....और गई गेंद चौधरी के खेत में




पश्चिम उत्तर प्रदेश के गढ़ मेले को कवर करने के रास्ते में गन्ने के खेत में हो रहे क्रिकेट टूर्नामेंट पर नज़र पड़ गई। जिस शिद्दत से मैच का आयोजन किया गया था उसे देखकर मुझे जैसे तदर्थ खेल प्रेमी को भी अच्छा लगा। मुरादाबाद के पास के गांवों के बीच टूर्नामेंट चल रहा था। बाउंड्री पर झंडे लगाए गए थे। गन्ने के खेतों के बीच के खाली खेत को मैदान बनाया गया। सिर्फ पिच समतल थी। क्रिकेट के ऐसे नज़ारे आम हैं। बहुत ज़माने से हैं। फिर समाज की जीवंतता झलकती रहती है तो अच्छा ही लगता है। हमारा मेट्रो मन थोड़ा देर के लिए लोकल लेवल पर आ जाता है।


बाउंड्री पर लाइव कमेंट्री भी चल रही थी। सैय्यद और अफ़रोज़ पिच पर डटे हुए थे। जंग लगे भोपूं से स्थानी धोनी सहवाग की खूबियां बखान की जा रही थीं। बगल में बर्गर और पैटीज बेचने वाला भी आ गया था। सीमा रेखा के बाहर गांव के समर्थक नौजवान तालियां बजा रहे थे। मैं तस्वीरें ले रहा था। कमेंटेटर ने कहा और ये गई गेंद सीमा रेखा से भी बाहर फलाने चौधरी के खेत में। कमेंटेटर को क्रिकेट के अलावा भी कई चीज़े मालूम थीं।

12 comments:

मनीष राज मासूम said...

apano eha aisane khel hola !

Rahul Singh said...

कमेन्‍ट्रेटर, विशेषज्ञ भी है.

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर, शास्त्रीजी भी क्रिकेट के अतिरिक्त बहुत कुछ सुनाते हैं।

जवाहर चौधरी said...

इ किरकिटवा !!!
ससुरा गांवोंन को भी बरबाद कर डालेगा ।
अरे ये भी कौनो खैल हय घ्
सारा देस टूंगता रहता है टीवी पर !
और फिर भी पेट नहीं भरता !

Satish Chandra Satyarthi said...

हमलोगों के गाँव के क्रिकेट मैदान के बगल में जिनका खेत था उनका नाम आज तक नहीं मालूम.. उनकी तोंद की वजह से उनको मदडू सिंह बुलाया जाता था.. तो कमेंटेटर बोलता था.. 'और ये गयी गेंद बाबू मदडू सिंह के खेत में.. फील्डर पीछे-पीछे.. और अब मदडूबाबू पूरब से लाठी लेके गरियाते हुए आ रहे हैं.. खिलाड़ी कृपया थोड़ी देर के लिए सुरक्षित स्थान पर छुप जाएँ.." हाहाहा

सम्वेदना के स्वर said...

अपने "मैट्रो मन" की खूब कही आपने रवीश भाई!

डॉ टी एस दराल said...

वाह मज़ा आ गया ।
क्या खूब पकड़ा है ।
सुन्दर चित्रावली ।

संतोष कुमार said...

Ravish Jee Namaskar,
Aaj ka blog padh kar bachpan yaad aa gaya , tab hum log colony me hua karte the aur khet ko maidan bana liya tha aur naam bhi diya tha apna "Sydney" par hua Patwari dukandar ka daar tha agar ball gayi uske ghar tab nyee ball leni padti thi chandra kar ke 2 -2 rupey sab dost milate the, par ek upsoss hamesha raha ki Patwari ka beta cricket nahi khelta tha.

नीरज said...

Ravish ji, kamaal ki rachnatmakta hai, bahut khoobsoorat.

anil yadav said...

ये पीपली क्रिकेट है....

amar singh said...

badi majedar baat kahi aapane ravish ji, gaon men kai jagah aise drishy mil jaate hain jab loudspeakar se log commentry karate hain.
badi majedar baaten likhatae hain apane blog men aap bhi ravishji,

Kkapil said...

after a long time got a blog to read from your side of your offical blog web page http://naisadak.blogspot.com/
last blog was
बोल के लब आज़ाद हैं तेरे (मनमोहन की चुप्पी पर विशेष)
well we all viewers would like to know your views on the new language called "hinglish" by using english & hindi both.
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