusre लोग aa jayenge aise daour me .

yahi to hmara bharat है
yahi jivan kram chlta rhega .
sachhe bharat ki sachhi tasvir dikhai hai apne .

vibidha said...

प्रवीण जी यह भी भारत नहीं यही ही भारत है

saurav said...

sir....
ye hai capitalist bharat ke barthe kadam.......
aapki wo line ki multiplex wale aukaat par aa rahein hain capitalist ke vampire attitude to suck the labor blood ko saaf dikha rahi hai........

मधुकर राजपूत said...

शहर के आउटस्कर्ट्स में और शहर के बीच बसे ऐसे गांवों में जहां मजदूर वर्ग सस्ते किराए पर रहता है ऐसे कई सिनेमा मिल जाएंगे। ऑफर अलग अलग होते हैं। सुबह कोई और मूवी शाम को कोई और मूवी और रात में कोई और। 3 रुपये से लेकर 7 रुपये तक का टिकट है। 3 रुपये में बोरा अपना बिछाकर बैठना पड़ता है। नोएडा के करीब छलेरा, गिझौड़, भंगेल, खोड़ा में ऐसे कई सिनेमा अपनी जगह बदल-बदलकर चलते रहते हैं। इन्हें इलाकाई भाषा में मंडुआ कहा जाता है। कहीं कहीं वीडियो प्रोजेक्टर लगाकर धुंधले से बड़े पर्दे का इंतज़ाम भी मिल जाता है। यहां बड़े पैमाने पर लोग ''पिच्चर'' देखने आते हैं। नोएडा आने के बाद मैंने खुद 4 मूवी ऐसे मंडुओं में पड़ोस वाले से बीड़ी मांगकर पीते हुए देखी हैं। 3 रुपये का टिकट लेकर जाता था लेकिन अपना बोरा नहीं। फिर कोई न कोई ऐसा मिल ही जाता था जो खिसककर अपने बोरे पर मेरे पिछवाड़े के लिए जगह बनाकर अपने बड़े दिल का परिचय देता था। नोएडा से पहले एक बार अपने यहां ही अनिल कपूर की बेटा देखी थी। उसके बाद यहां दोबारा वही तज़ुर्बा करने का मन किया। सो नोएडा के सबअर्ब्स में इन मंडुओं की तलाश में लग गया और ढूंढने के बाद शौक पूरा किया। इन मंडुओं ने लोकल रेहड़ी वालों को भी आकर्षित किया है। कहीं कहीं इंटरवल भी होता है और नहीं भी होता तो बाहर मक्का की खील भून रहे ठेले से लोग बीच बीच में 2 रुपये की थैली पकड़ लेते हैं और मज़े से खील चबाते हुए मूवी देखते हैं।

रविकान्त said...

वाह रवीश!

एक ज़माना था जब विमला, कमला और गुलाब नामक थिएटर की कंपनियाँ मलेमास के राजगीर मेले में अपने शो करती थीं, टिकट लगाकर। उस ज़माने तक सरकार फ़िल्म देखने की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए प्रॉजेक्टर लेकर गाँव-गाँव घूमती थी। हमने भी नीम के पेंड़ के नीचे कुछ शिक्षाप्रद और धर्मप्रधान फ़िल्में, जैसे संत ज्ञानेश्वर, आदि देखी थीं। फिर सिनेमा धीरे-धीरे आम हुआ, वीडियो के बाद आमतर। लेकिन मल्टीप्लेक्स ने उसे ख़ास लोगों की ख़ास पसंद बनाने की जो फिर से कोशिश की है, वह ज़ाहिर है बहुत सफल नहीं होने वाला है। लोग 'टाटा स्काय' पर भी 20-30 रूपये में परिवार-भर का मनोरंजन कर रहे हैं, और सस्ती नक़ली सीडियाँ तो ख़रीद ही रहे हैं। मज़ेदार बात ये है कि ये तकनीकी बदलाव ही हैं, जो लोगों तक लोगों का मनोरंजन पहुँचाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं, न कि लोकरंजक होने का दंभ भरकर अपना उल्लू सीधा करनेवाले फ़िल्मी प्रोड्यूसर, जिनका वश चले तो सिर्फ़ विदेशों में सिनेमा दिखाकर ख़ुश हो लें, अगर वहाँ से पूरा पैसा वसूल हो जाए। उनका वश चले तो हर नक़ली फ़िल्म के ग़ैर-आधिकारिक प्रदर्शन पर पाबंदी लगा दें, बग़ैर इसकी परवाह किए कि उनकी टीआरपी वहाँ से भी आती हैं, जहाँ नीटर नहीं लगे हैं।

रवीश, किताबों के डीलक्स संस्करण और पेपरबैक पेश करने की पुरानी परंपरा रही है। तकनीक का स्वरूप बदल गया है।
शुक्रिया, रविकान्त

नीरज said...

वाह रवीश जी
मैंने अभी अभी ब्लोग्स पढ़ना शुरू किया और आपके पोस्ट से मेरा पाला पड़ गया |आपसे प्रभावित होकर मैंने भी लिखना शुरू किया है |आपके पोस्ट में जीवन्तता होती है | बिलकुल आम आदमी से जुडी हुई | मैं बहुत प्रभावित हूँ |

shekhar suman said...

भारत की विशेषता ही यही है, कहीं २०० रुपये में एक फिल्म और कहीं १० में ४....
इस तरह फिल्में देखने का मज़ा ही कुछ और है....

मनहर said...

मामा जी के साथ पटना के रिजेन्ट हाल में पहली फिल्म कयामत से कयामत तक देखी थी
मामा जी भी फिल्मो के शौकीन थे
उसके बाद फिलमो के शौक हो गया कई बार विडीयो पर फिल्मे देखी अब घर में होम थियेटर आ गया पर
वो नमक नहीं अभाव में वस्तू कितनी प्यारी हो जाती है

प्रदीप कुमार said...

mera bhi blog visit karen aur meri kavita dekhe.. uchit raay de...
www.pradip13m.blogspot.com

abhishek said...

hi ravish sir
mein aapke saare ravish ki report dekhi hai
aap jaise logon ki sahi mein jarurat hai media mein
aapke kaam ko salaam
jai hind